POCSO मामलों पर हाई कोर्ट की चिंता: 16 से 18 साल की किशोरियों और 19 से 22 साल के युवाओं के लिए कैसी है जागरूकता व्यवस्था?
प्रदेश में पॉक्सो यानी Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के बढ़ते मामलों और बड़ी संख्या में लंबित अपीलों को लेकर हाई कोर्ट की चिंता के बाद अब चर्चा केवल मुकदमों के निपटारे तक सीमित नहीं रह गई है। बड़ा सवाल यह सामने आया है कि जिन आयु वर्गों में ऐसे मामलों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है, उन्हें कानून के प्रावधानों और उसके गंभीर परिणामों के बारे में कितनी जानकारी है।
हाई कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि पॉक्सो से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में पीड़िताएं 16 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की हैं, जबकि कई मामलों में आरोपितों की उम्र 19 से 22 वर्ष के बीच है। यह स्थिति सरकारी जागरूकता अभियानों की दिशा और प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सवाल यह नहीं है कि सरकार जागरूकता अभियान चला रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या ये अभियान उन किशोर-किशोरियों और युवाओं तक पहुंच रहे हैं, जहां जोखिम सबसे अधिक दिखाई दे रहा है? यदि किसी खास आयु वर्ग के लोग लगातार मामलों में सामने आ रहे हैं, तो उस आयु वर्ग के लिए अलग रणनीति और अलग तरह की कानूनी जागरूकता की जरूरत हो सकती है।
हाई कोर्ट ने जागरूकता को माना महत्वपूर्ण पहलू
पॉक्सो मामलों की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने जागरूकता की कमी को भी एक महत्वपूर्ण पहलू माना है। न्यायालय की चिंता का आधार यह है कि केवल अपराध होने के बाद कानूनी कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। अपराध की रोकथाम के लिए बच्चों, किशोरों, अभिभावकों और युवाओं को कानून की जानकारी देना भी जरूरी है।
केंद्र और राज्य सरकार को युवाओं के बीच पॉक्सो कानून के प्रावधानों तथा इसके संभावित कानूनी परिणामों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।
इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि किशोरावस्था में रिश्तों, दोस्ती और व्यक्तिगत निर्णयों को लेकर बच्चों और युवाओं के सामने कई तरह की परिस्थितियां आती हैं। कई बार उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि कानून में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को लेकर अलग कानूनी व्यवस्था है और उसकी कथित सहमति को वयस्कों की सहमति के समान नहीं माना जाता।
यही कानूनी जानकारी का अभाव आगे चलकर गंभीर आपराधिक मुकदमे का कारण बन सकता है।
सरकार ने प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों का दिया ब्योरा
हाई कोर्ट के समक्ष राज्य सरकार की ओर से प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों की जानकारी भी रखी गई। सरकार के अनुसार राज्य स्तर पर लगभग 52 हजार लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है, जबकि जिला स्तर पर 2.73 लाख से अधिक प्रतिभागियों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा गया।
इसके अलावा ‘आवाज’ संस्था के माध्यम से लगभग 4.50 लाख लोगों तक जागरूकता पहुंचने की जानकारी भी सामने आई है।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि सरकार की ओर से जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। लेकिन न्यायालय के समक्ष मामलों की स्थिति को देखते हुए अब असली प्रश्न कार्यक्रमों की संख्या से आगे बढ़कर उनकी प्रभावशीलता और लक्षित पहुंच का हो गया है।
किसी अभियान में लाखों लोगों की भागीदारी अपने आप में उसकी सफलता का प्रमाण नहीं हो सकती। यह देखना भी जरूरी है कि अभियान से लोगों के व्यवहार और कानूनी समझ में कितना बदलाव आया। विशेष रूप से उन आयु वर्गों में इसका असर कितना हुआ, जिनके मामले अदालतों में बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं।
क्या एक ही जागरूकता अभियान पर्याप्त है?
POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन बच्चों की उम्र और उनकी परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। 10-12 वर्ष के बच्चे और 16-17 वर्ष के किशोरों की सामाजिक स्थिति, समझ, इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल तथा रिश्तों को लेकर उनकी परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या सभी आयु वर्गों के लिए एक जैसा जागरूकता अभियान प्रभावी हो सकता है।
विशेषज्ञों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के सामने अब यह मुद्दा रखा जा रहा है कि 16 से 18 वर्ष के किशोर-किशोरियों के लिए अलग कानूनी जागरूकता कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए।
इसी तरह 18 से 25 वर्ष के युवाओं को भी यह समझाने की जरूरत है कि 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति से जुड़े यौन संबंधों के मामले में कानून किस प्रकार लागू हो सकता है।
युवाओं को डराने के बजाय उन्हें कानून की स्पष्ट और तथ्यात्मक जानकारी देना अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में विशेषज्ञों की मदद से नियमित कानूनी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
18 वर्ष की उम्र क्यों है महत्वपूर्ण?
