FCRA रजिस्ट्रेशन पर मद्रास हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘घर वापसी’ करने वाले संगठन पर भी लागू होगी रोक, विदेशी फंडिंग को लेकर कही बड़ी बात
जेन मेडिटेशन सेंटर चलाने वाले ट्रस्ट को FCRA रजिस्ट्रेशन देने से केंद्र का इनकार बरकरार; कोर्ट ने कहा- विदेशी अंशदान का अधिकार नहीं, यह अधिक से अधिक एक विशेषाधिकार
विदेशी फंडिंग और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा है कि विदेशी अंशदान हासिल करने वाली संस्थाओं के लिए लागू FCRA के नियम किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई संगठन धार्मिक परिवर्तन जैसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है तो उसके मामले में कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, चाहे वह किसी भी धर्म से संबंधित क्यों न हो।
इसी संदर्भ में अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई कट्टरपंथी हिंदू संगठन ‘घर वापसी’ जैसी गतिविधियों में शामिल होता है तो उसे भी विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए FCRA के तहत पंजीकरण देने से इनकार किया जा सकता है।
अदालत ने यह टिप्पणी कोडाइकनाल स्थित जेन मेडिटेशन सेंटर चलाने वाले कान्जिओन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। ट्रस्ट ने केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA के तहत पंजीकरण देने से इनकार किया गया था।
न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एमडी सुमति की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के निर्णय को बरकरार रखते हुए ट्रस्ट की याचिका खारिज कर दी।
हालांकि, फैसले में धर्म, धार्मिक परिवर्तन और भारत के बहुलतावादी समाज को लेकर अदालत की कुछ टिप्पणियां भी सामने आईं, जिन पर व्यापक चर्चा हो सकती है।
FCRA रजिस्ट्रेशन को लेकर था पूरा विवाद
मामला कोडाइकनाल में संचालित जेन मेडिटेशन सेंटर से जुड़ा है। इसे कान्जिओन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट संचालित करता है।
ट्रस्ट ने विदेशी स्रोतों से मिलने वाले अंशदान को स्वीकार करने के लिए FCRA के तहत पंजीकरण की मांग की थी। लेकिन केंद्र सरकार ने उसका आवेदन स्वीकार नहीं किया।
सरकार के निर्णय के खिलाफ ट्रस्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया।
ट्रस्ट की ओर से अदालत में मुख्य दलील यह थी कि उसका काम Zen Meditation से संबंधित है और इसे धार्मिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ट्रस्ट का कहना था कि ध्यान भारतीय आध्यात्मिक और ध्यान परंपराओं से जुड़ा हुआ है और उसके केंद्र की गतिविधियों को केवल धर्म परिवर्तन या धार्मिक प्रचार के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
दूसरी ओर केंद्र सरकार का पक्ष था कि ट्रस्ट की गतिविधियों में धार्मिक पहलू मौजूद हैं और इसलिए FCRA के तहत पंजीकरण से इनकार करने का निर्णय उचित था।
FCRA की धारा 12(4)(a)(ii) पर अदालत का जोर
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने FCRA की धारा 12(4)(a)(ii) का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि धार्मिक परिवर्तन से संबंधित इस प्रावधान को किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
अदालत की टिप्पणी का महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि कानून सभी धार्मिक संगठनों पर समान रूप से लागू होगा।
इसी बात को समझाने के लिए पीठ ने ‘घर वापसी’ का उदाहरण दिया। अदालत ने कहा कि यदि कोई कट्टरपंथी हिंदू संगठन लोगों के धर्म परिवर्तन या ‘घर वापसी’ जैसी गतिविधियों में शामिल होता है तो उस पर भी यही कानूनी प्रावधान लागू होगा।
अर्थात, अदालत के अनुसार FCRA के तहत धार्मिक गतिविधियों को लेकर जांच का आधार संगठन का धर्म नहीं, बल्कि उसकी गतिविधियां और कानून के प्रावधान होने चाहिए।
विदेशी फंडिंग को लेकर अदालत ने जताई चिंता
अदालत ने विदेशी अंशदान और धार्मिक परिवर्तन के बीच संभावित संबंध को लेकर भी टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि यदि धार्मिक परिवर्तन के उद्देश्य से विदेशी फंडिंग को बिना किसी नियंत्रण के अनुमति दी जाए तो इससे देश की संप्रभुता और सामाजिक संतुलन से जुड़े सवाल पैदा हो सकते हैं।
