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नेहरू प्लेस में अवैध रेहड़ी-पटरी पर अब सख्ती: दिल्ली हाईकोर्ट ने घोषित किया नो-हॉकिंग और नो-वेंडिंग जोन,

नेहरू प्लेस में अवैध रेहड़ी-पटरी पर अब सख्ती: दिल्ली हाईकोर्ट ने घोषित किया नो-हॉकिंग और नो-वेंडिंग जोन, 12 अक्टूबर के बाद शुरू होगी कार्रवाई

       दिल्ली के प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में शामिल नेहरू प्लेस डिस्ट्रिक्ट सेंटर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने तय हिस्से को छोड़कर पूरे डिस्ट्रिक्ट सेंटर क्षेत्र को नो-हॉकिंग और नो-वेंडिंग जोन घोषित कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि 12 अक्टूबर 2026 के बाद नगर निगम दिल्ली यानी MCD इस क्षेत्र में अवैध रूप से रेहड़ी-पटरी लगाकर कारोबार करने वाले विक्रेताओं को हटाने की कार्रवाई कर सकती है।

नेहरू प्लेस लंबे समय से दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों, अधिकृत विक्रेताओं और प्रशासन के बीच विवाद का केंद्र रहा है। यहां बड़ी संख्या में लोग वर्षों से छोटे स्तर पर कारोबार कर अपनी आजीविका चलाते रहे हैं। दूसरी ओर, अदालत और प्रशासन के सामने यह सवाल भी लगातार रहा है कि क्या निर्धारित नो-वेंडिंग क्षेत्र में इस तरह कारोबार की अनुमति दी जा सकती है।

अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश से स्थिति काफी हद तक स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। अदालत ने जहां अनधिकृत विक्रेताओं को हटाने का रास्ता साफ किया है, वहीं अधिकृत विक्रेताओं के लिए वैकल्पिक स्थान और उनके अधिकारों पर कानून के तहत निर्णय लेने की व्यवस्था भी की है।

नेहरू प्लेस में 400 से ज्यादा विक्रेता

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि वर्तमान में नेहरू प्लेस डिस्ट्रिक्ट सेंटर में 400 से अधिक विक्रेता कारोबार कर रहे हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिनके पास वैध वेंडिंग अधिकार नहीं हैं।

अदालत को बताया गया कि इन सैकड़ों विक्रेताओं में केवल 90 विक्रेताओं को अधिकृत रूप से वेंडिंग की अनुमति प्राप्त है। इसका मतलब यह हुआ कि बाकी बड़ी संख्या में लोग ऐसे क्षेत्र में कारोबार कर रहे हैं, जिसे पहले ही नो-हॉकिंग और नो-वेंडिंग क्षेत्र घोषित किया जा चुका है।

अदालत ने इस स्थिति को देखते हुए पुराने आदेशों के पालन पर जोर दिया। कोर्ट के सामने यह भी बताया गया कि नो-वेंडिंग जोन को लेकर पहले भी कई आदेश जारी हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग वहां कारोबार करते रहे हैं।

हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि अदालत के आदेश केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकते। यदि किसी क्षेत्र को कानून और न्यायिक आदेश के तहत नो-वेंडिंग जोन घोषित किया गया है तो संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि उस आदेश को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

12 अक्टूबर के बाद MCD कर सकेगी कार्रवाई

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 12 अक्टूबर 2026 के बाद MCD नेहरू प्लेस डिस्ट्रिक्ट सेंटर में अनधिकृत विक्रेताओं को हटाने की कार्रवाई कर सकती है।

यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद निगम को कार्रवाई करने के लिए अदालत की ओर से कोई अलग अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। यानी निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद MCD अपने अधिकार क्षेत्र के तहत नो-वेंडिंग जोन में मौजूद अनधिकृत विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।

हालांकि, इस पूरी कार्रवाई में दिल्ली पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि वह MCD और DDA के साथ मिलकर अदालत के आदेश को लागू कराने में सहयोग करे।

इससे साफ है कि अदालत इस बार आदेश के अनुपालन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी समन्वय चाहती है।

90 अधिकृत विक्रेताओं को मिली राहत

हाईकोर्ट के आदेश का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उन 90 विक्रेताओं से जुड़ा है, जिन्हें वर्तमान में अधिकृत रूप से वेंडिंग की अनुमति मिली हुई है।

अदालत ने इन विक्रेताओं को तत्काल पूरी तरह बेरोजगार करने के बजाय उनके लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था का रास्ता खोला है। आदेश के अनुसार, 12 अक्टूबर से इन 90 विक्रेताओं को नेहरू प्लेस के पास स्थित एक वैकल्पिक स्थान पर कारोबार करने की अनुमति दी गई है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस वैकल्पिक स्थान पर कारोबार करने की अनुमति को इन विक्रेताओं का अंतिम वेंडिंग अधिकार नहीं माना जाएगा।

