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दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करने का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करने का आदेश, कोर्ट में कथित गलत बयान का मामला

        दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के छह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश देकर जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला अदालत के समक्ष एक सरकारी पत्राचार को लेकर कथित तौर पर गलत जानकारी पेश किए जाने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों में आगे कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है।

जस्टिस मधु जैन ने IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल की याचिका को स्वीकार करते हुए CBI अधिकारियों सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और एमडी आजाद के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की उन धाराओं के तहत अपराध की आशंका जताई है, जो झूठे साक्ष्य, झूठे दावे और न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह करने से संबंधित हैं।

अदालत के निर्देश के मुताबिक, स्पेशल जज (CBI) को अधिकारियों के खिलाफ लिखित शिकायत तैयार कर उसे संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजना होगा। इसके लिए फैसले की प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार सप्ताह का समय दिया गया है।

किन धाराओं के तहत कार्रवाई का निर्देश?

दिल्ली हाईकोर्ट ने जिन धाराओं का उल्लेख किया है, वे सीधे तौर पर न्यायिक कार्यवाही में सत्यता और अदालत के सामने सही तथ्य रखने से जुड़ी हैं। अदालत ने प्रथम दृष्टया निम्न धाराओं के तहत अपराध की आशंका व्यक्त की है—

  • IPC की धारा 191 — झूठे साक्ष्य देना।
  • IPC की धारा 193 — झूठे साक्ष्य देने या गढ़ने के लिए दंड।
  • IPC की धारा 209 — अदालत में धोखे या बेईमानी से झूठा दावा करना।

यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत द्वारा इन धाराओं का उल्लेख किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित अधिकारी दोषी सिद्ध हो चुके हैं। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया आधार पाए जाने के बाद आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। अब संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत और उसके बाद कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही होगी।

क्या है पूरा विवाद?

मामले की जड़ वर्ष 2016 की उस जांच में है, जो IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ CBI द्वारा की जा रही थी। अग्रवाल पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में जांच और अभियोजन की कार्रवाई की गई थी।

इस मामले में जनवरी 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी को अमान्य करार दिया था। अभियोजन की मंजूरी के संबंध में अदालत के फैसले के बाद अग्रवाल को मामले से डिस्चार्ज कर दिया गया।

इसके बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा कि क्या CBI इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। इस संबंध में सरकारी स्तर पर विचार-विमर्श भी हुआ। लेकिन जून 2016 में कानून एवं न्याय मंत्रालय ने मामले को आगे ले जाने के संबंध में अपनी राय दी कि सुप्रीम कोर्ट में आगे कार्यवाही करने का उचित आधार नहीं है।

जुलाई 2016 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग यानी DoPT ने मंत्रालय की इस राय की जानकारी CBI को दे दी थी।

यहीं से आगे चलकर वह घटनाक्रम शुरू हुआ, जो अब दिल्ली हाईकोर्ट के सामने आपराधिक कार्यवाही के निर्देश तक पहुंच गया।

जब्त दस्तावेज वापस मांगने पर सामने आया विवाद

अशोक कुमार अग्रवाल ने जांच के दौरान CBI द्वारा जब्त किए गए दस्तावेजों को वापस लेने की मांग की। इसके लिए उन्होंने CBI से संपर्क किया। इसी सिलसिले में 2 अगस्त 2016 को CBI की ओर से उन्हें जवाब दिया गया।

इस जवाब में कहा गया कि मामले में आगे कानूनी कार्रवाई को लेकर संबंधित मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है। पहली नजर में यह एक सामान्य प्रशासनिक स्थिति जैसी दिखाई दे सकती थी, लेकिन बाद में इसी एक वाक्य ने पूरे विवाद को जन्म दिया।

अग्रवाल की ओर से इस जवाब को चुनौती दी गई और यह मामला अदालत के सामने आया। हाईकोर्ट ने जब संबंधित रिकॉर्ड और फाइलों की जांच की तो उसे पता चला कि जिस समय CBI की ओर से यह कहा गया था कि मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है, उस समय मंत्रालय के साथ वास्तव में ऐसा कोई पत्राचार नहीं हो रहा था।

अदालत के सामने उपलब्ध सामग्री के मुताबिक, उस समय CBI के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार की संभावना और आगे कानूनी राय लेने जैसे विकल्पों पर आंतरिक रूप से विचार किया जा रहा था।

यानी विवाद सिर्फ यह नहीं था कि किसी अधिकारी ने कोई गलत शब्द लिख दिया। सवाल यह था कि अदालत के सामने सरकारी स्तर पर हुई कार्रवाई और पत्राचार की वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर क्यों पेश की गई।

