अब अस्पतालों की फार्मेसी में नहीं चलेगा दवाओं की कीमत का खेल! खरीद रेट से बिक्री कीमत तक बताना होगा, QR कोड से मरीज देख सकेंगे पूरा हिसाब
उत्तर प्रदेश में निजी अस्पतालों और उनकी फार्मेसियों में दवाओं की कीमत को लेकर अक्सर उठने वाली शिकायतों पर अब सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। मरीजों और उनके परिजनों को दवाओं के नाम पर होने वाले अतिरिक्त आर्थिक बोझ से बचाने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन यानी FSDA ने निजी अस्पतालों और इन-हाउस मेडिकल स्टोर्स के लिए पारदर्शिता से जुड़े महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
नई व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा यह है कि अस्पताल की फार्मेसी को अब यह स्पष्ट करना होगा कि उसने किसी दवा को कितनी कीमत पर खरीदा और मरीज से कितनी कीमत वसूल की जा रही है। यानी दवा की खरीद लागत और मरीज से ली जाने वाली बिक्री कीमत के बीच कितना अंतर है, इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध करानी होगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य दवाओं की एमआरपी के नाम पर होने वाली मनमानी और अनुचित मुनाफाखोरी पर रोक लगाना है। इसके लिए अस्पतालों की फार्मेसियों को अपनी वेबसाइट पर दवाओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ मरीजों और तीमारदारों के लिए QR कोड की सुविधा भी देनी होगी।
निजी अस्पतालों की फार्मेसी में क्या बदलेगा?
अब तक किसी मरीज को अस्पताल में इलाज के दौरान डॉक्टर की ओर से लिखी गई दवा खरीदनी पड़ती थी तो अक्सर उसके सामने केवल दवा का नाम और बिल में दर्ज कीमत होती थी। दवा अस्पताल की फार्मेसी से खरीदी गई है तो मरीज के पास सामान्य तौर पर यह जानने का आसान माध्यम नहीं होता था कि अस्पताल ने वह दवा कितनी कीमत में खरीदी थी।
नई व्यवस्था इसी जानकारी की कमी को दूर करने की कोशिश है।
दिशा-निर्देशों के तहत निजी अस्पतालों और इन-हाउस मेडिकल स्टोर्स को दवाओं की खरीद और बिक्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। इससे मरीज यह देख सकेगा कि जिस दवा के लिए उससे भुगतान लिया जा रहा है, उसकी अस्पताल द्वारा खरीद कीमत क्या थी और मरीज से कितनी राशि ली जा रही है।
यानी दवा की कीमत को लेकर व्यवस्था पहले की तुलना में ज्यादा पारदर्शी होगी।
वेबसाइट पर दिखानी होगी दवा की पूरी जानकारी
नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक संबंधित फार्मेसी को अपनी सार्वजनिक वेबसाइट या ऑनलाइन पोर्टल उपलब्ध कराना होगा। इस वेबसाइट पर दवाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज करनी होगी।
इसमें मुख्य रूप से निम्न जानकारी शामिल होगी—
- दवा बनाने वाली कंपनी का नाम
- दवा का ब्रांड नाम
- जेनेरिक साल्ट
- अस्पताल या फार्मेसी द्वारा दवा की खरीद कीमत
- PTR यानी Price to Retailer
- मरीज से ली जाने वाली अंतिम कीमत
- PTC यानी Price to Consumer
- दवा का उपलब्ध स्टॉक
इसका सीधा फायदा यह होगा कि मरीज या उसका परिवार दवा खरीदते समय सिर्फ एमआरपी देखकर भुगतान नहीं करेगा, बल्कि उसे दवा की कीमत से जुड़ी अधिक विस्तृत जानकारी उपलब्ध होगी।
QR कोड से काउंटर पर ही देख सकेंगे रेट
नई व्यवस्था को मरीजों के लिए आसान बनाने के लिए अस्पतालों को केवल वेबसाइट बनाकर छोड़ देने की अनुमति नहीं होगी। अस्पताल के बिलिंग काउंटर और दवा वितरण केंद्र पर वेबसाइट का URL और QR कोड प्रमुखता से प्रदर्शित करना होगा।
मान लीजिए किसी मरीज के पर्चे में पांच अलग-अलग दवाएं लिखी गई हैं और अस्पताल की फार्मेसी उन दवाओं का बिल बना रही है। मरीज या तीमारदार अपने मोबाइल फोन से QR कोड स्कैन कर सकता है और संबंधित ऑनलाइन पोर्टल पर दवाओं की कीमत से जुड़ी जानकारी देख सकता है।
इससे मरीज को यह समझने में आसानी होगी कि अस्पताल की फार्मेसी में उपलब्ध दवा की खरीद और बिक्री कीमत क्या है।
व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि जानकारी मरीज से छिपी न रहे।
केवल दवा की कीमत ही नहीं, फार्मेसी की पहचान भी होगी सार्वजनिक
सरकार की ओर से पारदर्शिता को केवल दवा की कीमत तक सीमित नहीं रखा गया है। संबंधित मेडिकल स्टोर की पहचान और वहां काम करने वाले अधिकृत फार्मासिस्ट से जुड़ी जानकारी भी सार्वजनिक करने की व्यवस्था की गई है।