FCRA का मूल उद्देश्य ही विदेशी अंशदान को विनियमित करना है। अदालत ने इसी व्यापक संदर्भ में कहा कि विदेशी स्रोतों से आने वाली राशि के इस्तेमाल पर निगरानी आवश्यक है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संस्था को विदेशी योगदान प्राप्त करना कोई ऐसा मौलिक या स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं है जिसे हर स्थिति में लागू किया जा सके।
विदेशी योगदान कोई मौलिक अधिकार नहीं
फैसले में अदालत ने कहा कि विदेशी योगदान प्राप्त करने का किसी संस्था को कोई निहित या पूर्ण अधिकार नहीं है।
अधिक से अधिक इसे एक विशेषाधिकार माना जा सकता है, जिसे कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर प्राप्त किया जा सकता है।
इसका अर्थ यह है कि किसी संस्था का धर्मार्थ या सामाजिक संगठन होना अपने आप उसे विदेशी चंदा प्राप्त करने की अनुमति नहीं देता।
यदि संस्था FCRA के तहत पंजीकरण चाहती है तो उसे कानून में निर्धारित आवश्यकताओं और शर्तों का पालन करना होगा। सरकार को आवेदन की जांच करने और कानून के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार है।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के निर्णय को बरकरार रखते हुए ट्रस्ट को FCRA रजिस्ट्रेशन देने से इनकार को सही माना।
ट्रस्ट के संस्थापक की धार्मिक पहचान भी चर्चा में आई
ट्रस्ट की गतिविधियों की प्रकृति पर विचार करते हुए अदालत ने उसके संस्थापक और मुख्य सूत्रधार रेवरेंड फादर अमा सैमी SJ के बारे में भी रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी का उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि वह एक नियुक्त ईसाई पादरी हैं।
ट्रस्ट का पक्ष यह था कि उसका मुख्य काम Zen Meditation से संबंधित है और इसलिए इसे धार्मिक संगठन की गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
लेकिन अदालत ने संस्था की गतिविधियों, उसके संस्थापक की भूमिका और Zen Buddhism की धार्मिक प्रकृति से जुड़े पहलुओं को भी अपने विचार में शामिल किया।
Zen Buddhism को महायान बौद्ध परंपरा का हिस्सा माना
मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने Zen Buddhism को महायान बौद्ध परंपरा की एक शाखा के रूप में देखा।
इसी आधार पर अदालत ने कहा कि FCRA पंजीकरण के लिए आवेदन करते समय ट्रस्ट को अपनी धार्मिक प्रकृति के बारे में स्पष्ट होना चाहिए था।
अदालत के अनुसार संस्था को अपने धार्मिक स्वरूप को छिपाने की जरूरत नहीं थी।
पीठ ने टिप्पणी की कि कोई व्यक्ति या संस्था किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर नहीं रख सकती और बाद में यह नहीं कह सकती कि उसे उस तथ्य का खुलासा करने की आवश्यकता नहीं थी।
फैसले में यह बात भी सामने आई कि अदालत के अनुसार FCRA आवेदन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और संस्था को अपनी वास्तविक प्रकृति के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।
‘तेंदुआ अपने धब्बे नहीं बदलता’ वाली कहावत का जिक्र
फैसले में अदालत ने एक कहावत का भी उल्लेख किया कि “तेंदुआ अपने धब्बे नहीं बदलता।”
इसके बाद पीठ ने हिंदू धर्म और अब्राहमिक धर्मों की प्रकृति को लेकर व्यापक टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म के विपरीत अब्राहमिक धर्म स्वभाव से विशिष्ट माने जाते हैं। फैसले में यह भी कहा गया कि यहूदी, ईसाई और मुस्लिम आस्था परंपराओं में अपने धर्म को एकमात्र सच्चे और पूर्ण रहस्योद्घाटन के रूप में मानने की धारणा पाई जाती है।
यह टिप्पणी फैसले के उन हिस्सों में से है जिसने धर्म और धार्मिक पहचान को लेकर व्यापक दार्शनिक तथा सामाजिक चर्चा को जन्म देने की संभावना पैदा की है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य संबंधित ट्रस्ट पर किसी धार्मिक एजेंडे का आरोप लगाना नहीं है।
ईसाई संस्थानों को लेकर भी टिप्पणी
