भरण-पोषण खैरात नहीं, पत्नी और बच्चों का अधिकार है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बढ़ाई रकम; कांस्टेबल को अब हर महीने देने होंगे 13 हजार रुपये
हाईकोर्ट ने कहा- पत्नी और बच्चों को पति-पिता के समान सम्मानजनक जीवन का अधिकार, कांस्टेबल की आय 55 हजार से अधिक होने पर बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि पत्नी और बच्चों को दिया जाने वाला भरण-पोषण किसी तरह की खैरात नहीं है, बल्कि यह उनका कानूनी अधिकार है। अदालत ने कहा कि पत्नी और बच्चों को भी पति और पिता के समान स्तर का सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है। इसलिए भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की आर्थिक क्षमता, उसकी आय और परिवार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति जेके उपाध्याय की एकल पीठ ने इटावा निवासी एक पुलिस कांस्टेबल की पत्नी और नाबालिग बेटे की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए भरण-पोषण की रकम बढ़ा दी। कोर्ट ने पत्नी के लिए निर्धारित मासिक भरण-पोषण को 5 हजार रुपये से बढ़ाकर 8 हजार रुपये और बेटे के लिए निर्धारित राशि को 4 हजार रुपये से बढ़ाकर 5 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया।
इस तरह अब पति को पत्नी और बेटे के लिए कुल 13 हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण देना होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बढ़ी हुई राशि एक अक्टूबर से देय होगी।
2011 में हुई थी शादी, कुछ समय बाद विवाद
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता महिला की शादी 29 नवंबर 2011 को इटावा निवासी पुलिस कांस्टेबल से हुई थी। शादी के बाद महिला ने आरोप लगाया कि उसके ससुराल पक्ष की ओर से अतिरिक्त दहेज की मांग की जाने लगी।
याचिका में कहा गया कि मांग पूरी नहीं होने पर उसे कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया। वैवाहिक जीवन में विवाद बढ़ता गया और अंततः 22 मार्च 2013 को महिला को उसके छोटे बच्चे के साथ घर से बाहर निकाल दिया गया।
पति-पत्नी के बीच विवाद के बाद महिला ने अपने और अपने बेटे के भरण-पोषण के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
मामला परिवार न्यायालय पहुंचा, जहां दोनों पक्षों की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार किया गया।
2017 में परिवार न्यायालय ने तय की थी शुरुआती रकम
परिवार न्यायालय ने 1 जून 2017 को पत्नी और बच्चे के लिए भरण-पोषण की राशि निर्धारित की।
उस समय पत्नी को 3 हजार रुपये प्रति माह और बेटे को 1 हजार रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया गया था।
उस समय निर्धारित कुल राशि 4 हजार रुपये प्रतिमाह थी। लेकिन समय बीतने के साथ महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों में लगातार बढ़ोतरी होती गई।
बच्चे की शिक्षा, भोजन, कपड़े, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक खर्चों के साथ पत्नी के दैनिक जीवन की जरूरतें भी बढ़ीं। ऐसे में पुरानी राशि से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होने लगा।
इसी आधार पर पत्नी ने बाद में भरण-पोषण की राशि बढ़ाए जाने की मांग की।
2023 में बढ़ाई गई रकम, लेकिन पत्नी संतुष्ट नहीं
परिवार न्यायालय ने महिला की मांग पर विचार करते हुए वर्ष 2023 में भरण-पोषण की राशि में वृद्धि की।
पत्नी के लिए भरण-पोषण की रकम 3 हजार से बढ़ाकर 5 हजार रुपये प्रति माह कर दी गई, जबकि बेटे के लिए यह राशि 1 हजार से बढ़ाकर 4 हजार रुपये प्रतिमाह कर दी गई।
इस आदेश के बाद दोनों को मिलाकर कुल 9 हजार रुपये प्रतिमाह मिलने लगे।
हालांकि, पत्नी का कहना था कि पति की आय और परिवार की मौजूदा जरूरतों की तुलना में यह रकम पर्याप्त नहीं है। इसी वजह से उसने परिवार न्यायालय के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
महिला की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका में भरण-पोषण की राशि को और बढ़ाने की मांग की गई।
हाईकोर्ट में बताया- पति की आय 55 हजार से अधिक
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि महिला का पति पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है और उसका मासिक वेतन 55 हजार रुपये से अधिक है।
अधिवक्ता का कहना था कि पति की आय को देखते हुए पत्नी और नाबालिग बच्चे को दी जा रही भरण-पोषण की रकम बेहद कम है।