उनके वास्तविक अधिकार और भविष्य में कहां वेंडिंग की अनुमति दी जाएगी, इसका फैसला कानून के तहत गठित संबंधित टाउन वेंडिंग कमेटी करेगी।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि अदालत के आदेश के कारण अनधिकृत गतिविधि पर रोक लगे, लेकिन जिन विक्रेताओं के पास पहले से वैध अनुमति है, उनकी रोजी-रोटी का सवाल भी पूरी तरह नजरअंदाज न हो।

TVC-II तय करेगी किसे मिलेगा वेंडिंग सर्टिफिकेट

हाईकोर्ट ने इस मामले में टाउन वेंडिंग कमेटी-II यानी TVC-II की भूमिका को महत्वपूर्ण माना है।

अदालत के अनुसार, TVC-II के गठन के बाद इन 90 विक्रेताओं के मामलों पर विचार किया जाएगा। कमेटी यह तय करेगी कि संबंधित विक्रेताओं को वेंडिंग सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए या नहीं।

इसके साथ ही यदि किसी विक्रेता को वेंडिंग की अनुमति दी जाती है तो यह भी तय किया जाएगा कि उसे किस स्थान या क्षेत्र में कारोबार करने की अनुमति मिलेगी।

अदालत ने TVC-II को इस प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने की अनुमति नहीं दी है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि कमेटी के गठन के बाद दो महीने के भीतर इन 90 विक्रेताओं के संबंध में निर्णय लिया जाए।

फैसला होने के बाद संबंधित विक्रेताओं को भी इसकी जानकारी दी जानी होगी।

इस तरह अदालत ने एक ओर नो-वेंडिंग जोन में अवैध कारोबार पर रोक लगाने का रास्ता साफ किया है, वहीं दूसरी ओर अधिकृत विक्रेताओं के मामलों को कानून के तहत सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया में रखने का निर्देश दिया है।

नेहरू प्लेस में वेंडिंग विवाद की कहानी पुरानी है

नेहरू प्लेस में रेहड़ी-पटरी को लेकर विवाद कोई नया मामला नहीं है। इसकी जड़ें करीब डेढ़ दशक से भी ज्यादा पुरानी हैं।

वर्ष 2009 में एक आदेश के तहत 67 विक्रेताओं को नेहरू प्लेस में एक निर्धारित स्थान पर कारोबार करने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद समय के साथ इलाके में वेंडिंग को लेकर विवाद बढ़ता गया।

बाद में हाईकोर्ट ने पूरे डिस्ट्रिक्ट सेंटर को नो-हॉकिंग और नो-वेंडिंग जोन घोषित कर दिया। इस निर्णय के बाद भी जमीन पर स्थिति पूरी तरह नहीं बदली।

वेंडरों की संख्या बढ़ती गई और प्रशासन के लिए आदेश का पालन कराना चुनौती बनता रहा।

मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, लेकिन वहां से भी नो-वेंडिंग जोन की स्थिति में हस्तक्षेप नहीं किया गया।

इसके बावजूद नेहरू प्लेस में रेहड़ी-पटरी लगाने का सिलसिला जारी रहा। हाईकोर्ट ने ताजा सुनवाई के दौरान इसी लंबे विवाद और पहले के आदेशों का संदर्भ लिया।

अदालत के आदेश के बावजूद क्यों नहीं हटे विक्रेता?

नेहरू प्लेस जैसे बड़े व्यावसायिक केंद्रों में फुटपाथ और सार्वजनिक स्थानों पर छोटे विक्रेताओं की मौजूदगी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होती। इसके साथ आजीविका, छोटे व्यापार, ग्राहकों की सुविधा, पैदल आवाजाही और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे कई पहलू जुड़े होते हैं।

एक ओर प्रशासन का तर्क रहता है कि अनधिकृत रेहड़ी-पटरी से यातायात, पैदल आवागमन और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती है। दूसरी ओर छोटे विक्रेताओं के लिए यही स्थान उनकी आय का प्रमुख साधन होता है।

यही कारण है कि ऐसे मामलों में अदालतों को केवल हटाने का आदेश देने के साथ-साथ पुनर्वास और वैकल्पिक वेंडिंग की व्यवस्था पर भी विचार करना पड़ता है।

नेहरू प्लेस मामले में हाईकोर्ट ने इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश की है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसके अनुसार यदि कोई स्ट्रीट वेंडर नो-वेंडिंग जोन में कारोबार कर रहा है तो उसे वहां से हटाया जा सकता है, लेकिन संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था को वेंडर के लिए वैकल्पिक वेंडिंग क्षेत्र उपलब्ध कराने की दिशा में भी व्यावहारिक कदम उठाना चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी सार्वजनिक स्थान पर दुकान लगाने का अधिकार मिल जाता है। बल्कि कानून के तहत वेंडिंग क्षेत्र, वेंडिंग सर्टिफिकेट और स्थानीय व्यवस्था के आधार पर यह तय किया जाता है कि कौन व्यक्ति किस स्थान पर कारोबार कर सकता है।

