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झारखंड हाईकोर्ट की सख्ती: UK की यूनिवर्सिटी में चयनित छात्र को 39.76 लाख की छात्रवृत्ति 5 अक्टूबर तक देने का आदेश,

झारखंड हाईकोर्ट की सख्ती: UK की यूनिवर्सिटी में चयनित छात्र को 39.76 लाख की छात्रवृत्ति 5 अक्टूबर तक देने का आदेश, अफसर को व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी

         विदेश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में दाखिला पाने के बाद भी यदि किसी मेधावी छात्र की पढ़ाई सिर्फ इसलिए खतरे में पड़ जाए क्योंकि स्वीकृत छात्रवृत्ति की रकम समय पर जारी नहीं की गई, तो यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन जाती है। झारखंड हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में राज्य के अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए छात्रवृत्ति की पूरी राशि तत्काल जारी करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने यूनाइटेड किंगडम (UK) की University of Southampton में दाखिले के लिए चयनित रांची के कांके निवासी मेधावी छात्र सनत झा के मामले में यह आदेश दिया। अदालत ने झारखंड स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक को निर्देश दिया कि छात्र को स्वीकृत 39,76,655.20 रुपये की पूरी छात्रवृत्ति राशि हर हाल में 5 अक्टूबर तक जारी की जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर राशि जारी नहीं की जाती है तो संबंधित कार्यकारी निदेशक को 6 अक्टूबर को अदालत में सशरीर उपस्थित होकर यह बताना होगा कि अदालत के आदेश के बावजूद छात्रवृत्ति का भुगतान क्यों नहीं किया गया।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छात्र को विश्वविद्यालय की फीस जमा करने के लिए पहले ही एक समय सीमा दी जा चुकी थी और छात्र के अनुरोध पर उसे बढ़ाकर 5 अक्टूबर किया गया था। ऐसे में छात्रवृत्ति का भुगतान समय पर नहीं होने से उसका विदेश स्थित विश्वविद्यालय में दाखिला प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई थी।

क्या है पूरा मामला?

रांची के कांके निवासी सनत झा ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। छात्र का चयन यूनाइटेड किंगडम स्थित University of Southampton के तीन वर्षीय B.Tech Software Engineering (Computer Science and Information Systems) पाठ्यक्रम में हुआ है।

विदेशी विश्वविद्यालय में दाखिला मिलना छात्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। लेकिन पढ़ाई की फीस और अन्य खर्चों के लिए राज्य सरकार की छात्रवृत्ति पर निर्भर छात्र के सामने उस समय मुश्किल खड़ी हो गई, जब स्वीकृति मिलने के बावजूद छात्रवृत्ति की रकम उसके खाते में नहीं पहुंची।

छात्र की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई।

याचिका पर सुनवाई के दौरान छात्र के अधिवक्ता ने अदालत को पूरे मामले की जानकारी दी और बताया कि छात्र ने राज्य सरकार की निर्धारित योजना के तहत समय पर छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था।

9 जुलाई 2024 के संकल्प के तहत किया था आवेदन

अदालत को बताया गया कि झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने 9 जुलाई 2024 को एक संकल्प जारी किया था। इसी संकल्प के तहत मेधावी विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने की व्यवस्था की गई थी।

सनत झा ने भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत इस छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था।

छात्र की पात्रता और आवेदन पर संबंधित अधिकारियों ने विचार किया। इसके बाद झारखंड स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक ने 9 सितंबर को छात्रवृत्ति को मंजूरी प्रदान कर दी।

यानी छात्र की पात्रता को लेकर विभागीय स्तर पर निर्णय हो चुका था और छात्रवृत्ति की स्वीकृति भी मिल चुकी थी।

इसके बाद भी वास्तविक समस्या यह रही कि स्वीकृत राशि छात्र को उपलब्ध नहीं कराई गई।

39,76,655.20 रुपये की छात्रवृत्ति मंजूर

छात्र की छात्रवृत्ति के रूप में 39,76,655.20 रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि 9 सितंबर को छात्रवृत्ति की स्वीकृति देने के साथ ही उक्त राशि जारी करने के संबंध में पत्र भी जारी किया गया था।