POCSO कानून में बच्चे की कानूनी परिभाषा बेहद महत्वपूर्ण है। सामान्य तौर पर 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति इस कानून के तहत बच्चा माना जाता है। इसलिए किसी नाबालिग से जुड़े यौन अपराध के मामले में कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
यही वजह है कि किशोर-किशोरियों को यह जानकारी देना जरूरी है कि व्यक्तिगत संबंधों को लेकर उनकी सामाजिक या व्यक्तिगत समझ कुछ भी हो, लेकिन कानून में उम्र की सीमा का अपना महत्व है।
विशेष रूप से 16 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में यह जागरूकता और महत्वपूर्ण हो जाती है। इस उम्र में कई किशोर-किशोरियां स्वयं को वयस्क समझने लगते हैं, लेकिन कानून की नजर में 18 वर्ष से कम उम्र होने पर उन्हें बच्चा माना जाता है।
यदि इस अंतर को स्कूल और परिवार के स्तर पर सही तरीके से समझाया जाए तो कई परिस्थितियों में कानूनी जोखिम को कम किया जा सकता है।
स्कूल-कॉलेजों में नियमित कार्यक्रम की जरूरत
अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या स्कूल और कॉलेजों में पॉक्सो कानून को लेकर नियमित और व्यावहारिक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
कानून की जानकारी केवल किताबों या पोस्टरों तक सीमित रहने से उसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। किशोरों को यह बताया जाना चाहिए कि अनुचित स्पर्श क्या है, यौन शोषण की स्थिति में मदद किससे मांगी जा सकती है, शिकायत कैसे की जाती है और किसी घटना को छिपाने के क्या परिणाम हो सकते हैं।
साथ ही उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर निजी तस्वीरें, वीडियो या संदेश साझा करने से जुड़े जोखिम क्या हैं।
ऐसे कार्यक्रमों में केवल बच्चों को ही शामिल करना पर्याप्त नहीं होगा। अभिभावक, शिक्षक, स्कूल प्रबंधन और पुलिस अधिकारी भी इसका हिस्सा हों, तो जागरूकता का असर अधिक व्यापक हो सकता है।
16 से 18 और 18 से 25 वर्ष के लिए अलग रणनीति
वर्तमान स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यही है कि अलग-अलग आयु वर्गों के लिए अलग जागरूकता सामग्री तैयार की जाए।
16 से 18 वर्ष के किशोरों के लिए सामग्री सरल भाषा में होनी चाहिए। इसमें उनके कानूनी अधिकार, सुरक्षित और असुरक्षित व्यवहार, शिकायत की प्रक्रिया तथा भरोसेमंद व्यक्ति से सहायता लेने की जानकारी शामिल की जा सकती है।
वहीं 18 से 25 वर्ष के युवाओं के लिए कार्यक्रम का स्वरूप थोड़ा अलग हो सकता है। उन्हें POCSO की कानूनी सीमाओं, नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों के संभावित परिणाम और आपराधिक कानून की गंभीरता के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जा सकती है।
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नए छात्रों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम के दौरान भी इस विषय को शामिल किया जा सकता है।
पुलिस के पांच साल के आंकड़े बताएंगे वास्तविक तस्वीर
इस पूरे मामले में पुलिस मुख्यालय के पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि इन आंकड़ों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाए तो यह समझने में मदद मिल सकती है कि पॉक्सो के मामले किन आयु वर्गों में अधिक सामने आ रहे हैं और किन जिलों में इनकी संख्या अधिक है।
इसके लिए केवल कुल मामलों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं होगा। आंकड़ों में यह भी देखा जाना चाहिए कि पीड़ितों की उम्र क्या थी, आरोपितों की उम्र क्या थी, मामले किस जिले से संबंधित थे, कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई, कितने मामलों में दोषसिद्धि हुई और कितने मामले अभी लंबित हैं।
ऐसा तुलनात्मक अध्ययन नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद कर सकता है कि समस्या का वास्तविक स्वरूप क्या है।
यदि किसी विशेष आयु वर्ग या क्षेत्र में मामलों की संख्या लगातार अधिक है तो उसी क्षेत्र और आयु वर्ग को ध्यान में रखकर विशेष जागरूकता अभियान तैयार किया जा सकता है।
14,531 आपराधिक अपीलें लंबित होने का मुद्दा
हाई कोर्ट के समक्ष प्रदेश की तीनों खंडपीठों में पॉक्सो से संबंधित 14,531 आपराधिक अपीलें लंबित होने का आंकड़ा भी सामने आया है।
यह संख्या बताती है कि चुनौती केवल नए मामलों की रोकथाम तक सीमित नहीं है। पुराने मामलों के निपटारे और अपीलों के शीघ्र निस्तारण का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
