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चयनित अभ्यर्थी ने नौकरी नहीं ज्वाइन की तो मेरिट में अगले उम्मीदवार को मौका देना जरूरी, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

चयनित अभ्यर्थी ने नौकरी नहीं ज्वाइन की तो मेरिट में अगले उम्मीदवार को मौका देना जरूरी, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

       सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया में मेरिट लिस्ट में शामिल उम्मीदवारों के अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी पद पर चयनित अभ्यर्थी नियुक्ति के बाद नौकरी ज्वाइन नहीं करता है या उसकी उम्मीदवारी किसी कारण से समाप्त हो जाती है, तो चयन सूची में अगले पात्र अभ्यर्थी को मौका देने के नियमों पर विचार किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने माना कि किसी चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने के बाद रिक्त रह गए पद पर अगले योग्य उम्मीदवार की उम्मीदवारी पर विचार किए बिना भर्ती प्रक्रिया को समाप्त करना उचित नहीं माना जा सकता, यदि लागू भर्ती नियम और प्रशासनिक निर्देश ऐसी स्थिति में प्रतीक्षा सूची या रिजर्व सूची के उम्मीदवार को अवसर देने की व्यवस्था करते हैं।

यह फैसला ईएसआईसी (Employees’ State Insurance Corporation) की स्टाफ नर्स भर्ती से जुड़े मामले में आया है। जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने चयनित अभ्यर्थी की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट के पहले के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने ईएसआईसी को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर नए सिरे से विचार करे और इस प्रक्रिया को दो महीने के भीतर पूरा करे।

क्या है पूरा मामला?

मामला वर्ष 2019 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। उस समय ईएसआईसी की ओर से फार्मासिस्ट और स्टाफ नर्स सहित विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था।

भर्ती प्रक्रिया के तहत कुल 17 पद बताए गए थे। इनमें से एक पद अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी श्रेणी के लिए आरक्षित था।

ओबीसी श्रेणी के इस पद के लिए धमतरी जिले की रहने वाली दीप्ति साहू ने आवेदन किया था। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद तैयार मेरिट सूची में दीप्ति साहू का स्थान 18वां था।

ओबीसी श्रेणी के पद पर उनसे ऊपर चयनित अभ्यर्थी राखी पाल का चयन हुआ और उन्हें नियुक्ति का अवसर मिला।

शुरुआत में यह प्रक्रिया सामान्य रूप से आगे बढ़ी, लेकिन बाद में एक ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसने पूरी भर्ती प्रक्रिया को विवाद में ला दिया।

चयनित उम्मीदवार ने नौकरी ज्वाइन नहीं की

मेरिट के आधार पर चयनित राखी पाल ने नौकरी ज्वाइन नहीं करने का फैसला लिया। उन्होंने 24 जुलाई 2019 को ईएसआईसी को इसकी जानकारी दी।

यहीं से दीप्ति साहू ने अपने पक्ष में दावा पेश किया।

उनका कहना था कि जब ओबीसी श्रेणी में चयनित उम्मीदवार ने पद पर ज्वाइन नहीं किया है, तो रिक्त हुए पद पर मेरिट सूची में अगले पात्र उम्मीदवार के रूप में उनकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाना चाहिए।

दीप्ति साहू ने संबंधित विभाग के समक्ष अपनी नियुक्ति का दावा रखा। उनका तर्क था कि उन्होंने भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया था और चयन सूची में भी स्थान प्राप्त किया था। ऐसे में उनसे ऊपर चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने के बाद उनके मामले पर विचार किया जाना चाहिए।

लेकिन विभाग ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की।

इसके बाद उन्होंने अपनी बात पहले ईएसआईसी के समक्ष रखी और फिर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख किया।

कैट से भी नहीं मिली राहत

दीप्ति साहू ने अपने पक्ष को लेकर कैट के समक्ष आवेदन किया। उन्होंने मांग की कि चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने के बाद रिक्त हुए पद पर नियमों के अनुसार उनकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाए।

हालांकि, कैट से भी उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली।

इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में चयनित अभ्यर्थी पद पर ज्वाइन नहीं करता है, तो क्या चयन सूची में अगले उम्मीदवार को उस पद के लिए विचार का अवसर दिया जा सकता है?

