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प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण में पुलिस के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा जरूरी होगा? दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से 6 महीने में फैसला लेने को कहा

प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण में पुलिस के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा जरूरी होगा? दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से 6 महीने में फैसला लेने को कहा

हाईकोर्ट ने सीधे निर्देश देने से किया इनकार, याचिकाकर्ता को केंद्र के सामने प्रतिवेदन देने की छूट; रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने के लिए SOP की भी मांग

       प्रदर्शन, धरना और भीड़ नियंत्रण के दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा अनिवार्य किए जाने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने इस मामले में सीधे तौर पर कोई नीति बनाने या पुलिसकर्मियों के लिए कैमरा अनिवार्य करने का आदेश देने से इनकार किया, लेकिन केंद्र सरकार से कहा कि वह याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विचार कर छह महीने के भीतर फैसला ले और इसकी जानकारी उसे दे।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपनी मांगों और सुझावों के साथ केंद्र सरकार के समक्ष विस्तृत प्रतिवेदन पेश करे।

मामले में केवल पुलिसकर्मियों को बॉडी कैमरा पहनाने की मांग नहीं की गई थी, बल्कि कैमरे से रिकॉर्ड होने वाली वीडियो सामग्री को सुरक्षित रखने, उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने, रिकॉर्डिंग कितने समय तक संरक्षित रखी जाए और जरूरत पड़ने पर उसे अदालत में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग भी उठाई गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा- सरकार को फैसला लेना होगा

सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ किया कि वह इस मामले में केंद्र सरकार को सीधे कोई नीतिगत निर्देश नहीं दे सकती।

पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह पहले केंद्र सरकार के समक्ष अपना प्रतिवेदन रखे। सरकार को उस प्रतिवेदन पर विचार करना होगा और छह महीने के भीतर निर्णय लेकर याचिकाकर्ता को सूचित करना होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा नहीं है कि इस विषय पर कोई स्पष्ट कानूनी व्यवस्था ही मौजूद नहीं है।

इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह संकेत दिया कि बॉडी-वॉर्न कैमरे और पुलिस कार्रवाई से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर पूरी तरह से कानून का अभाव नहीं माना जा सकता। हालांकि, क्या पुलिस के लिए विशेष परिस्थितियों में बॉडी कैमरा अनिवार्य किया जाना चाहिए, रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया क्या हो और उसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाए, जैसे सवालों पर सरकार को नीति स्तर पर निर्णय लेना होगा।

इस तरह हाईकोर्ट ने सीधे नीति बनाने के बजाय मामले को संबंधित सरकारी प्राधिकरण के सामने रखने का रास्ता चुना है।

अधिवक्ता चाहत राघव ने दाखिल की थी याचिका

यह जनहित याचिका अधिवक्ता चाहत राघव की ओर से दाखिल की गई थी।

याचिका में प्रदर्शन, धरना और भीड़ नियंत्रण जैसी परिस्थितियों में ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा अनिवार्य करने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनती है तो घटनाओं की वास्तविक तस्वीर सामने लाना कई बार मुश्किल हो जाता है।

एक तरफ पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने के आरोप लगते हैं, तो दूसरी ओर पुलिस और सार्वजनिक संपत्ति पर हमला, पथराव या हिंसा के आरोप प्रदर्शनकारियों पर लग सकते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में यदि घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों के शरीर पर लगे कैमरे लगातार रिकॉर्डिंग कर रहे हों तो घटनाओं का एक आधिकारिक और वास्तविक रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने रखी दलील

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने अदालत के सामने मामले की गंभीरता को विस्तार से रखा।

उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा बॉडी-वॉर्न कैमरों का इस्तेमाल पूरी तरह नया नहीं है। कुछ परिस्थितियों में पुलिसकर्मी ऐसे कैमरों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह व्यवस्था अभी एक समान और व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत संचालित नहीं हो रही है।

उनकी दलील का मुख्य आधार यह था कि भीड़ नियंत्रण और प्रदर्शन प्रबंधन के दौरान होने वाली घटनाओं का रिकॉर्ड किसी एक पक्ष के नजरिए पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

यदि पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगता है तो यह पता लगाने के लिए प्रमाण होना चाहिए कि वास्तविक स्थिति क्या थी। इसी तरह यदि प्रदर्शनकारियों पर हिंसा या पथराव का आरोप लगाया जाता है तो उनके खिलाफ भी विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध होना चाहिए।

ऐसी स्थिति में बॉडी-वॉर्न कैमरा दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

निजी मोबाइल वीडियो पर निर्भरता का सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण के दौरान सामने आने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग का बड़ा हिस्सा आम लोगों या राहगीरों द्वारा मोबाइल फोन से बनाया जाता है।

सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में अक्सर ऐसी वीडियो क्लिप सामने आती हैं जिनके आधार पर घटनाओं को समझने की कोशिश की जाती है।

लेकिन निजी मोबाइल से बनाए गए वीडियो की अपनी सीमाएं होती हैं। कैमरा किस दिशा में था, रिकॉर्डिंग कब शुरू हुई, बीच में क्या हुआ और वीडियो के पहले या बाद में क्या घटनाएं हुईं—इन सवालों का जवाब हमेशा उपलब्ध नहीं होता।

