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सिंगल यूज प्लास्टिक पर अब सिर्फ जुर्माना नहीं, हाई कोर्ट ने पूछा- निर्माण और सप्लाई का स्रोत कहां है?

सिंगल यूज प्लास्टिक पर अब सिर्फ जुर्माना नहीं, हाई कोर्ट ने पूछा- निर्माण और सप्लाई का स्रोत कहां है?

      प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अब सिर्फ बाजारों में छापेमारी, प्लास्टिक जब्त करने और जुर्माना वसूलने से काम नहीं चलेगा। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और प्रशासन से यह जानना शुरू कर दिया है कि आखिर प्रतिबंधित प्लास्टिक बाजार तक पहुंच कैसे रहा है और इसके पीछे निर्माण, परिवहन, भंडारण तथा आपूर्ति का नेटवर्क कहां मौजूद है।

अदालत के इस सवाल के बाद राज्य में नगरीय निकायों के स्तर पर प्रतिबंधित प्लास्टिक के खिलाफ की गई कार्रवाई का नया ब्योरा जुटाया जा रहा है। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने प्रदेश के सभी नगर निगमों, नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों से निर्धारित प्रारूप में विस्तृत जानकारी मांगी है।

यह जानकारी मुख्य सचिव के नए शपथपत्र और कार्रवाई रिपोर्ट का हिस्सा बनेगी। मामले में हाई कोर्ट की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होनी है।

इस पूरी कवायद का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि केवल जुर्माना लगाने से प्रतिबंधित प्लास्टिक की समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि बाजार में प्रतिबंधित प्लास्टिक लगातार पहुंच रहा है तो प्रशासन को उसके स्रोत तक पहुंचना होगा।

1 जुलाई से 7 अक्टूबर तक की कार्रवाई का मांगा गया पूरा ब्योरा

नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने सभी संबंधित नगरीय निकायों से 1 जुलाई से 7 अक्टूबर 2026 तक की कार्रवाई की जानकारी मांगी है।

निकायों को निर्धारित प्रपत्र में जानकारी उपलब्ध करानी होगी। इसमें केवल कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई या कितना जुर्माना वसूला गया, इसका विवरण ही पर्याप्त नहीं होगा। कार्रवाई के अलग-अलग पहलुओं की जानकारी देनी होगी।

इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य स्तर पर आंकड़ों का संकलन किया जाएगा और फिर मुख्य सचिव की ओर से हाई कोर्ट में नया शपथपत्र तथा Action Taken Report प्रस्तुत की जाएगी।

इसका अर्थ यह है कि अब अदालत के सामने केवल पुराने आंकड़े नहीं, बल्कि हाल की अवधि में प्रशासन ने क्या किया, इसका भी विवरण रखा जाएगा।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित है। इसलिए नगरीय निकायों के लिए समय पर और तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण हो गया है।

नितिन सांघवी की जनहित याचिका से जुड़ा है मामला

यह पूरा मामला नितिन सांघवी की जनहित याचिका (Public Interest Litigation) से जुड़ा हुआ है। इस याचिका के माध्यम से प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई को लेकर हाई कोर्ट में मामला पहुंचा।

अदालत ने इस मामले को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समय-समय पर सरकार से कार्रवाई की स्थिति की जानकारी मांगी।

13 मई की सुनवाई में हाई कोर्ट ने विशेष रूप से यह स्पष्ट किया था कि केवल जुर्माना लगाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

अदालत का सवाल सीधा था—यदि प्रतिबंधित प्लास्टिक का उपयोग बाजार में हो रहा है तो वह वहां पहुंच कैसे रहा है?

यहीं से जांच का फोकस उपयोगकर्ता से आगे बढ़कर पूरे नेटवर्क पर जाने लगा।

कोर्ट ने पूछा- प्लास्टिक बन कहां रहा है?

प्रतिबंधित प्लास्टिक पर कार्रवाई करने में अक्सर सबसे आसान लक्ष्य दुकानदार या अंतिम उपयोगकर्ता होता है। किसी दुकान पर प्लास्टिक की थैली मिली तो उसे जब्त कर लिया गया, चालान काट दिया गया और जुर्माना वसूल लिया गया।

लेकिन यदि अगले दिन उसी बाजार में फिर वही प्रतिबंधित प्लास्टिक उपलब्ध हो जाए तो समस्या वहीं की वहीं रहती है।

