JSSC CGL परीक्षा रद्द करने के फैसले पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई, कोर्ट ने पूछा- 3 साल तक जांच में ढील क्यों, अचानक तेजी कैसे आई?
सीलबंद लिफाफे में सरकार ने पेश कीं दो जांच रिपोर्ट, कॉपी उपलब्ध न होने से पूरी नहीं हो सकी बहस; गुरुवार सुबह 11 बजे फिर होगी सुनवाई
झारखंड में JSSC CGL और JPSC परीक्षाओं को लेकर चल रहा विवाद बुधवार को एक बार फिर झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा। राज्य सरकार की ओर से JSSC CGL परीक्षा को रद्द करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत में सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अपनी पूरी बहस समाप्त कर दी गई और उनकी तरफ से जवाब भी अदालत के समक्ष दाखिल कर दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने परीक्षा रद्द करने के फैसले के समर्थन में दो जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने पेश कीं। दोनों रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी गईं। हालांकि, सरकार की वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा के पास इन जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध नहीं थी। इस वजह से सरकार की ओर से होने वाली मुख्य बहस आगे नहीं बढ़ सकी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच की गति और उसके समय को लेकर राज्य सरकार से कई तीखे सवाल भी किए। कोर्ट ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि जिस मामले की जांच पिछले करीब तीन वर्षों से चल रही थी, उसमें अचानक तेजी कैसे आ गई। अदालत ने यह भी सवाल किया कि तीन साल तक जांच में अपेक्षित तेजी क्यों नहीं दिखाई गई और अब अचानक जांच की प्रक्रिया इतनी तेज कैसे हो गई।
अब इस मामले की सुनवाई गुरुवार को सुबह 11 बजे फिर होगी। उस दौरान राज्य सरकार की ओर से अपनी मुख्य दलील पूरी किए जाने की संभावना है।
परीक्षा रद्द करने के फैसले को दी गई है चुनौती
JSSC CGL परीक्षा रद्द किए जाने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ अभ्यर्थियों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क परीक्षा रद्द करने के सरकार के निर्णय और उसके आधार से जुड़ा है।
बुधवार को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की तरफ से अदालत के सामने अपनी दलीलें पूरी कर दी गईं। उनकी ओर से जवाब भी दाखिल कर दिया गया।
अब सुनवाई का केंद्र राज्य सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले पक्ष पर है। सरकार को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना है कि परीक्षा को रद्द करने जैसा बड़ा फैसला किन परिस्थितियों में लिया गया और उसके पीछे जांच में सामने आए कौन-कौन से तथ्य मौजूद हैं।
सरकार की ओर से इस संबंध में दो जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष सीलबंद लिफाफे में पेश की गईं। इन रिपोर्ट को मामले में महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है।
हालांकि, रिपोर्ट की प्रति सरकार की वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा के पास उपलब्ध नहीं होने के कारण बुधवार को सरकार की विस्तृत बहस नहीं हो सकी।
कोर्ट ने जांच की टाइमलाइन पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जांच की टाइमलाइन को लेकर राज्य सरकार से सीधे सवाल किए। अदालत का सवाल था कि आखिर पिछले तीन वर्षों के दौरान जांच की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हो सकी।
कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि जब मामला इतने लंबे समय से जांच के दायरे में था तो अचानक जांच में तेजी आने की वजह क्या थी।
अदालत की टिप्पणी का मूल केंद्र जांच की गति और परीक्षा रद्द करने के फैसले के बीच का संबंध रहा। न्यायालय यह समझना चाहता है कि जांच की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ी और किस चरण पर ऐसे तथ्य सामने आए जिनके आधार पर सरकार को परीक्षा रद्द करने का निर्णय लेना पड़ा।
कोर्ट ने सवाल किया कि यदि जांच पिछले तीन साल से चल रही थी तो इस दौरान कार्रवाई में ढील क्यों रही? अचानक जांच की प्रक्रिया तेज होने के पीछे क्या कारण था?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परीक्षा रद्द करने का फैसला हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा होता है। किसी प्रतियोगी परीक्षा के रद्द होने का सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ता है जिन्होंने लंबे समय तक तैयारी की होती है और परीक्षा में शामिल हुए होते हैं।
ऐसे में सरकार को परीक्षा रद्द करने के पीछे ठोस आधार और पूरी प्रक्रिया अदालत के सामने स्पष्ट करनी होगी।
सरकार ने कहा- जांच के तार CGL परीक्षा से जुड़े