अदालत ने मामले में लागू प्रशासनिक निर्देशों और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े प्रावधानों का परीक्षण किया।

हाईकोर्ट ने प्रशासनिक निर्देशों को माना महत्वपूर्ण

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित प्रशासनिक निर्देशों का हवाला दिया। अदालत के अनुसार, यदि चयनित उम्मीदवार नौकरी ज्वाइन नहीं करता है या किसी कारण से उसकी उम्मीदवारी समाप्त हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में चयन सूची को आगे बढ़ाने और रिजर्व सूची में मौजूद अगले योग्य उम्मीदवार को अवसर देने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।

अदालत ने इस पहलू को महत्वपूर्ण माना कि चयन प्रक्रिया के दौरान किसी पद के लिए उम्मीदवारों की मेरिट तैयार की गई थी।

जब मेरिट में ऊपर रहने वाला चयनित उम्मीदवार पद स्वीकार नहीं करता, तो उस पद के रिक्त रह जाने की स्थिति में नीचे के पात्र उम्मीदवार के दावे को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसका मूल चयन नहीं हुआ था।

हालांकि, यह अधिकार हर मामले में स्वतः लागू नहीं होता। इसके लिए संबंधित भर्ती नियम, विज्ञापन की शर्तें और लागू प्रशासनिक निर्देश महत्वपूर्ण होंगे।

यही वजह है कि हाईकोर्ट ने ईएसआईसी को याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कैट का आदेश क्यों रद्द किया?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले में कैट के आदेश को भी रद्द कर दिया।

अदालत के सामने यह बात महत्वपूर्ण थी कि चयनित उम्मीदवार ने पद पर ज्वाइन नहीं किया था। ऐसी स्थिति में लागू प्रशासनिक व्यवस्था के तहत अगले उम्मीदवार के दावे पर विचार करने की संभावना मौजूद थी।

हाईकोर्ट ने माना कि इस पहलू को उचित तरीके से विचार किए बिना याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करना उचित नहीं था।

इसलिए अदालत ने कैट के आदेश को निरस्त करते हुए ईएसआईसी को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।

यहां अदालत ने सीधे तौर पर नियुक्ति का आदेश देने के बजाय ईएसआईसी को याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर नियमों के अनुसार निर्णय लेने को कहा है।

दो महीने में करना होगा फैसला

हाईकोर्ट ने ईएसआईसी को याचिकाकर्ता के मामले पर नए सिरे से विचार करने के लिए दो महीने की समयसीमा दी है।

इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने तत्काल दीप्ति साहू की नियुक्ति कर दी है। अदालत का निर्देश यह है कि ईएसआईसी उनके दावे और उम्मीदवारी की दोबारा जांच करे और लागू नियमों एवं प्रशासनिक निर्देशों के आधार पर उचित निर्णय ले।

इस प्रक्रिया में भर्ती विज्ञापन, मेरिट सूची, चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने की सूचना, रिजर्व सूची और उस समय लागू प्रशासनिक निर्देशों को ध्यान में रखा जाना होगा।

मेरिट लिस्ट में अगले उम्मीदवार का दावा कब बन सकता है?

सरकारी भर्तियों में मेरिट सूची का महत्व बहुत अधिक होता है। लेकिन किसी उम्मीदवार का मेरिट सूची में होना अपने आप में नियुक्ति का पूर्ण और असीमित अधिकार नहीं देता।

नियुक्ति संबंधित भर्ती नियमों, रिक्त पदों, आरक्षण व्यवस्था और चयन प्रक्रिया की शर्तों के अनुसार होती है।

फिर भी ऐसी स्थिति में जब चयनित उम्मीदवार पद स्वीकार नहीं करता और भर्ती नियम या प्रशासनिक निर्देश अगले उम्मीदवार को मौका देने की व्यवस्था करते हैं, तब अगले उम्मीदवार के दावे पर विचार किया जाना जरूरी हो सकता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस मामले में भी इसी सिद्धांत पर ध्यान दिया गया है।

