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मणिपुर यौन हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, दो प्रमुख पीड़ित-गवाहों की गवाही 7, 9 और 28 अक्टूबर को कराने का निर्देश

मणिपुर यौन हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, दो प्रमुख पीड़ित-गवाहों की गवाही 7, 9 और 28 अक्टूबर को कराने का निर्देश

          मणिपुर में 2023 के दौरान हुई जातीय हिंसा से जुड़े यौन हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI और ट्रायल कोर्ट से कहा है कि मामले की दो प्रमुख पीड़ित-गवाहों की अदालत में पेशी सुनिश्चित की जाए और उनकी गवाही दर्ज कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की कार्यवाही में तेजी लाने पर भी जोर दिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई अनावश्यक रूप से लंबी नहीं खिंचनी चाहिए। अदालत ने CBI को निर्देश दिया कि दोनों पीड़ित-गवाह 7, 9 और 28 अक्टूबर को निर्धारित तारीखों पर ट्रायल कोर्ट के सामने उपस्थित हों और उनके बयान दर्ज किए जाएं।

सुनवाई के दौरान गवाहों की सुरक्षा और आरोपियों की जमानत का मुद्दा भी सामने आया। CBI की ओर से अदालत को बताया गया कि आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं और उनकी मौजूदगी या संभावित प्रभाव के कारण पीड़ित-गवाहों की अदालत में बयान देने की इच्छा प्रभावित हो सकती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि जमानत पर बाहर रहने वाले आरोपी अपनी जमानत की शर्तों का दुरुपयोग करते हैं तो अदालत इस मुद्दे पर उचित कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने गवाही को लेकर क्यों दिया निर्देश?

मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि दो महत्वपूर्ण पीड़ित-गवाहों के बयान अभी दर्ज किए जाने हैं। इन गवाहों की गवाही मुकदमे की आगे की कार्यवाही के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए CBI और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि गवाहों की पेशी और उनके बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया निर्धारित तारीखों पर सुनिश्चित की जाए।

अदालत ने 7, 9 और 28 अक्टूबर की तारीखों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन अवसरों पर दोनों पीड़ित-गवाहों को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किया जाए।

यह निर्देश केवल गवाहों की उपस्थिति तक सीमित नहीं है। अदालत का जोर इस बात पर है कि उनकी गवाही वास्तव में दर्ज हो और मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़े।

किसी भी आपराधिक मुकदमे में प्रत्यक्षदर्शी या पीड़ित-गवाह का बयान अभियोजन के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विशेष रूप से यौन हिंसा जैसे गंभीर अपराधों में पीड़ित का बयान मामले के तथ्यों और घटनाक्रम को समझने में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है।

सीबीआई ने गवाहों की चिंता का मुद्दा उठाया

सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से यह चिंता जताई गई कि आरोपी जमानत पर बाहर हैं। जांच एजेंसी ने संकेत दिया कि आरोपियों के बाहर रहने की स्थिति पीड़ित-गवाहों के अदालत में बयान देने की इच्छा को प्रभावित कर सकती है।

ऐसी स्थिति में गवाहों की सुरक्षा और उनका मनोवैज्ञानिक भरोसा दोनों महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि किसी गवाह को यह आशंका हो कि बयान देने के बाद उसे या उसके परिवार को किसी तरह का खतरा हो सकता है, तो वह अदालत में बयान देने से हिचक सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस चिंता को गंभीरता से लिया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

अदालत का संदेश साफ था कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण मुकदमे की प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक नहीं रुक सकती। यदि गवाहों को सुरक्षा की आवश्यकता है तो प्रशासन को आवश्यक कदम उठाने होंगे।

गवाहों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान विशेष रूप से कहा कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

यह टिप्पणी इस मामले में महत्वपूर्ण है क्योंकि पीड़ित-गवाहों के बयान मुकदमे की आगे की दिशा पर असर डाल सकते हैं।

अदालत ने यह संकेत दिया कि यदि आरोपियों की ओर से जमानत की सुविधा का किसी प्रकार दुरुपयोग किया जाता है तो उस पर अदालत विचार कर सकती है।

इसका मतलब यह है कि जमानत मिलने के बाद आरोपी को अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा। यदि कोई आरोपी गवाह को प्रभावित करने, डराने, धमकाने या न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का प्रयास करता है तो अदालत उस आचरण को गंभीरता से ले सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल जमानत रद्द करने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। अदालत ने संकेत दिया है कि दोनों पीड़ित-गवाहों की गवाही दर्ज होने के बाद इस पहलू पर विचार करना अधिक उचित होगा।

जमानत रद्द करने पर बाद में विचार

सुनवाई के दौरान आरोपियों की जमानत का मुद्दा भी उठा। पीठ ने संकेत दिया कि अभी मुख्य प्राथमिकता दोनों पीड़ित-गवाहों के बयान दर्ज कराना है।

अदालत ने संकेत दिया कि गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद यह देखा जा सकता है कि जमानत पर बाहर आरोपियों के संबंध में आगे कोई कदम उठाने की आवश्यकता है या नहीं।

इस दृष्टिकोण से अदालत ने एक संतुलित रास्ता अपनाने की कोशिश की है। एक तरफ आरोपियों को मिली जमानत को तत्काल रद्द नहीं किया गया, वहीं दूसरी तरफ गवाहों की सुरक्षा और स्वतंत्र गवाही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी अधिकारियों पर डाल दी गई है।

यदि भविष्य में यह सामने आता है कि किसी आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की है, तो अदालत उस आधार पर कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

पिछली तारीख पर क्यों नहीं हो सकी गवाही?

