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वीरमणि POCSO मामले में सियासी घमासान के बीच SIT जांच पर नजर, DMK ने CM विजय और मंत्रियों से पूछताछ की मांग की

वीरमणि POCSO मामले में सियासी घमासान के बीच SIT जांच पर नजर, DMK ने CM विजय और मंत्रियों से पूछताछ की मांग की

       तमिलनाडु की राजनीति में वीरमणि से जुड़े कथित POCSO मामले को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। नाबालिगों से जुड़े कथित यौन अपराधों की जांच अब केवल पुलिस कार्रवाई या अदालत की कार्यवाही तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसे लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। इसी बीच मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच टीम यानी SIT की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में आ गई है।

सत्तारूढ़ और विपक्षी खेमों के बीच इस मामले को लेकर आरोपों का सिलसिला चल रहा है। DMK की ओर से आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री थलपति सी. जोसेफ विजय तथा मंत्रियों आधव अर्जुना और CTR निर्मल कुमार ने सार्वजनिक रूप से तत्कालीन DMK सरकार पर इस मामले को दबाने या कथित तौर पर ‘कवर-अप’ करने का आरोप लगाया था। पार्टी का कहना है कि यदि इन नेताओं के पास ऐसे आरोपों को साबित करने वाली कोई सामग्री, दस्तावेज, रिकॉर्ड या अन्य साक्ष्य मौजूद हैं, तो उन्हें SIT के सामने रखा जाना चाहिए।

इसी मांग को लेकर DMK कोषाध्यक्ष और सांसद टी. आर. बालू की ओर से मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया गया। पार्टी चाहती है कि जांच एजेंसी उन राजनीतिक नेताओं से पूछताछ करे, जिन्होंने सार्वजनिक मंचों पर मामले को दबाए जाने के आरोप लगाए हैं, और उनके दावों का आधार सामने लाया जाए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने फिलहाल ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया है। अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए हाल ही में गठित SIT को अपनी जांच आगे बढ़ाने के लिए समय देने का फैसला किया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।

‘कवर-अप’ के आरोप से क्यों बढ़ा राजनीतिक विवाद?

वीरमणि मामले में सबसे अधिक राजनीतिक विवाद उस समय बढ़ा जब मुख्यमंत्री विजय और कुछ मंत्रियों की ओर से यह आरोप सामने आया कि मामले को तत्कालीन DMK शासन के दौरान दबाया गया था।

राजनीतिक बयानबाजी में ‘कवर-अप’ शब्द का इस्तेमाल होने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया। विपक्षी दल DMK ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया और कहा कि यदि किसी राजनीतिक नेता के पास मामले को दबाए जाने से संबंधित ठोस जानकारी या दस्तावेज हैं तो उन्हें जांच एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

DMK का तर्क है कि केवल सार्वजनिक बयान देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के पास किसी कथित अपराध की जांच में हुई लापरवाही या उसे दबाने के संबंध में जानकारी है, तो उस जानकारी को जांच एजेंसी तक पहुंचना चाहिए ताकि उसकी स्वतंत्र रूप से जांच की जा सके।

पार्टी ने इसी आधार पर SIT को अपनी 27 सितंबर की रिप्रेजेंटेशन पर कार्रवाई करने की मांग की। DMK की ओर से कहा गया कि जांच एजेंसी को यह पता लगाना चाहिए कि जिन नेताओं ने मामले को दबाने के आरोप लगाए, उनके दावों का आधार क्या है और उनके पास कौन-कौन से दस्तावेज या अन्य सामग्री मौजूद है।

दूसरी ओर, मामले को लेकर लगाए गए राजनीतिक आरोपों को लेकर विवाद बना हुआ है। आरोपों और उनके खंडन के बीच अब पूरा मामला न्यायिक निगरानी के दायरे में भी चर्चा का विषय बन गया है।

मामले की शुरुआत कैसे हुई?

मामले की पृष्ठभूमि अक्टूबर 2025 से जुड़ी बताई गई है। पुलिस के अनुसार उस समय एक वीडियो क्लिप सामने आई थी, जिसमें कथित तौर पर एक नाबालिग के यौन शोषण से संबंधित सामग्री होने की बात कही गई। इस वीडियो क्लिप के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज कर प्रारंभिक जांच शुरू की।

शुरुआती जांच के दौरान पुलिस ने मामले में उपलब्ध सामग्री और तथ्यों की पड़ताल की। इसके बाद जांच एक ऐसे चरण में पहुंची जहां पुलिस की ओर से क्लोजर रिपोर्ट दाखिल किए जाने की दिशा में कदम बढ़ाया गया।

