नेपाल सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दूसरी शादी करने पर विधवा महिला को पहले पति की संपत्ति बच्चों को देने की बाध्यता खत्म
नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने विधवा महिलाओं के संपत्ति और विवाह के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर देश के पारिवारिक और संपत्ति कानून पर पड़ सकता है। अदालत ने उस कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया है, जिसके तहत किसी विधवा महिला द्वारा दूसरी शादी करने पर पहले पति से हिस्से में मिली संपत्ति उसके पहले पति से जन्मे बच्चों को देना अनिवार्य था।
नेपाल के मुलुकी देवानी संहिता, २०७४ की धारा 214(2) में यह व्यवस्था की गई थी कि यदि किसी विधवा महिला ने दूसरी शादी कर ली और उसके पहले पति से संतान है, तो पहले पति से उसे हिस्से के रूप में प्राप्त संपत्ति उन बच्चों को देनी होगी। नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के विपरीत माना है।
अदालत ने कहा कि किसी महिला के दोबारा विवाह करने के निर्णय के कारण उसकी अपनी संपत्ति पर इस तरह का प्रतिबंध लगाना उसके सम्मानपूर्वक जीवन जीने, समानता, संपत्ति और विवाह की स्वतंत्रता जैसे अधिकारों को प्रभावित करता है।
संविधान के कई मौलिक अधिकारों से टकराता था प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने माना कि धारा 214(2) का संबंधित प्रावधान नेपाल के संविधान के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों से मेल नहीं खाता।
अदालत के अनुसार, यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 16 में दिए गए सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार, अनुच्छेद 18 में समानता के अधिकार और अनुच्छेद 25 में संपत्ति के अधिकार से टकराती है।
इसके अलावा अदालत ने संविधान की धारा 69 के तहत व्यक्ति को विवाह करने, परिवार स्थापित करने और पारिवारिक जीवन जीने की स्वतंत्रता के संदर्भ में भी इस प्रावधान की समीक्षा की।
अदालत की चिंता केवल संपत्ति तक सीमित नहीं थी। उसके सामने यह सवाल भी था कि क्या किसी महिला को इस स्थिति में डालना संवैधानिक रूप से उचित है, जहां उसे अपनी संपत्ति बचाने और दोबारा विवाह करने में से किसी एक विकल्प को चुनना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी पहलू को महत्वपूर्ण माना।
विधवा महिला के सामने बन जाती थी मुश्किल स्थिति
कल्पना कीजिए कि किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है। पति की मृत्यु के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत उसे संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त होता है। वह उस संपत्ति की मालिक बन जाती है।
बाद में वह अपने जीवन को फिर से शुरू करने का फैसला करती है और दूसरी शादी कर लेती है।
संबंधित कानूनी प्रावधान के कारण उसे यह डर रहता था कि दूसरी शादी करते ही पहले पति से मिली संपत्ति उसके बच्चों को देनी पड़ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस तरह की व्यवस्था भले ही सीधे तौर पर विधवा महिला को दूसरी शादी करने से न रोकती हो, लेकिन इसका व्यावहारिक प्रभाव ऐसा हो सकता है कि महिला दूसरी शादी करने से पहले कई बार सोचे।
अदालत के अनुसार, यदि दूसरी शादी करने का परिणाम अपनी कानूनी संपत्ति छोड़ना हो, तो यह व्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से महिला की विवाह की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है।
यही कारण है कि अदालत ने इसे केवल संपत्ति कानून का मामला नहीं माना, बल्कि इसे महिला की स्वतंत्रता और सम्मानजनक जीवन से जोड़कर देखा।
संपत्ति मिलने के बाद महिला का अधिकार पूर्ण
फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संपत्ति में हिस्से यानी अंश के अधिकार को लेकर है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को कानून के अनुसार मिला अंश किसी राज्य या किसी अन्य व्यक्ति की कृपा से दिया गया उपहार नहीं होता। यह उस व्यक्ति का कानूनी अधिकार है।
एक बार जब विधि के अनुसार संपत्ति का बंटवारा हो जाता है और संबंधित व्यक्ति को उसका हिस्सा मिल जाता है, तो उस संपत्ति पर उसका स्वामित्व स्थापित हो जाता है।
अदालत ने इस तरह की संपत्ति को व्यक्ति की निजी संपत्ति के समान माना और कहा कि संबंधित व्यक्ति को उसके उपयोग, बिक्री और हस्तांतरण का अधिकार प्राप्त होता है, जब तक कानून के अनुसार कोई वैध प्रतिबंध लागू न हो।
इस दृष्टिकोण से अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि केवल महिला द्वारा दूसरी शादी कर लेने के कारण उसकी पहले से प्राप्त संपत्ति पर विशेष प्रतिबंध क्यों लगाया जाए।
बच्चों की जिम्मेदारी केवल मां की नहीं
सरकार की ओर से इस प्रावधान का बचाव करते हुए कहा गया था कि पहले पति से पैदा हुए बच्चों की स्थिति संवेदनशील हो सकती है। पिता की मृत्यु के बाद यदि मां दूसरी शादी कर लेती है, तो बच्चों के आर्थिक भविष्य को लेकर समस्या पैदा हो सकती है।
सरकार का तर्क था कि कानून का उद्देश्य ऐसे बच्चों को आर्थिक संकट से बचाना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस उद्देश्य को स्वीकार करते हुए भी यह माना कि बच्चों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल विधवा महिला की संपत्ति और विवाह की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि बच्चों के प्रति जिम्मेदारी केवल मां की नहीं होती। माता और पिता दोनों की बच्चों के पालन-पोषण और आर्थिक सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी होती है।
इसलिए बच्चों के हित की रक्षा के नाम पर केवल महिला पर ऐसी कानूनी जिम्मेदारी डालना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
क्या था लैंगिक भेदभाव का मुद्दा?