दलील दी गई कि पत्नी और बच्चे की आवश्यकताओं के साथ-साथ पति की आय और जीवन स्तर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यदि पति की आय में पर्याप्त वृद्धि हुई है तो भरण-पोषण की राशि भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि मौजूदा महंगाई में केवल कुछ हजार रुपये प्रतिमाह में पत्नी और बच्चे की आवश्यक जरूरतों को पूरा करना मुश्किल है।
हाईकोर्ट ने कहा- भरण-पोषण खैरात नहीं
मामले पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया।
अदालत ने कहा कि भरण-पोषण किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी या बच्चों पर किया गया उपकार नहीं है। यह पत्नी और बच्चों का अधिकार है।
न्यायालय ने कहा कि पत्नी और बच्चे को ऐसा जीवन जीने का अधिकार है जो पति और पिता के जीवन स्तर के अनुरूप सम्मानजनक हो।
इस टिप्पणी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कई बार भरण-पोषण की राशि को केवल न्यूनतम गुजारा चलाने के लिए दी जाने वाली रकम के रूप में देखा जाता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण तय करते समय केवल यह नहीं देखा जाना चाहिए कि व्यक्ति किसी तरह जीवित रह सकता है या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उसे सम्मानजनक जीवन जीने के लिए कितनी राशि की आवश्यकता है।
पति की भुगतान क्षमता भी देखना जरूरी
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भरण-पोषण की रकम तय करते समय पति की भुगतान क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी है।
इसका अर्थ है कि अदालत को पति की वास्तविक आय, आर्थिक स्थिति और अन्य जिम्मेदारियों को देखते हुए यह तय करना चाहिए कि पत्नी और बच्चों के लिए कितनी राशि उचित होगी।
दूसरी ओर पत्नी और बच्चों की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस मामले में अदालत ने पाया कि पति पुलिस विभाग में कांस्टेबल है और उसका मासिक वेतन 55 हजार रुपये से अधिक है। ऐसे में पत्नी और नाबालिग बेटे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से वह बच नहीं सकता।
अदालत ने यह भी माना कि परिवार की जरूरतों और पति की आय के अनुपात को देखते हुए परिवार न्यायालय द्वारा निर्धारित रकम में वृद्धि की आवश्यकता है।
पत्नी की राशि 5 हजार से बढ़ाकर 8 हजार
हाईकोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पत्नी के भरण-पोषण की राशि में वृद्धि कर दी।
पहले पत्नी को 5 हजार रुपये प्रतिमाह मिल रहे थे। हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर 8 हजार रुपये प्रति माह कर दिया।
अदालत के इस आदेश के बाद पत्नी को पहले की तुलना में हर महीने 3 हजार रुपये अधिक मिलेंगे।
कोर्ट ने राशि बढ़ाते समय पति की आय और पत्नी की आवश्यकताओं दोनों को ध्यान में रखा।
बेटे का भरण-पोषण भी बढ़ाया
अदालत ने केवल पत्नी की राशि में ही वृद्धि नहीं की, बल्कि नाबालिग बेटे के भरण-पोषण में भी बढ़ोतरी की।
बेटे को परिवार न्यायालय के आदेश के अनुसार 4 हजार रुपये प्रति माह मिल रहे थे। हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर 5 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया।
इस प्रकार बेटे के लिए हर महीने 1 हजार रुपये की अतिरिक्त राशि निर्धारित की गई।
अब पत्नी और बेटे को मिलाकर पति को कुल 13 हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण के रूप में देना होगा।
यह राशि पति की 55 हजार रुपये से अधिक मासिक आय के संदर्भ में तय की गई है।
पति पर पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी और नाबालिग बच्चे की देखभाल करना पति और पिता की जिम्मेदारी है।
यदि पत्नी अलग रह रही है और परिस्थितियों के कारण वह स्वयं पर्याप्त आय अर्जित नहीं कर पा रही है, तो केवल इस आधार पर उसके भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
इसी तरह नाबालिग बच्चे की आवश्यकताओं की जिम्मेदारी भी माता-पिता पर होती है।
बच्चे के भोजन, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी खर्चों को पूरा करना अभिभावकों का दायित्व है। जैसे-जैसे बच्चे की उम्र बढ़ती है, उसकी जरूरतें भी बढ़ सकती हैं। इसलिए लंबे समय पहले तय की गई राशि हमेशा वर्तमान परिस्थितियों में पर्याप्त हो, यह जरूरी नहीं है।
यही कारण है कि कानून में परिस्थितियों के बदलने पर भरण-पोषण की रकम में संशोधन की गुंजाइश रहती है।
महंगाई और बदलती जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू समय के साथ बढ़ता खर्च भी है।
वर्ष 2017 में जब पहली बार भरण-पोषण की राशि तय की गई थी, तब पत्नी को 3 हजार और बच्चे को 1 हजार रुपये मिलते थे। इसके बाद वर्ष 2023 में राशि बढ़ाई गई।
