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बिहार में सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदे गए डस्टबीन की कीमतों पर सवाल, पटना हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

बिहार में सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदे गए डस्टबीन की कीमतों पर सवाल, पटना हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

     Patna High Court : बिहार के सरकारी अस्पतालों में जैव-चिकित्सीय कचरे के निस्तारण के लिए खरीदे गए माइक्रोवेव डस्टबीन और जैव-विघटनीय बैग की कीमतों को लेकर पटना हाईकोर्ट में दायर लोकहित याचिका पर सुनवाई हुई। मामले में खरीद की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदे गए कुछ सामान की कीमत बाजार में उपलब्ध समान वस्तुओं की कथित कीमत से कई गुना अधिक है।

मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कौशलेश कुमार की ओर से दायर लोकहित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने मामले को आगे सुनने के लिए 19 नवंबर की तारीख तय की है।

हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों पर अभी कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। खरीद की वास्तविक कीमत, निविदा प्रक्रिया, तकनीकी specifications, आपूर्ति की शर्तें और बाजार में उपलब्ध उत्पादों से तुलना जैसे तमाम पहलुओं पर स्थिति राज्य सरकार के जवाब और आगे की न्यायिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला बिहार के सरकारी अस्पतालों में जैव-चिकित्सीय कचरे के प्रबंधन के लिए आवश्यक उपकरणों और सामग्री की खरीद से जुड़ा है।

सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान कई तरह का जैव-चिकित्सीय कचरा निकलता है। इसमें इस्तेमाल किए गए मेडिकल उपकरण, संक्रमित सामग्री, ड्रेसिंग से जुड़ा कचरा और अन्य स्वास्थ्य संबंधी अपशिष्ट शामिल हो सकते हैं। इस तरह के कचरे का सामान्य घरेलू कचरे की तरह निस्तारण नहीं किया जा सकता।

इसके लिए अस्पतालों में अलग व्यवस्था की जरूरत होती है, ताकि संक्रमण और पर्यावरण से जुड़े जोखिम को कम किया जा सके।

इसी उद्देश्य से बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी BMSICL ने सरकारी अस्पतालों के लिए माइक्रोवेव डस्टबीन और जैव-विघटनीय बैग की खरीद की प्रक्रिया शुरू की थी।

लेकिन बाद में इन सामानों की खरीद कीमत को लेकर सवाल उठे और मामला पटना हाईकोर्ट पहुंच गया।

BMSICL ने जारी की थी निविदा

याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने अदालत को खरीद प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि BMSICL ने सरकारी अस्पतालों के लिए 75 लीटर और 45 लीटर क्षमता वाले माइक्रोवेव डस्टबीन खरीदने के लिए निविदा जारी की थी।

इन डस्टबीन के साथ इस्तेमाल किए जाने वाले जैव-विघटनीय बैग की खरीद भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थी।

याचिका के अनुसार निविदा प्रक्रिया के बाद लखनऊ की एसएस मेडिकल सिस्टम को यह काम दिया गया।

याचिकाकर्ता ने खरीद प्रक्रिया में इस्तेमाल किए गए सामान की कीमतों को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि सरकारी खरीद में जिस कीमत पर सामान खरीदा गया, वह बाजार में बताई गई कीमत से काफी अधिक है।

75 लीटर के डस्टबीन की कीमत पर सवाल

याचिका में सबसे प्रमुख सवाल माइक्रोवेव डस्टबीन की कीमतों को लेकर उठाया गया है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, सरकारी अस्पतालों के लिए 75 लीटर क्षमता वाला डस्टबीन 15,490 रुपये की कीमत पर खरीदा गया।

वहीं याचिका में दावा किया गया है कि बाजार में इसी क्षमता के डस्टबीन की कीमत लगभग 1,550 रुपये बताई गई है।

यदि याचिका में बताए गए आंकड़ों की तुलना की जाए तो दोनों कीमतों के बीच काफी बड़ा अंतर दिखाई देता है।