फैसले में अदालत ने कुछ ऐसे ईसाई संस्थानों का उल्लेख किया जिन्हें धार्मिक परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।
लेकिन अदालत ने तुरंत यह स्पष्ट किया कि वह मौजूदा याचिकाकर्ता ट्रस्ट पर धर्म परिवर्तन का एजेंडा चलाने का आरोप नहीं लगा रही है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। अदालत की ओर से व्यापक सामाजिक और धार्मिक संदर्भों का उल्लेख किया गया, लेकिन उसने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि कान्जिओन ट्रस्ट स्वयं धर्म परिवर्तन की गतिविधि चला रहा था।
मामले का निर्णय मुख्य रूप से FCRA पंजीकरण और ट्रस्ट की गतिविधियों की प्रकृति से जुड़े सवालों पर आधारित रहा।
भारत को बताया ‘सलाद बाउल’, ‘मेल्टिंग पॉट’ नहीं
मद्रास हाईकोर्ट की पीठ ने भारत की सामाजिक और धार्मिक विविधता पर भी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि भारत एक बहुलतावादी देश है। इसके लिए पीठ ने ‘मेल्टिंग पॉट’ और ‘सलाद बाउल’ की उपमा का इस्तेमाल किया।
अदालत ने कहा कि अमेरिका की तुलना में भारत को ‘मेल्टिंग पॉट’ के बजाय ‘सलाद बाउल’ की तरह समझना बेहतर होगा। इसका अर्थ यह है कि अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक समूह अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए एक साझा देश का हिस्सा बने रहते हैं।
फैसले में कहा गया कि यदि कोई एक धार्मिक समूह अत्यधिक प्रभावशाली हो जाए तो भारत के इस बहुलतावादी स्वरूप पर असर पड़ सकता है।
यह टिप्पणी भारत की विविध धार्मिक परंपराओं और सामाजिक सह-अस्तित्व को लेकर अदालत की चिंता को दर्शाती है।
केरल में धार्मिक तनाव का भी जिक्र
अदालत ने अपने फैसले में केरल में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच हालिया तनाव का भी उल्लेख किया।
पीठ ने इस उदाहरण का इस्तेमाल धार्मिक प्रभुत्व और सामाजिक संतुलन से जुड़े सवाल को समझाने के लिए किया।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी विशेष घटना का अदालत द्वारा उल्लेख करना अपने आप उस घटना पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
मामले का मूल मुद्दा FCRA पंजीकरण था और अदालत ने उसी संदर्भ में विदेशी फंडिंग तथा धार्मिक गतिविधियों के बीच संबंध पर विचार किया।
Zen Meditation को धार्मिक नहीं मानने की दलील
ट्रस्ट की ओर से अदालत में सबसे महत्वपूर्ण दलीलों में से एक यह थी कि Zen Meditation को धार्मिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ट्रस्ट का कहना था कि ध्यान भारतीय ज्ञान और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा अभ्यास है और इसे केवल धार्मिक प्रचार के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
लेकिन अदालत ने Zen Buddhism की प्रकृति और ट्रस्ट की गतिविधियों को देखते हुए संस्था के इस पक्ष को स्वीकार नहीं किया।
पीठ ने माना कि Zen Buddhism महायान बौद्ध परंपरा से जुड़ा है। इसलिए ट्रस्ट को FCRA आवेदन में अपनी धार्मिक प्रकृति के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए थी।
भारतीय ज्ञान परंपराओं को लेकर कोर्ट की अलग टिप्पणी
फैसले का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने धार्मिक गतिविधियों और भारतीय ज्ञान प्रणालियों की शिक्षा के बीच अंतर किया।
पीठ ने कहा कि जो संस्थाएं वेदांत, भगवद्गीता, उपनिषद, योग और उनसे जुड़े विषयों की शिक्षा देती हैं, उन्हें सामान्य तौर पर धार्मिक संस्था के बजाय शैक्षणिक या सांस्कृतिक संस्था के रूप में देखा जा सकता है।
इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि किसी भारतीय आध्यात्मिक या दार्शनिक परंपरा का अध्ययन या शिक्षण अपने आप किसी संस्था को धार्मिक संगठन नहीं बना देता।
संस्था की वास्तविक गतिविधियों, उद्देश्य और काम करने के तरीके को देखकर उसकी प्रकृति तय की जानी चाहिए।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में योग, वेदांत, उपनिषद और भारतीय दर्शन का अध्ययन धार्मिक सीमाओं से बाहर भी व्यापक रूप से किया जाता है।
अदालत ने ट्रस्ट को FCRA रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं दिया?
