नौकरी या खराब बिजनेस का बहाना बनाकर पत्नी को गुजारा-भत्ता देने से नहीं बच सकता पति: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- यह खोखला बहाना
पत्नी के भरण-पोषण (Maintenance) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि पति केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या उसका कारोबार खराब चल रहा है। अदालत ने ऐसे तर्क को “खोखला बहाना” बताया और कहा कि सक्षम पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से सिर्फ आय का हवाला देकर पीछे नहीं हट सकता।
न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकलपीठ ने यह टिप्पणी कासगंज जिले के गंजडुंडवारा थाना क्षेत्र निवासी मोहम्मद कामिल की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए की। मामला पत्नी को दिए जाने वाले मासिक भरण-पोषण से जुड़ा था।
ग्राम न्यायालय, पटियाली ने 25 जनवरी 2023 को पति को अपनी पत्नी को 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने इस मामले में भरण-पोषण के कानूनी उद्देश्य पर भी विस्तार से चर्चा की और कहा कि कानून का उद्देश्य ऐसी महिला को आर्थिक सुरक्षा देना है, जिसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा हो।
क्या है पूरा मामला?
मामला कासगंज जिले का है। याचिकाकर्ता मोहम्मद कामिल की पत्नी ने अपने भरण-पोषण के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
पत्नी की ओर से आरोप लगाया गया कि उसे वैवाहिक घर से बाहर कर दिया गया और उसके पास स्वयं की कोई स्वतंत्र आय नहीं है। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, विवाद के पीछे दहेज की मांग पूरी न होने का आरोप भी था।
महिला ने अपने पति से गुजारा-भत्ता दिलाने की मांग की।
मामला ग्राम न्यायालय, पटियाली के सामने पहुंचा। न्यायालय ने मामले पर विचार करने के बाद 25 जनवरी 2023 को पति को पत्नी के लिए 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।
पति इस आदेश से संतुष्ट नहीं था। उसने इसे चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
पति ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट के सामने कई तर्क रखे गए।
सबसे प्रमुख दलील यह थी कि पति की कोई स्थायी आय नहीं है। उसके पास नियमित नौकरी नहीं है और उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह 3,500 रुपये प्रतिमाह पत्नी को दे सके।
उसकी ओर से यह भी कहा गया कि अधीनस्थ अदालत ने उसकी आय का सही आकलन नहीं किया है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि उसकी पत्नी अपनी इच्छा से और बिना किसी पर्याप्त कारण के मायके में रह रही है। इसलिए उसे भरण-पोषण देने का आदेश उचित नहीं है।
पति की ओर से अदालत से आग्रह किया गया कि ग्राम न्यायालय के आदेश को निरस्त किया जाए या उसमें हस्तक्षेप किया जाए।
राज्य सरकार ने आदेश का समर्थन किया
मामले में राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने अधीनस्थ अदालत के आदेश का समर्थन किया।
सरकार की ओर से कहा गया कि ग्राम न्यायालय का आदेश कानून के अनुरूप और न्यायपूर्ण है। इसमें ऐसा कोई आधार नहीं है जिसके कारण हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार किया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
नौकरी नहीं है तो क्या भरण-पोषण से मुक्ति मिल जाएगी?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही था।
पति की ओर से आर्थिक स्थिति खराब होने और स्थायी आय नहीं होने की दलील दी गई थी। लेकिन अदालत ने केवल इस आधार को पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने का पर्याप्त कारण नहीं माना।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति सक्षम है और अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने की स्थिति में है तो वह केवल यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसके पास नौकरी नहीं है या उसका व्यवसाय खराब चल रहा है।
अदालत ने इस तरह के तर्क को “खोखला बहाना” बताया।
इस टिप्पणी का व्यापक अर्थ यह है कि भरण-पोषण के मामलों में पति की वास्तविक आर्थिक क्षमता और परिस्थितियों को देखा जाएगा। केवल यह कहना कि कोई नौकरी नहीं है, अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा।
CrPC की धारा 125 का मूल उद्देश्य क्या है?
