नाबालिग के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, फिर भी परिवार को मुआवजे से नहीं किया जा सकता वंचित: कलकत्ता हाई कोर्ट ने 6.5 लाख रुपये देने का दिया आदेश
कोलकाता। सड़क दुर्घटनाओं में मुआवजे को लेकर अक्सर यह सवाल सामने आता है कि यदि दुर्घटना में मृत व्यक्ति से भी किसी स्तर पर यातायात नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो क्या उसके परिवार को मुआवजे का अधिकार समाप्त हो जाता है? कलकत्ता हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
हाई कोर्ट ने कहा कि वाहन चलाने के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस होना कानून की आवश्यकता है, लेकिन केवल इस आधार पर दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को मोटर दुर्घटना मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि बीमा कंपनी मृतक की कथित लापरवाही को आधार बनाकर मुआवजा कम या समाप्त करना चाहती है, तो उसे दुर्घटना में मृतक की वास्तविक और प्रत्यक्ष लापरवाही को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होगा।
मामला दिसंबर 2016 में नदिया जिले के रानाघाट इलाके में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें 17 वर्षीय किशोर की मौत हो गई थी। परिवार द्वारा किए गए मुआवजे के दावे को लेकर पहले जिला अदालत ने करीब 1.75 लाख रुपये की राशि तय की थी। बाद में मामला हाई कोर्ट पहुंचा और अदालत ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 6.5 लाख रुपये कर दी।
इसके साथ ही बीमा कंपनी को दावा दायर किए जाने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
दिसंबर 2016 में हुआ था दर्दनाक सड़क हादसा
यह मामला दिसंबर 2016 का है। नदिया जिले के रानाघाट के भादुड़ी नयाखालीपाड़ा इलाके में 17 वर्षीय किशोर स्कूटी से जा रहा था।
इसी दौरान पीछे से आ रही एक कार ने उसकी स्कूटी को टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि किशोर की मौत हो गई।
किशोर की उम्र उस समय महज 17 वर्ष थी। उसकी मौत के बाद परिवार के सामने न केवल भावनात्मक संकट पैदा हुआ, बल्कि आर्थिक नुकसान भी सामने आया। परिवार ने मोटर दुर्घटना मुआवजे के लिए दावा किया।
लेकिन बीमा कंपनी ने इस दावे का विरोध किया।
बीमा कंपनी ने लाइसेंस और लापरवाही का मुद्दा उठाया
बीमा कंपनी की ओर से मुख्य रूप से यह दलील दी गई कि दुर्घटना के समय मृत किशोर नाबालिग था और उसके पास वाहन चलाने का वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था।
बीमा कंपनी ने यह भी दावा किया कि दुर्घटना में किशोर की भी आंशिक गलती थी। कंपनी के अनुसार उसकी ओर से भी लापरवाही हुई थी और इसलिए परिवार को पूरा मुआवजा नहीं दिया जाना चाहिए।
मुआवजे से जुड़े मामलों में ऐसी दलीलें अक्सर महत्वपूर्ण बन जाती हैं, क्योंकि दुर्घटना में किसकी गलती थी और कितनी थी, इसका सीधा असर मुआवजे की गणना पर पड़ सकता है।
लेकिन हाई कोर्ट ने इस मामले में बीमा कंपनी की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।
जिला अदालत ने तय किया था करीब 1.75 लाख रुपये मुआवजा
मुआवजे के लिए परिवार की ओर से दावा किए जाने के बाद कृष्णनगर जिला कोर्ट ने मामले की सुनवाई की थी।
जिला अदालत ने परिवार को करीब 1.75 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्णय लिया।
परिवार इस राशि से संतुष्ट नहीं था। उनका पक्ष था कि मृत किशोर की उम्र, उसकी संभावित आय और भविष्य में होने वाली कमाई को देखते हुए मुआवजे की राशि अधिक होनी चाहिए।
इसी आधार पर मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट में परिवार की ओर से किशोर की आय और भविष्य में संभावित आय से जुड़े तथ्य पेश किए गए। इन्हीं तथ्यों के आधार पर अदालत ने मुआवजे की दोबारा गणना की।
छह हजार रुपये मासिक आय का दावा स्वीकार नहीं हुआ
हाई कोर्ट के सामने परिवार की ओर से किशोर की मासिक आय करीब छह हजार रुपये बताई गई थी।
लेकिन अदालत ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। इसका कारण यह था कि जिस नियोक्ता के यहां किशोर के काम करने का दावा किया गया था, उसे अदालत के सामने पेश नहीं किया गया।
यानी केवल यह दावा कर देना कि मृत किशोर प्रति माह छह हजार रुपये कमाता था, पर्याप्त नहीं माना गया। अदालत के सामने उस आय की पुष्टि करने वाला आवश्यक साक्ष्य होना भी जरूरी था।
इसलिए हाई कोर्ट ने उसकी मासिक आय चार हजार रुपये मानकर मुआवजे की गणना की।
