महिला वकील का नाम ‘गुंडा सूची’ में डालना दुर्भावनापूर्ण नहीं: जिला अदालत ने पलटा SDM कोर्ट का फैसला, 2 लाख रुपये का हर्जाना रद्द
किसी व्यक्ति के खिलाफ पुलिस द्वारा की गई निवारक कार्रवाई (Preventive Action) बाद में न्यायालय द्वारा निरस्त कर दी जाए तो क्या इससे यह मान लिया जाए कि पुलिस अधिकारियों ने कार्रवाई दुर्भावना (Malafide) से की थी? भोपाल जिला अदालत के सामने ऐसा ही एक महत्वपूर्ण सवाल आया, जब एक महिला अधिवक्ता का नाम पुलिस की ‘गुंडा सूची’ में दर्ज किए जाने और उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई किए जाने के मामले में दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति का विवाद सामने आया।
जिला अदालत ने निचली अदालत के उस फैसले को निरस्त कर दिया है, जिसमें तत्कालीन पुलिस अधिकारियों को महिला अधिवक्ता वीणा गौतम को दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया गया था। न्यायाधीश अजय पेंदाम की अदालत ने माना कि केवल इसलिए पुलिस कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाद में एसडीएम न्यायालय ने निवारक कार्रवाई से संबंधित प्रकरण को निरस्त कर दिया था।
अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद आपराधिक मामलों को भी महत्वपूर्ण माना। पुलिस के अनुसार, महिला अधिवक्ता के खिलाफ पहले से तीन आपराधिक मामले दर्ज थे और इन्हीं रिकॉर्ड के आधार पर उनका नाम गुंडा सूची में दर्ज कर निवारक कार्रवाई के लिए मामला एसडीएम न्यायालय भेजा गया था।
हालांकि एसडीएम न्यायालय ने बाद में उन्हें आदतन अपराधी नहीं माना और प्रकरण को निरस्त कर दिया था। इसी के बाद क्षतिपूर्ति का दावा सामने आया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला भोपाल जिला बार एसोसिएशन के वर्ष 2019-21 के चुनाव के समय की पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। वरिष्ठ महिला अधिवक्ता वीणा गौतम ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन थाना प्रभारी और एक उप निरीक्षक ने उनके खिलाफ द्वेषवश कार्रवाई की और झूठा इस्तगासा तैयार किया।
पुलिस ने 22 सितंबर 2020 को उनका नाम थाने की गुंडा सूची में क्रमांक 721 पर दर्ज किया था। इसके बाद उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई के लिए प्रकरण एसडीएम नजूल न्यायालय भेजा गया।
महिला अधिवक्ता की ओर से पुलिस की इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई गई। उनका आरोप था कि उनके खिलाफ कार्रवाई किसी वास्तविक आपराधिक गतिविधि के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत द्वेष के कारण की गई थी।
बाद में मामला एसडीएम न्यायालय के सामने पहुंचा, जहां इस निवारक कार्रवाई की न्यायिक जांच हुई।
एसडीएम न्यायालय ने क्यों निरस्त किया था प्रकरण?
एसडीएम न्यायालय ने 3 दिसंबर 2021 को संबंधित प्रकरण को निरस्त कर दिया था। अदालत ने महिला अधिवक्ता को आदतन अपराधी नहीं माना और उनके खिलाफ चलाए जा रहे निवारक प्रकरण को आगे बढ़ाने योग्य नहीं पाया।
यहीं से मामले ने एक नया मोड़ लिया।
महिला अधिवक्ता ने यह आरोप लगाया कि पुलिस की कार्रवाई के कारण उनकी सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। उनका कहना था कि पुलिस द्वारा उनका नाम गुंडा सूची में डालने और उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई शुरू करने से उनकी छवि प्रभावित हुई।
इसके बाद उन्होंने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति (Compensation) की मांग करते हुए सिविल दावा दायर किया।
निचली अदालत ने उनके दावे को स्वीकार कर लिया और तत्कालीन पुलिस अधिकारियों पर दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी तय कर दी।
इस फैसले से असंतुष्ट पुलिस अधिकारियों ने जिला अदालत में अपील दायर की।
जिला अदालत में क्या था पुलिस का पक्ष?