इस मामले में हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के उद्देश्य पर भी चर्चा की।
धारा 125 का उद्देश्य ऐसे मामलों में पत्नी, बच्चों और माता-पिता को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है, जब संबंधित व्यक्ति स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो और जिम्मेदार व्यक्ति के पास उन्हें सहायता देने की क्षमता हो।
पत्नी के संबंध में इस प्रावधान का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उसे आर्थिक अभाव के कारण असहाय स्थिति में जीवन न बिताना पड़े।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 125 का मूल उद्देश्य उस महिला की आर्थिक स्थिति और मानसिक पीड़ा को कम करना है, जिसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
यह प्रावधान केवल पैसा देने का आदेश नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ कानूनी उपाय भी है।
पत्नी को सम्मानजनक जीवन का अधिकार
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य महिला को ऐसा जीवन उपलब्ध कराना है जिसमें वह सम्मान और गरिमा के साथ रह सके।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी का भरण-पोषण केवल इस स्तर तक सीमित नहीं होना चाहिए कि वह किसी तरह जीवित रह सके।
कानून की दृष्टि में पत्नी को ऐसा भरण-पोषण मिलना चाहिए जिससे वह सम्मानजनक जीवन जी सके।
अदालत ने इस संदर्भ में यह सिद्धांत दोहराया कि पत्नी वैवाहिक जीवन के दौरान जिस सामाजिक और आर्थिक स्तर पर रह रही थी, उसके अनुरूप सम्मानजनक जीवन जीने की हकदार है, परिस्थितियों के अनुसार।
इसका अर्थ यह नहीं कि पत्नी को पति की पूरी आय का अधिकार मिल जाता है, बल्कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की क्षमता, पत्नी की जरूरत और दोनों की परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
पत्नी का पूरी तरह बेसहारा होना जरूरी नहीं
भरण-पोषण के मामलों में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पत्नी को भत्ता प्राप्त करने के लिए पूरी तरह बेसहारा या सड़क पर होने की स्थिति में होना आवश्यक नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को भी रेखांकित किया।
यदि पत्नी की अपनी स्वतंत्र आय नहीं है और वह अपने जीवन की आवश्यकताओं के लिए पति पर निर्भर है, तो केवल यह कहकर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी तरह अपने मायके में रह रही है।
कानून का उद्देश्य ऐसी महिला को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा देना है, जिसे वैवाहिक परिस्थितियों के कारण पति के साथ रहना संभव नहीं रहा।
पत्नी अपनी मर्जी से मायके में रह रही थी, इस दलील पर भी विचार
पति की ओर से यह दलील दी गई थी कि उसकी पत्नी अपनी इच्छा से बिना किसी पर्याप्त कारण के मायके में रह रही है।
यह तर्क भी अदालत के सामने महत्वपूर्ण था क्योंकि कुछ परिस्थितियों में यदि पत्नी बिना उचित कारण पति से अलग रह रही हो तो भरण-पोषण के अधिकार पर कानूनी प्रभाव पड़ सकता है।
लेकिन किसी पत्नी के अलग रहने के कारण का मूल्यांकन तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
इस मामले में रिकॉर्ड में यह आरोप भी था कि दहेज की मांग पूरी नहीं होने के कारण पत्नी को वैवाहिक घर से बाहर किया गया था।
इस परिस्थिति को देखते हुए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं था कि पत्नी अपनी मर्जी से मायके में रह रही है।
दहेज विवाद का भी था उल्लेख
मामले में पत्नी की ओर से यह आरोप लगाया गया कि उसे दहेज की मांग पूरी नहीं होने के कारण वैवाहिक घर से निकाल दिया गया था।
यदि कोई महिला इस प्रकार की परिस्थितियों के कारण पति से अलग रह रही है तो अदालत उसके अलग रहने को केवल “अपनी मर्जी” के रूप में नहीं देख सकती।
भरण-पोषण के मामले में न्यायालय को यह देखना होता है कि पति-पत्नी अलग क्यों रह रहे हैं और क्या पत्नी के पास अलग रहने का उचित कारण है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और परिस्थितियों को देखते हुए पति को भरण-पोषण देने के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया।
इनमें चतुर्भुज बनाम सीता बाई और जसबीर कौर सहगल जैसे फैसले शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों में यह सिद्धांत स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण की राशि इतनी होनी चाहिए कि पत्नी सम्मानजनक जीवन जी सके।
Maintenance का उद्देश्य पत्नी को दंडित करना या पति की संपत्ति बांटना नहीं है। इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्भर पत्नी को ऐसी सहायता देना है जिससे वह जीवन की आवश्यक जरूरतें सम्मान के साथ पूरी कर सके।
इसी कानूनी दृष्टिकोण को हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले में भी लागू किया।
भरण-पोषण पति की क्षमता के अनुसार होना चाहिए
अदालत ने यह भी माना कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की आर्थिक क्षमता को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन आर्थिक क्षमता का आकलन केवल उस आय से नहीं किया जाता जो पति अदालत के सामने बताता है।
