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सिर्फ बॉडी शेमिंग करना IPC की धारा 509 के तहत महिला की मर्यादा भंग का अपराध नहीं : कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट का अहम फैसला: सिर्फ बॉडी शेमिंग करना IPC की धारा 509 के तहत महिला की मर्यादा भंग का अपराध नहीं

        किसी महिला के शारीरिक रूप-रंग, वजन या शरीर की बनावट को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करना निश्चित रूप से सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर गंभीर अनुभव हो सकता है। लेकिन हर अपमानजनक टिप्पणी अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 509 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने का आपराधिक अपराध नहीं बन जाती। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले में इसी कानूनी पहलू को स्पष्ट करते हुए दो महिलाओं के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत, FIR, चार्जशीट और गवाहों के बयानों को देखने के बाद ऐसा नहीं पाया गया कि IPC की धारा 509 के तहत अपराध के लिए आवश्यक प्रारंभिक तत्व (Prima Facie Ingredients) रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। अदालत ने विशेष रूप से यह माना कि केवल शिकायतकर्ता की बॉडी शेमिंग (Body Shaming) करने या उसके शारीरिक रूप-रंग को लेकर अपमानित करने के आरोप से धारा 509 का अपराध स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।

यह फैसला जस्टिस एस.आर. कृष्ण कुमार की सिंगल जज बेंच ने दिया। अदालत ने मामले में Doctrine of Parity यानी समानता के सिद्धांत को भी महत्वपूर्ण माना, क्योंकि इसी घटना से जुड़े एक सह-आरोपी युवक के खिलाफ पहले ही हाईकोर्ट आपराधिक कार्यवाही रद्द कर चुका था।

क्या था पूरा मामला?

मामला वर्ष 2023 की एक कथित घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने पुलिस के सामने आरोप लगाया था कि सार्वजनिक स्थान पर तीन अज्ञात लोगों ने उसके और उसकी सहेली के साथ अभद्र व्यवहार किया। इन तीन लोगों में दो महिलाएं और एक पुरुष शामिल बताए गए।

शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने दोनों महिलाओं के साथ अपशब्दों का इस्तेमाल किया। कथित तौर पर उनके शरीर और मोटापे को लेकर मजाक उड़ाया गया तथा उनकी शारीरिक बनावट पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपियों ने नस्लभेदी टिप्पणियां और अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया।

शिकायत में यह भी कहा गया कि कथित घटना के समय आरोपी शराब के नशे में थे और उन्होंने शिकायतकर्ता के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिस से संपर्क किया। 9 अगस्त 2023 को सदाशिवनगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई। पुलिस ने मामले में दो महिलाओं और एक पुरुष के खिलाफ IPC की धारा 509 के तहत FIR दर्ज की।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में चार्जशीट भी दाखिल कर दी। इस तरह मामला ट्रायल कोर्ट के सामने पहुंच गया।

आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

मामले में आरोपी बनाए गए युवक ने सबसे पहले हाईकोर्ट का रुख किया था। उसने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी।

वर्ष 2024 में हाईकोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली और उसके खिलाफ धारा 509 के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

इसके बाद इसी घटना में आरोपी बनाई गई दोनों महिलाओं ने भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप उसी घटना से संबंधित हैं और सह-आरोपी युवक के मामले में हाईकोर्ट पहले ही राहत दे चुका है।

महिलाओं की ओर से यह तर्क रखा गया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं है जिससे IPC की धारा 509 के तहत अपराध के आवश्यक तत्व पूरे होते हों।

IPC की धारा 509 में क्या प्रावधान था?

भारतीय दंड संहिता की धारा 509 का उद्देश्य महिला की मर्यादा (Modesty) का अपमान करने वाले कुछ विशेष प्रकार के कृत्यों को दंडित करना था।

इस प्रावधान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की मर्यादा का अपमान करने के इरादे से कोई शब्द कहता है, कोई आवाज या इशारा करता है अथवा कोई वस्तु दिखाता है, और उसका उद्देश्य यह हो कि वह शब्द या आवाज महिला द्वारा सुनी जाए या वह इशारा अथवा वस्तु महिला द्वारा देखी जाए, तो यह अपराध हो सकता है।

इसके अलावा किसी महिला की निजता (Privacy) में दखल देना भी इस धारा के दायरे में आता था।

इसलिए धारा 509 को लागू करने के लिए केवल यह साबित करना पर्याप्त नहीं है कि महिला के साथ कोई अप्रिय या अपमानजनक व्यवहार हुआ। अभियोजन को यह भी दिखाना आवश्यक है कि कथित कृत्य में धारा 509 के तहत निर्धारित कानूनी तत्व मौजूद हैं।

यही अंतर इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

सिर्फ बॉडी शेमिंग से धारा 509 का अपराध क्यों नहीं बना?

