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डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में सिर्फ कॉल करने वालों तक सीमित नहीं रह सकती जांच, दिल्ली हाई कोर्ट

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में सिर्फ कॉल करने वालों तक सीमित नहीं रह सकती जांच, दिल्ली हाई कोर्ट ने मनी ट्रेल पर दिया जोर

       डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड के बढ़ते मामलों के बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने जांच एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण बात कही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में जांच केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, जिन्होंने पीड़ित को फोन किया, खुद को पुलिस, सीबीआई, ट्राई या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताया और उसे डराकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। ठगी की रकम जिन बैंक खातों में पहुंचती है, वहां से उसे आगे भेजने या दूसरे तरीके से ठिकाने लगाने वाले लोगों की पहचान करना भी जांच का अहम हिस्सा है।

जस्टिस संजीव नरूला ने यह टिप्पणी करीब 2.65 करोड़ रुपये के कथित डिजिटल-अरेस्ट फ्रॉड मामले में हिमांशु नाम के आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इस मामले में आरोपी के खिलाफ पीड़ित से सीधे बातचीत करने या उसे धमकी देने का आरोप नहीं था। पुलिस की जांच में उसकी कथित भूमिका पैसों के लेन-देन और मनी ट्रेल के जरिए सामने आई थी।

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड का तरीका क्या है?

पिछले कुछ समय में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का एक ऐसा तरीका सामने आया है, जिसमें अपराधी पहले पीड़ित से संपर्क करते हैं और फिर धीरे-धीरे उसे मानसिक दबाव में ले लेते हैं।

कभी कॉल करने वाला खुद को टेलीकॉम विभाग का अधिकारी बताता है, कभी पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, कस्टम अधिकारी या किसी अन्य सरकारी संस्था का कर्मचारी। पीड़ित को बताया जाता है कि उसके नाम से कोई संदिग्ध मोबाइल कनेक्शन, बैंक खाता, पार्सल या मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा मामला सामने आया है।

इसके बाद उसे गिरफ्तारी का डर दिखाया जाता है। कई मामलों में वीडियो कॉल पर बने रहने, कैमरा बंद नहीं करने, किसी से बात नहीं करने और निर्देशों का पालन करने के लिए कहा जाता है। इसी मानसिक दबाव के बीच पीड़ित को अलग-अलग बैंक खातों में रकम भेजने के लिए मजबूर किया जाता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह की धोखाधड़ी में अपराध का पूरा ढांचा केवल फोन पर धमकी देने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं होता। रकम को प्राप्त करने और उसे आगे स्थानांतरित करने वाला नेटवर्क भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

2.65 करोड़ रुपये के मामले में क्या हुआ?

यह मामला दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दर्ज FIR से जुड़ा है। FIR में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 419, 420, 384 और 120B के तहत आरोप लगाए गए थे।

पुलिस के अनुसार, एक वरिष्ठ नागरिक को Skype और टेलीफोन के माध्यम से संपर्क किया गया। कॉल करने वालों ने कथित तौर पर खुद को TRAI, मुंबई पुलिस और CBI के अधिकारी के रूप में पेश किया।

पीड़ित को बताया गया कि वह किसी गंभीर मामले में फंस गया है और उसे गिरफ्तारी का सामना करना पड़ सकता है। आरोप है कि लगातार दबाव और धमकी के बीच उससे करीब 2.65 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करा लिए गए।

मामले में हिमांशु की भूमिका अलग तरीके से सामने आई। उस पर यह आरोप नहीं था कि उसने खुद पीड़ित से बातचीत की या उसे सीधे धमकाया। पुलिस ने उसके बैंक खाते में पहुंची रकम और उससे जुड़े लेन-देन के आधार पर उसकी कथित भूमिका की जांच की।

यही पहलू अग्रिम जमानत की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण बन गया।

कोर्ट ने मनी ट्रेल को क्यों माना महत्वपूर्ण?