यदि कोई सक्षम व्यक्ति जानबूझकर अपनी आय कम दिखाता है या रोजगार से बचने की कोशिश करता है, तो केवल उसके इस दावे के आधार पर पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि अदालत ने नौकरी न होने या कारोबार खराब होने जैसे सामान्य दावों को स्वतः निर्णायक नहीं माना।
“सक्षम पति” की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस मूल सिद्धांत पर जोर दिया कि सक्षम पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
यह जिम्मेदारी केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाती कि पति ने नियमित नौकरी छोड़ दी है या उसका कारोबार अपेक्षित रूप से नहीं चल रहा है।
कानून यह नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति अपनी आय या रोजगार की स्थिति को इस तरह पेश करे कि उसकी पत्नी को कानूनी रूप से उपलब्ध आर्थिक सहायता से भी वंचित होना पड़े।
हालांकि प्रत्येक मामले में पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य, रोजगार, आश्रितों की संख्या और अन्य परिस्थितियों को देखा जाना आवश्यक है।
3,500 रुपये प्रतिमाह की राशि पर हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया
ग्राम न्यायालय ने पत्नी के लिए 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण तय किया था।
पति ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि उसकी आय इतनी नहीं है कि वह यह राशि दे सके और अधीनस्थ अदालत ने उसकी आर्थिक स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं किया।
लेकिन हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया।
नतीजतन मोहम्मद कामिल की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और भरण-पोषण का आदेश बरकरार रहा।
भरण-पोषण केवल आर्थिक सहायता नहीं
इस तरह के मामलों में अदालतें बार-बार यह स्पष्ट करती रही हैं कि Maintenance का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को पैसे देना नहीं है।
यह सामाजिक न्याय का एक माध्यम है। विवाह के बाद यदि पत्नी आर्थिक रूप से पति पर निर्भर हो जाती है और किसी कारण से वैवाहिक घर में रहना संभव नहीं रहता, तो कानून उसे पूरी तरह आर्थिक असुरक्षा में छोड़ने की अनुमति नहीं देता।
विशेषकर तब, जब पत्नी की अपनी स्वतंत्र आय न हो।
वर्तमान मामले में भी हाईकोर्ट ने इसी दृष्टिकोण को अपनाया।
फैसले का व्यापक कानूनी संदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहां पति अपनी आय या रोजगार की स्थिति को भरण-पोषण से बचने के आधार के रूप में पेश करता है।
फैसले से यह स्पष्ट होता है कि अदालत केवल पति के इस कथन पर निर्भर नहीं करेगी कि उसके पास नौकरी नहीं है या कारोबार में नुकसान हो रहा है। न्यायालय परिस्थितियों, उपलब्ध रिकॉर्ड और पति की वास्तविक क्षमता को देखते हुए निर्णय ले सकता है।
साथ ही पत्नी का अधिकार भी केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाता कि वह पति के साथ नहीं रह रही है। अदालत यह देखती है कि अलग रहने की परिस्थिति क्या थी और क्या पत्नी के पास ऐसा करने का उचित कारण था।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कासगंज के मोहम्मद कामिल की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि नौकरी नहीं होने या कारोबार खराब चलने का दावा मात्र पति को पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। ऐसे तर्क को परिस्थितियों और वास्तविक आर्थिक क्षमता के आधार पर परखा जाएगा।
ग्राम न्यायालय, पटियाली ने 25 जनवरी 2023 को पत्नी को 3,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इसे चुनौती देते हुए कहा था कि उसकी कोई स्थायी आय नहीं है और पत्नी अपनी इच्छा से मायके में रह रही है।
लेकिन हाईकोर्ट ने पत्नी की परिस्थितियों, उसकी स्वतंत्र आय नहीं होने और वैवाहिक घर से अलग होने के पीछे लगाए गए दहेज संबंधी आरोपों को ध्यान में रखते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया।
अदालत ने CrPC की धारा 125 के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि इसका मकसद ऐसी महिला को आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है, जिसे वैवाहिक परिस्थितियों के कारण पति से अलग रहना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के चतुर्भुज बनाम सीता बाई और जसबीर कौर सहगल जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने यह सिद्धांत भी दोहराया कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी गरिमा के साथ जीवन जी सके।
इस फैसले का सार यही है कि भरण-पोषण कोई एहसान नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार कानून द्वारा संरक्षित जिम्मेदारी है। सक्षम पति केवल बेरोजगारी या खराब कारोबार का सामान्य हवाला देकर इस जिम्मेदारी से अपने आप मुक्त नहीं हो जाता।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।