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जमानतदार बनना सिर्फ हस्ताक्षर करना नहीं: शर्त टूटी तो हो सकती है आर्थिक कार्रवाई,

जमानतदार बनना सिर्फ हस्ताक्षर करना नहीं: शर्त टूटी तो हो सकती है आर्थिक कार्रवाई, जानिए BNSS की धारा 491 क्या कहती है

        किसी आरोपी या अभियुक्त की जमानत होने पर अक्सर परिवार, रिश्तेदार या परिचित उसकी मदद के लिए जमानतदार बन जाते हैं। कई बार लोग जमानत के कागजों पर हस्ताक्षर तो कर देते हैं, लेकिन उन्हें यह पूरी जानकारी नहीं होती कि इस हस्ताक्षर के साथ वे एक कानूनी जिम्मेदारी भी स्वीकार कर रहे हैं। बाद में यदि बंधपत्र की शर्तों का उल्लंघन होता है तो परेशानी केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जमानतदार को भी आर्थिक और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

इसी विषय को लेकर पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार ने आम लोगों से सावधानी बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की जमानत लेने से पहले संबंधित दस्तावेजों और शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। बिना समझे केवल परिचय या रिश्तेदारी के आधार पर जमानतदार बन जाना बाद में परेशानी का कारण बन सकता है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 यानी BNSS में बंधपत्र की शर्तों के उल्लंघन और उसके परिणामों को लेकर प्रावधान किया गया है। BNSS की धारा 491 इसी प्रक्रिया से संबंधित है।

जमानतदार की जिम्मेदारी आखिर क्या होती है?

जमानतदार बनना केवल न्यायालय में किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करना नहीं है। जमानतदार न्यायालय के सामने एक कानूनी बंधपत्र देता है। इसमें वह निर्धारित शर्तों के अनुसार जिम्मेदारी स्वीकार करता है।

आमतौर पर जमानत की शर्तों में अभियुक्त का आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय के सामने उपस्थित होना शामिल हो सकता है। कुछ मामलों में अन्य शर्तें भी लगाई जा सकती हैं।

बंधपत्र का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जिस व्यक्ति को न्यायालय ने जमानत पर छोड़ा है, वह न्यायिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश न करे और न्यायालय द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करे।

इसलिए किसी के कहने पर बिना दस्तावेज पढ़े हस्ताक्षर कर देना उचित नहीं है।

जमानतदार को यह समझना चाहिए कि वह किस व्यक्ति के लिए जमानत दे रहा है, बंधपत्र में कितनी राशि निर्धारित है और उस व्यक्ति पर कौन-कौन सी शर्तें लागू हैं।

बंधपत्र क्या होता है?

सरल भाषा में समझें तो Bond यानी बंधपत्र न्यायालय के सामने दिया गया एक लिखित कानूनी वचन है।

इसमें संबंधित व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि वह बंधपत्र में लिखी शर्तों का पालन करेगा।

उदाहरण के लिए, किसी मामले में अभियुक्त को तय तारीख पर अदालत में उपस्थित होना जरूरी हो सकता है। यदि वह बिना उचित कारण के न्यायालय में उपस्थित नहीं होता और इससे बंधपत्र की शर्त का उल्लंघन होता है, तो न्यायालय कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है।

इसी प्रकार किसी मामले की प्रकृति के अनुसार न्यायालय ने यदि कोई विशेष शर्त निर्धारित की है तो उसका पालन करना भी जरूरी होता है।

यही कारण है कि जमानत के दस्तावेजों को केवल औपचारिक कागज समझना सही नहीं है।

BNSS की धारा 491 में क्या प्रावधान है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 491 बंधपत्र के उल्लंघन के बाद होने वाली कार्रवाई से संबंधित है।

यदि न्यायालय के सामने यह साबित हो जाता है कि बंधपत्र की शर्तों का पालन नहीं किया गया है और बंधपत्र जब्त होने की स्थिति पैदा हो गई है, तो न्यायालय को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।