पीड़ित पक्ष की ओर से सुनवाई के दौरान पिछली तारीख को लेकर भी जानकारी दी गई।

पीड़ित पक्ष ने बताया कि पिछली निर्धारित तारीख सार्वजनिक अवकाश होने के कारण संबंधित केंद्र बंद थे। इसके अलावा एक पीड़िता डेंगू से पीड़ित थी।

इन परिस्थितियों के कारण गवाहों की पेशी और बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

पीड़ित पक्ष की ओर से रखी गई इन परिस्थितियों को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने आगे की तारीखों पर गवाही सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित तारीखों पर सभी संबंधित पक्षों को पूरा सहयोग करना होगा ताकि मामले की सुनवाई आगे बढ़ सके।

ट्रायल कोर्ट को भी सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केवल CBI को ही निर्देश नहीं दिया है। ट्रायल कोर्ट को भी आदेश के अनुसार कार्यवाही करने को कहा गया है।

ट्रायल कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि दोनों पीड़ित-गवाहों की पेशी हो और उनके बयान दर्ज किए जाएं।

साथ ही सभी पक्षों से सहयोग करने की अपेक्षा की गई है।

यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी आपराधिक मुकदमे में केवल तारीखें तय होना पर्याप्त नहीं होता। गवाहों की वास्तविक उपस्थिति, अभियोजन की तैयारी, बचाव पक्ष को जिरह का अवसर और अदालत की प्रक्रिया—इन सभी को निर्धारित समय पर पूरा करना होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी कारण मामले की कार्यवाही में तेजी लाने पर जोर दिया है।

7, 9 और 28 अक्टूबर की तारीखें महत्वपूर्ण

अब मामले की आगे की प्रक्रिया में 7, 9 और 28 अक्टूबर की तारीखें महत्वपूर्ण हो गई हैं।

इन तारीखों पर दोनों प्रमुख पीड़ित-गवाहों को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किए जाने और उनके बयान दर्ज किए जाने हैं।

यदि दोनों गवाह निर्धारित तारीखों पर उपस्थित होकर अपनी गवाही दर्ज करा देते हैं तो मुकदमे की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

वहीं, यदि किसी कारण से गवाही फिर टलती है तो अदालत को उस कारण पर विचार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के निर्देश से यह स्पष्ट है कि अदालत अब इस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं चाहती।

2023 की मणिपुर हिंसा से जुड़ा है मामला

यह मामला मणिपुर में 2023 के दौरान हुई व्यापक जातीय हिंसा से जुड़े मामलों का हिस्सा है।

मई 2023 से मणिपुर में हिंसा का दौर शुरू हुआ था। विभिन्न समुदायों के बीच संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और हजारों लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा।

हिंसा के दौरान महिलाओं के खिलाफ भी गंभीर अपराधों के आरोप सामने आए। इनमें यौन हिंसा से जुड़े मामले विशेष रूप से देशभर में चर्चा का विषय बने।

महिलाओं के साथ हुई कथित यौन हिंसा का एक वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायिक और जांच प्रक्रिया को लेकर सक्रिय भूमिका निभाई।

मौजूदा मामला भी उसी व्यापक न्यायिक निगरानी के संदर्भ में देखा जा रहा है।

मणिपुर हिंसा मामलों में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

मणिपुर हिंसा के बाद कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में पहुंची थीं। इनमें हिंसा की जांच, पीड़ितों की सुरक्षा, राहत और पुनर्वास तथा यौन हिंसा के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई की मांग शामिल थी।

सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर जांच और ट्रायल की प्रगति पर जानकारी ली है।

ऐसे मामलों में अदालत की भूमिका केवल आरोपियों को सजा दिलाने तक सीमित नहीं रहती। पीड़ितों को न्याय मिले, गवाह सुरक्षित रहें और जांच निष्पक्ष तरीके से हो—इन पहलुओं पर भी अदालत ध्यान देती है।

वर्तमान मामले में भी गवाहों की सुरक्षा और गवाही की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

पीड़ित-गवाहों की गवाही क्यों अहम?

