भारत में जन्म हुआ तो नागरिकता का हक: हिमाचल हाई कोर्ट ने नेपाली नागरिक बताकर पासपोर्ट रोकने पर लगाई रोक, दो हफ्ते में नई पुलिस रिपोर्ट का आदेश
नागरिकता और पासपोर्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने साफ किया है कि नागरिकता का सवाल केवल पुलिस की किसी रिपोर्ट या स्थानीय स्तर पर तैयार की गई प्रशासनिक टिप्पणी के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति का जन्म उस अवधि में भारत की सीमा के भीतर हुआ है, जब नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत जन्म से नागरिकता का प्रावधान लागू था, तो उसके नागरिक होने के दावे पर कानून के अनुसार विचार करना होगा।
मनाली की रहने वाली शीतला देवी के मामले में हाई कोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए पुलिस की उस प्रतिकूल रिपोर्ट को प्रभावी रूप से दरकिनार किया, जिसके आधार पर उनके पासपोर्ट आवेदन को आगे नहीं बढ़ाया गया था। पुलिस रिपोर्ट में उन्हें नेपाली नागरिक बताया गया था, जबकि उनके पास सरकारी प्राधिकारी द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र मौजूद था। इस प्रमाणपत्र के अनुसार उनका जन्म 3 मई 1972 को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में हुआ था।
अदालत ने नागरिकता अधिनियम की धारा 3(1)(a) का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का जन्म भारत में उस समय हुआ था, जब कानून जन्म से भारतीय नागरिकता प्रदान करता था। ऐसे में केवल विरोधाभासी पुलिस या स्थानीय प्रशासनिक रिपोर्ट के आधार पर उन्हें विदेशी नागरिक मानना उचित नहीं है।
क्या था पूरा मामला?
मामला मनाली के पतलीकूहल क्षेत्र में रहने वाली शीतला देवी के पासपोर्ट आवेदन से जुड़ा था। महिला ने भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था। इसके बाद नियमानुसार पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू हुई।
यहीं से मामला उलझ गया।
स्थानीय स्तर पर की गई जांच में एसडीएम और तहसीलदार की रिपोर्ट में ग्राम पंचायत के हवाले से यह बताया गया कि महिला और उनका बेटा मूल रूप से नेपाल के निवासी हैं और वे पतलीकूहल में किरायेदार के तौर पर रह रहे हैं।
इस रिपोर्ट के आधार पर उनकी नागरिकता पर सवाल खड़ा हो गया। पुलिस वेरिफिकेशन प्रतिकूल होने के कारण पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया भी रुक गई।
लेकिन महिला के पास एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था—जन्म प्रमाणपत्र।
इस दस्तावेज में दर्ज था कि उनका जन्म 3 मई 1972 को पतलीकूहल, मनाली, जिला कुल्लू में हुआ था।
यानी एक ओर सरकारी रिकॉर्ड में भारत में जन्म का प्रमाण मौजूद था और दूसरी ओर स्थानीय जांच रिपोर्ट उन्हें नेपाल मूल का निवासी बता रही थी।
यही विरोधाभास अंततः हाई कोर्ट के सामने पहुंचा।
जन्म प्रमाणपत्र बना मामले का अहम आधार
किसी व्यक्ति की नागरिकता से जुड़े विवाद में जन्म की तारीख और जन्म स्थान का महत्व काफी अधिक होता है। शीतला देवी के मामले में भी यही दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ।
जन्म प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया था और उसमें उनका जन्म स्थान भारत में दर्ज था।
उनका जन्म वर्ष 1972 का था। उस समय नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3(1)(a) के तहत भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति के लिए जन्म से नागरिकता का प्रावधान था।
हाई कोर्ट ने इसी वैधानिक व्यवस्था को मामले का आधार बनाया।
अदालत के सामने सवाल यह नहीं था कि महिला वर्तमान में किस स्थान पर रह रही हैं या उनके परिवार की मूल पृष्ठभूमि क्या है। मुख्य प्रश्न यह था कि उपलब्ध कानूनी प्रावधान और दस्तावेजों के आधार पर उनके जन्म के समय उनकी नागरिकता की स्थिति क्या बनती है।
नागरिकता अधिनियम की धारा 3 क्या कहती है?
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 जन्म के आधार पर नागरिकता से संबंधित है।
इस प्रावधान में समय के साथ संशोधन हुए हैं और अलग-अलग अवधि में भारत में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के लिए नागरिकता के नियम अलग रहे हैं।
लेकिन 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति के लिए कानून की मूल स्थिति यह थी कि भारत के क्षेत्र में जन्म लेने वाला व्यक्ति जन्म से भारतीय नागरिक माना जाता था, बशर्ते लागू वैधानिक व्यवस्था के अनुसार कोई अपवाद न हो।
शीतला देवी का जन्म 3 मई 1972 को हुआ था।
इसलिए उनका जन्म इस अवधि के भीतर आता है।
हाई कोर्ट ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा कि उनके जन्म प्रमाणपत्र के आधार पर उन्हें जन्म से भारतीय नागरिक माना जाना चाहिए।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी बात यह भी है कि नागरिकता का निर्धारण केवल किसी अधिकारी की राय से नहीं होता। इसके लिए संबंधित कानून, उसके लागू होने की तारीख और व्यक्ति के दस्तावेजों को देखा जाना आवश्यक है।
पुलिस रिपोर्ट में क्यों पैदा हुआ विवाद?