इसके बावजूद छात्र के खाते में रकम नहीं पहुंची।

इसका सीधा असर छात्र के दाखिले पर पड़ सकता था, क्योंकि यूनिवर्सिटी की फीस जमा करने की अंतिम तारीख नजदीक आ चुकी थी।

छात्र लगातार संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर रहा था और स्वीकृत छात्रवृत्ति की रकम जारी करने का अनुरोध कर रहा था। लेकिन निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं हो पाया।

आखिरकार छात्र को अपनी पढ़ाई और दाखिले को बचाने के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

फीस जमा करने की अंतिम तारीख भी नजदीक थी

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि University of Southampton में फीस जमा करने की अंतिम तारीख पहले 21 सितंबर निर्धारित की गई थी।

छात्र ने समय बढ़ाने का अनुरोध किया। उसके अनुरोध पर विश्वविद्यालय ने फीस जमा करने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 5 अक्टूबर कर दी।

इसका मतलब था कि छात्र के पास फीस जमा करने के लिए बेहद सीमित समय बचा था।

यदि 5 अक्टूबर तक फीस जमा नहीं होती तो विदेश में उसकी पढ़ाई और दाखिले पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका थी।

ऐसी स्थिति में छात्र के लिए हाईकोर्ट की शरण लेना मजबूरी बन गया।

हाईकोर्ट ने अधिकारियों के रवैये पर जताई नाराजगी

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने छात्रवृत्ति की स्वीकृति के बावजूद राशि जारी नहीं किए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह गंभीर चिंता का विषय है कि संबंधित प्रतिवादी एक मेधावी छात्र के करियर के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील बना हुआ है।

अदालत की नाराजगी का मुख्य कारण यह था कि छात्र की पात्रता पर विचार हो चुका था, छात्रवृत्ति मंजूर हो चुकी थी और राशि जारी करने के संबंध में पत्र भी जारी किया जा चुका था। इसके बावजूद छात्र को अपने अधिकार की राशि पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

कोर्ट ने इस देरी को केवल प्रशासनिक औपचारिकता के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसके संभावित असर को छात्र के भविष्य से जोड़कर देखा।

कोर्ट ने कहा- करियर प्रभावित हो सकता है

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर विशेष जोर दिया कि ऐसी प्रशासनिक असंवेदनशीलता का असर केवल एक भुगतान पर नहीं पड़ता।

यदि समय पर फीस नहीं जमा होती है तो छात्र का विदेश स्थित विश्वविद्यालय में दाखिला प्रभावित हो सकता है। इससे उसके पूरे शैक्षणिक कार्यक्रम और भविष्य की योजनाओं पर असर पड़ सकता है।

अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारियों की ऐसी असंवेदनशीलता न केवल छात्र के उज्ज्वल करियर को प्रभावित कर सकती है, बल्कि राज्य सरकार की उस कल्याणकारी नीति (Welfare Policy) के उद्देश्य को भी विफल कर सकती है जिसके तहत मेधावी विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाना है।

यानी अदालत ने मामले को केवल छात्र और विभाग के बीच भुगतान के विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सरकार की छात्रवृत्ति नीति के उद्देश्य से भी जोड़ा।

छात्रवृत्ति योजना का उद्देश्य क्या है?