हाईकोर्ट ने शिकायत, FIR, चार्जशीट और गवाहों के बयानों को समग्र रूप से देखा। अदालत के सामने सवाल यह था कि क्या इन दस्तावेजों में ऐसे तथ्य मौजूद हैं, जिनसे प्रथम दृष्टया IPC की धारा 509 के तहत अपराध बनता है।

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में शिकायतकर्ता की बॉडी शेमिंग करने और उसके शारीरिक रूप-रंग को लेकर अपमानित करने के आरोप जरूर हैं, लेकिन केवल इन आरोपों के आधार पर धारा 509 के तहत आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते।

अदालत की टिप्पणी का मूल अर्थ यही था कि किसी व्यक्ति की शारीरिक बनावट या वजन का मजाक उड़ाना अपने आप में IPC की धारा 509 के तहत अपराध साबित नहीं करता। इसके लिए उस धारा में निर्धारित अन्य कानूनी आवश्यकताओं का पूरा होना भी जरूरी है।

यहां अदालत ने Prima Facie Ingredients पर जोर दिया। आपराधिक कानून में इसका मतलब यह है कि उपलब्ध सामग्री को पहली नजर में देखने पर अपराध के आवश्यक तत्व दिखाई देने चाहिए। यदि आरोपों को सही मान लेने के बावजूद किसी विशेष अपराध की कानूनी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो केवल आरोप के आधार पर आपराधिक मुकदमा आगे बढ़ाना उचित नहीं माना जाता।

अदालत ने कहा- आरोप और अपराध के कानूनी तत्व अलग-अलग हैं

इस मामले में शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों को अदालत ने नजरअंदाज नहीं किया। रिकॉर्ड में कथित गाली-गलौज, शरीर को लेकर टिप्पणियां और अन्य अपमानजनक व्यवहार का उल्लेख था।

लेकिन हाईकोर्ट ने यह जांच की कि क्या इन आरोपों से IPC Section 509 के तहत निर्धारित अपराध बनता है।

यही आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। किसी व्यक्ति का व्यवहार सामाजिक रूप से अनुचित या अपमानजनक हो सकता है, लेकिन आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि उस व्यवहार के लिए कानून में निर्धारित अपराध के सभी आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं।

अदालत का फैसला इसी कानूनी कसौटी पर आधारित रहा।

Doctrine of Parity भी बना अहम आधार

इस मामले में अदालत ने केवल धारा 509 के कानूनी तत्वों की जांच ही नहीं की, बल्कि Doctrine of Parity को भी लागू किया।

Doctrine of Parity का सामान्य अर्थ है कि समान परिस्थितियों वाले सह-आरोपियों के साथ समान कानूनी दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जब तक उनके मामलों में कोई महत्वपूर्ण अंतर मौजूद न हो।

यहां इसी घटना से जुड़े एक पुरुष सह-आरोपी को वर्ष 2024 में हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी थी।

अब जब दोनों महिला आरोपियों की याचिका अदालत के सामने आई तो हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की तुलना की। अदालत ने पाया कि इन दोनों महिलाओं पर लगाए गए आरोप उसी घटना से संबंधित थे और सह-आरोपी युवक के खिलाफ लगाए गए आरोपों से “बिल्कुल एक जैसे, मिलते-जुलते और समान” थे।

ऐसी स्थिति में यदि पहले ही समान आरोपों वाले सह-आरोपी को राहत मिल चुकी है और वर्तमान आरोपियों के मामले में कोई अलग या अतिरिक्त आपराधिक तत्व नहीं दिखाई देता, तो समानता के सिद्धांत को लागू करना उचित माना गया।

कोर्ट ने शिकायत और FIR का भी किया परीक्षण

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद शिकायत, FIR और चार्जशीट की सामग्री के साथ-साथ शिकायतकर्ता तथा अन्य गवाहों के बयानों को भी देखा।

अदालत ने कहा कि इन दस्तावेजों को देखने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि IPC की धारा 509 के तहत अपराध के लिए आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं।