पुलिस अधिकारियों की ओर से जिला अदालत के सामने मुख्य रूप से यह तर्क रखा गया कि उन्होंने किसी निजी द्वेष या दुर्भावना से कार्रवाई नहीं की थी।
उनका कहना था कि महिला अधिवक्ता के खिलाफ पुलिस रिकॉर्ड में पहले से आपराधिक मामले दर्ज थे। इन्हीं मामलों को देखते हुए पुलिस ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निवारक कार्रवाई की थी।
पुलिस के अनुसार, किसी व्यक्ति के खिलाफ निवारक कार्रवाई का उद्देश्य उसे किसी अपराध में दोषी ठहराना नहीं बल्कि संभावित आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाना होता है।
इसलिए बाद में एसडीएम न्यायालय द्वारा प्रकरण को निरस्त कर दिए जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस अधिकारियों ने शुरुआत में ही दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से कार्रवाई की थी।
जिला अदालत को इसी तर्क पर विचार करना था कि क्या पुलिस की कार्रवाई को केवल बाद के न्यायिक परिणाम के आधार पर Malafide घोषित किया जा सकता है।
तीन आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड बना महत्वपूर्ण आधार
जिला अदालत के सामने यह तथ्य विशेष रूप से रखा गया कि महिला अधिवक्ता के खिलाफ ऐशबाग थाने में तीन आपराधिक मामले दर्ज थे।
पुलिस ने इन्हीं मामलों के रिकॉर्ड को निवारक कार्रवाई का आधार बताया था।
अदालत ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि पुलिस के पास महिला अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक प्रकरणों का रिकॉर्ड मौजूद था। ऐसे में पुलिस अधिकारियों द्वारा उन रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई करना पूरी तरह आधारहीन नहीं माना जा सकता।
हालांकि बाद में एसडीएम न्यायालय ने महिला अधिवक्ता को आदतन अपराधी नहीं माना और निवारक प्रकरण निरस्त कर दिया, लेकिन जिला अदालत के सामने सवाल यह था कि क्या उस बाद के फैसले से पुलिस अधिकारियों की शुरुआती मंशा भी दुर्भावनापूर्ण साबित हो जाती है?
अदालत ने इसका जवाब नकारात्मक रूप में दिया।
बाद में केस निरस्त होना और पुलिस की मंशा अलग-अलग प्रश्न
जिला अदालत के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि किसी प्रशासनिक या पुलिस कार्रवाई का बाद में न्यायालय द्वारा निरस्त किया जाना अपने आप में उस कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण नहीं बना देता।
अदालत ने मूल रूप से यह अंतर स्पष्ट किया कि किसी कार्रवाई का कानून की कसौटी पर टिक न पाना और उस कार्रवाई का जानबूझकर दुर्भावना से किया जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
किसी पुलिस अधिकारी ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई की हो और बाद में सक्षम न्यायालय यह मान ले कि उस कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं था, तो इससे स्वतः यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अधिकारी ने व्यक्तिगत बदले या दुर्भावना के कारण कार्रवाई की थी।
दुर्भावना साबित करने के लिए परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड से ऐसा आधार सामने आना जरूरी है जिससे अधिकारी की गलत मंशा स्थापित हो।
इस मामले में जिला अदालत को ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला।
‘गुंडा सूची’ में नाम दर्ज होने का विवाद
मामले का एक संवेदनशील पहलू महिला अधिवक्ता का नाम पुलिस की ‘गुंडा सूची’ में दर्ज किया जाना था।
ऐसी सूची में नाम दर्ज होने का किसी व्यक्ति की सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है। विशेष रूप से यदि संबंधित व्यक्ति किसी पेशे में प्रतिष्ठित हो तो ऐसी कार्रवाई को लेकर विवाद और गंभीर हो सकता है।
वीणा गौतम की ओर से भी यही आरोप लगाया गया था कि पुलिस कार्रवाई से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
लेकिन जिला अदालत ने इस विवाद को केवल प्रतिष्ठा पर पड़े कथित प्रभाव के आधार पर तय नहीं किया। अदालत ने यह देखा कि पुलिस के पास कार्रवाई करने के लिए उस समय क्या सामग्री और रिकॉर्ड उपलब्ध था।
रिकॉर्ड में तीन आपराधिक मामलों का उल्लेख होने के कारण अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को पूरी तरह आधारहीन नहीं माना।
निवारक कार्रवाई का उद्देश्य क्या होता है?
