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फेसबुक पर जातिसूचक टिप्पणी करना भी पड़ सकता है भारी, हाईकोर्ट ने कहा-

फेसबुक पर जातिसूचक टिप्पणी करना भी पड़ सकता है भारी, हाईकोर्ट ने कहा- स्क्रीनशॉट और लिंक मौजूद हों तो पुलिस जांच से पीछे नहीं हट सकती

       सोशल मीडिया आज लोगों की बातचीत और विचार रखने का बड़ा माध्यम बन चुका है, लेकिन इंटरनेट पर लिखी गई हर बात को निजी बातचीत समझना भारी पड़ सकता है। खासकर किसी व्यक्ति की जाति, धर्म या परिवार को लेकर की गई अपमानजनक या अशालीन टिप्पणी अगर आपराधिक कानून के दायरे में आती है तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी कार्रवाई का आधार बन सकता है।

एक ऐसे ही मामले में हाईकोर्ट ने फेसबुक पर कथित जातिसूचक और आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मामले में पुलिस की जांच को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने अलीपुर कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें मामले को आगे बढ़ाने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने मामले में आगे कार्रवाई और जांच का रास्ता खोलते हुए डिजिटल साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच कराने का निर्देश दिया है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी सोशल मीडिया पोस्ट के स्क्रीनशॉट और लिंक उपलब्ध हैं तथा शिकायतकर्ता के बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं, तो केवल फेसबुक से जानकारी नहीं मिलने को आधार बनाकर पुलिस जांच को बंद नहीं कर सकती।

फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज हुई थी एफआईआर

मामला बेहला थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि रबीउल इस्लाम और सायन दत्त ने फेसबुक पर उसकी जाति, धर्म और परिवार के सदस्यों को लेकर कथित तौर पर अशालीन और आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हुए पोस्ट डाली थीं।

शिकायतकर्ता के अनुसार सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों से उसकी सामाजिक और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। इसी आधार पर उसने पुलिस के सामने शिकायत दर्ज कराई और मामले में आपराधिक कार्रवाई की मांग की।

पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी। जांच के दौरान सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों को भी सामने रखा गया।

लेकिन बाद में पुलिस की ओर से मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी गई।

फेसबुक से जानकारी नहीं मिलने को बनाया गया आधार

पुलिस की ओर से कथित तौर पर यह आधार लिया गया कि फेसबुक से मामले से संबंधित आवश्यक तथ्य या जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। इसी वजह से पुलिस ने आगे की कार्रवाई के बजाय फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।

यहीं से मामला न्यायिक विवाद में बदल गया।

शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि जब कथित आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट के स्क्रीनशॉट और लिंक पहले से उपलब्ध हैं तथा शिकायतकर्ता का बयान भी दर्ज हो चुका है, तब केवल सोशल मीडिया कंपनी से अतिरिक्त जानकारी नहीं मिलने के कारण जांच को समाप्त नहीं किया जा सकता।

मामला अंततः हाईकोर्ट के सामने पहुंचा।

अलीपुर कोर्ट ने पहले क्यों खारिज किया था मामला?

इस मामले में अलीपुर कोर्ट का रुख अलग था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार निचली अदालत ने इस आधार पर मामले को खारिज किया कि याचिकाकर्ता की ओर से पहले दर्ज कराए गए तीन अन्य मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई थी, जबकि वर्तमान मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल नहीं की थी।

यानी एक ओर शिकायतकर्ता की ओर से कथित सोशल मीडिया पोस्ट और उससे जुड़े साक्ष्य का दावा था, वहीं दूसरी ओर पुलिस की जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी थी।

अलीपुर कोर्ट के आदेश के खिलाफ शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट में मुख्य सवाल यह बना कि क्या सोशल मीडिया कंपनी से अपेक्षित जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण पुलिस उन डिजिटल साक्ष्यों की अनदेखी कर सकती है, जो पहले से शिकायतकर्ता के पास मौजूद हैं।

हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पर उठाए सवाल

जस्टिस उदय कुमार ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की जांच के तरीके पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि जब शिकायतकर्ता की ओर से स्क्रीनशॉट और लिंक उपलब्ध कराए गए हैं तथा बयान भी दर्ज किया जा चुका है, तो केवल इस आधार पर कि फेसबुक से आवश्यक तथ्य नहीं मिल सके, मामले को बंद नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया से जुड़े आपराधिक मामलों में डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिलने वाली जानकारी हमेशा जांच एजेंसी के नियंत्रण में नहीं होती।

