IndianLawNotes.com

रायबरेली में पंचायत और विधानसभा मतदाता सूची में 468 वोटरों का अंतर, हाईकोर्ट ने चुनाव आयोगों से मांगा जवाब

रायबरेली में पंचायत और विधानसभा मतदाता सूची में 468 वोटरों का अंतर, हाईकोर्ट ने चुनाव आयोगों से मांगा जवाब

चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश, अगली सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध

       उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच मतदाता सूचियों को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सामने पहुंचा है। रायबरेली जिले की एक ग्राम पंचायत में पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव के लिए तैयार की गई मतदाता सूचियों में बड़ा अंतर सामने आने के बाद न्यायालय ने केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दोनों चुनाव आयोगों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है। इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि एक ही ग्राम पंचायत के मतदाताओं की संख्या दो अलग-अलग चुनावों की मतदाता सूचियों में अलग क्यों है और दोनों सूचियों को तैयार करने के लिए अपनाए गए मानकों में कितना अंतर है।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने रायबरेली जिले की मखदूमपुर ग्राम पंचायत के निवासी रोहित की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

पंचायत और विधानसभा सूची में 468 मतदाताओं का अंतर

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मोतीलाल यादव ने न्यायालय के समक्ष दलील दी कि मखदूमपुर ग्राम पंचायत की पंचायत चुनाव के लिए तैयार की गई मतदाता सूची और विधानसभा चुनाव के लिए तैयार मतदाता सूची में काफी अंतर है।

याचिका के अनुसार, पंचायत चुनाव के लिए तैयार मतदाता सूची में कुल 1987 मतदाता दर्ज हैं, जबकि विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची में केवल 1519 मतदाता शामिल हैं। इस तरह दोनों सूचियों में 468 मतदाताओं का अंतर सामने आया है।

याचिकाकर्ता की ओर से इस अंतर को गंभीर बताते हुए सवाल उठाया गया कि जब दोनों सूचियां एक ही क्षेत्र के मतदाताओं से संबंधित हैं तो मतदाताओं की संख्या में इतना बड़ा अंतर कैसे हो सकता है।

अधिवक्ता की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि पंचायत चुनाव के लिए तैयार की गई सूची में जिन लोगों के नाम मतदाता के रूप में दर्ज हैं, उनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके नाम विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची में दिखाई नहीं दे रहे हैं।

मामले में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पंचायत और विधानसभा दोनों ही चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और मतदाता सूची किसी भी चुनाव की मूल आधारभूत व्यवस्था होती है।

चुनाव आयोग ने बताया अलग-अलग है सूची तैयार करने का मानक

याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्रीय चुनाव आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता ने मतदाता सूचियों में अंतर के संबंध में अपना पक्ष रखा। आयोग की ओर से कहा गया कि पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करने के मानक पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं।

आयोग के अधिवक्ता ने दलील दी कि विधानसभा चुनाव के लिए तैयार की जाने वाली मतदाता सूची में मतदाता के निवास और संबंधित विधानसभा क्षेत्र से उसके संबंध को निर्धारित मानकों के आधार पर देखा जाता है।

अदालत के समक्ष यह भी कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति संबंधित विधानसभा क्षेत्र में तीन या उससे अधिक वर्षों से निवास नहीं कर रहा है तो परिस्थितियों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसका नाम विधानसभा मतदाता सूची से हटाया जा सकता है।

इस दलील से यह संकेत मिलता है कि पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव की मतदाता सूचियों में अंतर केवल नाम जोड़ने या हटाने की सामान्य प्रक्रिया का परिणाम नहीं हो सकता, बल्कि दोनों चुनावों के लिए लागू अलग-अलग नियम और पुनरीक्षण प्रक्रिया भी इसका कारण हो सकती है।

हालांकि, मामले में अंतिम स्थिति क्या है और मखदूमपुर ग्राम पंचायत में 468 मतदाताओं के अंतर का वास्तविक कारण क्या है, यह आयोगों के जवाब के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

हाईकोर्ट ने दोनों चुनाव आयोगों से मांगा जवाब

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। न्यायालय ने दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

अदालत के इस आदेश के बाद अब चुनाव आयोगों को यह स्पष्ट करना होगा कि संबंधित ग्राम पंचायत में दोनों मतदाता सूचियों के बीच इतना अंतर क्यों है। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि जिन 468 मतदाताओं के नाम दोनों सूचियों में अलग-अलग स्थिति में हैं, उनके संबंध में कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई।

अगली सुनवाई में आयोगों की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब से इस मामले की तस्वीर काफी हद तक साफ होने की उम्मीद है।

