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बच्चों का कल्याण सर्वोपरि, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिता को सौंपी दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी

बच्चों का कल्याण सर्वोपरि, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिता को सौंपी दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी

       इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कस्टडी के विवाद में माता-पिता के व्यक्तिगत अधिकारों से अधिक महत्व बच्चे के कल्याण और उसके सर्वोत्तम हित का है। अदालत ने सात वर्षीय हुरेन जुबैर और तीन वर्षीय नूर जुबैर की अभिरक्षा उनके पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को सौंपने का आदेश दिया है। न्यायालय ने कहा कि बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए यह देखना आवश्यक है कि वर्तमान परिस्थितियों में उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और शैक्षणिक विकास के लिए कौन-सा वातावरण अधिक उपयुक्त है।

यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन ने बच्चों की कस्टडी से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। अदालत के सामने मामला केवल इस बात तक सीमित नहीं था कि बच्चे फिलहाल किसके साथ रह रहे हैं, बल्कि यह भी देखा गया कि दोनों बच्चों के भविष्य और समग्र विकास के लिए किस अभिभावक के पास उनकी अभिरक्षा रहना अधिक उचित होगा।

पहले पिता को दी गई थी अस्थायी अभिरक्षा

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले पिता को बच्चों से मिलने और उनके साथ समय बिताने की व्यवस्था की थी। न्यायालय ने पिता को प्रत्येक रविवार सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा देने का निर्देश दिया था। इसके अलावा पिता को प्रतिदिन शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच वीडियो कॉल के माध्यम से बच्चों से बातचीत करने की अनुमति भी दी गई थी।

पिता की ओर से अदालत को बताया गया कि जब वह बच्चों को लेने के लिए गए तो वहां ससुराल पक्ष के लोगों के साथ कहासुनी हो गई। उनका कहना था कि विवाद के कारण उन्हें बच्चों की अभिरक्षा नहीं मिल सकी। इसके बाद अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पिता, मां वजीहा वजाहत और दोनों बच्चों को न्यायालय के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।

जब सभी पक्ष अदालत के सामने उपस्थित हुए तो न्यायालय ने परिस्थितियों को स्वयं समझने और बच्चों तथा दोनों अभिभावकों की स्थिति का आकलन करने का प्रयास किया।

पति-पत्नी के बीच सुलह की भी कोशिश

सुनवाई के दौरान अदालत ने केवल कस्टडी के प्रश्न पर निर्णय लेने की जल्दबाजी नहीं की। न्यायालय ने पति-पत्नी के बीच मतभेद समाप्त कराने और दोनों को साथ रहने के लिए तैयार करने का भी ईमानदार प्रयास किया। अदालत का उद्देश्य था कि यदि पति-पत्नी अपने विवाद को समाप्त कर लेते हैं तो बच्चों को माता-पिता दोनों का साथ मिल सकता है और परिवार भी टूटने से बच सकता है।

हालांकि, पत्नी ने ससुराल में उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगाए और अपने पति के साथ दोबारा रहने से साफ इनकार कर दिया। ऐसी स्थिति में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध वैवाहिक घर में वापस जाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना कि वैवाहिक संबंधों से जुड़े विवाद और बच्चों की कस्टडी का प्रश्न अलग-अलग पहलू हैं। पत्नी का अपने पति के साथ न रहना अपने आप में यह तय नहीं करता कि बच्चों का हित किसके पास बेहतर तरीके से सुरक्षित रहेगा।

मां की शिक्षा और आर्थिक स्थिति भी बनी विचार का हिस्सा

कस्टडी का फैसला करते समय अदालत ने दोनों पक्षों की परिस्थितियों को विस्तार से देखा। बच्चों की मां वजीहा वजाहत फूड टेक्नोलॉजी में बीटेक और एमटेक शिक्षित हैं। हालांकि, वर्तमान में वह स्वयं कोई आय अर्जित नहीं कर रही हैं और अपने पिता पर निर्भर बताई गईं।

बच्चों के नाना वजाहत अली खान की ओर से अदालत में उनकी आर्थिक स्थिति के संबंध में हलफनामा दाखिल किया गया। बताया गया कि उनका मोबाइल शॉप और प्रॉपर्टी का कारोबार है। इसके अलावा उनकी एक औद्योगिक इकाई भी है, जिसमें करीब 20 से 30 लोग काम करते हैं।

हालांकि, अदालत के समक्ष उनकी आय से संबंधित कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। उनके ऊपर चार अविवाहित बेटियों की जिम्मेदारी होने की बात भी सामने आई। इसलिए अदालत को यह भी देखना था कि भविष्य में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रहने और अन्य आवश्यकताओं का खर्च किस प्रकार स्थायी रूप से पूरा किया जा सकेगा।