यही वजह है कि याचिकाकर्ता ने पुलिस की ओर से आधिकारिक और व्यवस्थित वीडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था बनाने की मांग की।

इसका उद्देश्य किसी एक पक्ष को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि घटनाओं का अधिक निष्पक्ष और विश्वसनीय रिकॉर्ड तैयार करना बताया गया।

पुलिस के पास व्यवस्थित रिकॉर्डिंग व्यवस्था नहीं होने का दावा

याचिका में कहा गया कि फिलहाल पुलिस कार्रवाई के दौरान रिकॉर्डिंग के लिए कोई ऐसी समान और व्यापक व्यवस्था नहीं है जो हर महत्वपूर्ण प्रदर्शन या भीड़ नियंत्रण अभियान पर लागू हो।

याचिकाकर्ता के अनुसार कई मामलों में घटनाओं की तस्वीर बाद में सामने आने वाले निजी वीडियो के माध्यम से तैयार होती है।

इससे जांच और न्यायिक प्रक्रिया दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

यदि किसी घटना का आधिकारिक वीडियो रिकॉर्ड मौजूद हो तो जांच एजेंसियों, अदालतों और संबंधित अधिकारियों के लिए घटनाक्रम को समझना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

इसके अलावा इससे पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों दोनों के व्यवहार का वस्तुनिष्ठ आकलन करने में भी मदद मिल सकती है।

कैमरा लगाना ही काफी नहीं, रिकॉर्ड सुरक्षित रखना भी जरूरी

याचिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा केवल बॉडी कैमरा लगाने से जुड़ा नहीं था। इसमें रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने की पूरी व्यवस्था बनाने की मांग भी की गई थी।

किसी कैमरे से वीडियो रिकॉर्ड हो जाने के बाद अगला सवाल होता है कि वह रिकॉर्ड कहां सुरक्षित रहेगा, उसे कौन देख सकता है, उसे कब तक सुरक्षित रखा जाएगा और उसमें किसी प्रकार का बदलाव न हो, यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।

इसीलिए याचिकाकर्ता ने रिकॉर्डिंग के संरक्षण के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाने की मांग की।

यदि किसी मामले में वीडियो अदालत के सामने साक्ष्य के रूप में पेश किया जाना है तो उसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता भी महत्वपूर्ण होगी।

वीडियो कब बनाया गया, किस कैमरे से बनाया गया, रिकॉर्डिंग के दौरान उसमें किसी तरह का बदलाव हुआ या नहीं और मूल रिकॉर्ड कहां सुरक्षित है—ऐसे सवाल न्यायिक जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

लगातार कैमरा चालू रखने की भी मांग

याचिका में बॉडी-वॉर्न कैमरों को केवल औपचारिक रूप से उपलब्ध कराने की बजाय ड्यूटी के दौरान उन्हें लगातार चालू रखने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP बनाने की मांग की गई थी।

इस मांग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के दौरान कैमरा बंद न हो।

यदि कैमरा केवल चुनिंदा समय पर चालू किया जाए तो रिकॉर्डिंग अधूरी रह सकती है और घटना के महत्वपूर्ण हिस्से का वीडियो उपलब्ध नहीं होगा।

हालांकि, बॉडी कैमरों को लगातार चालू रखने के साथ गोपनीयता, डेटा स्टोरेज, बैटरी, तकनीकी व्यवस्था और संवेदनशील परिस्थितियों में रिकॉर्डिंग से जुड़े अलग-अलग सवाल भी सामने आते हैं।

यही वजह है कि इस तरह की व्यवस्था के लिए केवल कैमरा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि विस्तृत SOP की आवश्यकता होगी।

पुलिस पर आरोप और प्रदर्शनकारियों पर आरोप, दोनों की जांच में मदद

बॉडी-वॉर्न कैमरे की व्यवस्था का एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि इससे किसी घटना की जांच केवल पुलिस या प्रदर्शनकारियों के दावों पर निर्भर न रहे।

उदाहरण के लिए, यदि किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर बल प्रयोग का आरोप लगता है तो वीडियो से यह देखा जा सकता है कि कार्रवाई से पहले स्थिति क्या थी और पुलिस ने किस परिस्थिति में बल का इस्तेमाल किया।

इसी तरह यदि किसी प्रदर्शनकारी पर पथराव या हिंसा का आरोप लगाया जाता है तो कैमरे की रिकॉर्डिंग से घटना की पुष्टि या खंडन करने में मदद मिल सकती है।

इस दृष्टि से बॉडी कैमरा केवल पुलिस की निगरानी का माध्यम नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के व्यवहार का रिकॉर्ड तैयार करने वाला उपकरण हो सकता है।

जवाबदेही बढ़ाने में मदद कर सकता है कैमरा

पुलिसिंग में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल पर चर्चा होती रही है।

