नाखूनों में छिपा था हत्या का राज: दो साल बाद DNA ने खोली रायपुर की लता साहू हत्याकांड की गुत्थी
रायपुर: अपराध की जांच में कई बार ऐसा वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आता है, जो घटना के समय भले ही छोटा दिखाई दे, लेकिन वर्षों बाद पूरी वारदात की तस्वीर बदल देता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में करीब दो साल पहले हुई 40 वर्षीय महिला लता साहू की हत्या का मामला इसका एक उदाहरण बनकर सामने आया है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में मृतका के नाखूनों से मिले जैविक नमूने जांच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुए। इन्हीं नमूनों से तैयार किए गए DNA प्रोफाइल ने पुलिस को उन संदिग्धों तक पहुंचने में मदद की, जिन पर अब हत्या का आरोप है।
पुलिस ने मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपियों में रायपुर के रावांभाठा निवासी मनहरण सारंग (33), मुंगेली के नवागांव निवासी राजेश पाल उर्फ चोटी उर्फ राजू (31) और रावांभाठा, खमतराई निवासी राजू मंडल उर्फ बंगाली (35) शामिल हैं।
इस पूरे मामले में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि हत्या 21 अगस्त 2024 को हुई थी, लेकिन आरोपियों की पहचान तत्काल नहीं हो सकी। जांच के दौरान पुलिस को मृतका के नाखूनों में अज्ञात व्यक्तियों के जैविक नमूने मिले थे। इन्हें सुरक्षित रखकर DNA प्रोफाइल तैयार की गई। करीब दो साल बाद जब जांच के दौरान कुछ संदिग्धों के बारे में जानकारी सामने आई और उनके DNA नमूने लिए गए, तो पुराने नमूनों से उनका मिलान किया गया। पुलिस का दावा है कि तीनों संदिग्धों के DNA मृतका के नाखूनों से मिले जैविक नमूनों से मेल खा गए।
ट्रांसपोर्ट नगर में हुई थी वारदात
मामला रायपुर के खमतराई थाना क्षेत्र के ट्रांसपोर्ट नगर का है। पुलिस के अनुसार, 21 अगस्त 2024 को लता साहू की उसके घर में हत्या कर दी गई थी। घटना के बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि हत्या करने वाले व्यक्तियों की तत्काल पहचान नहीं हो पाई थी।
मृतका के शरीर और घटनास्थल की जांच के दौरान पुलिस को ऐसे जैविक संकेत मिले, जो जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकते थे। नाखूनों में मिले नमूनों को सामान्य सबूत मानकर छोड़ने के बजाय उन्हें वैज्ञानिक परीक्षण के लिए सुरक्षित रखा गया।
हत्या के मामलों में अक्सर पीड़ित और हमलावर के बीच संघर्ष के दौरान त्वचा, रक्त या अन्य जैविक सामग्री एक-दूसरे के शरीर अथवा कपड़ों पर रह जाती है। इस मामले में भी पुलिस को संदेह था कि मृतका ने हत्या से पहले खुद को बचाने का प्रयास किया होगा और संघर्ष के दौरान हमलावरों की त्वचा के कुछ हिस्से उसके नाखूनों में फंस गए होंगे।
यही संभावना बाद में जांच की महत्वपूर्ण कड़ी बनी।
दो साल तक सुरक्षित रहा DNA प्रोफाइल
किसी हत्या के मामले में वैज्ञानिक साक्ष्य को सुरक्षित रखना जांच का अहम हिस्सा होता है। रायपुर पुलिस ने भी मृतका के नाखूनों से मिले जैविक नमूनों का DNA परीक्षण कराया और उसका प्रोफाइल सुरक्षित रखा।
उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि यह DNA किस व्यक्ति का है। इसलिए पुलिस के पास वैज्ञानिक साक्ष्य तो था, लेकिन उसका किसी आरोपी से मिलान करने के लिए संदिग्ध व्यक्ति की पहचान आवश्यक थी।