सरकार द्वारा मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं शुरू करने का उद्देश्य आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा के अवसरों में बाधा को कम करना होता है।

विशेष रूप से विदेश की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए फीस और अन्य शैक्षणिक खर्च काफी अधिक हो सकते हैं। ऐसे में यदि सरकार किसी छात्र की पात्रता जांचने के बाद छात्रवृत्ति स्वीकृत करती है, तो समय पर भुगतान भी योजना की सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

किसी छात्र को स्वीकृति पत्र मिल जाने के बाद यदि रकम समय पर उपलब्ध नहीं होती, तो व्यावहारिक रूप से छात्र के सामने वही समस्या बनी रहती है जिसके समाधान के लिए छात्रवृत्ति योजना बनाई गई थी।

झारखंड हाईकोर्ट ने इसी पहलू को अपने आदेश में रेखांकित किया।

कोर्ट ने अधिकारी को दिया एक और मौका

अदालत ने छात्रवृत्ति के भुगतान में हुई देरी पर नाराजगी तो जताई, लेकिन तत्काल कोई कठोर दंडात्मक आदेश पारित नहीं किया।

इसके बजाय कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को एक और अवसर दिया।

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि 5 अक्टूबर तक छात्रवृत्ति की पूरी राशि छात्र के खाते में जारी की जाए।

राशि जारी होने के बाद इसकी सूचना छात्र और राज्य सरकार की ओर से अदालत में उपस्थित अधिवक्ता को भी देने का निर्देश दिया गया।

इससे अदालत ने एक स्पष्ट समय सीमा निर्धारित कर दी।

आदेश का पालन नहीं हुआ तो 6 अक्टूबर को व्यक्तिगत पेशी

हाईकोर्ट ने आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए अगली कार्रवाई का भी स्पष्ट संकेत दिया है।

अदालत ने कहा कि यदि 5 अक्टूबर तक पूरी छात्रवृत्ति राशि जारी नहीं की गई तो 6 अक्टूबर को झारखंड स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक को अदालत में सशरीर उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा।

व्यक्तिगत पेशी का निर्देश यह दर्शाता है कि अदालत इस मामले को गंभीरता से देख रही है।

इससे संबंधित अधिकारी के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि अब केवल आश्वासन या प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला पर्याप्त नहीं होगा। निर्धारित समय सीमा में वास्तविक भुगतान करना होगा।

छात्र को अदालत क्यों जाना पड़ा?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जब छात्रवृत्ति पहले ही मंजूर हो चुकी थी तो छात्र को हाईकोर्ट जाने की जरूरत क्यों पड़ी?

उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, छात्र ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था। उसकी पात्रता पर विचार हुआ, छात्रवृत्ति स्वीकृत हुई और राशि जारी करने का पत्र भी जारी कर दिया गया।

लेकिन स्वीकृत रकम छात्र को उपलब्ध नहीं हुई।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय की फीस जमा करने की अंतिम तारीख लगातार नजदीक आ रही थी।

ऐसी स्थिति में छात्र के सामने दो विकल्प दिखाई दे रहे थे—या तो अपनी पढ़ाई का अवसर जोखिम में डाले या फिर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करे।

छात्र ने दूसरा रास्ता चुना और हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

विदेश में दाखिला और समय पर भुगतान का संबंध

विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया अक्सर निश्चित समय सीमा से जुड़ी होती है। फीस जमा करने की तारीख निकल जाने पर छात्र को अतिरिक्त समय मिलना हमेशा सुनिश्चित नहीं होता।

ऐसे में सरकारी छात्रवृत्ति पर निर्भर छात्र के लिए समय पर भुगतान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस मामले में University of Southampton ने छात्र के अनुरोध पर फीस जमा करने की तारीख 21 सितंबर से बढ़ाकर 5 अक्टूबर कर दी थी।

अब हाईकोर्ट ने भी इसी तारीख को ध्यान में रखते हुए छात्रवृत्ति की पूरी राशि 5 अक्टूबर तक जारी करने का निर्देश दिया है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालत ने मामले की तात्कालिकता को ध्यान में रखते हुए आदेश पारित किया।

कोर्ट ने कठोर कदम उठाने से पहले दिया अवसर

अदालत के आदेश का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने तत्काल संबंधित अधिकारी के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की।

इसके बजाय पहले भुगतान के लिए स्पष्ट समय सीमा दी गई।

अदालत ने कहा कि 5 अक्टूबर तक राशि छात्र के खाते में जारी की जाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो अगले दिन अधिकारी को स्वयं अदालत में उपस्थित होकर कारण बताना होगा।