निवारक कार्रवाई (Preventive Action) सामान्य आपराधिक मुकदमे से कुछ अलग होती है। सामान्य आपराधिक मुकदमे में किसी व्यक्ति पर अपराध करने का आरोप लगाया जाता है और अभियोजन को अपराध साबित करना होता है।
वहीं निवारक कानून व्यवस्था का उद्देश्य संभावित अपराध या शांति भंग जैसी स्थिति को रोकना होता है। ऐसी कार्रवाई में प्रशासन उपलब्ध परिस्थितियों और रिकॉर्ड के आधार पर यह आकलन कर सकता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ निवारक कदम उठाने की आवश्यकता है या नहीं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि निवारक कार्रवाई न्यायिक समीक्षा से बाहर है।
यदि संबंधित न्यायालय को लगता है कि निवारक कार्रवाई के लिए आवश्यक आधार मौजूद नहीं हैं, तो वह प्रकरण को निरस्त कर सकता है।
इस मामले में एसडीएम न्यायालय ने यही किया। लेकिन जिला अदालत के अनुसार, उस फैसले का अर्थ यह नहीं था कि कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारियों की मंशा भी दुर्भावनापूर्ण थी।
निचली अदालत के फैसले में क्या हुआ था?
एसडीएम न्यायालय द्वारा निवारक प्रकरण निरस्त किए जाने के बाद महिला अधिवक्ता ने पुलिस कार्रवाई के खिलाफ सिविल दावा दायर किया था।
उनकी ओर से यह दावा किया गया कि पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई के कारण उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और उन्हें क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए।
निचली अदालत ने उनके दावे को स्वीकार किया और तत्कालीन पुलिस अधिकारियों पर दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति निर्धारित कर दी।
इस फैसले का आधार यह था कि पुलिस कार्रवाई उचित नहीं थी और इससे महिला अधिवक्ता को नुकसान हुआ।
पुलिस अधिकारियों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए जिला अदालत में अपील की।
जिला अदालत ने निचली अदालत का फैसला क्यों पलटा?
जिला अदालत ने रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद माना कि निचली अदालत द्वारा पुलिस अधिकारियों पर क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं था।
अदालत के सामने मौजूद रिकॉर्ड से यह स्पष्ट था कि पुलिस के पास महिला अधिवक्ता के खिलाफ पहले से तीन आपराधिक मामलों की जानकारी थी। इन्हीं रिकॉर्ड को देखते हुए पुलिस ने उनका नाम गुंडा सूची में दर्ज किया और निवारक कार्रवाई के लिए मामला एसडीएम न्यायालय भेजा।
बाद में एसडीएम न्यायालय ने प्रकरण को निरस्त किया, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पुलिस अधिकारियों ने कार्रवाई किसी निजी दुर्भावना से की थी।
इसलिए जिला अदालत ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया।
दो लाख रुपये का हर्जाना खत्म
जिला अदालत के फैसले का सीधा परिणाम यह हुआ कि पुलिस अधिकारियों पर लगाया गया दो लाख रुपये का क्षतिपूर्ति आदेश समाप्त हो गया।
अदालत ने माना कि उपलब्ध परिस्थितियों में पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई को केवल इसलिए दुर्भावनापूर्ण नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाद में एसडीएम न्यायालय ने निवारक प्रकरण को निरस्त कर दिया था।
इस तरह निचली अदालत से मिली क्षतिपूर्ति को जिला अदालत ने खत्म कर दिया और पुलिस अधिकारियों को अपील में राहत मिली।
फैसले से निकलने वाला कानूनी सिद्धांत
इस मामले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि किसी सरकारी अधिकारी की कार्रवाई को गलत, अवैध और दुर्भावनापूर्ण कहने के लिए केवल अंतिम परिणाम को आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत को यह देखना होता है कि कार्रवाई के समय अधिकारी के सामने कौन-सी सामग्री उपलब्ध थी और उसने किस आधार पर निर्णय लिया।
