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BSF जवान की दाढ़ी बनी विवाद की वजह, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका;

BSF जवान की दाढ़ी बनी विवाद की वजह, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका; जानिए कोर्ट ने मामले की मेरिट पर फैसला क्यों नहीं दिया

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा- तुरा में हुआ पूरा घटनाक्रम उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर, उचित हाईकोर्ट में जाने की दी छूट

       सीमा सुरक्षा बल यानी BSF के एक जवान की दाढ़ी को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरकार हाईकोर्ट तक पहुंच गया। हालांकि, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने इस मामले में यह तय नहीं किया कि जवान को दाढ़ी रखने की अनुमति वापस लेना सही था या गलत। अदालत ने याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया, क्योंकि विवाद से जुड़ी मुख्य घटनाएं मेघालय के तुरा में हुई थीं और वे अदालत के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर थीं।

जस्टिस रजनीश ओसवाल की पीठ ने BSF जवान खुर्शीद अहमद खान की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन और उसे स्वीकार करने का आदेश दोनों तुरा में जारी हुए थे। इसलिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई करने का क्षेत्रीय अधिकार नहीं बनता।

अदालत ने याचिका खारिज करते हुए जवान को यह स्वतंत्रता दी कि वह उचित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत के सामने अपनी शिकायत रख सकते हैं।

इस फैसले की खास बात यह है कि हाईकोर्ट ने दाढ़ी रखने के अधिकार, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या जवान पर किसी तरह का दबाव होने के आरोप पर कोई अंतिम राय नहीं दी। यानी अदालत ने यह नहीं कहा कि BSF की कार्रवाई सही थी या जवान के आरोप सही थे। मामला केवल ज्यूरिस्डिक्शन यानी क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के आधार पर समाप्त हुआ।

1998 में BSF में भर्ती हुए थे खुर्शीद अहमद खान

खुर्शीद अहमद खान मार्च 1998 में सीमा सुरक्षा बल में भर्ती हुए थे। लंबे समय तक बल में सेवा देने के बाद उनका नाम दाढ़ी रखने को लेकर सामने आया।

रिकॉर्ड के अनुसार, 6 जनवरी 2018 को उन्हें दाढ़ी रखने की अनुमति दी गई थी। हालांकि यह अनुमति बिना किसी शर्त के नहीं थी। उन्हें निर्देश दिया गया था कि दाढ़ी साफ-सुथरी और ठीक से ट्रिम की हुई होनी चाहिए।

खान का कहना था कि वह इसी अनुमति के आधार पर दाढ़ी रखते रहे। लेकिन उनके अनुसार 16 जून 2023 को अचानक उनकी दाढ़ी रखने की अनुमति वापस ले ली गई।

याचिकाकर्ता के मुताबिक इस फैसले से वह परेशान हो गए और उसी दिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया।

यहीं से मामला और जटिल हो गया।

उसी दिन स्वीकार हो गई स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी

खान की याचिका के अनुसार, दाढ़ी रखने की अनुमति वापस लिए जाने के बाद उन्होंने उसी दिन स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी Voluntary Retirement के लिए आवेदन किया।

उनका कहना था कि परिस्थितियों से परेशान होकर उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। बाद में उन्होंने अपने इस आवेदन को वापस लेने की कोशिश भी की, लेकिन उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया।

इसके बाद 5 जुलाई 2023 को एक आदेश जारी किया गया, जिसमें उन्हें पेंशन प्राप्त करने और ड्यूटी पर वापस नहीं लौटने का निर्देश दिया गया।

खान ने बाद में 19 जुलाई 2024 को BSF के महानिदेशक को भी एक अभ्यावेदन दिया। उनका आरोप था कि इस अभ्यावेदन पर उचित विचार नहीं किया गया।

उन्होंने हाईकोर्ट में यह दावा भी किया कि दाढ़ी रखने की अनुमति वापस लेने का फैसला उनके खिलाफ बदले की भावना से किया गया था और उनकी सेवानिवृत्ति वास्तव में स्वैच्छिक नहीं थी।

जवान का आरोप- दबाव में लिया गया रिटायरमेंट का फैसला

खान ने अपनी याचिका में मूल रूप से यह सवाल उठाया था कि यदि उन्होंने पहले से दाढ़ी रखने की अनुमति प्राप्त कर रखी थी तो उसे अचानक वापस क्यों लिया गया।

उनका आरोप था कि अनुमति रद्द करने के पीछे कोई वैध और उचित कारण नहीं था। उन्होंने इसे अपने खिलाफ कार्रवाई और प्रतिशोध से जोड़ा।

उनका यह भी कहना था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी वास्तव में परिस्थितियों के दबाव में दी गई थी। यानी वह सामान्य परिस्थितियों में नौकरी छोड़ना नहीं चाहते थे।

खान के अनुसार, बाद में जब उन्होंने अपनी अर्जी वापस लेने की कोशिश की तो उनकी बात नहीं मानी गई।

इन्हीं आरोपों के आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट से राहत की मांग की थी।