लेकिन महंगाई, शिक्षा, चिकित्सा और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होती रहती है। इसलिए अदालतों के सामने यह सवाल भी रहता है कि पहले निर्धारित राशि वर्तमान समय में पर्याप्त है या नहीं।
हाईकोर्ट ने इसी व्यापक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए राशि में संशोधन किया।
भरण-पोषण का उद्देश्य केवल न्यूनतम खर्च उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता देना है।
बढ़ी हुई राशि एक अक्टूबर से देय होगी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि बढ़ी हुई भरण-पोषण राशि एक अक्टूबर से देय होगी।
इसका मतलब है कि अदालत द्वारा बढ़ाई गई राशि का प्रभाव निर्धारित तारीख से लागू होगा।
पति को अब पत्नी के लिए 8 हजार और बेटे के लिए 5 हजार रुपये यानी कुल 13 हजार रुपये प्रतिमाह की दर से भुगतान करना होगा।
इस आदेश से महिला और उसके बेटे को पहले की तुलना में आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया सहारा
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट पहले कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की आय, जीवन स्तर, पत्नी की आवश्यकताएं, बच्चों की जरूरतें और परिवार की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
भरण-पोषण की राशि इतनी कम भी नहीं होनी चाहिए कि पत्नी और बच्चों को बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़े और न ही ऐसी होनी चाहिए जो पति की वास्तविक आर्थिक क्षमता से पूरी तरह असंगत हो।
इस मामले में हाईकोर्ट ने इन्हीं सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए परिवार न्यायालय द्वारा निर्धारित राशि को संशोधित किया।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक परिवार तक सीमित मामला नहीं है। इसमें भरण-पोषण की प्रकृति को लेकर अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई है।
अदालत ने साफ किया कि पत्नी और बच्चों के लिए भरण-पोषण कोई दया या खैरात नहीं है। यह उनके कानूनी अधिकार से जुड़ा विषय है।
इसका मतलब यह है कि भरण-पोषण तय करते समय पत्नी और बच्चों की गरिमा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
पति की आय बढ़ने, बच्चे की जरूरतों में बदलाव आने या महंगाई बढ़ने जैसी परिस्थितियों में पहले से तय रकम को संशोधित किया जा सकता है।
यह फैसला उन मामलों में भी महत्वपूर्ण हो सकता है जहां लंबे समय पहले तय की गई भरण-पोषण की रकम वर्तमान परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं रह गई है।
कुल 13 हजार रुपये प्रतिमाह देने होंगे
इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश का सीधा असर यह है कि अब पुलिस कांस्टेबल पति को पत्नी और बेटे के लिए कुल 13 हजार रुपये प्रतिमाह देने होंगे।
पत्नी को 8 हजार रुपये और बेटे को 5 हजार रुपये मिलेंगे।
अदालत ने यह राशि पति की 55 हजार रुपये से अधिक मासिक आय और पत्नी-बेटे की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तय की है।
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भरण-पोषण की राशि को केवल औपचारिक भुगतान के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका उद्देश्य पत्नी और बच्चों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक आर्थिक आधार उपलब्ध कराना है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि विवाह के बाद पत्नी और बच्चों की आर्थिक सुरक्षा को केवल पति की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि पति सक्षम है तो पत्नी और नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसकी कानूनी जिम्मेदारियों का हिस्सा है।
इस मामले में 2017 से चली आ रही भरण-पोषण की व्यवस्था को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित करते हुए अदालत ने पत्नी की राशि 5 हजार से बढ़ाकर 8 हजार और बेटे की राशि 4 हजार से बढ़ाकर 5 हजार रुपये कर दी।
अदालत की टिप्पणी—“भरण-पोषण खैरात नहीं, अधिकार है”—इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। पत्नी और बच्चों को भी पति और पिता के समान सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है और उनकी जरूरतों के अनुरूप उचित भरण-पोषण उपलब्ध कराना कानून की दृष्टि से महत्वपूर्ण दायित्व है।
बढ़ी हुई राशि एक अक्टूबर से लागू होगी। इस तरह अब संबंधित पुलिस कांस्टेबल को पत्नी और बेटे के लिए हर महीने कुल 13 हजार रुपये भरण-पोषण के रूप में देने होंगे।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।