अंततः हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के निर्णय को बरकरार रखा।
अदालत ने ट्रस्ट की गतिविधियों, Zen Buddhism की प्रकृति, संस्थापक की धार्मिक पहचान और FCRA के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए माना कि केंद्र सरकार द्वारा पंजीकरण से इनकार करने का फैसला हस्तक्षेप योग्य नहीं है।
इसलिए ट्रस्ट की याचिका खारिज कर दी गई।
फैसले का व्यापक संदेश यह है कि विदेशी फंडिंग चाहने वाली संस्थाओं को अपनी वास्तविक गतिविधियों और उद्देश्य के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी होगी। यदि उनकी गतिविधियां FCRA के तहत प्रतिबंधित या नियंत्रित श्रेणी में आती हैं तो केवल उन्हें सामाजिक या धर्मार्थ संस्था बताने से उन्हें विदेशी योगदान प्राप्त करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
फैसले का व्यापक असर क्या हो सकता है?
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला धार्मिक संगठनों की विदेशी फंडिंग और FCRA के अनुपालन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून किसी एक धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है। यदि किसी संगठन की गतिविधियां धार्मिक परिवर्तन से संबंधित हैं और कानून में उसके लिए प्रतिबंध या शर्तें लागू होती हैं तो वही नियम सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होंगे।
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि विदेशी योगदान प्राप्त करना कोई स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं है।
संस्थाओं को FCRA के तहत निर्धारित नियमों का पालन करना होगा और आवेदन में अपनी वास्तविक प्रकृति तथा गतिविधियों के बारे में पारदर्शिता रखनी होगी।
निष्कर्ष
कान्जिओन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े मामले में मद्रास हाईकोर्ट का फैसला कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। अदालत ने एक ओर केंद्र सरकार के FCRA रजिस्ट्रेशन से इनकार के निर्णय को बरकरार रखा, वहीं दूसरी ओर धार्मिक परिवर्तन, विदेशी फंडिंग और भारत के बहुलतावादी समाज को लेकर व्यापक टिप्पणियां कीं।
अदालत ने कहा कि FCRA की धारा 12(4)(a)(ii) सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होती है। इसलिए यदि कोई हिंदू संगठन ‘घर वापसी’ जैसी धार्मिक परिवर्तन संबंधी गतिविधियों में शामिल होता है तो उस पर भी वही कानूनी प्रावधान लागू होंगे।
कोर्ट ने Zen Buddhism को महायान बौद्ध परंपरा की शाखा माना और कहा कि ट्रस्ट को FCRA आवेदन में अपनी धार्मिक प्रकृति स्पष्ट करनी चाहिए थी। साथ ही विदेशी योगदान को मौलिक अधिकार के बजाय अधिक से अधिक एक विशेषाधिकार के रूप में देखा।
फैसले में हिंदू धर्म, अब्राहमिक धर्मों और भारत के बहुलतावादी स्वरूप को लेकर की गई टिप्पणियां भी विशेष रूप से चर्चा में रहेंगी। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह याचिकाकर्ता ट्रस्ट पर धर्म परिवर्तन का एजेंडा चलाने का आरोप नहीं लगा रही है।
अंततः अदालत ने ट्रस्ट की याचिका खारिज करते हुए केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा। फैसले से यह संदेश जरूर निकलता है कि विदेशी फंडिंग चाहने वाली संस्थाओं के लिए अपनी गतिविधियों, उद्देश्य और धार्मिक स्वरूप के बारे में पारदर्शिता रखना बेहद महत्वपूर्ण है और FCRA के नियम धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं किए जा सकते।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।