इस मामले में सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अलग-अलग सरकारी और स्थानीय रिपोर्टों में विरोधाभासी बातें सामने आईं।
एक ओर महिला के पास जन्म प्रमाणपत्र था, जिसमें उनका जन्म मनाली क्षेत्र में होना दर्ज था।
दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट में ग्राम पंचायत के हवाले से यह कहा गया कि महिला मूल रूप से नेपाल की रहने वाली हैं।
इस तरह दो अलग-अलग तरह के रिकॉर्ड सामने थे।
एक रिकॉर्ड जन्म स्थान के बारे में आधिकारिक जानकारी दे रहा था और दूसरी रिपोर्ट महिला की मूल नागरिकता या निवास को लेकर अलग दावा कर रही थी।
हाई कोर्ट ने इसी विरोधाभास को देखते हुए मामले को कानून की कसौटी पर परखा।
अदालत ने पाया कि केवल ऐसी प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर महिला को विदेशी नागरिक मानना उचित नहीं होगा, खासकर तब जब उनके पास भारत में जन्म का वैध सरकारी रिकॉर्ड मौजूद है।
पासपोर्ट कार्यालय की भी गलती नहीं मानी
फैसले में हाई कोर्ट ने पासपोर्ट अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही।
अदालत ने माना कि पासपोर्ट कार्यालय ने उपलब्ध पुलिस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की थी। इसलिए केवल इस आधार पर पासपोर्ट विभाग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि उसने आवेदन रोक दिया।
यदि पुलिस वेरिफिकेशन में आवेदक की नागरिकता पर प्रतिकूल टिप्पणी की गई हो, तो पासपोर्ट जारी करने वाला अधिकारी उस रिपोर्ट को नजरअंदाज करके अपनी तरफ से नागरिकता का अंतिम फैसला नहीं कर सकता।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि गलत या विरोधाभासी पुलिस रिपोर्ट के कारण किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार हमेशा के लिए रोक दिया जाए।
इसीलिए हाई कोर्ट ने अब राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को अपनी रिपोर्ट की समीक्षा करने और कानून के अनुरूप नई रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।
दो सप्ताह में नई पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट
हाई कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को महत्वपूर्ण निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा कि नागरिकता अधिनियम की धारा 3 को ध्यान में रखते हुए महिला की नई और सकारात्मक पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर जारी की जाए।
इसके बाद क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करनी होगी और महिला के पासपोर्ट आवेदन पर आवश्यक कार्रवाई करनी होगी।
इस आदेश का व्यावहारिक महत्व काफी है क्योंकि महिला के लिए पासपोर्ट केवल यात्रा का दस्तावेज नहीं था। पासपोर्ट के लिए हुई जांच के दौरान उनकी नागरिकता पर ही सवाल खड़ा हो गया था।
हाई कोर्ट के आदेश ने इस विवाद को कानून की सही कसौटी पर रखने का रास्ता साफ किया है।
मूल रूप से नेपाल का होना और भारत में जन्म—दो अलग सवाल
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना भी जरूरी है।
किसी व्यक्ति के परिवार की मूल पृष्ठभूमि किसी दूसरे देश से हो सकती है। उसके माता-पिता या पूर्वज किसी अन्य देश के निवासी हो सकते हैं। लेकिन इससे हर स्थिति में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है।
नागरिकता कानून यह निर्धारित करता है कि किसी विशेष समय पर जन्म लेने वाले व्यक्ति की नागरिकता किस आधार पर तय होगी।
शीतला देवी के मामले में अदालत ने उनके जन्म की तारीख और जन्म स्थान को महत्वपूर्ण माना।
इसलिए स्थानीय रिपोर्ट में उनके या उनके परिवार के नेपाल से संबंध बताए जाने मात्र से उनके भारत में जन्म के आधार पर उत्पन्न नागरिकता अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक रिकॉर्ड में विरोधाभास हो तो क्या होगा?
यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।
सरकारी व्यवस्था में अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड में यदि विरोधाभास हो, तो किसी नागरिक के अधिकार को केवल कमजोर या प्रतिकूल रिपोर्ट के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
ऐसे मामलों में अधिकारियों को उपलब्ध सभी दस्तावेजों की जांच करनी होगी।
यदि जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज या अन्य वैधानिक रिकॉर्ड किसी व्यक्ति के जन्म स्थान के बारे में जानकारी देते हैं, तो उनकी जांच जरूरी है।
इसी तरह यदि किसी दस्तावेज पर संदेह है तो कानून के अनुसार उसकी सत्यता की जांच की जा सकती है। लेकिन जांच और अनुमान के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है।
शीतला देवी के मामले में हाई कोर्ट ने इसी पहलू को महत्व दिया।
नागरिकता और पासपोर्ट में क्या संबंध है?