नाना ने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का दिया भरोसा

वजाहत अली ने अपने हलफनामे में अपनी संपत्ति और संसाधनों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनके पास अचल संपत्ति, मकान और वाहन हैं। उनके पास एक कार और तीन दोपहिया वाहन होने की जानकारी दी गई। उन्होंने यह भी बताया कि उनके ऊपर कोई देनदारी नहीं है और उनका आवास लगभग तीन हजार वर्ग फुट में बना हुआ है।

नाना की ओर से यह आश्वासन भी दिया गया कि बच्चों को अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलाई जाएगी और उनके पालन-पोषण में किसी तरह की कमी नहीं होने दी जाएगी।

फिर भी अदालत ने केवल संपत्ति या आर्थिक स्थिति को ही कस्टडी का आधार नहीं बनाया। न्यायालय ने पूरे मामले को बच्चों के सर्वोत्तम हित के व्यापक दृष्टिकोण से देखा।

कोर्ट में बच्चों का व्यवहार भी रहा महत्वपूर्ण

सुनवाई के दौरान अदालत ने बच्चों के व्यवहार को भी ध्यान में रखा। न्यायालय ने पाया कि दोनों बच्चे कोर्ट में अपनी मां और नाना की गोद में ही रहे। वे पिता के साथ सहजता से बातचीत करते हुए दिखाई नहीं दिए।

हालांकि, अदालत ने इस व्यवहार को पिता को बच्चों द्वारा अस्वीकार किए जाने के रूप में स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने माना कि छोटे बच्चों का किसी एक अभिभावक के साथ अधिक सहज होना स्वाभाविक हो सकता है, खासकर तब जब वे लंबे समय से उसी के साथ रह रहे हों।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पिता को बच्चों से सार्थक और निरंतर संबंध बनाए रखने का अधिकार है। बच्चों को केवल इसलिए पिता से दूर नहीं किया जा सकता कि वर्तमान समय में वे मां के साथ अधिक घुले-मिले हुए हैं।

माता-पिता के अधिकारों से ऊपर बच्चे का हित

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कस्टडी मामलों के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराया कि माता-पिता के अधिकार अंतिम नहीं हैं। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि बच्चे के लिए क्या बेहतर है।

अदालत ने कहा कि माता-पिता के अधिकार बच्चे के कल्याण के अधीन हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी अभिभावक का दावा बच्चे के सर्वोत्तम हित से मेल नहीं खाता तो केवल माता-पिता होने के आधार पर उसे कस्टडी का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत से मुक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि बच्चे के हित और उसकी अभिरक्षा से जुड़े प्रश्न पर भी विचार करने का माध्यम बन सकती है। यदि बच्चे की कस्टडी को लेकर गंभीर विवाद हो तो न्यायालय बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखकर उचित आदेश पारित कर सकता है।

पिता की आर्थिक क्षमता और बच्चों की जिम्मेदारी लेने की इच्छा पर भी विचार

अदालत ने पिता की आर्थिक स्थिति, रहने की व्यवस्था और बच्चों की जिम्मेदारी उठाने की उनकी इच्छा को भी महत्वपूर्ण माना। न्यायालय के सामने यह बात आई कि पिता बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं।

अदालत ने परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि फिलहाल दोनों बच्चों का हित पिता के पास रहने से बेहतर तरीके से सुरक्षित हो सकता है। इसी आधार पर सात वर्षीय हुरेन जुबैर और तीन वर्षीय नूर जुबैर की कस्टडी उनके पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को सौंपने का आदेश दिया गया।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत का फैसला किसी एक पक्ष को दंडित करने के उद्देश्य से नहीं था। कस्टडी का निर्णय बच्चों के भविष्य और उनके कल्याण को केंद्र में रखकर किया गया।

बच्चों के सामने एक-दूसरे के खिलाफ बात न करने का निर्देश

कस्टडी सौंपने के साथ अदालत ने दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए। न्यायालय ने कहा कि माता-पिता को संयम बरतना चाहिए और बच्चों के सामने एक-दूसरे के खिलाफ किसी प्रकार की नकारात्मक या अपमानजनक बात नहीं करनी चाहिए।

ऐसे मामलों में पति-पत्नी के बीच विवाद का सीधा प्रभाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। यदि बच्चे लगातार अपने माता-पिता को एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाते हुए देखते हैं तो इससे उनके मन में तनाव, असुरक्षा और भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

इसलिए अदालत ने दोनों पक्षों से अपेक्षा की कि वे अपने व्यक्तिगत विवादों को बच्चों के सामने न लाएं और बच्चों के हित को प्राथमिकता दें।

पिता से संबंध बनाए रखना भी बच्चों के हित में

अदालत का आदेश केवल कस्टडी पिता को देने तक सीमित नहीं है। न्यायालय के दृष्टिकोण में बच्चों के लिए यह भी जरूरी है कि उनका अपने माता-पिता दोनों से स्वस्थ और संतुलित संबंध बना रहे।