पुराने ड्राफ्ट ने खोला महत्वपूर्ण पहलू

इस मामले में हाईकोर्ट ने CBI की ओर से तैयार किए गए जवाब के अलग-अलग ड्राफ्टों की भी जांच की। यही दस्तावेज अदालत के सामने पूरे मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

अदालत के मुताबिक, जवाब के शुरुआती ड्राफ्ट में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि DoPT ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

बाद के ड्राफ्ट में इस महत्वपूर्ण तथ्य को हटा दिया गया। उसकी जगह हाथ से एक अलग टिप्पणी जोड़ी गई कि मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है।

हाईकोर्ट ने इस बदलाव को महज भाषा की गलती या शब्दों के गलत इस्तेमाल के रूप में देखने से इनकार किया। अदालत के सामने सवाल यह था कि जब रिकॉर्ड में पहले से यह बात स्पष्ट थी कि संबंधित विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था, तो बाद के जवाब में उस तथ्य को हटाकर मंत्रालय के साथ कथित रूप से चल रहे पत्राचार की बात क्यों कही गई?

अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया यह मानने का उचित आधार है कि कोर्ट के सामने गलत बयान रखा गया था।

कोर्ट के सामने सही तथ्य रखना क्यों जरूरी?

न्यायिक व्यवस्था की बुनियाद ही इस सिद्धांत पर टिकी है कि अदालत के सामने पक्षकार और सरकारी एजेंसियां सही एवं पूर्ण तथ्य रखें। खासकर जब किसी जांच एजेंसी की बात हो, तो अदालत उसके रिकॉर्ड और प्रस्तुतियों को गंभीरता से देखती है।

CBI जैसी केंद्रीय जांच एजेंसी जब किसी न्यायिक कार्यवाही में कोई तथ्य प्रस्तुत करती है तो अदालत के लिए वह तथ्य केवल किसी निजी पक्ष की दलील नहीं होता। उसके पीछे सरकारी रिकॉर्ड, जांच की फाइलें और अधिकारियों की आधिकारिक प्रक्रिया जुड़ी होती है।

इसी वजह से अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायालय के सामने जानबूझकर या प्रक्रिया के माध्यम से गलत स्थिति रखी गई, तो इसकी जांच होना जरूरी है।

अदालत ने यह भी देखा कि जवाब केवल एक व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया दस्तावेज नहीं था। उसके तैयार होने, उसमें बदलाव किए जाने, उसकी जांच, अधिकारियों द्वारा प्रक्रिया में शामिल होने, मंजूरी और अंततः उसे अदालत में दाखिल किए जाने तक कई स्तर शामिल थे।

इसी पूरी प्रक्रिया को देखते हुए हाईकोर्ट ने छह अधिकारियों की भूमिका की जांच के लिए आपराधिक शिकायत दर्ज करने का रास्ता अपनाया।

बाद में CBI ने स्थिति स्पष्ट की, लेकिन राहत नहीं मिली

CBI की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि बाद में 9 अगस्त 2016 के जवाब के जरिए स्थिति को स्पष्ट कर दिया गया था। साथ ही यह भी कहा गया कि कथित गलत जानकारी से अशोक कुमार अग्रवाल को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ।

लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

अदालत का दृष्टिकोण यह था कि यदि किसी न्यायिक कार्यवाही में पहले ही कोई गलत या भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किया गया है, तो बाद में उसमें सुधार कर देना अपने आप में उस प्रारंभिक कार्रवाई की जांच की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता।

अदालत ने जवाब तैयार करने की पूरी प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना। इसमें प्रारंभिक ड्राफ्ट, बाद में किए गए बदलाव, फाइल नोटिंग, अधिकारियों की भूमिका, जवाब की जांच और उसकी मंजूरी जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया गया।

यही वजह है कि हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार मानते हुए आपराधिक शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया।

अदालत ने अधिकारियों को दोषी नहीं ठहराया

इस आदेश का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि हाईकोर्ट ने संबंधित छह अधिकारियों को इस चरण पर दोषी घोषित नहीं किया है। अदालत ने केवल यह माना है कि आरोपों और रिकॉर्ड में इतनी सामग्री मौजूद है कि आपराधिक प्रक्रिया शुरू की जा सके और मामले की जांच संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत हो।

आपराधिक कानून में प्रथम दृष्टया आधार और अंतिम दोषसिद्धि के बीच काफी अंतर होता है। किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। आरोपों की जांच, साक्ष्यों की समीक्षा और संबंधित पक्षों को अपना बचाव रखने का अवसर मिलने के बाद ही अदालत अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचती है।

इसलिए इस आदेश को CBI अधिकारियों की अंतिम दोषसिद्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह एक ऐसा न्यायिक निर्देश है, जिसके जरिए अदालत ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले को आपराधिक प्रक्रिया के अगले चरण तक पहुंचाया है।

सरकारी एजेंसियों के लिए क्या संदेश?

दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश सरकारी जांच एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालतों के सामने किसी जांच या सरकारी कार्रवाई का रिकॉर्ड पेश करते समय तथ्यात्मक शुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

किसी फाइल में एक शब्द, एक टिप्पणी या किसी पुराने ड्राफ्ट में किए गए बदलाव का भी न्यायिक महत्व हो सकता है। विशेषकर तब, जब वह बदलाव किसी महत्वपूर्ण सरकारी निर्णय या न्यायालय के सामने रखे जाने वाले तथ्य को प्रभावित करता हो।

इस मामले में शुरुआती ड्राफ्ट और अंतिम जवाब के बीच का अंतर अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल बनकर उभरा। यदि रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्य कुछ और हो और अदालत के सामने प्रस्तुत जानकारी कुछ अलग हो, तो न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।

यही कारण है कि हाईकोर्ट ने केवल यह देखने तक मामला सीमित नहीं रखा कि बाद में स्थिति स्पष्ट हुई या नहीं। उसने यह भी देखा कि प्रारंभिक जवाब किस परिस्थिति में तैयार हुआ, उसमें बदलाव किस स्तर पर हुए और संबंधित अधिकारियों की भूमिका क्या थी।

शिकायत अब मजिस्ट्रेट के पास जाएगी

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। स्पेशल जज (CBI) को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लिखित शिकायत तैयार करके उसे क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजना है। इसके लिए अदालत ने फैसले की प्रति प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई करने को कहा है।

इसके बाद मामला संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा। यानी हाईकोर्ट का आदेश अब उस चरण की शुरुआत करता है, जिसमें आरोपों और उपलब्ध सामग्री को आपराधिक कानून के तहत जांचा जाएगा।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सरकारी एजेंसी के अधिकारियों के आचरण और अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों की विश्वसनीयता का सवाल सीधे जुड़ा हुआ है।

दोनों पक्षों की ओर से कौन पेश हुआ?

अशोक कुमार अग्रवाल की ओर से सीनियर एडवोकेट यशराज सिंह देवड़ा के साथ अधिवक्ता अनुपमा धुर्वे और प्रियांश मोहन श्रीवास्तव ने पैरवी की।

वहीं CBI अधिकारियों की ओर से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) अतुल गुलरिया के साथ अधिवक्ता आर्यन राकेश, विवेक मौर्य, केएम स्वाति और मनीष अदालत में पेश हुए।

आदेश का व्यापक महत्व

दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश का महत्व केवल छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत तक सीमित नहीं है। यह आदेश इस व्यापक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि अदालत के समक्ष सरकारी एजेंसी द्वारा प्रस्तुत जानकारी भी न्यायिक जांच से परे नहीं है।

किसी जांच एजेंसी के पास व्यापक अधिकार और संसाधन होते हैं, लेकिन उन अधिकारों का इस्तेमाल भी कानून और न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में ही होना चाहिए। अदालत के सामने रखे जाने वाले तथ्य रिकॉर्ड के अनुरूप और स्पष्ट होने चाहिए।

इस मामले में 2016 की एक जांच से शुरू हुआ विवाद वर्षों बाद फिर न्यायिक स्तर पर सामने आया। पहले अभियोजन की मंजूरी को चुनौती मिली, फिर अधिकारी को मामले से डिस्चार्ज किया गया, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में संभावित चुनौती को लेकर सरकारी स्तर पर विचार हुआ और अंततः दस्तावेज वापस लेने की मांग के दौरान CBI के जवाब को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया।

अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस पूरे घटनाक्रम का अगला अध्याय मजिस्ट्रेट के समक्ष चलेगा।

फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया ऐसी सामग्री पाई, जिसे नजरअंदाज करना उसके अनुसार उचित नहीं था। इसी आधार पर छह CBI अधिकारियों के खिलाफ IPC की धारा 191, 193 और 209 के तहत शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।

यह आदेश एक बार फिर यह सवाल सामने लाता है कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी सरकारी संस्था की विश्वसनीयता केवल उसके अधिकारों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने रिकॉर्ड और तथ्यों को कितनी पारदर्शिता और सटीकता से रखा जाता है, इससे तय होती है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।