राज्य सरकार की ओर से अदालत में परीक्षा रद्द करने के निर्णय का बचाव किया गया। सरकार की तरफ से बताया गया कि जिस जांच के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ी, उसके दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए जिनके तार JSSC CGL परीक्षा से भी जुड़ते चले गए।
सरकार की ओर से अदालत में यह दावा किया गया कि शुरुआत में जांच का दायरा JPSC मामले से जुड़ा था, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर JSSC CGL परीक्षा से संबंधित कथित अनियमितताओं के तथ्य भी सामने आए।
सरकार ने अदालत को एक व्यक्ति अभय तिवारी से जुड़े कथित कनेक्शन के बारे में जानकारी दी। सरकार के अनुसार जांच के दौरान अभय तिवारी का नाम सामने आया और उसके बाद उसके भाई तथा भाभी के CGL परीक्षा में चयन से संबंधित तथ्य भी जांच के दायरे में आए।
सरकार का कहना है कि जांच में सामने आए इन तथ्यों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता था, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र में संभावित गड़बड़ी के संदर्भ में इसकी जांच जरूरी हो गई।
हालांकि, इन आरोपों और जांच में सामने आए तथ्यों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी। फिलहाल ये राज्य सरकार की ओर से अदालत में रखी गई दलीलें और जांच से जुड़े दावे हैं।
नेपाल ही नहीं, देश के कई हिस्सों में उत्तर रटवाने का दावा
राज्य सरकार की ओर से सुनवाई के दौरान एक और गंभीर दावा किया गया। सरकार ने कहा कि कथित तौर पर अभ्यर्थियों को केवल नेपाल ले जाकर ही परीक्षा के उत्तर नहीं रटवाए गए, बल्कि देश के कई अन्य स्थानों पर भी ऐसी गतिविधियां होने की बात जांच में सामने आई है।
सरकार के अनुसार, अभ्यर्थियों को अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर कथित तौर पर परीक्षा से जुड़े उत्तर उपलब्ध कराए गए और उन्हें रटवाया गया।
यदि जांच में सामने आए इन दावों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रह जाएगा, बल्कि परीक्षा की निष्पक्षता और पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
सरकार का यही तर्क है कि कथित गड़बड़ी का दायरा इतना व्यापक था कि परीक्षा में वास्तविक रूप से मेहनत करके सफल हुए अभ्यर्थियों और कथित तरीके से अनुचित लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया।
इसी आधार पर सरकार ने परीक्षा को पूरी तरह रद्द करने के निर्णय को उचित बताया।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती- सही और गलत अभ्यर्थियों की पहचान
प्रतियोगी परीक्षा में कथित पेपर लीक या बड़े पैमाने पर अनियमितता का सबसे कठिन सवाल यह होता है कि वास्तविक रूप से कितने अभ्यर्थी प्रभावित हुए और कितने लोगों ने अनुचित तरीके से लाभ उठाया।
सरकार की ओर से अदालत में यही बात रखी गई कि कथित गड़बड़ी का दायरा इतना व्यापक था कि केवल कुछ चुनिंदा अभ्यर्थियों की परीक्षा या चयन को प्रभावित मानकर पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना संभव नहीं था।
सरकार के अनुसार जांच में अलग-अलग स्थानों पर अभ्यर्थियों को ले जाकर उत्तर रटवाने की बात सामने आई। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि परीक्षा में सफल हुए किन अभ्यर्थियों ने वास्तव में अपनी योग्यता के आधार पर प्रदर्शन किया और किन्होंने कथित रूप से अनुचित साधनों का इस्तेमाल किया।
इसी परिस्थिति में राज्य सरकार की कैबिनेट ने परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया।
अब हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि सरकार के इस फैसले के लिए पेश किए गए आधार कानूनी रूप से पर्याप्त हैं या नहीं और क्या पूरी परीक्षा को रद्द करना परिस्थितियों के अनुपात में उचित कदम था।
सीलबंद रिपोर्ट से बढ़ी सुनवाई की अहमियत
बुधवार की सुनवाई में राज्य सरकार द्वारा दो जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश किए जाने से मामले की गंभीरता और बढ़ गई।
सीलबंद रिपोर्ट अदालत के समक्ष इसलिए महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि उनमें जांच से जुड़े ऐसे तथ्य हो सकते हैं जिन्हें तत्काल सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। हालांकि, बुधवार को सरकार की ओर से रिपोर्ट पर विस्तृत बहस नहीं हो सकी क्योंकि वरिष्ठ अधिवक्ता के पास उसकी प्रति उपलब्ध नहीं थी।
रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध होने के बाद सरकार अदालत के सामने इन दस्तावेजों में दर्ज तथ्यों और उनके आधार पर लिए गए फैसले की विस्तृत व्याख्या कर सकेगी।
गुरुवार की सुनवाई में यह हिस्सा खास तौर पर महत्वपूर्ण रहने वाला है कि सरकार जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को किस तरह अदालत के सामने रखती है और परीक्षा रद्द करने के फैसले को उनसे कैसे जोड़ती है।
तीन साल की जांच पर कोर्ट की नाराजगी क्यों अहम?