यह पहलू मोटर दुर्घटना मामलों में साक्ष्य के महत्व को भी सामने लाता है। परिवार द्वारा बताई गई आय और अदालत द्वारा स्वीकार की गई आय में अंतर हो सकता है, यदि वास्तविक आय का पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध न हो।
भविष्य की आय को भी ध्यान में रखकर हुई गणना
मुआवजा केवल मृतक की वर्तमान आय को देखकर तय नहीं किया जाता। दुर्घटना में मृत व्यक्ति की उम्र, आय, आश्रितों की स्थिति और भविष्य की संभावित आर्थिक क्षमता जैसे पहलू भी मुआवजे की गणना में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इस मामले में मृतक की उम्र केवल 17 वर्ष थी। ऐसे में उसके भविष्य की कमाई की संभावना को भी अदालत के सामने विचार का विषय बनाया गया।
हालांकि परिवार द्वारा बताई गई छह हजार रुपये की आय का दावा प्रमाण के अभाव में स्वीकार नहीं हुआ, लेकिन अदालत ने चार हजार रुपये मासिक आय को आधार बनाकर अन्य निर्धारित मानकों के साथ मुआवजे की गणना की।
इसी गणना के बाद हाई कोर्ट ने मूल मुआवजे की राशि 6.5 लाख रुपये निर्धारित की।
सिर्फ लाइसेंस नहीं होने से मुआवजा खत्म नहीं हो जाता
मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू मृत किशोर के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होने से जुड़ा था।
यह निर्विवाद है कि कानून के अनुसार वाहन चलाने के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस आवश्यक है। नाबालिग द्वारा वाहन चलाना भी अलग से कानूनी प्रश्न खड़ा कर सकता है।
लेकिन हाई कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या लाइसेंस का अभाव अपने आप सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिवार के मुआवजे के अधिकार को खत्म कर देता है?
अदालत ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने दुर्घटना की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को भी देखा। बीमा कंपनी की ओर से यह दावा किया गया था कि किशोर की भी गलती थी, लेकिन अदालत के अनुसार बीमा कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि दुर्घटना वास्तव में किशोर की लापरवाही के कारण हुई थी।
पीछे से कार की टक्कर को भी अदालत ने देखा
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार किशोर स्कूटी से जा रहा था और पीछे से एक कार ने उसकी स्कूटी को टक्कर मारी थी।
दुर्घटना के तरीके को देखते हुए बीमा कंपनी पर यह साबित करने का दायित्व था कि मृत किशोर की ओर से ऐसी लापरवाही हुई थी, जिसने दुर्घटना में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सिर्फ यह तथ्य कि किशोर के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, दुर्घटना की जिम्मेदारी तय करने के लिए अपने आप पर्याप्त नहीं माना गया।
यही अंतर इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है।
लाइसेंस का न होना एक अलग कानूनी उल्लंघन हो सकता है, लेकिन दुर्घटना किसकी गलती से हुई, यह अलग सवाल है।
दोनों बातों को एक ही मान लेना उचित नहीं है।
बीमा कंपनी को लापरवाही साबित करनी थी
मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में बीमा कंपनी यदि मृतक की contributory negligence यानी सह-दोष या आंशिक लापरवाही का दावा करती है तो उस दावे के समर्थन में साक्ष्य आवश्यक होते हैं।
इस मामले में हाई कोर्ट ने पाया कि बीमा कंपनी मृत किशोर की ऐसी लापरवाही साबित नहीं कर सकी, जिसके आधार पर मुआवजे को कम किया जा सके।
अदालत ने इसलिए केवल लाइसेंस नहीं होने के आधार पर परिवार के मुआवजे के दावे को समाप्त करने से इनकार कर दिया।
यह बात दुर्घटना के मामलों में काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुर्घटना के बाद अक्सर मृतक या घायल व्यक्ति के किसी यातायात नियम के उल्लंघन को आधार बनाकर मुआवजे की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की जाती है।
परिवार को 6.5 लाख रुपये का मुआवजा
कलकत्ता हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों, आय और अन्य निर्धारित मानकों को ध्यान में रखते हुए परिवार को 6.5 लाख रुपये का मूल मुआवजा देने का निर्देश दिया।
यह राशि जिला अदालत द्वारा पहले निर्धारित करीब 1.75 लाख रुपये से काफी अधिक है।
इसके अलावा बीमा कंपनी को दावा दायर किए जाने की तारीख से 6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा।