किसी पीड़ित बच्चे और उसके परिवार के लिए लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया अपने आप में कठिन अनुभव हो सकती है। दूसरी ओर, यदि किसी आरोपी के मामले में अपील लंबे समय तक लंबित रहती है तो उसके अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया की गति को लेकर भी सवाल उठते हैं।
इसलिए एक ओर अपराध की रोकथाम के लिए जागरूकता जरूरी है, तो दूसरी ओर अदालतों में लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा भी आवश्यक है।
योजनाओं का फोकस छोटे बच्चों तक सीमित न रहे
जनहित याचिकाकर्ता अमिताभ गुप्ता ने इस मुद्दे पर कहा कि सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर केंद्रित दिखाई देता है। उनका कहना है कि 16 से 18 वर्ष की किशोरियों और 18 से 25 वर्ष के युवाओं के लिए समग्र योजना की जरूरत है।
उनके अनुसार इस आयु वर्ग से जुड़े आंकड़े उपलब्ध होने के बावजूद उनका पर्याप्त विश्लेषण नहीं हुआ है। केवल आंकड़े जुटाना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि इस उम्र के युवाओं के सामने सामाजिक, शैक्षणिक, मानसिक और रोजगार से जुड़ी कौन-कौन सी चुनौतियां हैं।
यह बात नीति निर्माण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। किसी भी कानून की प्रभावशीलता का मूल्यांकन केवल दर्ज मामलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि कानून के बारे में समाज के उस वर्ग को कितनी जानकारी है, जिसके लिए कानून बनाया गया है।
कानून की जानकारी रोकथाम का महत्वपूर्ण माध्यम
विधिवेत्ता असीम त्रिवेदी के अनुसार POCSO कानून का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है। लेकिन इसका प्रभावी क्रियान्वयन केवल मुकदमे दर्ज करने तक सीमित नहीं रह सकता।
उनका मानना है कि किशोरों, अभिभावकों और स्कूलों के स्तर पर कानून की स्पष्ट जानकारी पहुंचाना और अपराध की रोकथाम पर जोर देना आवश्यक है।
यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी अपराध के बाद कार्रवाई करना न्याय व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन अपराध होने से पहले संभावित जोखिमों को कम करना भी सरकार और समाज की जिम्मेदारी है।
जागरूकता अभियान को कैसे बनाया जा सकता है प्रभावी?
सरकार के सामने अब एक ऐसी रणनीति तैयार करने की चुनौती है जो केवल संख्या आधारित न होकर परिणाम आधारित हो।
स्कूलों और कॉलेजों में नियमित कानूनी जागरूकता सत्र आयोजित किए जा सकते हैं। शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले गंभीर बदलावों को पहचान सकें। अभिभावकों को यह जानकारी दी जा सकती है कि बच्चों से संवेदनशील विषयों पर संवाद कैसे किया जाए।
इसके अलावा जिला स्तर पर बाल संरक्षण से जुड़े अधिकारियों, पुलिस, विधिक सेवा प्राधिकरण, स्कूल प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के बीच बेहतर समन्वय बनाया जा सकता है।
जागरूकता सामग्री भी स्थानीय भाषा और आयु वर्ग के अनुरूप तैयार होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों की चुनौतियां अलग हो सकती हैं, इसलिए दोनों के लिए एक जैसी रणनीति हमेशा प्रभावी नहीं होगी।
अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती
हाई कोर्ट की चिंता ने पॉक्सो मामलों को केवल न्यायिक प्रक्रिया का विषय न रखकर इसे सार्वजनिक नीति और सरकारी जवाबदेही से जोड़ दिया है।
एक तरफ हजारों अपीलें लंबित हैं, दूसरी तरफ नए मामले लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—पहली, लंबित मामलों के निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था को प्रभावी सहयोग देना और दूसरी, भविष्य में अपराधों को रोकने के लिए लक्षित जागरूकता अभियान चलाना।
खासकर 16 से 18 वर्ष के किशोर-किशोरियों और 18 से 25 वर्ष के युवाओं के बीच कानूनी जागरूकता बढ़ाने पर अब विशेष ध्यान देने की जरूरत दिखाई देती है।
आखिरकार POCSO कानून का उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद दोषी को सजा दिलाना नहीं है। कानून की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब बच्चे और युवा अपने अधिकारों तथा कानूनी सीमाओं से परिचित हों, अभिभावक और शिक्षक संवेदनशील परिस्थितियों को समय रहते समझ सकें और समाज में ऐसे वातावरण का निर्माण हो जिसमें बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता मिले।
हाई कोर्ट के सामने आए आंकड़ों ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि अब जागरूकता अभियान की संख्या नहीं, उसकी पहुंच और प्रभाव पर ध्यान देने का समय है। आने वाले समय में सरकार की नीति किस तरह इन सवालों का जवाब देती है, यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होगा।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।