वेबसाइट पर मेडिकल स्टोर का ड्रग लाइसेंस नंबर और संचालक से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित करनी होगी।
इसके अलावा वहां तैनात अधिकृत फार्मासिस्ट का नाम, पंजीकरण संख्या और फोटो भी उपलब्ध करानी होगी।
इस प्रावधान का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मरीजों को यह पता रहे कि जिस मेडिकल स्टोर से वह दवा खरीद रहा है, वह किस लाइसेंस के तहत संचालित हो रहा है और वहां जिम्मेदार फार्मासिस्ट कौन है।
इससे फर्जी लाइसेंस, गलत पहचान या बिना अधिकृत फार्मासिस्ट के दवा बिक्री जैसी शिकायतों पर भी निगरानी बढ़ाई जा सकती है।
लाइव स्टॉक की जानकारी भी करनी होगी अपडेट
नई व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू लाइव स्टॉक से जुड़ा है।
फार्मेसी को उपलब्ध दवाओं के स्टॉक की स्थिति नियमित रूप से अपडेट करनी होगी। इसका फायदा यह होगा कि मरीजों को यह जानकारी मिल सकेगी कि अस्पताल की फार्मेसी में कौन सी दवा उपलब्ध है।
अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह सुविधा विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। कई बार किसी दवा के लिए मरीज के परिजन अलग-अलग मेडिकल स्टोर पर जाते हैं। यदि उपलब्ध स्टॉक की ऑनलाइन जानकारी मिलती है, तो अनावश्यक भागदौड़ कम हो सकती है।
हालांकि इस व्यवस्था की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि अस्पताल और फार्मेसियां स्टॉक की जानकारी कितनी नियमित और सही तरीके से अपडेट करती हैं।
सरकार को कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी?
दवाओं की कीमत को लेकर मरीजों और उनके परिवारों की ओर से लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। खासकर बड़े निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च पहले ही काफी अधिक होता है। इसके ऊपर यदि अस्पताल की फार्मेसी से दवाएं खरीदनी पड़ें और उनकी कीमत बाजार की तुलना में अधिक हो, तो मरीज पर आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है।
विभागीय जांच और शिकायतों में भी ऐसी स्थिति सामने आने की बात कही गई है जिसमें अस्पतालों की फार्मेसियों को दवा कंपनियों से अपेक्षाकृत कम कीमत पर दवाएं मिलती हैं, जबकि मरीजों से अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP वसूल किया जाता है।
ऐसी स्थिति में मरीज के लिए यह पता लगाना आसान नहीं होता कि दवा की वास्तविक खरीद कीमत क्या थी और अस्पताल ने उस पर कितना मार्जिन रखा।
नई व्यवस्था इसी अंतर को सार्वजनिक करने पर जोर देती है।
MRP और खरीद कीमत में अंतर को समझना जरूरी
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी दवा की MRP और अस्पताल की खरीद कीमत एक जैसी होना जरूरी नहीं है।
दवा की सप्लाई चेन में निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर, रिटेलर और अन्य स्तर शामिल हो सकते हैं। इसलिए खरीद मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच अंतर होना अपने आप में अवैध नहीं माना जा सकता।
विवाद तब पैदा होता है जब मरीज को पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होती या कीमत और मार्जिन को लेकर अनुचित तरीके से वसूली किए जाने की शिकायत होती है।
नई व्यवस्था का फोकस इसी पारदर्शिता पर है।
मरीज को यह पता चल सकेगा कि अस्पताल ने दवा किस कीमत पर खरीदी और उससे कितनी कीमत ली जा रही है। इससे मरीज खुद कीमतों की तुलना कर सकेगा और जरूरत पड़ने पर सवाल भी उठा सकेगा।
PTR और PTC क्या होते हैं?
नई व्यवस्था में PTR और PTC जैसे शब्दों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है।
PTR यानी Price to Retailer वह कीमत है जिस पर दवा रिटेलर या फार्मेसी को दवा उपलब्ध कराई जाती है।
वहीं PTC यानी Price to Consumer वह कीमत है जिस पर अंतिम उपभोक्ता यानी मरीज को दवा बेची जाती है।
इन दोनों कीमतों को सार्वजनिक करने का उद्देश्य मरीज को दवा के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी देना है।
यदि मरीज को दोनों कीमतें दिखाई देती हैं, तो उसे यह समझने में आसानी होगी कि खरीद कीमत और बिक्री कीमत में कितना अंतर है।
क्या सरकार दवाओं की कीमत तय कर रही है?