अदालत की ओर से जांच की टाइमलाइन पर सवाल उठाना इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू है।
किसी प्रतियोगी परीक्षा से जुड़ा मामला यदि वर्षों तक जांच में रहता है तो उसका असर सीधे अभ्यर्थियों पर पड़ता है। परीक्षा देने वाले छात्र अपने परिणाम, नियुक्ति या भविष्य की प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता में रहते हैं।
दूसरी ओर, यदि लंबे समय तक जांच चलने के बाद अचानक कोई बड़ा निर्णय लिया जाता है तो उस निर्णय की प्रक्रिया और समय को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह जानना चाहा कि तीन साल तक जांच में तेजी क्यों नहीं आई और अचानक जांच की प्रक्रिया तेज होने का कारण क्या था।
अदालत की यह टिप्पणी आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, क्योंकि सरकार को केवल कथित गड़बड़ी के तथ्य ही नहीं, बल्कि जांच की प्रक्रिया और उसके समय से जुड़े सवालों का भी जवाब देना होगा।
अभ्यर्थियों की चिंता भी बढ़ी
JSSC CGL जैसी प्रतियोगी परीक्षा में हजारों अभ्यर्थी शामिल होते हैं। परीक्षा रद्द होने की स्थिति में अभ्यर्थियों के सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं।
जो अभ्यर्थी पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ परीक्षा में शामिल हुए, उनके लिए परीक्षा रद्द होना निराशाजनक हो सकता है। वहीं यदि परीक्षा में वास्तव में बड़े स्तर पर अनियमितता हुई हो तो निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम उठाना भी जरूरी माना जाता है।
यही संतुलन इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण है।
एक तरफ उन अभ्यर्थियों का हित है जिन्होंने बिना किसी अनुचित साधन के परीक्षा दी। दूसरी तरफ यदि परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा हो जाए तो पूरी प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता पर सवाल खड़ा हो सकता है।
अब हाईकोर्ट को उपलब्ध कराई जाने वाली जांच रिपोर्ट और राज्य सरकार की दलीलों से यह समझने में मदद मिलेगी कि परीक्षा रद्द करने का निर्णय किन ठोस तथ्यों पर आधारित था।
गुरुवार सुबह 11 बजे फिर होगी सुनवाई
बुधवार की सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस और जवाब दाखिल किया जा चुका है, जबकि राज्य सरकार की ओर से मुख्य बहस अभी बाकी है।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई गुरुवार सुबह 11 बजे निर्धारित की है।
गुरुवार को सरकार की ओर से जांच रिपोर्ट और परीक्षा रद्द करने के फैसले के पक्ष में विस्तृत दलीलें रखे जाने की उम्मीद है। अदालत की ओर से जांच की समयसीमा, कथित अनियमितताओं की प्रकृति और परीक्षा रद्द करने के निर्णय के आधार पर आगे सवाल पूछे जा सकते हैं।
इस सुनवाई पर JSSC CGL परीक्षा में शामिल रहे हजारों अभ्यर्थियों की नजर रहेगी। अदालत में होने वाली बहस से यह स्पष्ट होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठ सकता है कि परीक्षा रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले को न्यायिक कसौटी पर किस तरह देखा जाता है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। बुधवार की सुनवाई में केवल दोनों पक्षों की दलीलों और जांच रिपोर्ट से जुड़े पहलुओं पर चर्चा हुई। इसलिए परीक्षा रद्द करने का फैसला बरकरार रहेगा या उसमें कोई बदलाव होगा, इस पर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
अब अगली सुनवाई में राज्य सरकार की मुख्य दलील और जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों पर अदालत की प्रतिक्रिया सबसे अहम होगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि तीन साल की जांच और उसके बाद आई तेजी को लेकर सरकार की ओर से अदालत को क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है।
फिलहाल मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और परीक्षा रद्द करने के फैसले की अंतिम कानूनी स्थिति अदालत के आगामी आदेश से ही स्पष्ट होगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
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यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।