सिलीगुड़ी कोर्ट में ‘जय श्री राम’ नारे पर विवाद: हिजाब पहनी महिला मजिस्ट्रेट को देखकर नारा लगाने का आरोप, वकील ने मांगी माफी
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में एक अदालत की कार्यवाही के दौरान कथित तौर पर धार्मिक नारा लगाए जाने की घटना को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि कोर्टरूम में एक आरोपी ने महिला ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को हिजाब पहने हुए देखकर ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया। घटना के बाद अदालत परिसर में चर्चा तेज हो गई और कानूनी बिरादरी के कुछ सदस्यों ने कोर्ट की गरिमा बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।
मामला सिलीगुड़ी सब-डिविजनल कोर्ट के कोर्ट नंबर 4 का बताया जा रहा है। यहां वर्ष 2018 से जुड़े एक मामले में 24 आरोपियों को अदालत के सामने पेश होने के लिए बुलाया गया था। इसी दौरान आरोप है कि हाजिरी की प्रक्रिया चल रही थी और एक आरोपी ने महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर देखते हुए नारा लगाया।
हालांकि, आरोपी की ओर से अदालत में पेश वकील ने तुरंत बिना शर्त माफी मांग ली। वकील का कहना था कि आरोपी ने यह नारा न्यायाधीश को संबोधित करते हुए नहीं लगाया था और घटना को गलत अर्थ में लिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने अदालत में धार्मिक अभिव्यक्ति, न्यायालय की गरिमा और कोर्टरूम में अनुशासन को लेकर बहस छेड़ दी है।
2018 के मामले की सुनवाई के दौरान हुआ विवाद
जिस मामले की सुनवाई के लिए आरोपियों को अदालत में बुलाया गया था, उसकी शुरुआत वर्ष 2018 में हुई एक अंतर-धार्मिक शादी से जुड़े विवाद के बाद हुई थी।
उस समय एक समूह द्वारा कथित तौर पर इस शादी को लेकर ‘लव जिहाद’ का आरोप लगाया गया था। इसके विरोध में लोगों के एक समूह ने सिलीगुड़ी के बागहाजतिन पार्क से हिल कार्ट रोड स्थित सिलीगुड़ी सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के कार्यालय तक मार्च निकाला था।
मार्च के दौरान एक ज्ञापन सौंपे जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद पुलिस ने मामले में 24 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया।
मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ती रही। कुछ आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी, जबकि कुछ के खिलाफ वारंट जारी किए गए थे। इसी क्रम में सभी 24 आरोपियों को अदालत में पेश होने के लिए बुलाया गया था।
यही पेशी आगे चलकर कोर्टरूम के अंदर हुए कथित नारेबाजी विवाद का कारण बनी।
हाजिरी के समय क्या हुआ?
रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत में उस समय आरोपियों की हाजिरी लगाई जा रही थी। नाम पुकारे जाने के दौरान आरोपी कोर्टरूम में खड़े थे।
इसी प्रक्रिया के बीच एक आरोपी की ओर से कथित तौर पर ‘जय श्री राम’ का नारा लगाए जाने की बात सामने आई।
आरोप यह भी है कि आरोपी ने नारा लगाने से पहले महिला ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की ओर देखा और उन्हें हिजाब में देखकर यह नारा लगाया।
यदि यह घटनाक्रम इसी तरह हुआ था, तो यह अदालत की कार्यवाही के दौरान धार्मिक पहचान को लेकर टिप्पणी या नारेबाजी का मामला बनता है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में आरोपी की ओर से नारे के पीछे किसी विशेष उद्देश्य की पुष्टि नहीं हुई है।