आपराधिक मुकदमे में गवाहों की गवाही का महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह गवाह घटना के बारे में क्या जानकारी रखता है और उसकी गवाही अन्य साक्ष्यों से किस प्रकार जुड़ती है।

पीड़ित-गवाह स्वयं घटना का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाला व्यक्ति हो सकता है। इसलिए उसकी गवाही मामले की परिस्थितियों को अदालत के सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

लेकिन गवाही दर्ज होने के बाद भी उसका मूल्यांकन अदालत द्वारा अन्य साक्ष्यों के साथ किया जाता है। केवल बयान दर्ज हो जाने से आरोपी दोषी नहीं हो जाता।

अदालत को पूरे रिकॉर्ड, गवाहों की विश्वसनीयता, जिरह के दौरान सामने आए तथ्यों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचना होता है।

आरोपियों के जमानत पर होने का क्या असर?

मामले में आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं। सामान्य तौर पर जमानत का अर्थ यह नहीं होता कि आरोपी को अपराध से मुक्त कर दिया गया है। जमानत केवल मुकदमे के दौरान हिरासत से बाहर रहने की अनुमति होती है, जो अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों के अधीन रहती है।

यदि आरोपी इन शर्तों का उल्लंघन करता है या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश करता है तो अदालत जमानत की समीक्षा कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इसी संभावना की ओर संकेत किया। अदालत ने कहा कि यदि जमानत की सुविधा का दुरुपयोग होता है तो वह इस पर विचार कर सकती है।

हालांकि, अदालत ने फिलहाल जमानत रद्द करने का आदेश नहीं दिया है। पीठ ने संकेत दिया कि पहले दोनों पीड़ित-गवाहों के बयान दर्ज कराना अधिक उचित होगा।

सरकार और जांच एजेंसी के सामने चुनौती

अब CBI और संबंधित सरकारी अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दोनों गवाहों की सुरक्षित और समय पर पेशी सुनिश्चित करना है।

गवाहों को अदालत तक लाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे बिना किसी दबाव या भय के अपना बयान दर्ज करा सकें।

यदि किसी गवाह को सुरक्षा की जरूरत है तो प्रशासन को उसके लिए आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी।

साथ ही ट्रायल कोर्ट को भी यह देखना होगा कि अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों को कानून के अनुसार पर्याप्त अवसर मिले और कार्यवाही निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़े।

अदालत ने सभी पक्षों से सहयोग करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सभी संबंधित पक्षों को अदालत की प्रक्रिया में पूरा सहयोग करना होगा।

इसका मतलब है कि CBI, ट्रायल कोर्ट, अभियोजन पक्ष, बचाव पक्ष और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को निर्धारित तारीखों पर आवश्यक तैयारी के साथ उपस्थित रहना होगा।

गवाहों की पेशी में अनावश्यक देरी से मुकदमे की अवधि बढ़ती है और पीड़ितों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने मामले की कार्यवाही में तेजी लाने पर जोर दिया है।

अब आगे क्या होगा?

अब 7, 9 और 28 अक्टूबर की तारीखें इस मामले के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार इन तारीखों पर दोनों प्रमुख पीड़ित-गवाहों की पेशी और गवाही सुनिश्चित की जानी है।

यदि गवाहों के बयान दर्ज हो जाते हैं तो इसके बाद अदालत आरोपियों की जमानत से जुड़े मुद्दे पर भी आगे विचार कर सकती है।

यदि किसी आरोपी की ओर से जमानत की शर्तों के उल्लंघन या गवाहों को प्रभावित करने का कोई ठोस मामला सामने आता है तो अदालत उसके आधार पर उचित कदम उठा सकती है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकता गवाहों की गवाही को दी है।

न्यायिक प्रक्रिया में तेजी पर जोर

मणिपुर यौन हिंसा से जुड़ा यह मामला केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं है, बल्कि 2023 की व्यापक हिंसा और उसके दौरान सामने आए गंभीर आरोपों की न्यायिक जांच का हिस्सा है।

ऐसे मामलों में समय पर न्याय मिलना बेहद महत्वपूर्ण होता है। लंबे समय तक मुकदमा चलने से पीड़ितों और गवाहों पर मानसिक तथा सामाजिक दबाव बना रह सकता है। दूसरी ओर आरोपी को भी निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।

इसलिए अदालत के सामने चुनौती दोनों हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की होती है।

सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इसी संतुलन पर जोर दिया। अदालत ने एक तरफ आरोपियों की जमानत को तत्काल रद्द नहीं किया, वहीं दूसरी तरफ गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी।

साथ ही अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि जमानत की सुविधा का दुरुपयोग होता है तो वह उस पर कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी।

फिलहाल अगली महत्वपूर्ण तारीखें 7, 9 और 28 अक्टूबर हैं। इन तारीखों पर होने वाली कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि दोनों प्रमुख पीड़ित-गवाहों की गवाही किस तरह आगे बढ़ती है और उसके बाद आरोपियों की जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है। मणिपुर हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की गति और गवाहों की सुरक्षा दोनों पर अब अदालत की विशेष नजर बनी हुई है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।