याचिकाकर्ता ने इसी अंतर को आधार बनाकर सरकारी खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि किसी सरकारी निविदा में खरीदे गए उत्पाद की कीमत और बाजार में उपलब्ध किसी अन्य उत्पाद की कीमत की सीधी तुलना हमेशा पर्याप्त नहीं होती। उत्पाद की गुणवत्ता, तकनीकी specifications, certification, warranty, installation, supply conditions और अन्य अनुबंध संबंधी शर्तों का भी प्रभाव हो सकता है।

इसीलिए अंतिम स्थिति सरकार के जवाब और रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

45 लीटर वाले डस्टबीन को लेकर भी दावा

याचिका में 45 लीटर क्षमता वाले माइक्रोवेव डस्टबीन की खरीद कीमत पर भी सवाल उठाया गया है।

याचिकाकर्ता का दावा है कि 45 लीटर क्षमता वाला डस्टबीन सरकारी खरीद में 11,474 रुपये की कीमत पर खरीदा गया।

इसके विपरीत, याचिका में इसकी बाजार कीमत लगभग 1,162 रुपये बताई गई है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि सरकारी खरीद और कथित बाजार मूल्य के बीच यह अंतर जांच का विषय होना चाहिए।

अदालत ने फिलहाल इन आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। मामले में राज्य सरकार को जवाब देने का अवसर दिया गया है।

जैव-विघटनीय बैग की कीमत भी विवाद में

डस्टबीन के अलावा उनके उपयोग के लिए खरीदे गए जैव-विघटनीय बैग की कीमतों को लेकर भी याचिका में सवाल उठाए गए हैं।

याचिका के अनुसार 75 लीटर क्षमता वाले बैग की कीमत 98 रुपये निर्धारित की गई थी, जबकि याचिकाकर्ता ने इसकी बाजार कीमत काफी कम होने का दावा किया है।

इसी तरह 45 लीटर क्षमता वाले बैग की कीमत 69 रुपये बताई गई है।

याचिका में कहा गया है कि इन उत्पादों की कथित बाजार कीमत और सरकारी खरीद कीमत में अंतर की जांच की जानी चाहिए।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद किसी एक-दो सामान की खरीद तक सीमित नहीं बताया गया है। याचिका में बड़ी संख्या में खरीद आदेशों का उल्लेख किया गया है।

57 आदेशों के जरिए हुई खरीद का दावा

याचिका के अनुसार जून 2024 से 18 अप्रैल 2026 के बीच कुल 57 आदेशों के माध्यम से इन वस्तुओं की खरीद की गई।

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि इन खरीद आदेशों के तहत चारों वस्तुओं की कुल खरीद का मूल्य लगभग 307 करोड़ रुपये है।

इतनी बड़ी राशि की खरीद होने के कारण याचिकाकर्ता ने कीमतों और पूरी निविदा प्रक्रिया की जांच की मांग की है।

हालांकि, इस रकम और खरीद प्रक्रिया से संबंधित सभी दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से जो तथ्य रखे गए हैं, वे फिलहाल आरोप और दावे के रूप में हैं।

राज्य सरकार का जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि उसी के माध्यम से खरीद प्रक्रिया, निविदा, चयन, दर निर्धारण और भुगतान से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आ सकते हैं।

सरकारी खरीद में बाजार कीमत से तुलना क्यों महत्वपूर्ण?

सरकारी संस्थाओं द्वारा किसी भी सामान की खरीद में कीमत एक महत्वपूर्ण पहलू होती है। सरकारी धन का इस्तेमाल होने के कारण यह अपेक्षा रहती है कि खरीद प्रक्रिया पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी हो।

यदि किसी उत्पाद की खरीद कीमत सामान्य बाजार कीमत से काफी अधिक है, तो यह सवाल उठ सकता है कि उस अंतर का कारण क्या है।

क्या उत्पाद सामान्य बाजार में उपलब्ध वस्तु से अलग specifications वाला था?

क्या उसमें कोई विशेष तकनीकी सुविधा शामिल थी?

क्या कीमत में परिवहन, installation, warranty या अन्य सेवाओं का खर्च शामिल था?

क्या निविदा में किसी विशेष गुणवत्ता या certification की शर्त रखी गई थी?