इस व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण भ्रम दूर करना जरूरी है।
दिए गए दिशा-निर्देशों का उद्देश्य सीधे तौर पर सभी दवाओं के लिए कोई नया बिक्री मूल्य निर्धारित करना नहीं है। मुख्य जोर स्व-प्रकटीकरण और पारदर्शिता पर है।
यानी अस्पताल की फार्मेसी को अपने यहां उपलब्ध दवाओं की खरीद और बिक्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करनी होगी।
सरकार का उद्देश्य यह है कि मरीज को कीमत की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो और वह दवा खरीदते समय अंधेरे में न रहे।
DPCO-2013 से क्या संबंध है?
FSDA ने इस व्यवस्था को औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 यानी DPCO-2013 के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के कानूनी दिशा-निर्देशों के संदर्भ में बताया है।
DPCO का उद्देश्य दवाओं की कीमतों से संबंधित नियामकीय व्यवस्था को नियंत्रित करना है। आवश्यक दवाओं की कीमतों और उनके मूल्य निर्धारण से संबंधित नियम इसी व्यापक नियामकीय ढांचे का हिस्सा हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार की नई व्यवस्था में इस नियामकीय ढांचे के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
इसका अर्थ यह है कि मरीज को केवल दवा की एमआरपी बताना पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि खरीद और बिक्री से संबंधित जानकारी को भी अधिक सुलभ बनाने की दिशा में कदम उठाया जा रहा है।
मरीजों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?
किसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवाओं का खर्च कई बार हजारों या लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती मरीजों के मामले में यह खर्च और भी बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में हर दवा की कीमत का अंतर परिवार के कुल इलाज खर्च पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
यदि मरीज को यह जानकारी आसानी से उपलब्ध हो कि अस्पताल ने दवा किस कीमत पर खरीदी है और उससे कितनी कीमत ली जा रही है, तो वह अपने खर्च को बेहतर तरीके से समझ सकता है।
साथ ही, परिवार को यह भी पता चल सकेगा कि अस्पताल की फार्मेसी में कौन सी दवा उपलब्ध है और संबंधित स्टोर का लाइसेंस व फार्मासिस्ट कौन है।
अस्पतालों के लिए बढ़ेगी जवाबदेही
नई व्यवस्था का दूसरा बड़ा प्रभाव निजी अस्पतालों पर पड़ेगा।
अब अस्पताल की फार्मेसी को दवाओं की खरीद, बिक्री और स्टॉक से संबंधित जानकारी व्यवस्थित तरीके से रखनी होगी। वेबसाइट पर जानकारी उपलब्ध कराने के लिए डेटा को नियमित रूप से अपडेट करना पड़ेगा।
इससे फार्मेसी के संचालन में डिजिटल रिकॉर्ड और जवाबदेही बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों की नजर में किसी भी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में मरीज और अस्पताल के बीच जानकारी का संतुलन महत्वपूर्ण होता है। जब मरीज के पास पर्याप्त जानकारी नहीं होती, तो वह कीमतों और सेवाओं पर सवाल उठाने की स्थिति में नहीं रहता।
ऑनलाइन सार्वजनिक जानकारी इस असमानता को कुछ हद तक कम कर सकती है।
क्या मरीज को हर दवा सस्ती मिलेगी?