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तैयारियां चल रही हैं और राज्य के अलग-अलग जिलों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर लगातार गतिविधियां जारी हैं।

पंचायत चुनाव के लिए 12 करोड़ से ज्यादा मतदाता

उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों को लेकर जारी अंतिम मतदाता सूची के अनुसार प्रदेश में कुल 12 करोड़ 58 लाख 51 हजार 570 मतदाता दर्ज हैं।

यदि वर्ष 2021 के आंकड़ों से इसकी तुलना की जाए तो इस बार मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2021 में प्रदेश में कुल 12 करोड़ 29 लाख 50 हजार 52 मतदाता दर्ज किए गए थे।

इस तरह पांच वर्ष के अंतराल में मतदाताओं की संख्या में 29 लाख 1 हजार 518 की वृद्धि दर्ज की गई है।

मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए। इसके साथ ही ऐसे मतदाताओं के नाम भी हटाए गए जिन्हें मृत, स्थानांतरित या अन्य कारणों से अपात्र पाया गया।

आंकड़ों के अनुसार विशेष पुनरीक्षण के दौरान 2 करोड़ 32 लाख 24 हजार 805 नाम जोड़े गए, जबकि 2 करोड़ 3 लाख 23 हजार 287 नाम हटाए गए।

नाम जोड़ने और हटाने की इस व्यापक प्रक्रिया के बाद प्रदेश की कुल मतदाता संख्या में शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई।

जौनपुर में सबसे ज्यादा मतदाता

पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश के कई बड़े जिलों में मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है।

इनमें जौनपुर सबसे आगे है। यहां कुल 36 लाख 97 हजार 376 मतदाता दर्ज किए गए हैं।

इसके बाद प्रयागराज का स्थान है, जहां 34 लाख 95 हजार 203 मतदाता हैं। वहीं सीतापुर में कुल 31 लाख 18 हजार 29 मतदाता दर्ज किए गए हैं।

गोरखपुर में मतदाताओं की संख्या 29 लाख 63 हजार 142 है, जबकि लखीमपुर खीरी में कुल 28 लाख 87 हजार 290 मतदाता दर्ज हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के विशाल ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत चुनाव का दायरा कितना बड़ा है। ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक होने वाले चुनाव में करोड़ों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव प्रक्रिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

मतदाता सूची में अंतर क्यों बनता है महत्वपूर्ण सवाल?

किसी भी चुनाव में मतदाता सूची सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक होती है। मतदाता सूची में नाम दर्ज होने के बाद ही व्यक्ति संबंधित चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकता है। इसलिए एक ही भौगोलिक क्षेत्र के लिए अलग-अलग चुनावों में मतदाताओं की संख्या में बड़ा अंतर होने पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है।

हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि पंचायत और विधानसभा चुनाव अलग-अलग संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं के तहत संचालित होते हैं। दोनों चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने और उसके पुनरीक्षण की प्रक्रिया में अंतर हो सकता है।

यही कारण है कि केवल मतदाताओं की संख्या अलग होने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी सूची में अनिवार्य रूप से गड़बड़ी हुई है।

मखदूमपुर ग्राम पंचायत का मामला अब न्यायालय के सामने है। हाईकोर्ट ने संबंधित चुनाव आयोगों से जवाब मांगकर इस अंतर का आधिकारिक आधार स्पष्ट करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

अब आयोगों के जवाब पर टिकी नजर

मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। तब तक केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग को अपना जवाब अदालत में दाखिल करना होगा।

अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि 1987 और 1519 मतदाताओं के बीच का अंतर किन कारणों से उत्पन्न हुआ। साथ ही यह भी सामने आ सकता है कि संबंधित मतदाताओं के नाम हटाने या शामिल करने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई।

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। न्यायालय ने केवल संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इसलिए इस मामले में आगे की स्थिति आयोगों के जवाब और अदालत की आगामी सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।

रायबरेली की इस ग्राम पंचायत से जुड़ा मामला भले ही स्थानीय स्तर का दिखाई देता हो, लेकिन इसका महत्व व्यापक है। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के लिए करोड़ों मतदाताओं की सूची तैयार की गई है। ऐसे में अलग-अलग चुनावों की मतदाता सूचियों में अंतर और उनके पीछे लागू नियमों को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना चुनाव प्रक्रिया में जनता के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण है।

अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट में दाखिल होने वाले जवाब पर हैं। चार सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि दोनों मतदाता सूचियों में 468 मतदाताओं के अंतर को लेकर चुनाव आयोगों की ओर से क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है और इस संबंध में आगे क्या कानूनी दिशा तय होती है।

✓
संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।