अदालत ने इस बात को नजरअंदाज नहीं किया कि पद आरक्षित श्रेणी से जुड़ा था और उस श्रेणी में चयनित उम्मीदवार ने नियुक्ति स्वीकार नहीं की थी।

रिजर्व सूची का महत्व

भर्ती प्रक्रियाओं में रिजर्व या प्रतीक्षा सूची का उद्देश्य यही होता है कि चयनित उम्मीदवारों में से कोई व्यक्ति नियुक्ति स्वीकार न करे, दस्तावेजों की जांच में अयोग्य पाया जाए या किसी अन्य कारण से पद रिक्त हो जाए, तो नियमों के अनुसार अगले उम्मीदवार पर विचार किया जा सके।

हालांकि, रिजर्व सूची का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब संबंधित भर्ती नियम या प्रशासनिक नीति इसकी अनुमति देती हो।

यही कारण है कि किसी भी भर्ती विवाद में यह देखना जरूरी होता है कि उस भर्ती के विज्ञापन में रिजर्व सूची के संबंध में क्या व्यवस्था थी और चयन प्रक्रिया के समय कौन से प्रशासनिक निर्देश लागू थे।

दीप्ति साहू के मामले में हाईकोर्ट ने इन्हीं पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ईएसआईसी को उनकी उम्मीदवारी पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।

सिर्फ मेरिट में स्थान होना पर्याप्त नहीं

इस फैसले को इस अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए कि मेरिट सूची में किसी भी स्थान पर मौजूद हर उम्मीदवार को रिक्त पद पर नियुक्ति का स्वतः अधिकार मिल जाता है।

अदालत का निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों और लागू प्रशासनिक निर्देशों पर आधारित है।

यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में चयनित उम्मीदवार ज्वाइन नहीं करता है, तो अगले उम्मीदवार को मौका देने के लिए कई शर्तें पूरी होनी जरूरी हो सकती हैं। इनमें रिक्त पद की प्रकृति, आरक्षण श्रेणी, चयन सूची की वैधता, रिजर्व सूची की स्थिति और भर्ती नियम शामिल हैं।

इसलिए हर भर्ती मामले में परिस्थितियों की अलग से जांच करनी होगी।

ओबीसी पद होने से मामला और महत्वपूर्ण

इस मामले में जिस पद को लेकर विवाद हुआ, वह ओबीसी श्रेणी के लिए आरक्षित था।

ऐसे में रिक्त पद को उसी आरक्षण श्रेणी के पात्र उम्मीदवारों के बीच नियमों के अनुसार भरने का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

दीप्ति साहू ने इसी श्रेणी के तहत आवेदन किया था। उनका कहना था कि जब उनसे ऊपर चयनित उम्मीदवार ने नौकरी स्वीकार नहीं की, तो मेरिट के अनुसार अगले उम्मीदवार के रूप में उनकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाना चाहिए था।

हाईकोर्ट ने भी इसी दावे को पूरी तरह खारिज करने के बजाय ईएसआईसी को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है।

सरकारी भर्ती में उम्मीदवारों के लिए क्या संदेश?

इस फैसले से सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में चयन सूची जारी होने के बाद ऊपर का उम्मीदवार पद पर ज्वाइन नहीं करता है, तो नीचे के उम्मीदवार को संबंधित भर्ती नियमों की जांच करनी चाहिए।

उसे यह देखना चाहिए कि क्या भर्ती विज्ञापन में रिजर्व या प्रतीक्षा सूची का प्रावधान है। साथ ही, नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक आदेश और विभागीय निर्देश भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में उम्मीदवार को समय रहते विभाग के सामने अपना दावा रखना चाहिए। यदि विभाग से राहत नहीं मिलती, तो उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत संबंधित मंच पर मामला उठाया जा सकता है।

दीप्ति साहू ने भी पहले विभाग और फिर कैट के माध्यम से अपना दावा रखा और अंततः हाईकोर्ट पहुंचीं।

क्या इस फैसले से सभी भर्तियों पर असर पड़ेगा?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अब हर सरकारी भर्ती में चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन न करने पर अगले उम्मीदवार की नियुक्ति स्वतः हो जाएगी।