नेहरू प्लेस मामले में भी अदालत ने इसी कानूनी ढांचे को ध्यान में रखा है।

इसलिए 12 अक्टूबर के बाद अनधिकृत विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई होने की संभावना है, लेकिन अधिकृत 90 विक्रेताओं के मामलों को अलग प्रक्रिया के तहत देखा जाएगा।

आग से सुरक्षा भी अदालत के एजेंडे में

नेहरू प्लेस में रेहड़ी-पटरी और अतिक्रमण का मुद्दा केवल रास्ते खाली कराने तक सीमित नहीं है। अदालत ने फायर सेफ्टी को भी महत्वपूर्ण माना है।

अवैध विक्रेताओं को हटाए जाने के बाद दिल्ली फायर सर्विसेज नेहरू प्लेस डिस्ट्रिक्ट सेंटर का निरीक्षण करेगी।

इस निरीक्षण में यह देखा जाएगा कि इलाके में आग लगने जैसी आपात स्थिति में फायर टेंडर और राहत दल के पहुंचने के लिए पर्याप्त रास्ता उपलब्ध है या नहीं। साथ ही आपातकालीन निकास, सार्वजनिक मार्ग और अन्य सुरक्षा पहलुओं की भी जांच की जा सकती है।

निरीक्षण के बाद फायर सर्विस को अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट के समक्ष दाखिल करनी होगी।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक इलाकों में अस्थायी दुकानें और रेहड़ी-पटरी कई बार आपातकालीन रास्तों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में छोटी सी आग भी बड़ी दुर्घटना का रूप ले सकती है।

प्रशासन के सामने अब बड़ी जिम्मेदारी

हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद अब असली परीक्षा प्रशासन की है। 12 अक्टूबर के बाद यदि MCD कार्रवाई करती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्रवाई अदालत के निर्देश और लागू कानून के अनुसार हो।

एक तरफ 400 से अधिक विक्रेताओं में से अनधिकृत विक्रेताओं को हटाने का प्रश्न है, दूसरी तरफ 90 अधिकृत विक्रेताओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था है। इसके अलावा TVC-II को निर्धारित समय के भीतर उनके मामलों पर निर्णय लेना होगा।

दिल्ली पुलिस, MCD और DDA के बीच समन्वय भी जरूरी होगा ताकि कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े।

वेंडिंग कानून का उद्देश्य केवल सड़क और फुटपाथ खाली कराना नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि वास्तविक स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका और उनके कानूनी अधिकारों को एक निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से सुरक्षित किया जाए।

आगे क्या होगा?

अब 12 अक्टूबर 2026 के बाद नेहरू प्लेस में स्थिति बदलने की उम्मीद है। MCD को नो-वेंडिंग क्षेत्र से अनधिकृत विक्रेताओं को हटाने की कार्रवाई का अधिकार मिल जाएगा और दिल्ली पुलिस इस प्रक्रिया में सहयोग करेगी।

दूसरी ओर, 90 अधिकृत विक्रेताओं को फिलहाल वैकल्पिक स्थान पर कारोबार करने की अनुमति दी गई है। उनका स्थायी अधिकार अभी तय नहीं हुआ है। TVC-II यह फैसला करेगी कि उन्हें वेंडिंग सर्टिफिकेट मिलना चाहिए या नहीं और यदि मिलता है तो वे किस स्थान पर कारोबार कर सकेंगे।

कमेटी को गठन के बाद दो महीने के भीतर फैसला करना होगा।

इसके बाद फायर सर्विसेज का निरीक्षण और उसकी रिपोर्ट भी इस मामले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

निष्कर्ष

नेहरू प्लेस को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला केवल अवैध रेहड़ी-पटरी हटाने का आदेश नहीं है। इसमें सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल, छोटे कारोबारियों की आजीविका, वेंडिंग अधिकार, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक सुरक्षा—इन सभी पहलुओं को साथ रखा गया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि पहले से घोषित नो-हॉकिंग और नो-वेंडिंग जोन में नियमों की अनदेखी जारी नहीं रह सकती। वहीं, जिन विक्रेताओं के पास वैध अनुमति है, उनके अधिकारों का फैसला भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए।

अब 12 अक्टूबर के बाद MCD की कार्रवाई पर सबकी नजर रहेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन अदालत के निर्देश को किस तरह लागू करता है और TVC-II अधिकृत विक्रेताओं के भविष्य पर कितनी जल्दी निर्णय लेती है।

नेहरू प्लेस जैसे व्यस्त बाजार में व्यवस्था और आजीविका के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। हाईकोर्ट के इस आदेश ने फिलहाल दोनों पक्षों के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढांचा तय कर दिया है—अनधिकृत वेंडिंग पर कार्रवाई होगी, जबकि वैध अधिकार का दावा करने वाले विक्रेताओं के मामलों का फैसला कानून के अनुसार किया जाएगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।