घटना के बाद कोर्टरूम में स्थिति असहज हो गई और इस पर चर्चा शुरू हो गई।
आरोपी के वकील ने तुरंत मांगी माफी
आरोपी की ओर से अदालत में पेश अधिवक्ता त्रिदीप साहा ने घटना के बाद तुरंत माफी मांग ली।
उन्होंने अदालत को बताया कि नारा जज को संबोधित करके नहीं लगाया गया था। वकील ने इसे अनजाने में हुई घटना बताते हुए कहा कि कई लोग धार्मिक अभिवादन के तौर पर ‘जय श्री राम’ या ‘राधे-राधे’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
उनके अनुसार, जब आरोपियों के नाम पुकारे जा रहे थे, तभी संबंधित आरोपी ने बिना सोचे-समझे ये शब्द कह दिए।
साहा के मुताबिक, जैसे ही कानूनी टीम को महसूस हुआ कि कोर्टरूम के माहौल में इस शब्द का अलग अर्थ निकाला जा सकता है, उन्होंने तत्काल माफी मांग ली।
यह पक्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कथित नारे के पीछे आरोपी की मंशा को लेकर अलग-अलग व्याख्या सामने आ रही है। एक ओर आरोप है कि उसने मजिस्ट्रेट को देखकर नारा लगाया, वहीं बचाव पक्ष का कहना है कि नारा न्यायाधीश के लिए नहीं था।
कोर्टरूम में धार्मिक नारों को लेकर सवाल
इस घटना ने एक व्यापक सवाल भी खड़ा किया है कि अदालत के अंदर धार्मिक या राजनीतिक नारों के लिए कितनी जगह होनी चाहिए।
कोर्टरूम सामान्य सार्वजनिक सभा की तरह नहीं होता। वहां न्यायिक कार्यवाही निर्धारित नियमों और अनुशासन के तहत चलती है। न्यायाधीश, वकील, आरोपी, गवाह और अन्य पक्षकार सभी से न्यायालय की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।
इसी वजह से कानूनी क्षेत्र से जुड़े लोगों ने कहा कि किसी भी धर्म या राजनीतिक विचारधारा से संबंधित नारेबाजी को न्यायिक कार्यवाही से अलग रखा जाना चाहिए।
इस विवाद में भी यही सवाल प्रमुखता से सामने आया है कि अदालत में किसी धार्मिक नारे का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया गया और उसका न्यायिक कार्यवाही पर क्या प्रभाव पड़ा।
सिलीगुड़ी बार एसोसिएशन ने जताई आपत्ति
घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए सिलीगुड़ी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष उदय शंकर मालाकार ने इसे अनुचित बताया।
उनका कहना था कि कोर्टरूम के भीतर इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है। उनके अनुसार, अदालत की कार्यवाही के दौरान अनुशासन और गरिमा बनाए रखना आवश्यक है।
मालाकार ने यह भी कहा कि यदि अदालत उचित समझती तो मामले में स्वयं संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू कर सकती थी।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कोर्टरूम की अवमानना या अनुशासन से संबंधित मामलों में न्यायालय के पास परिस्थितियों के अनुसार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने के विकल्प होते हैं।
हालांकि, इस विशेष मामले में अदालत ने किस प्रकार की आगे की कार्रवाई की या नहीं की, यह अलग प्रश्न है और उसे अदालत के रिकॉर्ड के आधार पर ही निश्चित रूप से कहा जा सकता है।
ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन की भी प्रतिक्रिया
ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन के दार्जिलिंग जिला सचिव दिवाकर रॉय ने भी घटना को लेकर न्यायालय की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने पर जोर दिया।
उनका कहना था कि कोर्टरूम न्याय पाने की जगह है और इसे धार्मिक तथा राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाना चाहिए।