सबसे पहले न्यायालय उस उल्लंघन के संबंध में कारण दर्ज कर सकता है।

इसके बाद संबंधित व्यक्ति को यह अवसर दिया जाता है कि वह बंधपत्र में निर्धारित दंड राशि जमा करे या यह बताए कि उससे वह राशि क्यों न वसूल की जाए।

इसका अर्थ यह है कि कानून सीधे किसी व्यक्ति को बिना प्रक्रिया के दंडित करने की बात नहीं करता। संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है।

सिर्फ शर्त टूटने से तुरंत जेल नहीं होती

जमानतदारों को लेकर एक आम धारणा यह है कि यदि जिस व्यक्ति की उन्होंने जमानत ली है, उसने कोई शर्त तोड़ दी तो जमानतदार को तुरंत जेल भेज दिया जाएगा।

यह समझ सही नहीं है।

कानून में इसके लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है। बंधपत्र के उल्लंघन के बाद न्यायालय मामले को देखता है, कारण दर्ज करता है और संबंधित व्यक्ति को जवाब देने का अवसर देता है।

यदि पर्याप्त कारण नहीं बताया जाता और निर्धारित राशि भी जमा नहीं की जाती, तो कानून के अनुसार उसकी वसूली की कार्रवाई की जा सकती है।

इसलिए किसी भी कार्रवाई से पहले न्यायालय की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।

दंड राशि जमा न करने पर क्या हो सकता है?

यदि न्यायालय के आदेश के अनुसार बंधपत्र में तय दंड राशि जमा नहीं की जाती और संबंधित व्यक्ति पर्याप्त कारण भी नहीं बता पाता, तो न्यायालय उस राशि की वसूली जुर्माने की तरह कर सकता है।

इसका मतलब यह हुआ कि जमानतदार के लिए आर्थिक जोखिम वास्तविक हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति ने किसी अभियुक्त का जमानतदार बनकर एक निश्चित राशि के बंधपत्र पर हस्ताक्षर किया है और बाद में बंधपत्र जब्त होने की स्थिति आती है, तो परिस्थितियों के अनुसार उस राशि की वसूली की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

यही वजह है कि जमानतदार बनने से पहले बंधपत्र की शर्तों को समझना जरूरी है।

पैसा नहीं देने पर सिविल जेल की स्थिति

कानून में इससे भी आगे की प्रक्रिया का प्रावधान है।

यदि जमानतदार दंड राशि का भुगतान नहीं करता और कानूनी प्रक्रिया के जरिए भी उस राशि की वसूली नहीं हो पाती, तो न्यायालय उसे अधिकतम छह महीने तक सिविल जेल में रखने का आदेश दे सकता है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि जमानत की कोई शर्त टूटते ही जमानतदार को छह महीने के लिए जेल भेज दिया जाएगा। ऐसा स्वतः नहीं होता।

इसके लिए पहले बंधपत्र के उल्लंघन से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया पूरी होनी होती है और न्यायालय को कानून के अनुसार आदेश देना होता है।

इसलिए जमानतदारों को डरने के बजाय अपनी कानूनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए।

जमानतदार बनने से पहले कौन-कौन सी बातें देखें?

किसी व्यक्ति की जमानत लेने से पहले कुछ बुनियादी बातों की जानकारी लेना बहुत जरूरी है।

सबसे पहले यह देखें कि जिस व्यक्ति की जमानत ली जा रही है, उसका मामला क्या है और वह किन शर्तों पर जमानत पर बाहर आ रहा है।

इसके बाद जमानत बंधपत्र को ध्यान से पढ़ें।

कितनी राशि की जिम्मेदारी है, कौन-कौन सी शर्तें हैं, न्यायालय में कब उपस्थित होना है और किन परिस्थितियों में जमानत या बंधपत्र प्रभावित हो सकता है—इन बातों को समझना चाहिए।