BSF ने रखा अलग पक्ष

BSF की ओर से इस मामले में पूरी तरह अलग तस्वीर अदालत के सामने रखी गई।

बल की ओर से कहा गया कि वर्ष 2018 में खान को दाढ़ी रखने की जो अनुमति दी गई थी, वह शर्तों के साथ थी। उन्हें साफ-सुथरी और निर्धारित तरीके से ट्रिम की हुई दाढ़ी रखने की अनुमति थी।

BSF के अनुसार, 16 जून 2023 को खान खराब स्थिति में और लंबी, बिना ट्रिम की हुई दाढ़ी में पाए गए।

बल ने कहा कि यह फोर्स के नियमों और संबंधित न्यायिक निर्देशों के अनुरूप नहीं था।

BSF का दावा था कि खान को दाढ़ी ट्रिम करने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पहले से दी गई अनुमति वापस ले ली गई।

यानी BSF का पक्ष यह था कि अनुमति वापस लेना अचानक या बदले की भावना से किया गया कदम नहीं था, बल्कि जवान द्वारा अनुमति की शर्तों का पालन नहीं करने के कारण उठाया गया कदम था।

BSF का दावा- जवान ने खुद मांगी थी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति

खान के इस आरोप से भी BSF ने असहमति जताई कि उन्हें दबाव में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेनी पड़ी।

जवाब में बल की ओर से कहा गया कि खान ने स्वयं परेड के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की इच्छा जताई थी।

बताया गया कि कमांडेंट ने अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में खान की बात सुनी थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह किसी दबाव या मजबूरी के कारण ऐसा कर रहे हैं, तो उन्होंने कथित तौर पर इससे इनकार किया।

इस पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड भी रखे जाने की बात BSF की ओर से कही गई।

बल ने यह भी बताया कि खान ने अपनी मां की बीमारी और अपनी मेडिकल कैटेगरी का हवाला देते हुए नौकरी जारी रखने में कठिनाई की बात कही थी।

इसके बाद सक्षम अधिकारी ने उनके हालात, सेवा रिकॉर्ड और हालिया व्यवहार को देखते हुए मामले पर फैसला लिया।

तीन महीने के नोटिस पीरियड में दी गई छूट

BSF के अनुसार, सामान्य प्रक्रिया में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस अवधि होती है। लेकिन खान के मामले में सक्षम अधिकारी ने परिस्थितियों को देखते हुए तीन महीने की नोटिस अवधि में छूट दी।

इसके बाद तुरा में उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर ली गई।

BSF ने अदालत को यह भी बताया कि खान के सेवा रिकॉर्ड में 13 प्रतिकूल प्रविष्टियां थीं।

इनमें बिना अनुमति या छुट्टी के अनुपस्थित रहने और नशे की हालत में पाए जाने जैसे आरोपों से संबंधित प्रविष्टियां शामिल होने की बात कही गई।

बल के अनुसार खान स्थायी रूप से लो मेडिकल कैटेगरी में भी थे।

इस प्रकार BSF ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का फैसला केवल दाढ़ी रखने के विवाद के आधार पर नहीं लिया गया था, बल्कि उनके सेवा रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा गया था।

फिर हाईकोर्ट ने मामले की मेरिट पर फैसला क्यों नहीं किया?

यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

अदालत ने यह जांचने से पहले कि खान के आरोप सही हैं या BSF का पक्ष सही है, यह देखा कि क्या जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई करने का अधिकार है।

BSF की ओर से शुरुआत में ही अधिकार क्षेत्र यानी jurisdiction को लेकर आपत्ति उठाई गई थी।

जस्टिस रजनीश ओसवाल ने इस आपत्ति को स्वीकार कर लिया।

अदालत ने पाया कि खान की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी और उससे संबंधित विवादित आदेश तुरा, मेघालय में हुए थे।

यानी मामले की मुख्य कार्रवाई जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के क्षेत्र में नहीं हुई थी।

अनुच्छेद 226 का क्या महत्व है?

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने रिट अधिकार क्षेत्र से जुड़े सिद्धांतों पर विचार किया।

अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन इसके लिए यह देखना जरूरी होता है कि मामले की वजह यानी cause of action पूरी तरह या आंशिक रूप से उस हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में उत्पन्न हुई है या नहीं।

सरल शब्दों में कहें तो किसी मामले की मुख्य कानूनी घटना यदि किसी दूसरे राज्य में हुई है, तो केवल किसी अधिकारी या विभाग का कोई अन्य कार्यालय उस हाईकोर्ट के क्षेत्र में होने से उस अदालत को स्वतः सुनवाई का अधिकार नहीं मिल जाता।

अदालत ने इसी सिद्धांत को मौजूदा मामले में लागू किया।

‘कॉज ऑफ एक्शन’ का छोटा हिस्सा भी कब महत्वपूर्ण होता है?