पासपोर्ट किसी व्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में आवेदक की नागरिकता का सत्यापन भी महत्वपूर्ण होता है।
यदि पुलिस वेरिफिकेशन में नागरिकता पर सवाल उठाया जाता है तो पासपोर्ट कार्यालय उस रिपोर्ट को गंभीरता से लेता है।
लेकिन यदि बाद में यह सामने आता है कि पुलिस रिपोर्ट उपलब्ध वैधानिक रिकॉर्ड और कानून से मेल नहीं खाती, तो उस रिपोर्ट को सुधारा जाना आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने इसी दिशा में राज्य सरकार और पुलिस को नई रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि पुलिस वेरिफिकेशन अंतिम रूप से संविधान या नागरिकता कानून से ऊपर नहीं है।
महिला के बेटे का मामला भी चर्चा में आया
स्थानीय रिपोर्ट में महिला के बेटे का भी उल्लेख किया गया था और दोनों को नेपाल मूल का निवासी बताया गया था।
हालांकि, हाई कोर्ट के सामने महिला की अपनी नागरिकता और पासपोर्ट आवेदन मुख्य मुद्दा था।
इसलिए अदालत ने सबसे पहले उनके जन्म और उस समय लागू नागरिकता कानून की स्थिति को देखा।
किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण उसके अपने कानूनी तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं की जा सकती, जब कानून और दस्तावेज कुछ और बताते हों।
फैसले का व्यापक महत्व
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, जहां जन्म से नागरिकता के दावे के सामने स्थानीय स्तर की पुलिस या प्रशासनिक रिपोर्ट विरोधाभासी हो।
फैसले से यह बात स्पष्ट होती है कि नागरिकता का सवाल गंभीर संवैधानिक और वैधानिक विषय है। इसे महज स्थानीय जांच रिपोर्ट या मौखिक जानकारी के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
विशेष रूप से पुराने जन्म रिकॉर्ड वाले मामलों में तारीख बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि नागरिकता कानून में समय-समय पर बदलाव हुए हैं।
26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच जन्म लेने वाले व्यक्तियों के लिए लागू कानूनी स्थिति को समझे बिना केवल वर्तमान नियमों के आधार पर उनकी नागरिकता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
अदालत ने कानून को प्राथमिकता दी
इस मामले की सबसे बड़ी सीख यही है कि प्रशासनिक प्रक्रिया को कानून के अनुरूप चलना होता है।
पुलिस वेरिफिकेशन का उद्देश्य तथ्य जुटाना और उनकी पुष्टि करना है। यदि वेरिफिकेशन में कोई ऐसी रिपोर्ट सामने आती है जो किसी व्यक्ति के सरकारी जन्म रिकॉर्ड से विपरीत है, तो अधिकारियों को उस विरोधाभास की जांच करनी चाहिए।
किसी व्यक्ति को केवल इसलिए विदेशी नागरिक नहीं माना जा सकता कि किसी स्थानीय रिपोर्ट में ऐसा उल्लेख कर दिया गया है।
शीतला देवी के मामले में हाई कोर्ट ने उपलब्ध जन्म प्रमाणपत्र और नागरिकता अधिनियम की धारा 3 को निर्णायक कानूनी आधार माना।
क्या कहा जा सकता है इस फैसले का सार?
इस पूरे मामले को सरल शब्दों में समझें तो कहानी एक महिला के पासपोर्ट आवेदन से शुरू हुई, लेकिन अदालत के सामने यह सवाल पहुंच गया कि जन्म से भारतीय नागरिकता का दावा किस आधार पर तय होगा।
महिला का जन्म 3 मई 1972 को भारत में हुआ था। उनके पास इसका सरकारी जन्म प्रमाणपत्र था। दूसरी ओर पुलिस वेरिफिकेशन में उन्हें नेपाल मूल का बताया गया।
हाई कोर्ट ने कानून की उस व्यवस्था को देखा जो उस समय भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को जन्म से नागरिकता प्रदान करती थी। अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर महिला को भारतीय नागरिक मानने का कानूनी आधार मौजूद है।
इसलिए राज्य सरकार और पुलिस को दो सप्ताह के भीतर नई सकारात्मक वेरिफिकेशन रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया।
इसके बाद पासपोर्ट कार्यालय को कानून के अनुसार आवेदन पर कार्रवाई करनी होगी।
यह फैसला यह भी बताता है कि नागरिकता जैसे संवेदनशील मामले में किसी व्यक्ति की पहचान और अधिकार केवल विरोधाभासी प्रशासनिक टिप्पणी पर निर्भर नहीं किए जा सकते। कानून, आधिकारिक दस्तावेज और संवैधानिक अधिकारों को साथ देखकर ही अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें नागरिकता अधिनियम, प्रशासनिक जांच और पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया के बीच संबंध को स्पष्ट किया गया है। साथ ही यह संदेश भी दिया गया है कि सरकारी रिकॉर्ड में विरोधाभास होने की स्थिति में नागरिक के मौलिक और वैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।