यह भी समझना जरूरी है कि नई व्यवस्था लागू होने का मतलब यह नहीं है कि अस्पताल की हर दवा बाजार से सस्ती हो जाएगी।
इस कदम का मुख्य उद्देश्य कीमतों को पारदर्शी बनाना है।
यदि अस्पताल की फार्मेसी किसी दवा को निर्धारित या अनुमत कीमत पर बेच रही है, तो मरीज को उसकी खरीद और बिक्री कीमत की जानकारी उपलब्ध होगी। वहीं यदि किसी कीमत को लेकर नियमों के उल्लंघन की शिकायत होती है, तो उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड जांच में मददगार हो सकता है।
इसलिए इसका वास्तविक लाभ केवल कम कीमत मिलने में नहीं, बल्कि मरीज के पास जानकारी और शिकायत के लिए अधिक स्पष्ट आधार होने में भी है।
तीमारदारों को भी मिलेगा सीधा फायदा
अस्पताल में भर्ती मरीज अक्सर खुद दवाओं की खरीद नहीं कर पाते। ऐसे में पूरा काम परिवार के सदस्यों या तीमारदारों को करना पड़ता है।
कई बार उन्हें दवा के नाम, ब्रांड, कीमत और उपलब्धता के बारे में सीमित जानकारी होती है। ऐसी स्थिति में फार्मेसी की ओर से बताई गई कीमत ही अंतिम मान ली जाती है।
QR कोड आधारित व्यवस्था से तीमारदार अपने मोबाइल फोन पर जानकारी देख सकेगा। इससे दवा खरीदते समय सवाल पूछने और कीमत समझने की क्षमता बढ़ सकती है।
पारदर्शिता तभी सफल होगी जब जानकारी सही हो
नई व्यवस्था की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार यह होगा कि अस्पतालों की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी वास्तविक और अद्यतन हो।
यदि PTR, PTC या स्टॉक की जानकारी पुरानी है या गलत दर्ज की गई है, तो QR कोड की सुविधा होने के बावजूद उसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
इसलिए केवल वेबसाइट बनाना पर्याप्त नहीं होगा। नियमित अपडेट, सही बिलिंग रिकॉर्ड और विभागीय निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
अस्पतालों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि ऑनलाइन प्रदर्शित जानकारी और मरीज को दिए गए वास्तविक बिल में कोई विरोधाभास न हो।
शिकायतों के निपटारे में भी मदद मिल सकती है
डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने से भविष्य में शिकायतों की जांच आसान हो सकती है।
मान लीजिए किसी मरीज को लगता है कि उससे दवा की कीमत नियमों के विपरीत ली गई है। ऐसे में वेबसाइट पर मौजूद जानकारी, बिल और अन्य रिकॉर्ड की तुलना की जा सकती है।
इससे जांच एजेंसियों को भी यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी दवा की खरीद कीमत और बिक्री कीमत क्या थी।
यानी नई व्यवस्था केवल मरीज को जानकारी देने तक सीमित नहीं है। यह नियामकीय निगरानी के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में जवाबदेही की दिशा में कदम
उत्तर प्रदेश में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। बड़े अस्पतालों के साथ-साथ छोटे निजी अस्पताल, नर्सिंग होम और मेडिकल स्टोर भी स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
ऐसे में दवाओं की कीमत और उनकी उपलब्धता से संबंधित पारदर्शिता मरीजों के हित में महत्वपूर्ण है।
FSDA की नई व्यवस्था यदि प्रभावी ढंग से लागू होती है तो अस्पताल की फार्मेसी में दवाओं की खरीद और बिक्री से जुड़ी जानकारी पहले की तुलना में कहीं अधिक आसानी से उपलब्ध हो सकती है।
यह कदम मरीज को केवल उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि जानकारी रखने वाले व्यक्ति के रूप में भी मजबूत कर सकता है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से निजी अस्पतालों और इन-हाउस मेडिकल स्टोर्स में दवाओं की खरीद और बिक्री की जानकारी सार्वजनिक करने की पहल मरीजों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम है।
नई व्यवस्था के तहत संबंधित फार्मेसी को अपनी वेबसाइट या ऑनलाइन पोर्टल पर दवा निर्माता, ब्रांड, जेनेरिक साल्ट, खरीद कीमत यानी PTR, मरीज से ली जाने वाली कीमत यानी PTC और उपलब्ध स्टॉक जैसी जानकारी प्रदर्शित करनी होगी।
इसके साथ ही अस्पताल के बिलिंग काउंटर और दवा वितरण केंद्र पर वेबसाइट का URL और QR कोड लगाया जाएगा, ताकि मरीज या तीमारदार अपने मोबाइल से दवाओं की कीमत संबंधी जानकारी देख सकें।
मेडिकल स्टोर का ड्रग लाइसेंस नंबर, संचालक की जानकारी और अधिकृत फार्मासिस्ट का नाम, पंजीकरण संख्या तथा फोटो सार्वजनिक करने का प्रावधान भी व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य दवाओं की कीमत को लेकर मरीज और अस्पताल के बीच मौजूद सूचना के अंतर को कम करना है। मरीज को यह जानने का अधिकार और सुविधा मिले कि अस्पताल की फार्मेसी ने दवा किस कीमत पर खरीदी और उससे किस कीमत पर बिक्री की जा रही है।
हालांकि इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। वेबसाइट पर जानकारी समय पर अपडेट हो, QR कोड काम करे, स्टॉक सही दिखे और बिलिंग रिकॉर्ड ऑनलाइन जानकारी से मेल खाए—इन सभी पहलुओं की निगरानी जरूरी होगी।
यदि यह व्यवस्था सही तरीके से लागू होती है, तो निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में दवाओं की कीमत को लेकर पारदर्शिता बढ़ सकती है और मरीजों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, दवा बिक्री व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियामकीय निगरानी को भी मजबूती मिलेगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।