अदालत ने भुगतान को लेकर भी समयसीमा निर्धारित की है।
आठ सप्ताह के भीतर राशि जमा करनी होगी
हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि 6.5 लाख रुपये की मूल मुआवजा राशि और उस पर लागू ब्याज को फैसला सुनाए जाने के आठ सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराया जाए।
इस तरह अदालत ने केवल मुआवजे की राशि निर्धारित नहीं की, बल्कि उसके भुगतान की प्रक्रिया और समयसीमा भी स्पष्ट कर दी।
इससे परिवार को मुआवजे की वसूली के लिए अनिश्चित समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
नाबालिग द्वारा वाहन चलाने का सवाल अलग है
इस फैसले को यह समझना भी जरूरी है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि नाबालिग द्वारा वाहन चलाना कानूनन सही है।
वाहन चलाने की न्यूनतम आयु और लाइसेंस संबंधी नियमों का पालन करना जरूरी है। अभिभावकों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है कि वे नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति न दें।
लेकिन दुर्घटना के बाद मुआवजे के दावे में अलग कानूनी प्रश्न खड़े होते हैं।
एक सवाल यह है कि क्या वाहन चलाने वाले के पास वैध लाइसेंस था।
दूसरा सवाल यह है कि दुर्घटना किसकी लापरवाही से हुई।
तीसरा सवाल यह है कि मृतक की कथित लापरवाही ने दुर्घटना में कितना योगदान दिया।
चौथा सवाल यह है कि मृतक के आश्रितों को आर्थिक नुकसान कितना हुआ।
अदालत को इन सभी पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है।
परिवार के लिए मुआवजा क्यों महत्वपूर्ण है?
सड़क दुर्घटना में कम उम्र के व्यक्ति की मृत्यु होने पर परिवार को केवल एक सदस्य की कमी नहीं होती, बल्कि भविष्य की संभावित आर्थिक सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
इसीलिए मोटर दुर्घटना कानून में मुआवजे की व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ित परिवार को आर्थिक राहत देना है।
मुआवजा किसी व्यक्ति की जान की कीमत नहीं है। यह दुर्घटना के कारण परिवार को हुए आर्थिक नुकसान और अन्य वैधानिक पहलुओं के आधार पर मिलने वाली राहत है।
इसी वजह से अदालतें मुआवजे की गणना करते समय मृतक की उम्र, आय, आश्रितों और भविष्य की संभावनाओं जैसे पहलुओं पर विचार करती हैं।
इस फैसले से क्या कानूनी संदेश निकलता है?
कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले से सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आती है कि ड्राइविंग लाइसेंस का अभाव और दुर्घटना की लापरवाही दो अलग कानूनी मुद्दे हैं।
यदि किसी व्यक्ति के पास लाइसेंस नहीं था तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई का प्रश्न अलग हो सकता है। लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि सड़क दुर्घटना उसी की गलती से हुई।
यदि बीमा कंपनी यह दावा करती है कि मृतक की लापरवाही के कारण दुर्घटना हुई तो उसे उस दावे को साक्ष्यों से स्थापित करना होगा।
इस मामले में हाई कोर्ट ने पाया कि बीमा कंपनी मृत किशोर की लापरवाही साबित नहीं कर सकी। इसलिए परिवार को केवल लाइसेंस न होने के आधार पर मुआवजे से वंचित करना उचित नहीं माना गया।
निष्कर्ष
कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला सड़क दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करता है। किसी व्यक्ति के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होना कानून का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिवार का मुआवजा दावा खत्म नहीं किया जा सकता।
नदिया के रानाघाट में दिसंबर 2016 में हुई दुर्घटना में 17 वर्षीय किशोर की मौत के बाद परिवार ने मुआवजे का दावा किया था। जिला अदालत ने करीब 1.75 लाख रुपये तय किए थे, लेकिन हाई कोर्ट में मामले की दोबारा समीक्षा के बाद चार हजार रुपये मासिक आय को आधार बनाकर मुआवजे की गणना की गई और राशि बढ़ाकर 6.5 लाख रुपये कर दी गई।
बीमा कंपनी मृत किशोर की कथित लापरवाही साबित नहीं कर सकी। इसलिए अदालत ने मुआवजा देने का निर्देश दिया और दावा दायर करने की तारीख से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी निर्धारित किया।
इस फैसले का व्यापक संदेश यही है कि किसी यातायात नियम के उल्लंघन को दुर्घटना की वास्तविक जिम्मेदारी का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता। मुआवजे के मामले में दुर्घटना की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।