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले का बहुत छोटा हिस्सा यदि किसी हाईकोर्ट के क्षेत्र में हुआ है तो मात्र इस आधार पर हमेशा अधिकार क्षेत्र स्थापित नहीं हो जाता।

वह हिस्सा विवाद का महत्वपूर्ण, आवश्यक या मुख्य हिस्सा होना चाहिए।

इस मामले में अदालत को जम्मू-कश्मीर के भीतर ऐसा कोई महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं मिला जिससे यह कहा जा सके कि विवाद का कारण वहां उत्पन्न हुआ था।

अदालत के अनुसार, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी तुरा में दी गई थी और उसे स्वीकार करने वाला विवादित आदेश भी तुरा में जारी हुआ था।

इसलिए मामले का मुख्य कारण-ए-दावा मेघालय में पैदा हुआ।

कश्मीर के IG को पक्षकार बनाने से नहीं बना अधिकार क्षेत्र

याचिका में कुछ ऐसे अधिकारियों को भी पक्षकार बनाया गया था, जिनका कार्यालय जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में था।

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी अधिकारी को पक्षकार बना देने से अदालत का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं बन जाता।

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि इंस्पेक्टर जनरल, BSF, कश्मीर का इस विवाद से कोई वास्तविक संबंध नहीं था।

वास्तविक संबंधित अधिकारी इंस्पेक्टर जनरल, BSF, शिलांग थे।

इसलिए कश्मीर के अधिकारी को पक्षकार बनाने मात्र से याचिकाकर्ता यह दावा नहीं कर सकते कि मामले का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा जम्मू-कश्मीर में पैदा हुआ।

दिल्ली में DG का कार्यालय होने से भी अधिकार क्षेत्र नहीं बनता

अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही।

BSF के डायरेक्टर जनरल का कार्यालय नई दिल्ली में होने के बावजूद इससे देश के किसी भी हाईकोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं मिल जाता।

यानी किसी केंद्रीय संगठन का मुख्यालय किसी स्थान पर होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उस संगठन के हर फैसले को उस स्थान के हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

मामले से वास्तविक और पर्याप्त संबंध होना जरूरी है।

यही कारण है कि अदालत ने केवल अधिकारियों की सूची देखकर अधिकार क्षेत्र स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

दाढ़ी रखने का अधिकार सही था या गलत? कोर्ट ने नहीं बताया

इस फैसले को लेकर एक बात विशेष रूप से समझना जरूरी है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि BSF द्वारा दाढ़ी रखने की अनुमति वापस लेना कानूनी था।

अदालत ने यह भी तय नहीं किया कि खान ने दाढ़ी रखने की अनुमति की शर्तों का उल्लंघन किया था या नहीं।

इसी तरह अदालत ने इस सवाल पर भी कोई फैसला नहीं दिया कि खान को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के लिए वास्तव में मजबूर किया गया था या उन्होंने अपनी इच्छा से नौकरी छोड़ी थी।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की मंजूरी वैध थी या नहीं, इस मुद्दे पर भी हाईकोर्ट ने कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।

याचिका केवल इसलिए खारिज हुई क्योंकि मामला इस हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था।

उचित अदालत में जाने की छूट

हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को उचित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत में जाने की स्वतंत्रता दी।

इसका मतलब है कि खान के लिए कानूनी रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

वह उस हाईकोर्ट के सामने अपनी शिकायत रख सकते हैं जिसके क्षेत्र में संबंधित घटनाएं हुई हैं और जहां से विवादित आदेश जारी किया गया था।

वहां अदालत इस बात पर विचार कर सकती है कि दाढ़ी की अनुमति वापस लेने की कार्रवाई उचित थी या नहीं, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति वास्तव में स्वेच्छा से ली गई थी या नहीं और संबंधित आदेश कानून के अनुरूप थे या नहीं।

निष्कर्ष

BSF जवान खुर्शीद अहमद खान का मामला पहली नजर में दाढ़ी रखने की अनुमति और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से जुड़ा विवाद दिखाई देता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में इसकी सुनवाई का अंत एक अलग कानूनी सवाल पर हुआ।

जस्टिस रजनीश ओसवाल ने पाया कि विवाद की मुख्य घटनाएं तुरा, मेघालय में हुई थीं। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी वहीं दी गई और संबंधित आदेश भी वहीं जारी हुआ। जम्मू-कश्मीर के भीतर ऐसा कोई महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं मिला जो इस हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को स्थापित कर सके।

इसलिए अदालत ने याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया और संबंधित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत में जाने की छूट दी।

इस फैसले में दाढ़ी रखने की अनुमति रद्द किए जाने की वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया गया है। न ही अदालत ने यह तय किया कि खान को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए मजबूर किया गया था या उन्होंने अपनी इच्छा से आवेदन किया था।

इसलिए इस मामले का वास्तविक विवाद अभी भी खुला है। यदि खान उचित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत का रुख करते हैं तो वहां दाढ़ी रखने की अनुमति, BSF के नियम, उनकी सेवा में दर्ज प्रतिकूल प्रविष्टियां, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया और कथित दबाव जैसे सभी मुद्दों पर अलग से न्यायिक विचार हो सकता है।

फिलहाल जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट का फैसला केवल इतना तय करता है कि इस मामले की सुनवाई उस हाईकोर्ट में नहीं हो सकती, क्योंकि विवाद का मुख्य कारण उसके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में पैदा नहीं हुआ था।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।