जस्टिस संजीव नरूला ने इस बात पर जोर दिया कि साइबर अपराधों में पैसे का रास्ता यानी Money Trail अक्सर जांच की महत्वपूर्ण कड़ी होता है।

कोर्ट ने कहा कि डिजिटल-अरेस्ट फ्रॉड आमतौर पर सरकारी अधिकारियों का रूप धारण करने, लगातार मानसिक दबाव बनाने और कई बैंक खातों के माध्यम से तेजी से रकम ट्रांसफर करने के तरीके से किए जाते हैं।

ऐसे में अगर जांच सिर्फ उस व्यक्ति की पहचान तक सीमित रह जाए जिसने पीड़ित से बात की थी, तो अपराध की पूरी श्रृंखला सामने नहीं आ सकती।

ठगी की रकम किस खाते में गई? उस खाते का मालिक कौन है? खाते में रकम आने का वास्तविक कारण क्या था? रकम आने के बाद वह कहां भेजी गई? क्या संबंधित व्यक्ति को मालूम था कि पैसा अपराध से जुड़ा हो सकता है? क्या खाते का इस्तेमाल केवल रकम को आगे भेजने के लिए किया गया?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब मनी ट्रेल की जांच से मिल सकता है।

‘म्यूल अकाउंट’ की भूमिका पर भी जोर

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस मामले का भी उल्लेख किया जिसमें डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर व्यापक चिंता व्यक्त की गई थी। यह मामला ‘In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents’ के नाम से जाना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल-अरेस्ट स्कैम के बड़े पैमाने और इसकी गंभीरता को देखते हुए विशेष और समन्वित जांच की जरूरत पर जोर दिया था। इस संदर्भ में ‘म्यूल’ बैंक अकाउंट्स की जांच भी महत्वपूर्ण मानी गई।

म्यूल अकाउंट सामान्य तौर पर ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल दूसरे लोगों की रकम प्राप्त करने और उसे आगे भेजने के लिए किया जाता है। कई साइबर अपराधों में अपराधी खुद अपने नाम के खातों का इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसके बजाय दूसरे व्यक्तियों या संस्थाओं के खातों के जरिए रकम को कई चरणों में घुमाया जाता है।

इसलिए किसी खाते में ठगी की रकम पहुंच जाना अपने आप में हर मामले में अपराध सिद्ध नहीं करता, लेकिन जांच एजेंसी के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण हो जाता है कि रकम वहां कैसे पहुंची और उसके बाद उसका क्या हुआ।

5.31 लाख रुपये के लेन-देन पर उठे सवाल

हिमांशु के मामले में पुलिस ने एक विशेष लेन-देन का उल्लेख किया। पुलिस का दावा था कि वेवलैंड कॉमेस्टिबल प्राइवेट लिमिटेड के खाते से 5,31,168 रुपये आरोपी के Kotak Mahindra Bank खाते में ट्रांसफर किए गए थे।

पुलिस के अनुसार, इसी खाते में शिकायतकर्ता की करीब 1.15 करोड़ रुपये की रकम पहले जमा हुई थी।

यहीं से आरोपी की कथित भूमिका को लेकर जांच आगे बढ़ी।

हिमांशु की ओर से यह तर्क दिया गया कि 5,31,168 रुपये की रकम किसी अपराध से जुड़ी नहीं थी, बल्कि मोबाइल फोन की बिक्री से संबंधित एक वास्तविक व्यावसायिक लेन-देन का भुगतान था।

आरोपी ने इस दावे के समर्थन में इनवॉइस का भी हवाला दिया।

लेकिन हाई कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को इस स्तर पर पर्याप्त नहीं माना।

सिर्फ इनवॉइस से कोर्ट संतुष्ट क्यों नहीं हुआ?