इस तरह अदालत ने प्रशासन को आदेश का पालन करने का एक अंतिम अवसर दिया है।

यह न्यायिक प्रक्रिया में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण भी माना जा सकता है, क्योंकि इससे छात्र की तत्काल समस्या का समाधान करने का अवसर मिलता है और साथ ही आदेश के अनुपालन को लेकर जवाबदेही भी तय होती है।

मामला केवल एक छात्र का नहीं, नीति के क्रियान्वयन का भी

हाईकोर्ट की टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि मामला केवल सनत झा की छात्रवृत्ति तक सीमित नहीं है।

यदि किसी कल्याणकारी योजना के तहत छात्र को पात्र मानकर आर्थिक सहायता मंजूर की जाती है, लेकिन राशि समय पर जारी नहीं होती, तो योजना का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

सरकारी योजनाओं में आवेदन, सत्यापन, स्वीकृति और भुगतान अलग-अलग चरण होते हैं। किसी योजना की सफलता केवल स्वीकृति तक नहीं बल्कि अंतिम लाभार्थी तक सहायता पहुंचने से तय होती है।

सनत झा के मामले में स्वीकृति हो जाने के बावजूद भुगतान लंबित था। यही कारण है कि अदालत ने इसे गंभीरता से लिया।

अब आगे क्या होगा?

अब संबंधित विभाग और झारखंड स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के सामने 5 अक्टूबर तक छात्रवृत्ति की पूरी राशि जारी करने की समय सीमा है।

यदि राशि समय पर छात्र के खाते में पहुंच जाती है तो अदालत को इसकी जानकारी दी जाएगी।

लेकिन यदि निर्धारित समय तक भुगतान नहीं होता है तो कार्यकारी निदेशक को 6 अक्टूबर को हाईकोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा।

ऐसी स्थिति में अदालत आगे के आदेश पर भी विचार कर सकती है।

फिलहाल अदालत ने छात्र के शैक्षणिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए तत्काल समाधान पर जोर दिया है।

निष्कर्ष

झारखंड हाईकोर्ट का यह मामला सरकारी छात्रवृत्ति योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

रांची के कांके निवासी सनत झा का चयन University of Southampton में तीन वर्षीय B.Tech Software Engineering (Computer Science and Information Systems) पाठ्यक्रम के लिए हुआ है। छात्र ने झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के 9 जुलाई 2024 के संकल्प के तहत छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था।

पात्रता पर विचार के बाद 9 सितंबर को झारखंड स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक ने छात्रवृत्ति को मंजूरी दी और 39,76,655.20 रुपये की राशि जारी करने का पत्र भी जारी किया। इसके बावजूद छात्र को राशि उपलब्ध नहीं कराई गई।

इधर यूनिवर्सिटी की फीस जमा करने की अंतिम तारीख पहले 21 सितंबर थी, जिसे छात्र के अनुरोध पर बढ़ाकर 5 अक्टूबर कर दिया गया।

मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर जस्टिस राजेश शंकर ने अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसी असंवेदनशीलता छात्र के उज्ज्वल करियर को प्रभावित कर सकती है और राज्य की कल्याणकारी छात्रवृत्ति नीति के उद्देश्य को भी विफल कर सकती है।

अदालत ने 5 अक्टूबर तक पूरी छात्रवृत्ति राशि छात्र के खाते में जारी करने का निर्देश दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आदेश का पालन नहीं होने पर 6 अक्टूबर को संबंधित कार्यकारी निदेशक को अदालत में सशरीर उपस्थित होकर जवाब देना होगा।

इस आदेश का मूल संदेश यही है कि सरकारी योजना में किसी छात्र की पात्रता और छात्रवृत्ति स्वीकृत हो जाने के बाद भुगतान में अनावश्यक देरी उसके शैक्षणिक अवसर को प्रभावित नहीं कर सकती। खासकर तब, जब विद्यार्थी के सामने किसी विदेशी विश्वविद्यालय में दाखिले की निश्चित समय सीमा हो।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।