अदालत के अनुसार, केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ताओं और एक अन्य आरोपी पर शिकायतकर्ता की बॉडी शेमिंग करने तथा उसके शारीरिक रूप-रंग को लेकर उसे अपमानित करने का आरोप लगाया गया है, यह नहीं कहा जा सकता कि रिकॉर्ड पर धारा 509 के तहत दंडनीय अपराध स्थापित होता है।

इस प्रकार अदालत ने आरोपों की गंभीरता के बजाय यह देखा कि क्या आरोप कानून की निर्धारित सीमा के भीतर किसी विशिष्ट अपराध का गठन करते हैं।

आपराधिक मुकदमे में कानूनी तत्वों का महत्व

यह फैसला एक व्यापक कानूनी सिद्धांत को भी सामने रखता है। आपराधिक कानून में किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने या उसे ट्रायल का सामना करने के लिए आरोपों का होना ही पर्याप्त नहीं होता।

जिस अपराध की धारा लगाई गई है, उसके आवश्यक तत्वों का प्रथम दृष्टया मौजूद होना जरूरी है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी विशेष धारा में किसी कृत्य के साथ विशेष इरादा (Intent), उद्देश्य या परिस्थिति आवश्यक है, तो अभियोजन की सामग्री में उसका आधार दिखाई देना चाहिए।

धारा 509 के संदर्भ में भी कानून केवल किसी सामान्य अपमान को दंडित करने की बात नहीं करता था। इसमें महिला की मर्यादा के अपमान के इरादे से शब्द, आवाज, इशारे, वस्तु दिखाने अथवा निजता में दखल जैसे विशिष्ट कृत्यों को शामिल किया गया था।

इसलिए अदालत ने आरोपों को उसी कानूनी कसौटी पर परखा।

बॉडी शेमिंग और आपराधिक कानून के बीच अंतर

आज के समय में बॉडी शेमिंग एक महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या बन चुकी है। किसी व्यक्ति के वजन, रंग, शरीर की बनावट या शारीरिक विशेषताओं को लेकर बार-बार अपमानित करना उसके लिए गंभीर मानसिक और सामाजिक परेशानी का कारण बन सकता है।

हालांकि किसी व्यवहार का सामाजिक रूप से गलत या आपत्तिजनक होना और किसी विशेष आपराधिक धारा के तहत अपराध बनना दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को इसी संदर्भ में समझना जरूरी है। अदालत ने यह नहीं कहा कि किसी महिला के शरीर या रूप-रंग को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करना उचित है। अदालत ने केवल यह जांच की कि दिए गए तथ्यों के आधार पर IPC की धारा 509 के तहत आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्व पूरे होते हैं या नहीं।

यह अंतर कानून की प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

दोनों महिला आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही रद्द

अंततः हाईकोर्ट ने आपराधिक याचिका स्वीकार करते हुए दोनों महिला आरोपियों के खिलाफ संबंधित अदालत में चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

अदालत ने एक ओर पाया कि शिकायत, FIR, चार्जशीट और गवाहों के बयानों से IPC की धारा 509 के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होते। दूसरी ओर, इसी घटना के एक सह-आरोपी को पहले ही समान आरोपों के आधार पर राहत मिल चुकी थी।

इन दोनों परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने Doctrine of Parity लागू करना उचित माना।

फैसले का कानूनी महत्व

कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मुकदमे में आरोपों की भाषा और लगाए गए अपराध की कानूनी आवश्यकताओं के बीच सीधा संबंध होना चाहिए।

किसी व्यक्ति पर अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि IPC की हर संबंधित धारा लागू हो जाएगी। अदालत को यह देखना होता है कि जिस अपराध के लिए FIR और चार्जशीट दाखिल की गई है, उसके प्रत्येक आवश्यक तत्व का प्रथम दृष्टया आधार रिकॉर्ड पर मौजूद है या नहीं।

इस मामले में हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए बॉडी शेमिंग और मौखिक दुर्व्यवहार के आरोपों को धारा 509 के कानूनी परीक्षण के संदर्भ में देखा। अदालत को उस धारा के तहत आवश्यक प्रारंभिक तत्व नहीं मिले।

साथ ही, समान घटना में समान आरोपों वाले सह-आरोपी को पहले मिल चुकी राहत को देखते हुए समानता के सिद्धांत को भी लागू किया गया।

इस प्रकार फैसला केवल बॉडी शेमिंग के आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए आरोपों और लागू की गई दंडात्मक धारा के बीच आवश्यक कानूनी संबंध स्थापित होना चाहिए।

यही वजह है कि हाईकोर्ट ने दोनों महिला आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 509 के तहत लंबित आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।