किसी सोशल मीडिया कंपनी की ओर से जानकारी उपलब्ध न कराए जाने या तकनीकी कारणों से रिकॉर्ड प्राप्त न होने की स्थिति में भी जांच एजेंसी के पास उपलब्ध दूसरे डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जा सकती है।

फोरेंसिक विशेषज्ञों की मदद लेने का निर्देश

हाईकोर्ट ने मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए फोरेंसिक कर्मचारियों की नियुक्ति का निर्देश दिया है।

अदालत ने कहा कि कथित आपराधिक पोस्ट और उनसे जुड़े digital footprints की पहचान के लिए फोरेंसिक विशेषज्ञों की सहायता ली जाए।

इस निर्देश का महत्व इसलिए भी है क्योंकि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला कोई स्क्रीनशॉट अपने आप में जांच का अंतिम निष्कर्ष नहीं होता। जांच एजेंसी को यह पता लगाने की आवश्यकता हो सकती है कि पोस्ट कब और किस खाते से अपलोड की गई, उसमें कोई बदलाव हुआ या नहीं, लिंक वास्तविक है या नहीं और उपलब्ध डिजिटल सामग्री का स्रोत क्या है।

फोरेंसिक जांच इन सवालों के जवाब तलाशने में मदद कर सकती है।

तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने मामले में जांच को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने के बजाय समयसीमा भी तय की है।

अदालत ने निर्देश दिया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी CrPC की उपयुक्त धारा के तहत तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल की जाए।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल साक्ष्यों से जुड़े मामले में जांच केवल तकनीकी अड़चनों के कारण लंबे समय तक लंबित न रहे।

अदालत का संदेश साफ है कि अगर किसी मामले में डिजिटल सामग्री उपलब्ध है तो जांच एजेंसी को उसके सत्यापन और वैज्ञानिक परीक्षण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

स्क्रीनशॉट और लिंक क्यों महत्वपूर्ण हैं?

सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में अक्सर यह सवाल उठता है कि किसी पोस्ट का स्क्रीनशॉट कितनी अहमियत रखता है।

स्क्रीनशॉट किसी सोशल मीडिया पोस्ट का दृश्य रिकॉर्ड हो सकता है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की जांच आवश्यक होती है। यही कारण है कि ऐसे मामलों में डिजिटल फोरेंसिक की भूमिका बढ़ जाती है।

यदि किसी पोस्ट का URL या लिंक उपलब्ध है तो जांचकर्ता उस लिंक, संबंधित अकाउंट, पोस्ट की तारीख और अन्य उपलब्ध डिजिटल जानकारी की जांच कर सकते हैं।

इसके अलावा स्क्रीनशॉट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को भी कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण होता है।

यही कारण है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल सोशल मीडिया कंपनी से जानकारी मिलने या न मिलने पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध डिजिटल फुटप्रिंट की फोरेंसिक जांच कराने को कहा है।

जाति और धर्म को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट का मामला

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि फेसबुक पोस्ट में उसकी जाति, धर्म और परिवार के लोगों को लेकर अशालीन टिप्पणी की गई।

ऐसे मामलों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि टिप्पणी किसी व्यक्ति को बुरी लगी या नहीं। जांच में यह भी देखना पड़ता है कि कथित पोस्ट की वास्तविक सामग्री क्या थी, उसका संदर्भ क्या था, किस व्यक्ति को संबोधित किया गया था और संबंधित कानून की आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं या नहीं।

इसीलिए हाईकोर्ट के आदेश का अर्थ यह नहीं माना जाना चाहिए कि फेसबुक पर हर जातिसूचक या विवादित टिप्पणी अपने आप अपराध सिद्ध कर देती है। आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण पोस्ट की वास्तविक सामग्री, परिस्थितियों, लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।

इस मामले में भी हाईकोर्ट ने जांच को आगे बढ़ाने का रास्ता खोला है; आरोपों की अंतिम सत्यता जांच के बाद ही सामने आएगी।

सोशल मीडिया पर लिखी बात भी कानूनी रिकॉर्ड बन सकती है

इस मामले से सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए एक अहम संदेश निकलता है।

फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स या किसी अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लिखी गई टिप्पणी केवल इसलिए कानूनी दायरे से बाहर नहीं हो जाती क्योंकि वह इंटरनेट पर पोस्ट की गई है।

किसी व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक, धमकीपूर्ण, जातिसूचक या अन्य आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट किए जाने पर परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं।

