महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा योजना को हाईकोर्ट में चुनौती, याचिका वापस; जानिए क्या है ‘वेट्री पयनम’ स्कीम और विवाद
Tamil Nadu Free Bus Travel Scheme: तमिलनाडु में महिलाओं और ट्रांसजेंडर यात्रियों के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने वाली ‘वेट्री पयनम’ (Vettri Payanam) योजना को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में दायर याचिका सोमवार को वापस ले ली गई। इरोड की एक निजी बस ऑपरेटर एन. कलामणि ने इस योजना की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
मामले की सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को मद्रास हाईकोर्ट की पहली डिवीजन बेंच के सामने हुई। मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने मामले की सुनवाई करने में अनिच्छा जताई। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से याचिका वापस ले ली गई।
हालांकि अदालत में इस याचिका पर विस्तृत सुनवाई नहीं हुई, लेकिन इस मामले ने तमिलनाडु सरकार की मुफ्त बस यात्रा योजना और उसके निजी बस ऑपरेटरों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर एक नई बहस जरूर खड़ी कर दी है।
क्या है ‘वेट्री पयनम’ योजना?
तमिलनाडु सरकार ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की सुविधा को और व्यापक बनाने के उद्देश्य से ‘वेट्री पयनम’ योजना शुरू की है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 2 अक्टूबर को इस विस्तारित योजना की शुरुआत की।
योजना के तहत पात्र महिला यात्रियों को सरकारी बसों में यात्रा के लिए किराया नहीं देना होगा और उन्हें जीरो-फेयर टिकट उपलब्ध कराया जाएगा।
सरकार का उद्देश्य केवल महिलाओं को मुफ्त यात्रा उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि परिवहन खर्च के कारण महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक अवसरों पर पड़ने वाले असर को कम करना भी है। सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक परिवहन तक आसान और कम लागत वाली पहुंच महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी गतिविधियों में भागीदारी बढ़ा सकती है।
नई व्यवस्था के साथ योजना का दायरा पहले की तुलना में काफी बढ़ा दिया गया है।
पहले सीमित था मुफ्त यात्रा का दायरा
तमिलनाडु में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की सुविधा पहले से लागू थी, लेकिन इसका दायरा सीमित था। पहले यह सुविधा मुख्य रूप से सामान्य शहर और कस्बाई बसों में उपलब्ध थी। पहाड़ी क्षेत्रों में भी एक निश्चित दूरी तक यात्रा को इस सुविधा के तहत रखा गया था।
अब सरकार ने इस व्यवस्था को कई अन्य प्रकार की बस सेवाओं तक विस्तार दिया है।
नई व्यवस्था के तहत एक्सप्रेस, लिमिटेड स्टॉप सर्विस (LSS), डीलक्स, सब-अर्बन ऑर्डिनरी यानी मोफुसिल ऑर्डिनरी और घाट ऑर्डिनरी सेवाओं को भी योजना में शामिल किया गया है।
ये बस सेवाएं राज्य के विभिन्न हिस्सों में लंबी दूरी के रूट पर संचालित होती हैं। खास तौर पर 40 किलोमीटर से अधिक दूरी वाले कई रूट अब इस विस्तारित योजना का हिस्सा बन गए हैं।
इस विस्तार के बाद बड़ी संख्या में महिला यात्रियों को पहले की तुलना में अधिक बस सेवाओं में मुफ्त यात्रा का लाभ मिलने की उम्मीद है।
रोजाना 84 लाख से ज्यादा महिलाओं को लाभ का अनुमान
सरकार की योजना के अनुसार राज्य के सात स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन इस विस्तारित व्यवस्था को लागू करेंगे।
बताया गया है कि योजना के तहत कुल 12,695 बसें रोजाना संचालित होंगी। इन बसों से लगभग 1,68,500 सिंगल ट्रिप किए जाने का अनुमान है।
सरकार के मुताबिक इससे राज्य में प्रतिदिन लगभग 84.32 लाख महिला यात्रियों को लाभ मिल सकता है।
इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों को मुफ्त यात्रा उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार को राज्य परिवहन निगमों को आर्थिक सहायता देनी होगी। इसी वजह से इस योजना का वित्तीय बोझ भी काफी बड़ा है।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि सरकार इस योजना के तहत राज्य परिवहन निगमों को मुआवजा देने के लिए सालाना लगभग 6,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है।
निजी बस ऑपरेटर ने क्यों जताई आपत्ति?