ऐसे सवालों का जवाब खरीद रिकॉर्ड और निविदा दस्तावेजों से ही मिल सकता है।

इसलिए केवल दो कीमतों की तुलना के आधार पर किसी खरीद को गलत या अनियमित घोषित करना अंतिम निष्कर्ष नहीं हो सकता।

कोर्ट के सामने अभी क्या सवाल हैं?

पटना हाईकोर्ट में इस समय मुख्य मुद्दा यह है कि याचिका में लगाए गए आरोपों पर राज्य सरकार का क्या पक्ष है और खरीद प्रक्रिया वास्तव में किस प्रकार हुई।

अदालत यह देख सकती है कि—

  • निविदा किस प्रक्रिया के तहत जारी की गई थी।
  • कितने विक्रेताओं या कंपनियों ने इसमें हिस्सा लिया।
  • तकनीकी पात्रता की क्या शर्तें थीं।
  • चयनित कंपनी का चयन किस आधार पर हुआ।
  • उत्पाद की specifications क्या थीं।
  • निर्धारित दर किस आधार पर तय की गई।
  • खरीद के लिए कितने आदेश जारी हुए।
  • भुगतान किस आधार पर किया गया।
  • बाजार कीमत से कथित अंतर का कारण क्या है।

इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही विवाद की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।

जैव-चिकित्सीय कचरे का सही प्रबंधन क्यों जरूरी?

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिन सामानों की खरीद पर सवाल उठाया गया है, उनका संबंध अस्पतालों में जैव-चिकित्सीय कचरे के प्रबंधन से है।

अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल कचरे का गलत तरीके से निस्तारण स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। संक्रमित कचरे के संपर्क में आने से अस्पताल के कर्मचारियों, मरीजों, सफाईकर्मियों और आसपास के लोगों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।

इसी कारण अस्पतालों में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में रखने, सुरक्षित तरीके से एकत्र करने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निस्तारित करने की व्यवस्था की जाती है।

इस तरह के काम के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरण और सामग्री की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है।

कीमत के साथ गुणवत्ता भी जांच का विषय

याचिका में कीमतों को लेकर मुख्य सवाल उठाए गए हैं, लेकिन किसी भी न्यायिक जांच में केवल कीमत ही नहीं बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यदि सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदा गया डस्टबीन सामान्य बाजार में मिलने वाले डस्टबीन से अलग है और उसमें विशेष तकनीकी सुविधाएं हैं, तो दोनों की कीमतों में अंतर स्वाभाविक रूप से हो सकता है।

इसके विपरीत, यदि दोनों उत्पादों की specifications और गुणवत्ता समान हैं और फिर भी कीमत में बहुत बड़ा अंतर है, तो खरीद प्रक्रिया की जांच का सवाल ज्यादा गंभीर हो सकता है।

इसीलिए राज्य सरकार के जवाब में इन सभी पहलुओं का स्पष्ट होना जरूरी होगा।

लोकहित याचिका क्यों महत्वपूर्ण है?

लोकहित याचिका यानी PIL का उद्देश्य ऐसे मामलों को अदालत के सामने लाना है जिनका प्रभाव व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़ा हो।

सरकारी अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों और सामग्रियों की खरीद सीधे तौर पर सरकारी धन से जुड़ी होती है। यदि खरीद में बड़ी राशि खर्च की गई है और उसकी कीमतों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो मामला सार्वजनिक महत्व का बन सकता है।

याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

हालांकि, PIL में आरोप लगाए जाने मात्र से यह साबित नहीं होता कि सरकारी खरीद में अनियमितता हुई है। आरोपों की पुष्टि दस्तावेजों और संबंधित विभाग के जवाब से ही होगी।

सरकार के जवाब का इंतजार

पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। अब सरकार को खरीद प्रक्रिया से संबंधित अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा।

सरकार यह बता सकती है कि निविदा कैसे जारी हुई, चयनित कंपनी का चयन किस आधार पर किया गया और निर्धारित कीमतों के पीछे क्या आधार था।

यदि सरकार के पास उत्पाद की विशेष specifications, तकनीकी आवश्यकताओं या अन्य खर्चों के आधार पर कीमत का औचित्य साबित करने वाले दस्तावेज हैं, तो वे भी अदालत के सामने रखे जा सकते हैं।

दूसरी ओर, यदि अदालत को रिकॉर्ड की जांच के बाद किसी तरह की अनियमितता का प्रथमदृष्टया आधार मिलता है, तो आगे की जांच या अन्य निर्देशों पर भी विचार हो सकता है।

फिलहाल इस स्तर पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

अगली सुनवाई कब होगी?