लेकिन मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ।

विशेष POCSO अदालत ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने मामले में आगे की जांच करने का निर्देश दिया। इस आदेश के बाद जांच की दिशा में नया मोड़ आया और पुलिस ने मामले से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी जांच आगे बढ़ाई।

बाद की जांच में कथित पीड़िताओं और मामले से जुड़े अन्य तथ्यों की पहचान किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद वीरमणि और कुछ अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई।

मामले की संवेदनशीलता और इससे जुड़े आरोपों को देखते हुए आगे चलकर SIT का गठन किया गया, जो अब पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है।

क्लोजर रिपोर्ट के बाद जांच ने लिया नया मोड़

इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट का स्वीकार न किया जाना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। सामान्य तौर पर किसी मामले में पुलिस जांच पूरी करने के बाद यदि उसे आगे अपराध की पुष्टि के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिलता है तो क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। लेकिन संबंधित अदालत उस रिपोर्ट से सहमत होना जरूरी नहीं है।

वीरमणि मामले में विशेष POCSO अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की और आगे की जांच का रास्ता खोला। इससे मामले में नए सिरे से जांच की संभावना बनी।

इसके बाद जांच में नए तथ्यों और कथित पीड़िताओं से जुड़े पहलुओं पर ध्यान दिया गया। गिरफ्तारी और अन्य कार्रवाई के बाद मामला और गंभीर राजनीतिक तथा कानूनी बहस का हिस्सा बन गया।

अब SIT के सामने चुनौती यह है कि वह पुराने पुलिस रिकॉर्ड, पहले की जांच में अपनाई गई प्रक्रिया, उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक सामग्री, गवाहों के बयान और मामले से जुड़े अन्य दस्तावेजों की निष्पक्ष तरीके से जांच करे।

DMK ने हाईकोर्ट में क्या मांग रखी?

DMK कोषाध्यक्ष और सांसद टी. आर. बालू की ओर से दाखिल याचिका में मुख्य जोर उन राजनीतिक दावों पर है, जिनमें तत्कालीन सरकार पर मामले को दबाने का आरोप लगाया गया था।

पार्टी का कहना है कि मुख्यमंत्री विजय और मंत्रियों आधव अर्जुना तथा CTR निर्मल कुमार ने सार्वजनिक रूप से मामले के कथित कवर-अप को लेकर बयान दिए हैं। ऐसे में यदि उनके पास इस संबंध में कोई जानकारी या साक्ष्य है तो वह जांच एजेंसी तक पहुंचना चाहिए।

DMK ने मांग की कि SIT उसकी 27 सितंबर की रिप्रेजेंटेशन पर कार्रवाई करे। पार्टी के अनुसार जांच एजेंसी को संबंधित नेताओं से पूछताछ करनी चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि उन्होंने जिन आरोपों का सार्वजनिक रूप से उल्लेख किया, उनके पीछे कौन-से तथ्य और दस्तावेज हैं।

याचिका में कथित तौर पर दस्तावेजों, रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन और अन्य साक्ष्य सामग्री को जांच का हिस्सा बनाए जाने की मांग की गई है।

यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी जांच में सार्वजनिक रूप से लगाए गए गंभीर आरोपों का आधार स्पष्ट होना आवश्यक होता है। यदि किसी व्यक्ति के पास मामले से संबंधित अतिरिक्त जानकारी है तो जांच एजेंसी उसके आधार पर आगे की जांच कर सकती है।

हाईकोर्ट में 30 सितंबर को क्या हुआ?

मामले पर मद्रास हाईकोर्ट में 30 सितंबर को सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन के समक्ष DMK की याचिका पर सुनवाई हुई।

DMK की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे. रविंद्रन ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए कहा कि यदि संबंधित राजनीतिक नेताओं के पास कथित कवर-अप से जुड़ी कोई सामग्री या साक्ष्य है तो उसे पुलिस अथवा SIT के समक्ष उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

याचिका के माध्यम से मूल रूप से यह मांग रखी गई थी कि जांच एजेंसी सार्वजनिक बयानों को केवल राजनीतिक आरोप मानकर नजरअंदाज न करे, बल्कि यदि उन बयानों के पीछे कोई तथ्यात्मक आधार है तो उसे जांच का हिस्सा बनाया जाए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस चरण पर किसी नेता के खिलाफ पूछताछ का बाध्यकारी आदेश जारी नहीं किया। अदालत ने कहा कि हाल ही में गठित SIT को अपनी जांच पूरी करने के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए।

इसी आधार पर मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी गई।

अभी SIT के सामने क्या चुनौतियां हैं?