इरोड की निजी बस ऑपरेटर एन. कलामणि ने हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में मुख्य रूप से योजना के निजी बस कारोबार पर पड़ने वाले प्रभाव को मुद्दा बनाया था।
उनका कहना था कि जब सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी, तो यात्रियों के लिए सरकारी बसों का चुनाव अधिक आकर्षक हो जाएगा। इसका सीधा असर निजी बसों के यात्रियों की संख्या पर पड़ सकता है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक समस्या केवल महिला यात्रियों तक सीमित नहीं रहेगी। उनका तर्क था कि यदि किसी परिवार में महिला सदस्य सरकारी बस में मुफ्त यात्रा कर सकती है, तो परिवार के अन्य सदस्य भी उसी बस में यात्रा करना पसंद कर सकते हैं।
ऐसे में निजी बसों को महिला यात्रियों के साथ-साथ पुरुष यात्रियों का भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रही तो निजी बस संचालकों के सामने अपना कारोबार जारी रखना मुश्किल हो सकता है।
‘समानता के अधिकार’ का दिया गया हवाला
निजी बस ऑपरेटर ने योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 का भी हवाला दिया।
उनका तर्क था कि सरकारी और निजी बस ऑपरेटर एक ही परिवहन क्षेत्र में यात्रियों को सेवा उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में केवल सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा उपलब्ध कराने से दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकार द्वारा सरकारी परिवहन निगमों को आर्थिक सहायता देकर मुफ्त यात्रा की सुविधा उपलब्ध कराना निजी बस ऑपरेटरों के लिए समान परिस्थितियां नहीं छोड़ता।
हालांकि, इन दलीलों पर मद्रास हाईकोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया, क्योंकि सुनवाई के दौरान याचिका वापस ले ली गई।
इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने ‘वेट्री पयनम’ योजना को असंवैधानिक घोषित नहीं किया और न ही योजना की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष दिया।
याचिकाकर्ता ने अपनी व्यक्तिगत स्थिति भी बताई
एन. कलामणि ने अदालत के सामने अपने निजी हालात का भी उल्लेख किया था। उन्होंने बताया कि वह विधवा हैं और अपनी दो बेटियों की देखभाल कर रही हैं।
उन्होंने बताया कि उनके पास इरोड से वेल्लिथिरुप्पुर तक करीब 47 किलोमीटर लंबे रूट और काकापालयम से अंधियुर तक करीब 88 किलोमीटर लंबे रूट पर बसें संचालित करने के परमिट हैं।
उनके मुताबिक उनका परिवहन कारोबार केवल उनके परिवार की आय का साधन नहीं था, बल्कि कई अन्य परिवार भी उससे जुड़े हुए थे।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने करीब 15 लोगों को रोजगार दिया हुआ था। इसलिए यदि सरकारी बसों की मुफ्त यात्रा के कारण उनकी बसों में यात्रियों की संख्या में बड़ी गिरावट आती है, तो इसका असर उनके कर्मचारियों और उनके परिवारों पर भी पड़ सकता है।
उनकी चिंता थी कि जिन रूटों पर उनकी बसें चलती हैं, वहां पहले से बड़ी संख्या में सरकारी बसें संचालित होती हैं। मुफ्त यात्रा की सुविधा का विस्तार होने के बाद यात्री निजी बसों की जगह सरकारी बसों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
निजी बस ऑपरेटरों की मांग का भी किया गया उल्लेख
याचिका में तमिलनाडु के बस ऑपरेटर संघों की ओर से की गई मांग का भी उल्लेख किया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 22 जुलाई 2026 को तमिलनाडु के बस ऑपरेटर संघों के महासंघ ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से मुलाकात कर योजना को निजी बस ऑपरेटरों तक भी विस्तारित करने का अनुरोध किया था।
निजी बस ऑपरेटरों का तर्क था कि यदि सरकार महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा को सार्वजनिक परिवहन नीति के रूप में लागू कर रही है, तो निजी बसों को इससे बाहर रखने पर उनके कारोबार पर असमान आर्थिक प्रभाव पड़ेगा।
हालांकि, याचिकाकर्ता के मुताबिक इस मांग पर उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिला।
इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया और योजना को चुनौती दी।
मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधानों का भी हवाला
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 और तमिलनाडु मोटर व्हीकल रूल्स, 1989 के विभिन्न प्रावधानों का हवाला दिया।
उनकी ओर से तर्क दिया गया कि बस परिवहन व्यवस्था में यात्रियों से किराया वसूलने की व्यवस्था कानून और परमिट की शर्तों से जुड़ी है। इसलिए सरकार द्वारा कुछ यात्रियों के लिए शून्य किराया तय करने के अधिकार को भी कानूनी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
याचिका में यह भी कहा गया कि सरकारी बसों को इस तरह की आर्थिक सहायता मिलने से निजी बस ऑपरेटरों के सामने प्रतिस्पर्धा की स्थिति बदल जाती है।
हालांकि इन कानूनी तर्कों पर अदालत की ओर से कोई विस्तृत टिप्पणी या निर्णय नहीं आया, क्योंकि याचिका सुनवाई के चरण में ही वापस ले ली गई।
पहले की योजना से कैसे अलग है ‘वेट्री पयनम’?
तमिलनाडु में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की अवधारणा बिल्कुल नई नहीं है। पिछली सरकार के दौरान ‘विडियाल पयनम’ नाम से भी महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि पुरानी योजना का दायरा अपेक्षाकृत सीमित था और इसलिए निजी बस ऑपरेटरों पर उसका प्रभाव भी उतना व्यापक नहीं था।
इसके विपरीत, ‘वेट्री पयनम’ के तहत मुफ्त यात्रा का दायरा कई अतिरिक्त बस सेवाओं तक बढ़ा दिया गया है।
यही वजह है कि निजी बस संचालकों को इस बार ज्यादा आर्थिक नुकसान की आशंका दिखाई दे रही है।
सरकार का उद्देश्य क्या है?