यदि अधिकारी के पास कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड आधारित आधार मौजूद था, तो बाद में सक्षम न्यायालय द्वारा उस कार्रवाई को निरस्त कर दिए जाने मात्र से अधिकारी की व्यक्तिगत दुर्भावना साबित नहीं हो जाती।
हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि पुलिस की हर कार्रवाई न्यायिक समीक्षा से सुरक्षित हो जाती है। यदि रिकॉर्ड से यह साबित हो कि किसी अधिकारी ने जानबूझकर कानून का दुरुपयोग किया, व्यक्तिगत द्वेष से कार्रवाई की या बिना किसी वैध आधार के किसी व्यक्ति को परेशान किया, तो परिस्थितियों के अनुसार न्यायिक उपचार उपलब्ध रह सकते हैं।
इस मामले में जिला अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं पाया।
महिला अधिवक्ता के मामले में महत्वपूर्ण अंतर
इस फैसले को समझते समय एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। जिला अदालत ने यह नहीं कहा कि महिला अधिवक्ता के खिलाफ एसडीएम न्यायालय की कार्रवाई गलत थी या उन्हें आदतन अपराधी माना जाना चाहिए था।
एसडीएम न्यायालय पहले ही संबंधित निवारक प्रकरण को निरस्त कर चुका था।
जिला अदालत के सामने मुख्य विवाद बाद की क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी का था। सवाल यह था कि क्या पुलिस अधिकारियों की शुरुआती कार्रवाई इतनी दुर्भावनापूर्ण थी कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देनी पड़े।
जिला अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इसका उत्तर नहीं में दिया।
पुलिस कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन
ऐसे मामले पुलिस शक्तियों और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होते हैं।
एक तरफ पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित अपराधों को रोकने के लिए निवारक शक्तियां दी जाती हैं। दूसरी तरफ किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता भी कानून द्वारा संरक्षित हित हैं।
इसलिए पुलिस द्वारा की गई निवारक कार्रवाई का न्यायिक परीक्षण होना आवश्यक है। लेकिन न्यायिक परीक्षण में यह भी देखा जाता है कि कार्रवाई करने वाले अधिकारी के पास उस समय क्या सामग्री थी और उसकी मंशा क्या थी।
भोपाल जिला अदालत का यह फैसला इसी अंतर को रेखांकित करता है।
निष्कर्ष
भोपाल में महिला अधिवक्ता वीणा गौतम का नाम गुंडा सूची में दर्ज करने और उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई के मामले में जिला अदालत ने निचली अदालत के दो लाख रुपये के क्षतिपूर्ति आदेश को निरस्त कर दिया है।
अदालत ने माना कि पुलिस अधिकारियों ने महिला अधिवक्ता के खिलाफ उपलब्ध आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई की थी। उनके खिलाफ ऐशबाग थाने में तीन आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड पुलिस के पास मौजूद था। बाद में एसडीएम न्यायालय द्वारा निवारक प्रकरण निरस्त किए जाने से पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई अपने आप दुर्भावनापूर्ण साबित नहीं हो जाती।
इस फैसले का मूल संदेश यही है कि किसी सरकारी कार्रवाई का बाद में निरस्त हो जाना और उस कार्रवाई को शुरू से ही दुर्भावना से किया गया साबित करना दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
जिला अदालत ने इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निचली अदालत का फैसला पलट दिया और पुलिस अधिकारियों पर लगाया गया दो लाख रुपये का हर्जाना समाप्त कर दिया।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।