यदि दस्तावेज में कोई कानूनी शब्द समझ नहीं आता है तो उसे बिना समझे हस्ताक्षर करने से बचना चाहिए।

जरूरत पड़ने पर अधिवक्ता से जानकारी ली जा सकती है।

अदालत की तारीख को हल्के में न लें

जमानत पर बाहर आने के बाद अभियुक्त के लिए न्यायालय की तारीखों का पालन करना बेहद महत्वपूर्ण होता है।

यदि अभियुक्त को किसी निर्धारित तारीख पर अदालत में उपस्थित होना है तो उसकी जानकारी जमानतदार को भी रखना उपयोगी है।

जमानतदार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अभियुक्त अदालत की प्रक्रिया से बचने की कोशिश तो नहीं कर रहा है।

हालांकि, जमानतदार खुद पुलिस या न्यायालय की जगह कार्रवाई करने वाला अधिकारी नहीं होता। उसकी भूमिका बंधपत्र में स्वीकार की गई कानूनी जिम्मेदारी तक सीमित रहती है।

लेकिन यदि कोई गंभीर समस्या सामने आती है तो उचित कानूनी माध्यम से न्यायालय को जानकारी देना महत्वपूर्ण हो सकता है।

वास्तविक परेशानी हो तो अदालत को बताएं

कई बार किसी व्यक्ति के सामने ऐसी परिस्थिति आ सकती है जिसमें वह निर्धारित तारीख पर अदालत में उपस्थित नहीं हो सकता।

ऐसी स्थिति में सबसे खराब विकल्प यह है कि वह बिना सूचना दिए तारीख की अनदेखी कर दे।

यदि कोई वास्तविक और उचित कारण है तो कानून के अनुसार समय रहते न्यायालय को इसकी जानकारी देने का प्रयास किया जाना चाहिए।

कई मामलों में न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार उचित आदेश पारित कर सकता है। लेकिन इसके लिए संबंधित पक्ष को समय पर उचित माध्यम अपनाना आवश्यक है।

जमानतदार के लिए भी यही सावधानी महत्वपूर्ण है।

रिश्तेदारी या दोस्ती में जल्दबाजी न करें

अक्सर लोग रिश्तेदार, दोस्त या परिचित होने के कारण किसी की जमानत लेने के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं।

उन्हें लगता है कि केवल कागज पर हस्ताक्षर करने की औपचारिकता है और आगे उनकी कोई भूमिका नहीं होगी।

यही सोच बाद में परेशानी पैदा कर सकती है।

जमानतदार बनने से पहले यह समझना चाहिए कि जिस व्यक्ति की जमानत ली जा रही है, उसके मामले की स्थिति क्या है और वह न्यायालय की शर्तों का पालन करने में सक्षम है या नहीं।

किसी ऐसे व्यक्ति की जमानत लेना, जिसके बारे में यह आशंका हो कि वह अदालत में उपस्थित नहीं होगा या जानबूझकर शर्तों का उल्लंघन करेगा, जमानतदार के लिए आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है।

दस्तावेजों को पढ़ना क्यों जरूरी है?

कानूनी दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाली भाषा आम बोलचाल की भाषा से अलग होती है।

कई बार लोग पूरा दस्तावेज पढ़े बिना केवल इसलिए हस्ताक्षर कर देते हैं क्योंकि परिवार का कोई सदस्य या परिचित उनसे ऐसा करने के लिए कहता है।

यह आदत बदलनी चाहिए।

जमानत बंधपत्र पर हस्ताक्षर करने से पहले उसमें लिखी राशि, शर्तें और संबंधित व्यक्ति की जिम्मेदारियों को समझना चाहिए।

यदि कोई बात अस्पष्ट हो तो अदालत में मौजूद अधिवक्ता या संबंधित कानूनी विशेषज्ञ से उसका अर्थ समझना बेहतर है।