रिट याचिका में एक महत्वपूर्ण सवाल पुरुष और महिला की अलग-अलग कानूनी स्थिति को लेकर भी उठाया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि यदि पत्नी की मृत्यु हो जाती है और उसका पति दूसरी शादी करता है, तो पुरुष को इसी प्रकार अपनी संपत्ति पहले बच्चों के नाम करने की बाध्यता नहीं होती।
इसके विपरीत, पति की मृत्यु के बाद यदि विधवा महिला दूसरी शादी करती है तो उस पर पहले पति से मिली संपत्ति बच्चों को देने की बाध्यता लगती है।
याचिकाकर्ता ने इसे Gender Discrimination यानी लैंगिक भेदभाव का उदाहरण बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से देखा और माना कि कानून में ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जो महिला की वैवाहिक स्थिति के आधार पर उसके संपत्ति अधिकार को पुरुष की तुलना में अलग तरीके से सीमित करे।
अदालत के अनुसार, केवल इसलिए कि महिला ने दूसरी शादी की है, उसके पहले से प्राप्त संपत्ति पर विशेष प्रतिबंध लगाना समानता के सिद्धांत के साथ समस्या पैदा करता है।
दूसरी शादी को लेकर पुरानी सोच पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस तरह की कानूनी व्यवस्था विधवा महिलाओं को दोबारा शादी करने से हतोत्साहित करने वाली पुरानी सामाजिक सोच को बनाए रखने जैसा प्रभाव डाल सकती है।
पति की मृत्यु के बाद किसी महिला का दोबारा विवाह करना उसका व्यक्तिगत निर्णय है। यदि कानून उस निर्णय के साथ आर्थिक नुकसान को जोड़ देता है, तो महिला की वास्तविक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
अदालत ने इस पहलू को संविधान में दिए गए सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार से जोड़ा।
किसी महिला का विधवा होना अपने आप में उसके अधिकारों को कम करने का आधार नहीं हो सकता। इसी तरह दोबारा विवाह करने का फैसला भी उसकी संपत्ति के अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
बच्चों की देखभाल और संपत्ति के अधिकार में अंतर
अदालत ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया।
पति की मृत्यु के बाद यदि मां अपने बच्चों की देखभाल, शिक्षा और पालन-पोषण करती है तो यह पारिवारिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। परिस्थितियों के अनुसार मां की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है।
लेकिन केवल इसलिए कि महिला दूसरी शादी कर रही है, उसे अपनी कानूनी संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून अलग व्यवस्था कर सकता है, लेकिन उसका भार केवल विधवा महिला की संपत्ति और विवाह की स्वतंत्रता पर नहीं डाला जा सकता।
यही इस फैसले का एक प्रमुख कानूनी आधार है।
अदालत ने विधायिका की भूमिका को भी माना
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून बनाने का प्राथमिक अधिकार संसद या विधायिका के पास होता है।
अदालत सामान्य परिस्थितियों में विधायिका द्वारा बनाई गई नीतियों में हस्तक्षेप नहीं करती। लेकिन विधायिका की शक्ति असीमित नहीं है।
देश का संविधान सर्वोच्च कानून है और संसद द्वारा बनाया गया कोई भी कानून संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों और संवैधानिक सीमाओं के अधीन रहता है।
यदि कोई कानूनी प्रावधान संविधान के विपरीत पाया जाता है, तो अदालत को उसकी Judicial Review करने का अधिकार है।
इसी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने धारा 214(2) के संबंधित प्रावधान को अमान्य घोषित किया।
महिला कानून और विकास मंच ने दायर की थी रिट
इस मामले में महिला कानून और विकास मंच की ओर से अधिवक्ता मीरा ढुंगाना ने रिट याचिका दायर की थी।
याचिका में नेपाल सरकार के प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय, कानून मंत्रालय, तत्कालीन महिला, बालबालिका तथा ज्येष्ठ नागरिक मंत्रालय और प्रतिनिधि सभा को विपक्षी बनाया गया था।
याचिका का मूल सवाल यही था कि विधवा महिला को दूसरी शादी करने के कारण पहले पति से प्राप्त संपत्ति से वंचित करने वाली व्यवस्था संविधान के अनुरूप है या नहीं।
याचिकाकर्ता ने पुराने कानूनी ढांचे और मौजूदा मुलुकी देवानी संहिता के बीच महिलाओं के अधिकारों से संबंधित अंतर की ओर भी अदालत का ध्यान खींचा।
संवैधानिक पीठ ने सुनाया फैसला
इस मामले की सुनवाई नेपाल सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने की।
पीठ की अध्यक्षता न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने की। पीठ में न्यायाधीश कुमार रेग्मी, हरिप्रसाद फुयाल, डॉ. मनोजकुमार शर्मा और नहकुल सुवेदी भी शामिल थे।
पीठ ने 21 बैशाख को फैसला सुनाया था। शुक्रवार को फैसले का पूर्ण पाठ सार्वजनिक किया गया।
पूर्ण फैसले में अदालत ने विवाह की स्वतंत्रता, संपत्ति के अधिकार, समानता और सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार को एक-दूसरे से जोड़कर इस प्रावधान की संवैधानिकता की जांच की।
सरकार की दलील क्यों नहीं मानी गई?