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव की खंडपीठ ने की। याचिका कौशलेश कुमार की ओर से दायर की गई है।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 नवंबर की तारीख निर्धारित की है।

उस समय सरकार का जवाब और मामले से संबंधित अन्य रिकॉर्ड अदालत के सामने आ सकते हैं। इसके बाद यह स्पष्ट होगा कि अदालत इस मामले में आगे क्या दिशा तय करती है।

सरकारी खरीद में पारदर्शिता का सवाल

यह पूरा मामला केवल चार वस्तुओं की कीमत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सरकारी खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का बड़ा सवाल भी जुड़ा हुआ है।

जब सरकारी संस्थाएं बड़ी मात्रा में सामान खरीदती हैं तो प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा, उचित मूल्य, गुणवत्ता और सार्वजनिक धन के बेहतर इस्तेमाल का ध्यान रखना जरूरी होता है।

खासकर स्वास्थ्य विभाग में होने वाली खरीद का सीधा संबंध आम लोगों से होता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया सार्वजनिक संसाधन से जुड़ा होता है।

इसलिए यदि किसी खरीद को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं, तो उनका तथ्यात्मक जवाब सामने आना जरूरी है।

क्या अभी अनियमितता साबित हो गई है?

नहीं।

यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। पटना हाईकोर्ट के समक्ष इस मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

याचिका में डस्टबीन और जैव-विघटनीय बैग की खरीद कीमतों को लेकर जो आंकड़े दिए गए हैं, वे याचिकाकर्ता के दावे हैं। अदालत ने अभी यह घोषित नहीं किया है कि खरीद में अनियमितता हुई है या सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है।

राज्य सरकार का पक्ष सामने आने के बाद मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।

इसलिए फिलहाल इस मामले को सरकारी खरीद में कथित कीमतों के अंतर और उस पर उठे सवाल के रूप में देखना उचित होगा।

निष्कर्ष

बिहार के सरकारी अस्पतालों के लिए माइक्रोवेव डस्टबीन और जैव-विघटनीय बैग की खरीद को लेकर पटना हाईकोर्ट में दायर लोकहित याचिका ने सरकारी खरीद प्रक्रिया और कीमत निर्धारण पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि 75 लीटर का माइक्रोवेव डस्टबीन 15,490 रुपये और 45 लीटर का डस्टबीन 11,474 रुपये में खरीदा गया, जबकि बाजार में इनकी कथित कीमत क्रमशः 1,550 रुपये और 1,162 रुपये बताई गई है। इसी तरह जैव-विघटनीय बैग की कीमतों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि जून 2024 से 18 अप्रैल 2026 के बीच 57 आदेशों के जरिए इन चार वस्तुओं की खरीद की गई और कुल खरीद करीब 307 करोड़ रुपये की रही।

इन दावों की वास्तविकता और खरीद प्रक्रिया की वैधता अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन है। केवल याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सरकारी धन की हेराफेरी या खरीद में अनियमितता साबित हो गई है।

पटना हाईकोर्ट ने फिलहाल राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है और मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।

अब सबकी नजर सरकार के जवाब पर रहेगी। यदि सरकार खरीद कीमतों और निविदा प्रक्रिया का संतोषजनक आधार अदालत के सामने रखती है तो विवाद की दिशा अलग हो सकती है। वहीं यदि खरीद प्रक्रिया में नियमों या कीमत निर्धारण को लेकर कोई गंभीर विसंगति सामने आती है, तो अदालत आगे उचित निर्देश जारी कर सकती है।

फिलहाल इस मामले का सबसे अहम पहलू यही है कि सरकारी अस्पतालों के लिए खर्च की गई बड़ी सार्वजनिक राशि से जुड़ी खरीद प्रक्रिया अब न्यायिक जांच के दायरे में है और अगली सुनवाई में तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट होने की उम्मीद है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।