एक बार दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बाद यह कहना कि शर्तों की जानकारी नहीं थी, हमेशा पर्याप्त बचाव नहीं हो सकता।

जमानतदार और अभियुक्त की जिम्मेदारियां अलग हैं

यह भी समझना जरूरी है कि जमानतदार और अभियुक्त की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं होती।

अभियुक्त वह व्यक्ति है जिसके खिलाफ आपराधिक मामले की कार्यवाही चल रही है। जमानतदार का दायित्व अलग प्रकार का होता है और वह बंधपत्र के माध्यम से न्यायालय के सामने कुछ जिम्मेदारियां स्वीकार करता है।

इसलिए अभियुक्त द्वारा शर्तों का पालन न करने का मतलब यह नहीं है कि जमानतदार अपने आप उस अपराध का आरोपी बन जाता है।

लेकिन बंधपत्र से जुड़ी जिम्मेदारी के उल्लंघन पर उसके खिलाफ कानून में निर्धारित आर्थिक या अन्य प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

यह अंतर समझना बेहद जरूरी है।

पुलिस अधीक्षक की अपील क्यों महत्वपूर्ण है?

पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार की आम लोगों से की गई अपील का उद्देश्य यही है कि लोग जमानत को केवल औपचारिकता न समझें।

किसी व्यक्ति को जमानत दिलाना मानवीय मदद हो सकती है, लेकिन इसके साथ कानूनी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।

इसलिए किसी की सहायता करने से पहले संबंधित व्यक्ति और मामले की स्थिति को समझना चाहिए।

सिर्फ परिचय, रिश्तेदारी या भावनात्मक दबाव में आकर जमानतदार बनना उचित नहीं है।

कानून की जानकारी से बच सकती है परेशानी

जमानतदार के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने अधिकार और जिम्मेदारियों को समझे।

न्यायालय की तारीखों की जानकारी रखें। बंधपत्र की शर्तों को पढ़ें। किसी शर्त में बदलाव या कोई समस्या हो तो उचित कानूनी माध्यम से कार्रवाई करें।

यदि अभियुक्त को किसी तारीख पर उपस्थित होना है तो उसे इसकी जानकारी होनी चाहिए। यदि वास्तविक परेशानी के कारण उपस्थिति संभव नहीं है तो समय पर न्यायालय के समक्ष उचित आवेदन या सूचना देने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

कानून में प्रक्रिया का महत्व इसलिए है क्योंकि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुसार ही होनी चाहिए।

जमानत लेना जिम्मेदारी है, महज मदद नहीं

किसी व्यक्ति की जमानत देना निश्चित रूप से उसकी मुश्किल घड़ी में मदद करना हो सकता है। लेकिन इस मदद के साथ कानूनी दायित्व भी जुड़ा होता है।

BNSS की धारा 491 के तहत बंधपत्र के उल्लंघन की स्थिति में न्यायालय के पास निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दंड राशि की वसूली की शक्ति है। परिस्थितियां पूरी होने पर राशि की वसूली जुर्माने की तरह की जा सकती है और कानून में निर्धारित स्थिति में सिविल जेल का आदेश भी संभव है।

इसलिए जमानतदार बनने से पहले सबसे जरूरी सावधानी यही है कि बंधपत्र को पढ़ें, उसकी शर्तों को समझें और अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करने के बाद ही हस्ताक्षर करें।

किसी की मदद करना अच्छी बात हो सकती है, लेकिन कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले यह जानना उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उस हस्ताक्षर का कानूनी अर्थ क्या है।

जमानत की प्रक्रिया में थोड़ी सी सावधानी बाद में होने वाली बड़ी आर्थिक या कानूनी परेशानी से बचा सकती है। इसलिए पुलिस अधीक्षक की अपील का मूल संदेश यही है कि जमानतदार बनने से पहले भावनाओं से नहीं, कानून और जिम्मेदारी को समझकर फैसला करें।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।