कोर्ट ने कहा कि यदि कोई लेन-देन वास्तविक व्यावसायिक सौदे का हिस्सा है तो सामान्य तौर पर उसके साथ अन्य व्यावसायिक रिकॉर्ड भी मौजूद हो सकते हैं।

अदालत ने ध्यान दिलाया कि आरोपी की ओर से GST और Income Tax Returns, Stock Register, Purchase Register, Sales Register, Ledger, Delivery Challans, Transport Receipts, Payment Receipts और E-Way Bills जैसे सामान्य कारोबारी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।

इन दस्तावेजों की अनुपस्थिति ने अदालत के सामने यह सवाल खड़ा किया कि जिस लेन-देन को सामान्य व्यापारिक भुगतान बताया जा रहा है, उसका पूरा कारोबारी रिकॉर्ड कहां है।

यहां कोर्ट ने किसी दस्तावेज की अनुपस्थिति को अपने आप अपराध का अंतिम प्रमाण नहीं माना, बल्कि जांच के लिए उसकी प्रासंगिकता पर ध्यान दिया।

अदालत के सामने मूल प्रश्न यह था कि क्या आरोपी द्वारा बताया गया व्यापारिक लेन-देन वास्तव में हुआ था या यह रकम किसी अन्य उद्देश्य से उसके खाते में पहुंची थी।

खरीदार का फोन नंबर और WhatsApp बातचीत भी नहीं मिली

अदालत ने एक और महत्वपूर्ण पहलू पर गौर किया। याचिकाकर्ता कथित खरीदार का टेलीफोन नंबर या उसके साथ हुई WhatsApp बातचीत उपलब्ध कराने में असमर्थ रहा।

अगर मोबाइल फोन की बिक्री के संबंध में वास्तविक कारोबारी लेन-देन हुआ था तो खरीदार से संपर्क, बातचीत, भुगतान और डिलीवरी से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड जांच में उपयोगी हो सकते थे।

डिजिटल अपराधों की जांच में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि लेन-देन केवल बैंक स्टेटमेंट तक सीमित नहीं रहता। फोन कॉल, WhatsApp चैट, ईमेल, इनवॉइस, GST रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजेक्शन, ई-वे बिल और डिलीवरी रिकॉर्ड एक-दूसरे से जुड़कर पूरी तस्वीर सामने ला सकते हैं।

5,31,168 रुपये जमा करने का प्रस्ताव भी स्वीकार नहीं हुआ

आरोपी की ओर से 5,31,168 रुपये जमा करने का प्रस्ताव भी रखा गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने इसे पर्याप्त आधार नहीं माना।

अदालत ने साफ किया कि जांच का उद्देश्य केवल किसी विशेष रकम की रिकवरी करना नहीं है।

अगर जांच एजेंसी को यह पता लगाना है कि अपराध से जुड़ी रकम किस रास्ते से आगे बढ़ी, तो केवल उतनी रकम वापस कर देना जांच का विकल्प नहीं हो सकता।

कोर्ट ने कहा कि जांच में यह पता लगाना जरूरी है कि पैसा आरोपी के खाते में कैसे पहुंचा, जिस लेन-देन का स्पष्टीकरण दिया गया है वह वास्तविक था या नहीं और रकम उसके खाते में आने के बाद कहां गई।

यानी अदालत ने Recovery और Investigation के बीच अंतर को रेखांकित किया।

अग्रिम जमानत में आरोपी को क्या राहत नहीं मिली?

हिमांशु की ओर से अग्रिम जमानत की मांग की गई थी। उनका पक्ष था कि उनके खिलाफ सीधे तौर पर पीड़ित से बातचीत या धमकी देने का आरोप नहीं है और जिस रकम को लेकर संदेह जताया गया है, उसके संबंध में कारोबारी दस्तावेज मौजूद हैं।

लेकिन अदालत ने जांच के इस चरण में इन दलीलों को अग्रिम जमानत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

कोर्ट ने कहा कि अभी जांच का उद्देश्य केवल रकम की वसूली करना नहीं है, बल्कि पूरे लेन-देन की प्रकृति और उसके स्रोत की जांच करना भी आवश्यक है।

अदालत ने यह भी माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी ने BNSS की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत के लिए आवश्यक आधार स्थापित नहीं किया है।

इसके बाद अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

साइबर अपराध की जांच के लिए क्या संदेश निकलता है?

दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश डिजिटल फ्रॉड की जांच के व्यापक तरीके की ओर संकेत करता है। आधुनिक साइबर अपराधों में अपराधी अक्सर अलग-अलग स्तरों पर काम करते हैं।

एक व्यक्ति पीड़ित से बातचीत कर सकता है। दूसरा नकली दस्तावेज या पहचान तैयार कर सकता है। तीसरा बैंक खाते की व्यवस्था कर सकता है। चौथा रकम को दूसरे खाते में भेज सकता है और आगे कोई अन्य व्यक्ति उसे नकद, क्रिप्टोकरेंसी या किसी दूसरे माध्यम से निकाल सकता है।

ऐसी स्थिति में केवल फोन करने वाले व्यक्ति को पकड़ना पूरी आपराधिक श्रृंखला तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

यही कारण है कि बैंक स्टेटमेंट, KYC रिकॉर्ड, IP details, मोबाइल नंबर, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, चैट, CCTV फुटेज, डिवाइस फॉरेंसिक और दूसरे डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका बढ़ जाती है।

बैंक खाते में रकम आना और अपराध साबित होना अलग बातें हैं

इस मामले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी भी समझी जानी चाहिए। किसी व्यक्ति के बैंक खाते में ठगी की रकम पहुंच जाना और उस व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता साबित हो जाना एक ही बात नहीं है।

जांच एजेंसी को यह स्थापित करना होगा कि संबंधित रकम का स्रोत क्या था, संबंधित व्यक्ति की भूमिका क्या थी, उसे लेन-देन की प्रकृति के बारे में क्या जानकारी थी और रकम को आगे भेजने में उसकी क्या भूमिका रही।

इसीलिए हाई कोर्ट ने मनी ट्रेल की जांच को जरूरी बताया है। मनी ट्रेल जांच की दिशा दिखा सकता है, लेकिन प्रत्येक आरोपी की वास्तविक भूमिका और आपराधिक ज्ञान का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में बढ़ती चुनौती

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड का सबसे खतरनाक पहलू केवल आर्थिक नुकसान नहीं है। अपराधी पीड़ित के डर और सरकारी संस्थाओं के प्रति उसके भरोसे का इस्तेमाल करते हैं।

किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिलाना कि उसके खिलाफ FIR हो गई है, उसका नाम मनी लॉन्ड्रिंग में आया है या पुलिस उसे तुरंत गिरफ्तार करने वाली है—मानसिक दबाव बनाने की एक रणनीति हो सकती है।

ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के सामने चुनौती यह होती है कि अपराधी अक्सर अलग-अलग शहरों और राज्यों में बैठे हो सकते हैं और पैसे का लेन-देन कई बैंक खातों से होकर गुजर सकता है।

दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक चुनौती की ओर ध्यान खींचती है।

निष्कर्ष

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड की जांच अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रह सकती कि पीड़ित को फोन किसने किया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने 2.65 करोड़ रुपये के इस मामले में मनी ट्रेल की अहमियत को रेखांकित करते हुए कहा कि पैसे को प्राप्त करने, आगे भेजने या ठिकाने लगाने वाले लोगों की पहचान भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी रकम को जमा कर देने का प्रस्ताव अपने आप में जांच का विकल्प नहीं है। जांच एजेंसी को रकम के स्रोत, खाते तक पहुंचने के तरीके, कथित कारोबारी लेन-देन की वास्तविकता और उसके बाद पैसे के प्रवाह का पता लगाना होगा।

डिजिटल अपराधों की बदलती प्रकृति को देखते हुए यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। अपराधी चाहे कितनी भी परतों के पीछे अपनी पहचान छिपाने की कोशिश करें, बैंकिंग ट्रेल और डिजिटल साक्ष्य उनके बीच संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण जांच, साक्ष्य और मुकदमे की प्रक्रिया में होगा। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट की यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे संगठित साइबर अपराधों में ‘कॉल करने वाला कौन था’ के साथ-साथ ‘पैसा किसने लिया, किसने भेजा और आखिर पैसा गया कहां’—इन सवालों के जवाब भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।