रॉय के अनुसार, किसी भी परिस्थिति में अदालत के अंदर धार्मिक या राजनीतिक नारे नहीं लगाए जाने चाहिए।
उनकी टिप्पणी का आधार यह है कि न्यायालय में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह अपेक्षा करता है कि मामले की सुनवाई उसके धर्म, जाति, राजनीतिक विचार या व्यक्तिगत पहचान से अलग होकर कानून के आधार पर होगी।
इसलिए कोर्टरूम में ऐसा कोई व्यवहार जो किसी धार्मिक या राजनीतिक पहचान को केंद्र में लाता हुआ दिखाई दे, न्यायिक वातावरण को प्रभावित कर सकता है।
2018 के विवाद की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण
वर्तमान घटना को समझने के लिए उस पुराने मामले की पृष्ठभूमि को देखना भी जरूरी है।
वर्ष 2018 में एक अंतर-धार्मिक विवाह को लेकर विवाद हुआ था। कथित तौर पर कुछ लोगों ने इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़ते हुए विरोध किया था।
इसके बाद एक समूह द्वारा मार्च निकाले जाने और प्रशासन को ज्ञापन दिए जाने की बात सामने आई। पुलिस ने इसी घटनाक्रम के संबंध में 24 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
कई वर्षों बाद जब इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया के तहत आरोपियों को अदालत में पेश होने के लिए बुलाया गया, तब यह नया विवाद सामने आया।
यानी वर्तमान घटना का संदर्भ सीधे उस पुराने मामले की सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। हालांकि, कथित नारे की मंशा और पुराने मामले के बीच कोई सीधा संबंध था या नहीं, इसका निर्धारण उपलब्ध जानकारी से नहीं किया जा सकता।
‘जय श्री राम’ का इस्तेमाल और विवाद
‘जय श्री राम’ भारत में धार्मिक अभिवादन और धार्मिक नारे के रूप में अलग-अलग संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है। किसी व्यक्ति द्वारा इसे सामान्य अभिवादन के रूप में बोलना और किसी विशेष व्यक्ति या परिस्थिति को लक्ष्य बनाकर नारा लगाना—दोनों के संदर्भ अलग हो सकते हैं।
इसी वजह से इस मामले में भी आरोपी के वकील ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि आरोपी का उद्देश्य महिला मजिस्ट्रेट को संबोधित करना नहीं था।
दूसरी ओर, घटना से जुड़े आरोप में यह कहा गया है कि आरोपी ने मजिस्ट्रेट को हिजाब पहने हुए देखकर नारा लगाया।
इन दोनों बातों के बीच वास्तविक तथ्य क्या था, यह केवल प्रत्यक्षदर्शी विवरण, अदालत की कार्यवाही के रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के बयानों से ही स्पष्ट हो सकता है।
अदालत की गरिमा क्यों महत्वपूर्ण है?
न्यायालय केवल फैसला सुनाने वाली जगह नहीं है। यह वह संस्थागत स्थान है जहां दो पक्ष अपने विवाद को कानून के सामने रखते हैं और न्यायाधीश उपलब्ध साक्ष्यों तथा कानून के आधार पर निर्णय देते हैं।
ऐसे वातावरण में न्यायाधीश को किसी धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक दबाव से स्वतंत्र होकर कार्य करने की आवश्यकता होती है।
इसी कारण कोर्टरूम में अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता है।
अदालत में जोर से नारे लगाना, न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालना या न्यायाधीश के प्रति अनुचित व्यवहार करना केवल सामान्य शिष्टाचार का मामला नहीं रह जाता। परिस्थितियों के आधार पर यह न्यायालय की कार्यवाही और उसकी गरिमा से जुड़ा कानूनी मुद्दा बन सकता है।
क्या आरोपी पर कार्रवाई होगी?