कोर्ट ने इस बात को महत्व दिया कि बच्चों को पिता से अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिए। पिता को बच्चों के जीवन में सार्थक और निरंतर भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए। इसी प्रकार बच्चों को मां के साथ भी भावनात्मक संबंध बनाए रखने की आवश्यकता है।

इस प्रकार कस्टडी का उद्देश्य किसी एक अभिभावक को दूसरे से पूरी तरह अलग करना नहीं, बल्कि बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करना है जिसमें उनका भावनात्मक और मानसिक विकास प्रभावित न हो।

कस्टडी विवाद में आर्थिक स्थिति ही अंतिम कसौटी नहीं

इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि बच्चे की कस्टडी तय करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किस अभिभावक के पास अधिक पैसा या संपत्ति है। अदालत को बच्चे की उम्र, शिक्षा, भावनात्मक जरूरत, रहने का वातावरण, अभिभावक की जिम्मेदारी उठाने की क्षमता और बच्चे के समग्र भविष्य को ध्यान में रखना होता है।

इसी वजह से अदालत ने मां की उच्च शैक्षणिक योग्यता, नाना की संपत्ति और उनकी ओर से दिए गए आश्वासनों को भी देखा, लेकिन अंतिम निर्णय लेते समय सभी परिस्थितियों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया।

न्यायालय ने पिता की आर्थिक क्षमता, आवासीय व्यवस्था और बच्चों की शिक्षा एवं पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेने की तत्परता को देखते हुए माना कि वर्तमान परिस्थितियों में बच्चों की कस्टडी पिता के पास रहना उनके हित में अधिक उपयुक्त होगा।

राज्य अधिकारियों को भी पालन में सहयोग का निर्देश

अदालत ने अपने आदेश के पालन के लिए राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों और अन्य पक्षकारों को आवश्यक सहयोग देने का निर्देश दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अदालत द्वारा कस्टडी को लेकर दिए गए आदेश को लागू करने में अनावश्यक बाधा उत्पन्न न हो।

न्यायालय ने दोनों पक्षों को यह भी संदेश दिया कि बच्चों की कस्टडी को लेकर आगे किसी प्रकार का विवाद खड़ा करने के बजाय उनके भविष्य को प्राथमिकता दी जाए।

अंततः अदालत ने आवश्यक निर्देश जारी करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया।

क्या है इस फैसले का व्यापक महत्व?

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला कस्टडी विवादों में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करता है। बच्चों की अभिरक्षा का फैसला माता या पिता के अधिकार के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के सर्वोत्तम हित के आधार पर किया जाना चाहिए।

किसी बच्चे के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका सुरक्षित वातावरण, अच्छी शिक्षा, उचित पालन-पोषण, भावनात्मक स्थिरता और माता-पिता दोनों से स्वस्थ संबंध हैं। यदि माता-पिता के बीच विवाद चल रहा हो तो उसका प्रभाव बच्चे पर न पड़े, यह दोनों की जिम्मेदारी है।

इस मामले में भी अदालत ने पति-पत्नी के विवाद को अलग रखते हुए बच्चों के भविष्य को केंद्र में रखा। पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया गया, वहीं पिता को भी बच्चों से सार्थक संबंध रखने के अधिकार से वंचित नहीं किया गया।

अदालत का संदेश साफ है कि कस्टडी का असली केंद्र माता या पिता नहीं, बल्कि बच्चा है। माता-पिता के अधिकार तभी तक महत्वपूर्ण हैं, जब तक वे बच्चे के कल्याण के अनुरूप हों। यदि दोनों के बीच विवाद हो तो न्यायालय का प्राथमिक दायित्व बच्चे के वर्तमान और भविष्य के हितों की रक्षा करना है।

हुरेन जुबैर और नूर जुबैर की कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश इसी व्यापक सिद्धांत पर आधारित है। कोर्ट ने आर्थिक क्षमता, आवास, शिक्षा, बच्चों की परिस्थितियों और अभिभावकों के व्यवहार सहित सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अपना निर्णय दिया।

अब दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि वे अदालत के निर्देशों का पालन करें और बच्चों को अपने वैवाहिक विवाद से दूर रखें। बच्चों के सामने एक-दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप न करना और उन्हें दोनों माता-पिता के प्रति सम्मान बनाए रखने का अवसर देना ही उनके हित में होगा।

इस फैसले से एक बार फिर यह बात सामने आती है कि पारिवारिक विवादों में कानून का अंतिम उद्देश्य किसी एक पक्ष को जीत दिलाना नहीं, बल्कि बच्चे के सुरक्षित और बेहतर भविष्य को सुनिश्चित करना है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।