मामले की आगे की जांच में SIT के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हो सकते हैं। सबसे पहले यह देखना होगा कि शुरुआती पुलिस जांच में क्या-क्या कार्रवाई हुई थी और किन परिस्थितियों में क्लोजर रिपोर्ट की दिशा में कदम बढ़ाया गया।

इसके बाद यह भी महत्वपूर्ण होगा कि विशेष POCSO अदालत द्वारा आगे की जांच का आदेश दिए जाने के बाद जांच में क्या नए तथ्य सामने आए।

इसके अलावा कथित पीड़िताओं के बयान, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री, वीडियो क्लिप, पुलिस रिकॉर्ड, FIR से जुड़े दस्तावेज और आरोपियों से संबंधित जांच भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यदि राजनीतिक स्तर पर लगाए गए ‘कवर-अप’ के आरोपों को जांच का हिस्सा बनाया जाता है तो SIT को यह भी देखना होगा कि क्या किसी स्तर पर जानबूझकर जांच को प्रभावित करने, किसी तथ्य को छिपाने या कार्रवाई में लापरवाही बरतने के प्रमाण मौजूद हैं।

हालांकि, इन सभी पहलुओं पर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है।

राजनीतिक बयान और न्यायिक जांच में अंतर

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राजनीतिक आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य एक समान नहीं होते। किसी नेता द्वारा सार्वजनिक मंच से लगाया गया आरोप अपने आप में अपराध या प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण नहीं बन जाता।

उसी तरह किसी राजनीतिक दल द्वारा लगाए गए आरोपों को भी जांच के बाद ही तथ्यात्मक रूप से परखा जा सकता है।

यही कारण है कि हाईकोर्ट ने फिलहाल SIT को समय देने का फैसला किया है। अदालत ने तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय जांच एजेंसी को उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर दिया है।

आगे यदि जांच में किसी राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप के प्रमाण मिलते हैं तो उसके आधार पर संबंधित कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। लेकिन तब तक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना आवश्यक है।

POCSO मामले की संवेदनशीलता भी महत्वपूर्ण

यह पूरा मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इसमें नाबालिगों से जुड़े कथित यौन अपराधों की बात सामने आई है। POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना और ऐसे मामलों की जांच एवं सुनवाई के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराना है।

ऐसे मामलों में जांच एजेंसी पर निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ काम करने की विशेष जिम्मेदारी होती है। पीड़ित बच्चों की पहचान और उनकी निजता की रक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

इसी कारण इस मामले में भी जांच के दौरान सामने आने वाली किसी भी सामग्री को सार्वजनिक करने के बजाय कानून के अनुसार उसका उपयोग किया जाना आवश्यक होगा।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल मामले की जांच SIT के पास है और हाईकोर्ट ने उसे जांच आगे बढ़ाने के लिए समय दिया है। चार सप्ताह बाद जब मामला फिर अदालत के सामने आएगा, तब जांच की प्रगति पर नजर रह सकती है।

DMK की ओर से उठाई गई मांग का अगला चरण भी महत्वपूर्ण होगा। यदि मुख्यमंत्री विजय या संबंधित मंत्रियों के पास मामले को दबाने के आरोपों के समर्थन में कोई दस्तावेज, रिकॉर्ड या इलेक्ट्रॉनिक सामग्री है, तो वह जांच एजेंसी के सामने आती है या नहीं, इस पर भी राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर नजर रहेगी।

दूसरी ओर SIT की जांच यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि शुरुआती जांच में क्या हुआ, क्लोजर रिपोर्ट क्यों तैयार की गई, POCSO अदालत के हस्तक्षेप के बाद क्या नए तथ्य सामने आए और बाद की जांच किस आधार पर आगे बढ़ी।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वीरमणि POCSO मामला अब केवल एक आपराधिक जांच का विषय नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक आरोप, पूर्व जांच की प्रक्रिया और कथित प्रशासनिक लापरवाही से जुड़े सवाल भी जुड़ चुके हैं।

लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा। अदालत ने फिलहाल किसी राजनीतिक नेता को दोषी नहीं ठहराया है और न ही मुख्यमंत्री या मंत्रियों के खिलाफ कोई बाध्यकारी आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट ने SIT को अपना काम करने का अवसर दिया है।

ऐसे में आने वाले दिनों में SIT की जांच की दिशा और उसकी रिपोर्ट इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। साथ ही चार सप्ताह बाद होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर भी राजनीतिक और कानूनी दोनों पक्षों की नजर रहेगी।

फिलहाल मामला जांच के चरण में है और आरोपों की सच्चाई का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एजेंसी तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।