हाई कोर्ट ने इसी मूल समस्या की ओर ध्यान खींचा।

अदालत ने अधिकारियों से यह पता लगाने को कहा कि प्रतिबंधित प्लास्टिक का निर्माण कहां हो रहा है, उसका परिवहन कौन कर रहा है और उसकी आपूर्ति किन माध्यमों से की जा रही है।

यानी कार्रवाई को अंतिम स्तर से शुरुआती स्तर तक ले जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

अगर निर्माण करने वाली इकाई तक पहुंच हो जाए, परिवहन के रास्ते की पहचान हो जाए और सप्लाई करने वालों पर कार्रवाई हो तो बाजार में प्रतिबंधित प्लास्टिक की उपलब्धता को कम करने की संभावना बढ़ सकती है।

सिर्फ दुकानदार पर कार्रवाई से क्यों नहीं रुकेगा मामला?

मान लीजिए किसी बाजार में किसी दुकानदार के पास 1000 प्रतिबंधित प्लास्टिक बैग मिले। प्रशासन ने उन्हें जब्त कर लिया और दुकानदार पर जुर्माना लगा दिया।

लेकिन अगला सवाल यह है कि ये 1000 बैग दुकानदार तक पहुंचे कैसे?

क्या उसने इन्हें किसी थोक विक्रेता से खरीदा था?
क्या इन्हें किसी स्थानीय निर्माता ने बनाया था?
क्या ये दूसरे शहर या राज्य से आए थे?
किस वाहन से इनका परिवहन हुआ?
किसने इन्हें बाजार में पहुंचाया?
क्या इसी स्रोत से दूसरे दुकानदार भी माल खरीद रहे हैं?

यदि इन सवालों का जवाब नहीं खोजा जाता तो कार्रवाई मुख्यतः अंतिम स्तर पर ही रह जाती है।

हाई कोर्ट की निगरानी में अब इसी पूरी श्रृंखला पर जानकारी जुटाने की कोशिश की जा रही है।

पुराने शपथपत्र के बाद फिर जुटाई जा रही जानकारी

24 अगस्त की सुनवाई में हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव को पहले दाखिल शपथपत्र के संबंधित हिस्सों पर नया शपथपत्र पेश करने के लिए कहा था।

इसके बाद नगरीय निकायों से नए सिरे से जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू हुई है।

सरकार के सामने चुनौती यह है कि प्रदेश के अलग-अलग नगरीय निकायों में हुई कार्रवाई को एक समान प्रारूप में संकलित किया जाए, ताकि हाई कोर्ट के सामने स्थिति स्पष्ट रूप से रखी जा सके।

अलग-अलग निकायों में कार्रवाई का तरीका और आंकड़े अलग हो सकते हैं। इसलिए अब उनसे निर्धारित प्रारूप में जानकारी मांगी गई है।

इस प्रक्रिया में केवल कुल जुर्माना बताना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी दिखाना होगा कि प्रतिबंधित प्लास्टिक के खिलाफ वास्तव में किस प्रकार की कार्रवाई की गई।

पहले की रिपोर्ट में सामने आए थे ये आंकड़े

मुख्य सचिव द्वारा 7 जुलाई को दाखिल शपथपत्र में प्रदेश के 194 नगरीय निकायों में की गई कार्रवाई के आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे।

उस शपथपत्र के अनुसार 1 जुलाई 2022 से मई 2026 तक कुल 16,497 निरीक्षण किए गए थे।

इन निरीक्षणों के दौरान करीब 9,216 किलोग्राम सिंगल यूज प्लास्टिक जब्त किया गया।

इसके अलावा लगभग 59 लाख 75 हजार 574 रुपये का जुर्माना वसूले जाने की जानकारी दी गई थी।

ये आंकड़े बताते हैं कि प्रशासन की ओर से लंबे समय से कार्रवाई की जा रही थी। लेकिन अदालत के सवाल के बाद अब कार्रवाई की दिशा और व्यापक हो गई है।

अब यह देखना होगा कि इन जब्तियों और जुर्माने के बावजूद प्रतिबंधित प्लास्टिक की आपूर्ति जारी क्यों है और उसके पीछे कौन से स्रोत हैं।

रायपुर में निर्माता के खिलाफ आपराधिक शिकायत

पुरानी रिपोर्ट में रायपुर से जुड़ी कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया था।

रायपुर में करीब 7 लाख 26 हजार 500 रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाए जाने की जानकारी दी गई थी। इसके अलावा एक निर्माता के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई थी।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कार्रवाई केवल प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि निर्माण स्तर तक पहुंचती है।