सरकार का मुख्य तर्क बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा था। सरकार का कहना था कि पिता की मृत्यु के बाद मां के दूसरी शादी करने की स्थिति में पहले पति से जन्मे बच्चे आर्थिक रूप से असुरक्षित हो सकते हैं।
इसलिए कानून ने महिला के हिस्से की संपत्ति को बच्चों के हित में सुरक्षित रखने की व्यवस्था की।
लेकिन अदालत ने माना कि किसी वैध उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बनाया गया कानून भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकता।
बच्चों की आर्थिक सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके लिए ऐसा उपाय नहीं अपनाया जा सकता जो महिला के मौलिक अधिकारों पर असमान और अत्यधिक प्रभाव डाले।
अदालत ने इसी आधार पर संबंधित प्रावधान को संवैधानिक कसौटी पर अस्वीकार किया।
फैसले का व्यापक महत्व
नेपाल सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल विधवा महिलाओं की संपत्ति से संबंधित एक प्रावधान को रद्द करने तक सीमित नहीं है। इसमें अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि विवाह की स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति के संपत्ति अधिकारों में असमानता पैदा करने वाली व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।
फैसले में संपत्ति को लेकर भी महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आया है कि कानूनी रूप से प्राप्त अंश केवल किसी व्यक्ति के पास अस्थायी रूप से रखी गई संपत्ति नहीं है। कानून के अनुसार हिस्सा मिल जाने के बाद उस पर संबंधित व्यक्ति का स्वामित्व स्थापित होता है।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर बनाए गए कानूनों का उद्देश्य भले ही संरक्षण देना हो, लेकिन यदि उनका वास्तविक प्रभाव महिला की स्वतंत्रता और समानता को सीमित करता है तो उनकी संवैधानिक समीक्षा जरूरी हो सकती है।
आगे के लिए क्या संदेश?
इस फैसले से यह संदेश निकलता है कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति उसके मूल संपत्ति अधिकारों को अपने आप समाप्त नहीं कर सकती।
पति की मृत्यु के बाद महिला को कानून के अनुसार जो संपत्ति प्राप्त हुई है, वह उसकी अपनी संपत्ति है। बाद में उसके जीवन में होने वाला विवाह परिवर्तन अपने आप उस संपत्ति के अधिकार को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता।
बच्चों के अधिकार और उनकी आर्थिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी और समानता के संवैधानिक सिद्धांत को ध्यान में रखना होगा।
नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इसी संतुलन को केंद्र में रखा है।
फिलहाल यह फैसला नेपाल में महिलाओं के संपत्ति अधिकार, विवाह की स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े कानूनी विमर्श में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास बात यह है कि अदालत ने केवल कानून के शब्दों को नहीं देखा, बल्कि यह भी परखा कि किसी कानूनी प्रावधान का वास्तविक प्रभाव महिला के जीवन और उसके संवैधानिक अधिकारों पर क्या पड़ता है।
इस फैसले के बाद अब विधवा महिला को केवल दूसरी शादी करने के कारण पहले पति से कानूनी रूप से प्राप्त अपने हिस्से की संपत्ति बच्चों को सौंपने के लिए बाध्य करने वाला संबंधित प्रावधान प्रभावी नहीं रहेगा। हालांकि बच्चों के उत्तराधिकार और संपत्ति संबंधी अन्य वैधानिक अधिकार अपने अलग कानूनी ढांचे के तहत बने रहेंगे।
कुल मिलाकर, नेपाल सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मूल विचार पर आधारित है कि किसी महिला को दोबारा विवाह करने और अपनी वैध संपत्ति पर अधिकार बनाए रखने में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संविधान द्वारा दिए गए समानता, सम्मान और संपत्ति के अधिकारों की कसौटी पर कानून को खरा उतरना ही होगा।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।