भर्ती प्रक्रिया की अपनी अलग शर्तें होती हैं।

कहीं रिजर्व सूची लागू होती है, कहीं प्रतीक्षा सूची की वैधता सीमित होती है और कहीं विज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा जाता है कि चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने पर पद को अगली भर्ती प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।

इसलिए किसी भी उम्मीदवार को केवल इस फैसले के आधार पर नियुक्ति का दावा करने से पहले संबंधित भर्ती के नियमों और विज्ञापन की शर्तों को देखना होगा।

फिर भी इस फैसले की अहमियत इसलिए है क्योंकि अदालत ने उस स्थिति को गंभीरता से देखा जिसमें चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने के बाद मेरिट में मौजूद अगले उम्मीदवार के दावे पर उचित विचार नहीं किया गया था।

अदालत के निर्देश का व्यावहारिक असर

अब ईएसआईसी को दो महीने के भीतर दीप्ति साहू के मामले पर नए सिरे से विचार करना होगा।

विभाग को यह देखना होगा कि संबंधित भर्ती में लागू प्रशासनिक निर्देश क्या कहते थे और चयनित उम्मीदवार के ज्वाइन नहीं करने के बाद क्या रिजर्व सूची के अगले उम्मीदवार को मौका देने का प्रावधान था।

यदि सभी आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

इस तरह हाईकोर्ट ने फिलहाल नियुक्ति का अंतिम आदेश देने के बजाय संबंधित भर्ती प्राधिकरण को नियमों के अनुसार निर्णय लेने की जिम्मेदारी दी है।

फैसले का व्यापक महत्व

सरकारी भर्ती में उम्मीदवार वर्षों तक तैयारी करते हैं और चयन प्रक्रिया के हर चरण से गुजरते हैं। ऐसे में यदि चयन सूची में ऊपर का उम्मीदवार पद स्वीकार नहीं करता, तो अगले उम्मीदवार की उम्मीद भी उसी प्रक्रिया से जुड़ी होती है।

ऐसी परिस्थितियों में पारदर्शी और नियम आधारित निर्णय जरूरी होता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले से यह संदेश निकलता है कि भर्ती प्रक्रिया में उपलब्ध प्रशासनिक निर्देशों और रिजर्व सूची से जुड़े नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि नियम अगले उम्मीदवार को अवसर देने की अनुमति देते हैं, तो उसके दावे पर उचित तरीके से विचार करना होगा।

यह दृष्टिकोण सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ईएसआईसी की 2019 की भर्ती से जुड़े मामले में मेरिट और रिजर्व सूची के उम्मीदवारों के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मामला स्टाफ नर्स और फार्मासिस्ट पदों की भर्ती से जुड़ा था, जिसमें ओबीसी वर्ग के लिए एक पद निर्धारित था।

धमतरी की दीप्ति साहू ने इस पद के लिए आवेदन किया था और मेरिट सूची में उनका स्थान 18वां था। उनसे ऊपर चयनित राखी पाल ने 24 जुलाई 2019 को ईएसआईसी को नौकरी ज्वाइन नहीं करने की सूचना दी।

इसके बाद दीप्ति साहू ने खाली हुए पद पर अपनी उम्मीदवारी पर विचार करने की मांग की। विभाग और कैट से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने मामले में लागू प्रशासनिक निर्देशों पर विचार करते हुए कहा कि यदि चयनित अभ्यर्थी नौकरी ज्वाइन नहीं करता या उसकी उम्मीदवारी समाप्त हो जाती है, तो नियमों के अनुसार चयन सूची या रिजर्व सूची में अगले उम्मीदवार को अवसर देने पर विचार किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कैट के आदेश को रद्द करते हुए ईएसआईसी को याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर दो महीने के भीतर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।

इस फैसले का सबसे अहम संदेश यह है कि किसी चयनित उम्मीदवार के पद पर ज्वाइन नहीं करने की स्थिति में, यदि संबंधित भर्ती नियम अगले योग्य उम्मीदवार को मौका देने की अनुमति देते हैं, तो उस उम्मीदवार के दावे को केवल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि नियुक्ति का अंतिम अधिकार संबंधित भर्ती नियमों और पात्रता की शर्तों पर ही निर्भर करेगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।