हाई कोर्ट द्वारा पूछे गए सवाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि यदि प्रतिबंधित प्लास्टिक का उत्पादन कहीं हो रहा है तो संबंधित निर्माता या उत्पादन केंद्र की पहचान और उसके खिलाफ कार्रवाई का रिकॉर्ड क्या है।

बिलासपुर में विशेष अभियान

बिलासपुर में भी मई और जून 2026 में विशेष अभियान चलाए गए थे।

इन अभियानों के दौरान करीब 386 किलोग्राम प्रतिबंधित प्लास्टिक जब्त किए जाने की जानकारी दी गई थी। इसके साथ करीब 93,100 रुपये जुर्माना और पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाए जाने की बात सामने आई।

ऐसे विशेष अभियान आमतौर पर बाजारों और व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रतिबंधित सामग्री की जांच के लिए चलाए जाते हैं।

हालांकि अब हाई कोर्ट की निगरानी में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जब्ती के बाद आगे क्या हुआ? जिस स्रोत से प्लास्टिक आया था, उसकी पहचान हुई या नहीं? यदि स्रोत मिला तो उस पर कार्रवाई हुई या नहीं?

यही जानकारी अब नई रिपोर्ट का हिस्सा बन सकती है।

तीन हिस्सों में मांगी गई जानकारी

नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने इस बार निकायों से जानकारी को तीन प्रमुख हिस्सों में मांगा है।

पहला हिस्सा—सफाई और प्लास्टिक कचरा हटाने का अभियान

निकायों को सफाई अभियान और प्लास्टिक कचरे को हटाने के लिए किए गए कार्यों की जानकारी देनी होगी।

इसमें यह बताया जा सकता है कि किस क्षेत्र में सफाई अभियान चलाया गया, कितनी मात्रा में प्लास्टिक कचरा हटाया गया और उसके निस्तारण के लिए क्या व्यवस्था की गई।

यह हिस्सा प्लास्टिक प्रदूषण के बाद की समस्या से जुड़ा है।

दूसरा हिस्सा—जनजागरूकता अभियान

प्रतिबंधित प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकने के लिए जनता को जागरूक करना भी महत्वपूर्ण है।

निकायों को अपने जनजागरूकता कार्यक्रमों की जानकारी देनी होगी। इसमें स्कूलों, बाजारों, व्यापारिक संगठनों, नागरिक समूहों या अन्य स्तरों पर चलाए गए अभियानों का विवरण शामिल हो सकता है।

केवल कानून और जुर्माना किसी प्रतिबंध को पूरी तरह प्रभावी नहीं बना सकते। आम लोगों और कारोबारियों को यह पता होना भी जरूरी है कि कौन सी प्लास्टिक सामग्री प्रतिबंधित है और उसके स्थान पर कौन से विकल्प इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

तीसरा हिस्सा—निर्माण से आपूर्ति तक कार्रवाई

सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रतिबंधित प्लास्टिक के निर्माण, परिवहन, भंडारण और आपूर्ति से संबंधित है।

निकायों को यह बताना होगा कि ऐसे कितने मामले सामने आए, कितनी मात्रा में प्लास्टिक जब्त किया गया और संबंधित मामलों में क्या कार्रवाई की गई।

यही वह जानकारी है जिसकी जरूरत हाई कोर्ट ने विशेष रूप से महसूस की है।

अब कार्रवाई की गुणवत्ता भी देखी जाएगी

पहले यदि किसी निकाय ने कहा कि उसने 100 दुकानों की जांच की और 50 हजार रुपये जुर्माना वसूला, तो यह कार्रवाई का एक आंकड़ा था।

लेकिन अब अदालत के सवाल के बाद संभवतः इससे आगे जाना होगा।

कितने निर्माता पकड़े गए?
कितने परिवहनकर्ताओं की पहचान हुई?
कितने गोदामों की जांच हुई?
कितनी मात्रा में प्लास्टिक स्रोत स्तर पर जब्त हुआ?
कितने मामलों में आपराधिक कार्रवाई हुई?
कितने मामलों में पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाई गई?