वहीं दूसरी तरफ किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत होने मात्र से उसे दोषी भी नहीं माना जा सकता। आपराधिक मामले में आरोपों की जांच, साक्ष्यों का परीक्षण और कानून के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक होती है।

पुलिस के लिए भी डिजिटल जांच एक बड़ी चुनौती

पारंपरिक अपराधों की तुलना में साइबर अपराधों की जांच का स्वरूप अलग है। यहां घटनास्थल किसी सड़क, घर या कार्यालय तक सीमित नहीं होता। अपराध का डिजिटल रिकॉर्ड अलग-अलग सर्वर, डिवाइस और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद हो सकता है।

कई बार पुलिस के सामने सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म से आवश्यक जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।

लेकिन हाईकोर्ट के इस आदेश में यह बात सामने आई है कि जांच एजेंसी को उपलब्ध दूसरे साक्ष्यों की भी जांच करनी चाहिए।

यदि शिकायतकर्ता स्क्रीनशॉट, URL, वीडियो, चैट या अन्य डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध कराता है तो जांच एजेंसी को उनकी प्रामाणिकता और तकनीकी पहलुओं की जांच करनी चाहिए।

फाइनल रिपोर्ट के बाद भी न्यायिक रास्ता बंद नहीं

पुलिस द्वारा फाइनल रिपोर्ट दाखिल किए जाने का मतलब यह नहीं होता कि शिकायतकर्ता के लिए हर न्यायिक रास्ता समाप्त हो गया।

यदि शिकायतकर्ता को लगता है कि जांच उचित तरीके से नहीं हुई या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जांच नहीं की गई तो वह कानून के अनुसार संबंधित न्यायालय का रुख कर सकता है।

इस मामले में भी शिकायतकर्ता ने अलीपुर कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और हाईकोर्ट ने मामले की जांच को लेकर अलग दृष्टिकोण अपनाया।

अदालत ने उपलब्ध डिजिटल सामग्री को ध्यान में रखते हुए फोरेंसिक जांच कराने और निर्धारित समय में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

डिजिटल युग में जांच का तरीका भी बदलना जरूरी

फेसबुक पोस्ट से जुड़े इस मामले ने एक व्यापक सवाल भी खड़ा किया है—जब अपराध का माध्यम डिजिटल हो गया है तो जांच का तरीका भी उसी स्तर का होना चाहिए।

सिर्फ सोशल मीडिया कंपनी से जवाब मिलने या न मिलने के आधार पर किसी मामले की जांच समाप्त करना कई परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं हो सकता। उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का वैज्ञानिक परीक्षण, डिजिटल फुटप्रिंट का विश्लेषण और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद जांच को अधिक प्रभावी बना सकती है।

हाईकोर्ट का फोरेंसिक कर्मचारियों की नियुक्ति का निर्देश इसी दिशा में देखा जा सकता है।

तीन महीने बाद सामने आएगी जांच की तस्वीर

फिलहाल इस मामले में आरोपों की अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। हाईकोर्ट ने जांच को आगे बढ़ाने और डिजिटल साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच कराने का निर्देश दिया है।

अब जांच एजेंसियों को उपलब्ध स्क्रीनशॉट, लिंक और अन्य डिजिटल फुटप्रिंट की जांच करनी होगी। इसके बाद तीन महीने के भीतर अदालत के सामने रिपोर्ट दाखिल की जानी है।

इस जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि कथित फेसबुक पोस्ट वास्तव में किस खाते से प्रकाशित हुई थी, उसकी डिजिटल प्रामाणिकता क्या है और आरोपों को समर्थन देने वाले पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं या नहीं।

निष्कर्ष

फेसबुक पर लिखी गई कोई टिप्पणी केवल इसलिए कानून से बाहर नहीं हो जाती क्योंकि वह सोशल मीडिया पर प्रकाशित हुई है। दूसरी ओर किसी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर शिकायत दर्ज होने मात्र से आरोप साबित भी नहीं हो जाते। दोनों स्थितियों के बीच निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच महत्वपूर्ण है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने खास तौर पर यह रेखांकित किया कि जब शिकायतकर्ता के पास स्क्रीनशॉट और लिंक मौजूद हैं और बयान भी दर्ज हो चुका है, तब केवल फेसबुक से जानकारी नहीं मिलने को आधार बनाकर जांच को बंद नहीं किया जा सकता।

फोरेंसिक जांच और डिजिटल फुटप्रिंट की पड़ताल के निर्देश से यह भी स्पष्ट होता है कि सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। अब यह जांच पर निर्भर करेगा कि उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड से कथित अपराध की पुष्टि होती है या नहीं।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।