पुलिसकर्मी को यह पता होता है कि उसकी कार्रवाई रिकॉर्ड हो रही है तो इससे व्यवहार में अधिक सावधानी आने की संभावना रहती है। दूसरी ओर आम नागरिकों को भी यह भरोसा हो सकता है कि किसी विवाद की स्थिति में घटनाओं का आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद रहेगा।

हालांकि, केवल तकनीक अपने आप जवाबदेही सुनिश्चित नहीं करती। इसके लिए रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल, संरक्षण और जांच की स्पष्ट व्यवस्था भी जरूरी है।

यदि कैमरा तो लगा दिया जाए लेकिन रिकॉर्डिंग उपलब्ध न हो, समय पर सुरक्षित न की जाए या जरूरत के समय उसके मूल स्रोत की पुष्टि न हो सके तो पूरी व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर हो सकता है।

इसीलिए याचिका में SOP और रिकॉर्ड संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया था।

अदालत ने खुद नीति बनाने से क्यों इनकार किया?

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में सीधे पुलिस के लिए बॉडी कैमरा अनिवार्य करने का आदेश देने से इनकार किया।

इसका कारण यह है कि ऐसी व्यवस्था केवल न्यायिक आदेश के जरिए लागू करने के बजाय प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर तय की जा सकती है।

किस पुलिस बल में कितने कैमरों की जरूरत होगी, किन परिस्थितियों में उन्हें चालू रखना अनिवार्य होगा, रिकॉर्डिंग कितने समय तक रखी जाएगी, डेटा की सुरक्षा कैसे होगी और किस अधिकारी को रिकॉर्डिंग तक पहुंच होगी—ये सभी तकनीकी और प्रशासनिक विषय हैं।

अदालत ने इसी वजह से याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के सामने अपना प्रतिवेदन रखने को कहा।

अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है।

छह महीने में लेना होगा फैसला

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर छह महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।

सरकार को यह भी बताना होगा कि प्रतिवेदन पर क्या निर्णय लिया गया।

इसका अर्थ यह है कि हाईकोर्ट ने याचिका को सीधे स्वीकार करके बॉडी-वॉर्न कैमरा लागू करने का आदेश नहीं दिया, लेकिन सरकार को इस महत्वपूर्ण नीति संबंधी मांग पर निष्क्रिय रहने की छूट भी नहीं दी।

अब केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता की मांगों पर विचार करना होगा और निर्धारित अवधि के भीतर अपना निर्णय बताना होगा।

आगे क्या हो सकता है?

यदि केंद्र सरकार इस मांग पर सकारात्मक निर्णय लेती है तो प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण से जुड़ी पुलिस कार्रवाई के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई SOP या विस्तृत दिशानिर्देश तैयार किए जा सकते हैं।

इसमें कैमरे के उपयोग, रिकॉर्डिंग, डेटा संरक्षण, रिकॉर्ड की सुरक्षा, रिकॉर्डिंग की अवधि और अदालत में इसके इस्तेमाल जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं।

दूसरी ओर यदि सरकार इस मांग को स्वीकार नहीं करती है तो उसके निर्णय के कारणों को भी देखा जा सकता है।

फिलहाल हाईकोर्ट ने नीति तय करने की जिम्मेदारी सरकार पर छोड़ी है।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर इस जनहित याचिका ने पुलिसिंग में तकनीक और जवाबदेही से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल को सामने रखा है। प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण जैसी संवेदनशील परिस्थितियों में अक्सर पुलिस और प्रदर्शनकारियों की ओर से एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं। ऐसे मामलों में वास्तविक घटनाक्रम का भरोसेमंद रिकॉर्ड उपलब्ध होना बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

याचिकाकर्ता की मांग थी कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा अनिवार्य किया जाए और उन्हें लगातार चालू रखने के लिए स्पष्ट SOP बनाई जाए। साथ ही रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने, उसकी विश्वसनीयता बनाए रखने और आवश्यकता पड़ने पर उसे अदालत में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने की व्यवस्था भी हो।

हाईकोर्ट ने हालांकि सीधे तौर पर केंद्र सरकार को ऐसी व्यवस्था लागू करने का आदेश नहीं दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की पीठ ने याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिवेदन देने को कहा है।

केंद्र सरकार को अब छह महीने के भीतर इस प्रतिवेदन पर निर्णय लेकर याचिकाकर्ता को सूचित करना होगा।

मामले का व्यापक महत्व यही है कि यदि बॉडी-वॉर्न कैमरों के लिए एक स्पष्ट और समान व्यवस्था तैयार होती है तो भविष्य में पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के व्यवहार से जुड़े विवादों में निजी मोबाइल वीडियो पर निर्भरता कम हो सकती है। साथ ही घटनाओं की जांच के लिए एक आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकता है।

हालांकि, कैमरा लगाना इस समस्या का अकेला समाधान नहीं है। असली चुनौती रिकॉर्डिंग की निष्पक्षता, डेटा की सुरक्षा, उसे सुरक्षित रखने की अवधि और जरूरत पड़ने पर उसकी प्रमाणिकता सुनिश्चित करने की होगी। इसलिए आने वाले छह महीनों में केंद्र सरकार इस मांग पर क्या निर्णय लेती है, यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण अगला कदम होगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।