इस घटना के बाद यह सवाल भी उठ सकता है कि आरोपी के खिलाफ कोई अलग कानूनी कार्रवाई की जाएगी या नहीं।
इसका उत्तर अदालत के आगे के आदेश और उपलब्ध रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा। केवल किसी रिपोर्ट में घटना का उल्लेख होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी के खिलाफ कोई विशेष अपराध सिद्ध हो गया है।
यदि अदालत घटना को न्यायिक कार्यवाही में अनुशासन भंग या अवमानना के संदर्भ में देखती है तो कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
लेकिन फिलहाल उपलब्ध जानकारी में आरोपी की ओर से तत्काल माफी मांगे जाने की बात प्रमुख रूप से सामने आई है।
इसलिए घटना के तथ्य और उसके संभावित कानूनी परिणामों के बीच अंतर करना जरूरी है।
धार्मिक पहचान को लेकर संवेदनशीलता
इस मामले का एक संवेदनशील पहलू महिला मजिस्ट्रेट का हिजाब पहनना भी है।
किसी न्यायिक अधिकारी की धार्मिक पहचान या पहनावे को देखकर कोर्टरूम में प्रतिक्रिया देना एक संवेदनशील विषय हो सकता है। न्यायाधीश की व्यक्तिगत पहचान से अलग उनका संवैधानिक और न्यायिक पद महत्वपूर्ण होता है।
अदालत में उपस्थित लोगों से अपेक्षा रहती है कि वे न्यायिक अधिकारी के पद और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें।
इस घटना में कथित तौर पर नारा लगाने के कारण हिजाब और धार्मिक पहचान का पहलू चर्चा में आ गया। हालांकि, किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान को लेकर निष्कर्ष निकालने के बजाय घटना के वास्तविक तथ्य और न्यायिक प्रक्रिया पर ध्यान देना अधिक उचित होगा।
वकील की तत्काल माफी का महत्व
आरोपी के वकील द्वारा तुरंत बिना शर्त माफी मांगना इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वकील ने यह भी कहा कि आरोपी की ओर से नारा किसी विशेष व्यक्ति को लक्ष्य करके नहीं लगाया गया था। इस स्पष्टीकरण के साथ माफी मांगी गई।
कोर्टरूम में यदि कोई ऐसी बात हो जाती है जिससे न्यायिक कार्यवाही या अदालत की गरिमा प्रभावित होती दिखाई दे, तो तत्काल स्पष्टीकरण और माफी स्थिति को संभालने का एक तरीका हो सकता है।
हालांकि, माफी का कानूनी प्रभाव क्या होगा, यह संबंधित न्यायालय और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
कोर्टरूम को विवादों से दूर रखने की जरूरत
सिलीगुड़ी की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि अदालतों में धार्मिक और राजनीतिक भावनाओं को न्यायिक कार्यवाही से अलग रखना क्यों जरूरी है।
भारत जैसे विविधता वाले देश में अलग-अलग धर्मों और विचारों से जुड़े लोग अदालतों में आते हैं। न्यायालय का काम किसी धार्मिक या राजनीतिक पहचान के आधार पर निर्णय देना नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्याय करना है।
इसलिए कोर्टरूम में मौजूद हर व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी गतिविधि से बचे जिससे न्यायिक वातावरण प्रभावित हो।
यह बात केवल किसी एक धर्म या किसी एक नारे तक सीमित नहीं है। यही सिद्धांत किसी भी धार्मिक या राजनीतिक नारे पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
घटना से क्या संदेश निकलता है?
सिलीगुड़ी सब-डिविजनल कोर्ट की यह घटना फिलहाल एक आरोप और उसके जवाब के रूप में सामने आई है। एक तरफ आरोप है कि आरोपी ने महिला मजिस्ट्रेट को हिजाब में देखकर ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया। दूसरी तरफ उसके वकील ने कहा है कि नारा जज के लिए नहीं था और यह अनजाने में कहा गया।
इन दोनों पक्षों के बीच वास्तविक स्थिति का अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड और आगे की कार्यवाही से ही होगा।
लेकिन घटना ने कोर्टरूम की मर्यादा को लेकर एक स्पष्ट बहस जरूर शुरू कर दी है।
अदालत में मौजूद हर व्यक्ति के लिए न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान आवश्यक है। धार्मिक आस्था किसी व्यक्ति की निजी या सामाजिक पहचान का हिस्सा हो सकती है, लेकिन अदालत की कार्यवाही में कानून, निष्पक्षता और अनुशासन को प्राथमिक स्थान दिया जाता है।
सिलीगुड़ी की इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि कोर्टरूम किसी धार्मिक या राजनीतिक टकराव का मंच नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का स्थान है। वहां किसी भी पक्ष की धार्मिक पहचान से ऊपर न्यायालय की गरिमा और कानून का शासन रहता है।
आगे इस घटना पर अदालत क्या रुख अपनाती है और क्या कोई औपचारिक कार्रवाई होती है, यह उसके आदेशों से स्पष्ट होगा। फिलहाल आरोपी की ओर से माफी और घटना की कानूनी बिरादरी द्वारा आलोचना, दोनों इस मामले के प्रमुख पहलू हैं।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।