ऐसे सवालों के जवाब से यह पता चल सकता है कि कार्रवाई केवल आंकड़े बढ़ाने के लिए हो रही है या वास्तव में प्रतिबंधित प्लास्टिक की सप्लाई चेन को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण का सवाल सिर्फ प्लास्टिक बैग तक सीमित नहीं

सिंगल यूज प्लास्टिक की समस्या केवल एक प्लास्टिक बैग या कप तक सीमित नहीं है। इसका संबंध कचरा प्रबंधन, नालियों के जाम होने, जल निकायों में प्रदूषण और लंबे समय तक बने रहने वाले प्लास्टिक कचरे से भी है।

शहरों में प्लास्टिक कचरा अक्सर नालियों और जल निकासी व्यवस्था में पहुंच जाता है। बारिश के दौरान यही कचरा जलभराव की समस्या को बढ़ा सकता है।

दूसरी तरफ प्लास्टिक के उचित निस्तारण की व्यवस्था न होने पर खुले में फेंका गया कचरा लंबे समय तक पर्यावरण में बना रह सकता है।

इसलिए प्रतिबंधित प्लास्टिक पर कार्रवाई का उद्देश्य केवल दुकानदारों से जुर्माना वसूलना नहीं होना चाहिए। इसका व्यापक उद्देश्य प्लास्टिक कचरे के स्रोत और प्रवाह को नियंत्रित करना है।

जनजागरूकता और प्रवर्तन दोनों जरूरी

एक तरफ प्रशासन को नियमों का पालन सुनिश्चित करना होगा, दूसरी तरफ जनता को वैकल्पिक सामग्री के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना भी जरूरी है।

यदि किसी बाजार में दुकानदार को प्रतिबंधित प्लास्टिक नहीं देने का निर्देश है लेकिन उसे वैकल्पिक पैकेजिंग आसानी से उपलब्ध नहीं है, तो व्यवहार में समस्या बनी रह सकती है।

इसीलिए जनजागरूकता अभियान और प्रवर्तन कार्रवाई दोनों को साथ लेकर चलना जरूरी है।

हाई कोर्ट के समक्ष अब सरकार को यह बताना होगा कि इन दोनों स्तरों पर क्या कदम उठाए गए।

13 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर

अब सभी की निगाहें 13 अक्टूबर को होने वाली हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर हैं।

उस समय मुख्य सचिव की ओर से नया शपथपत्र और Action Taken Report प्रस्तुत की जानी है। इस रिपोर्ट में 1 जुलाई से 7 अक्टूबर तक की कार्रवाई का विवरण शामिल होगा।

विशेष रूप से यह देखा जा सकता है कि राज्य के नगरीय निकायों ने प्रतिबंधित प्लास्टिक के निर्माण, परिवहन, भंडारण और आपूर्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई की।

यदि रिपोर्ट में केवल जब्ती और जुर्माने के आंकड़े होंगे तो अदालत द्वारा उठाया गया मूल सवाल पूरी तरह संबोधित नहीं हो सकता। इसके विपरीत यदि स्रोत स्तर तक की कार्रवाई, निर्माताओं की पहचान और सप्लाई नेटवर्क के संबंध में ठोस जानकारी सामने आती है तो सरकार की कार्रवाई की तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष

प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक को लेकर दिल्ली या किसी एक शहर की नहीं, बल्कि देश के कई हिस्सों में प्रशासन के सामने चुनौती बनी हुई है। बाजार में प्रतिबंधित प्लास्टिक की मौजूदगी केवल दुकानदार या ग्राहक की गलती का परिणाम नहीं हो सकती। उसके पीछे उत्पादन, थोक बिक्री, परिवहन, भंडारण और वितरण की पूरी श्रृंखला हो सकती है।

हाई कोर्ट की निगरानी में चल रहे इस मामले में अब यही महत्वपूर्ण सवाल बन गया है कि प्रशासन उस श्रृंखला के स्रोत तक कितना पहुंच पाया है।

पहले के आंकड़ों में 194 नगरीय निकायों में हजारों निरीक्षण, हजारों किलो प्लास्टिक की जब्ती और लाखों रुपये के जुर्माने की जानकारी सामने आ चुकी है। लेकिन अदालत की अपेक्षा अब इससे आगे की है।

सफाई अभियान, जनजागरूकता और प्रवर्तन कार्रवाई—तीनों के साथ यह पता लगाना भी जरूरी है कि प्रतिबंधित प्लास्टिक बन कहां रहा है, बाजार तक पहुंच कैसे रहा है और उसके पीछे कौन सा नेटवर्क काम कर रहा है।

13 अक्टूबर की सुनवाई में पेश होने वाली नई रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि उससे यह पता चलेगा कि राज्य सरकार और नगरीय निकायों ने हाई कोर्ट के इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए जमीन पर क्या कदम उठाए हैं।

आखिर प्रतिबंधित प्लास्टिक की समस्या का स्थायी समाधान केवल पकड़ने और जुर्माना लगाने से नहीं, बल्कि स्रोत से लेकर बाजार तक पूरी सप्लाई चेन पर प्रभावी नियंत्रण से ही संभव हो सकता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।