राज्य सरकार की ओर से योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देना बताया गया है।
कई महिलाओं के लिए रोजाना काम, शिक्षा, अस्पताल, बाजार या अन्य जरूरी गतिविधियों तक पहुंचने में बस किराया एक नियमित खर्च होता है। खासकर कम आय वाले परिवारों में परिवहन पर होने वाला खर्च घरेलू बजट को प्रभावित कर सकता है।
मुफ्त बस यात्रा से महिलाओं के पास अपनी आय का अधिक हिस्सा बचाने का अवसर हो सकता है। इसी तरह नौकरी या शिक्षा के लिए अपेक्षाकृत दूर तक आने-जाने का निर्णय भी आसान हो सकता है।
सरकार इसी सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य को योजना के विस्तार का आधार मान रही है।
क्या हाईकोर्ट ने योजना पर रोक लगाई?
नहीं। यह बात स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है।
मद्रास हाईकोर्ट ने ‘वेट्री पयनम’ योजना पर रोक नहीं लगाई है। अदालत ने योजना को असंवैधानिक भी घोषित नहीं किया है।
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने में अनिच्छा जताई और इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली।
इसलिए वर्तमान स्थिति में योजना पर अदालत की ओर से कोई प्रतिकूल आदेश नहीं आया है और सरकार की विस्तारित मुफ्त बस यात्रा योजना जारी रहने का रास्ता साफ है।
अब आगे क्या हो सकता है?
याचिका वापस लिए जाने के बाद इस मामले में फिलहाल कोई न्यायिक फैसला सामने नहीं आया है। लेकिन निजी बस ऑपरेटरों की ओर से उठाए गए सवाल भविष्य में फिर अदालत के सामने आ सकते हैं।
खासकर तब, जब मुफ्त यात्रा के कारण निजी बसों की यात्री संख्या और आय पर गंभीर प्रभाव पड़ने के ठोस आंकड़े सामने आते हैं।
सरकार के सामने भी एक चुनौती यह होगी कि महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा देने के साथ-साथ निजी परिवहन क्षेत्र पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को किस तरह संतुलित किया जाए।
यदि निजी बस ऑपरेटरों को लगातार नुकसान होता है, तो वे सरकार से मुआवजे, समान सुविधा या किसी वैकल्पिक नीति की मांग कर सकते हैं।
योजना से जुड़ी बड़ी तस्वीर
‘वेट्री पयनम’ को केवल मुफ्त बस टिकट की योजना के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे सार्वजनिक परिवहन को महिलाओं के लिए अधिक सुलभ बनाने की नीति भी जुड़ी है।
दूसरी ओर, निजी बस ऑपरेटरों की चिंता भी व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। निजी बस संचालक अपने संसाधनों से बसें चलाते हैं, कर्मचारियों को वेतन देते हैं और परिचालन लागत वहन करते हैं। यदि उनके रूट पर चलने वाली सरकारी बसें महिला यात्रियों को मुफ्त यात्रा उपलब्ध कराती हैं, तो प्रतिस्पर्धा की स्थिति बदलना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि इस योजना ने सामाजिक कल्याण और बाजार प्रतिस्पर्धा दोनों से जुड़े सवाल खड़े किए हैं।
निष्कर्ष
तमिलनाडु की ‘वेट्री पयनम’ योजना महिलाओं और ट्रांसजेंडर यात्रियों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है। 2 अक्टूबर 2026 से इसके विस्तारित स्वरूप को लागू किया गया है। इसके तहत एक्सप्रेस, लिमिटेड स्टॉप सर्विस, डीलक्स, सब-अर्बन ऑर्डिनरी और घाट ऑर्डिनरी जैसी सेवाओं को भी शामिल किया गया है।
सरकार के अनुमान के मुताबिक 12,695 बसों के जरिए रोजाना करीब 1,68,500 सिंगल ट्रिप संचालित होंगी और लगभग 84.32 लाख महिला यात्रियों को प्रतिदिन इसका लाभ मिल सकता है।
वहीं इरोड की निजी बस ऑपरेटर एन. कलामणि ने इस योजना के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया था कि इससे निजी बस कारोबार पर गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 सहित मोटर व्हीकल एक्ट और राज्य के मोटर व्हीकल रूल्स के प्रावधानों का हवाला देते हुए योजना की वैधता पर सवाल उठाए थे।
हालांकि, 5 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ के समक्ष मामला आने के बाद याचिका वापस ले ली गई। इसलिए अभी इस योजना की संवैधानिक वैधता पर हाईकोर्ट की ओर से कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
फिलहाल ‘वेट्री पयनम’ योजना जारी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार महिलाओं को मुफ्त सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने के सामाजिक उद्देश्य और निजी बस ऑपरेटरों के आर्थिक हितों के बीच संतुलन कैसे कायम करती है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।