वर्ष 2026 में जांच के दौरान पुलिस को कुछ संदिग्धों के संबंध में जानकारी मिली। इसके बाद उनके DNA नमूने लिए गए। पुलिस के अनुसार, इन नमूनों का पुराने DNA प्रोफाइल से मिलान कराया गया। जांच में तीनों आरोपियों के DNA का मेल सामने आया।
यहीं से करीब दो वर्ष पुराना मामला एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया।
पूछताछ में सामने आई वारदात की कहानी
पुलिस के अनुसार, DNA मिलान के बाद तीनों आरोपियों से पूछताछ की गई। शुरुआत में आरोपियों ने घटना को लेकर अलग-अलग बातें बताईं। हालांकि, पुलिस का कहना है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर लगातार पूछताछ किए जाने के बाद वारदात से जुड़ी कई अहम जानकारियां सामने आईं।
पुलिस के मुताबिक, लता साहू के पहले पति का निधन हो चुका था। इसके बाद उसने दूसरी शादी की थी। उसका दूसरा पति फेरी लगाकर परिवार चलाता था।
पुलिस जांच के अनुसार, घटना वाले दिन मनहरण सारंग, राजेश पाल और राजू मंडल लता के घर पहुंचे थे। तीनों लता और उसके पति के परिचित बताए गए हैं।
घर में चारों ने शराब पी। पुलिस के मुताबिक, शराब खत्म होने के बाद दोबारा शराब लाने को लेकर विवाद शुरू हुआ। विवाद बढ़ते-बढ़ते झूमाझटकी तक पहुंच गया।
पुलिस के अनुसार तीनों ने इस तरह दबोचा
पुलिस का आरोप है कि विवाद के दौरान राजू मंडल उर्फ बंगाली ने लता का गला दबाया। इसी दौरान मनहरण सारंग ने उसके दोनों हाथ पकड़ रखे थे, जबकि राजेश पाल उर्फ चोटी ने उसके पैर पकड़ लिए थे।
लता ने खुद को बचाने के लिए संघर्ष किया। इसी संघर्ष के दौरान उसने आरोपियों को नोचने की कोशिश की। पुलिस के अनुसार, इसी दौरान आरोपियों की त्वचा के जैविक नमूने उसके नाखूनों में फंस गए।
कुछ समय बाद लता की छटपटाहट बंद हो गई।
पुलिस के मुताबिक, इसके बाद आरोपियों ने घर में रखी नकदी, साड़ी और पायल अपने कब्जे में ले ली और पीछे की दीवार से निकलकर वहां से फरार हो गए।
बताया गया है कि नकदी तीनों ने आपस में बांट ली, जबकि साड़ी और पायल मनहरण सारंग ने अपने पास रख ली।
हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगी। फिलहाल पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर मामले की आगे की जांच शुरू की है।
नाखूनों में मिले नमूने क्यों बने अहम?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू DNA evidence है। सामान्य तौर पर हत्या के मामलों में पुलिस घटनास्थल से फिंगरप्रिंट, खून, बाल, कपड़े, हथियार और दूसरे जैविक नमूनों को जांच के लिए सुरक्षित करती है। लेकिन नाखूनों के नीचे या आसपास मिले नमूने विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं, यदि यह संभावना हो कि मृतक ने हमलावर के साथ संघर्ष किया था।
किसी व्यक्ति के शरीर पर हमला होने की स्थिति में वह स्वाभाविक रूप से खुद को बचाने की कोशिश कर सकता है। इस दौरान उसके हाथ और नाखून हमलावर के शरीर के संपर्क में आ सकते हैं। ऐसी स्थिति में हमलावर की त्वचा या अन्य जैविक सामग्री नाखूनों में रह सकती है।
यदि उस जैविक सामग्री से उपयोगी DNA प्रोफाइल तैयार हो जाए, तो बाद में संदिग्ध व्यक्ति के DNA से उसका मिलान जांच को नई दिशा दे सकता है।
रायपुर के इस मामले में भी पुलिस के अनुसार यही हुआ।
दो साल बाद मिला वैज्ञानिक सबूत से सुराग
2024 में हुई हत्या के समय पुलिस के सामने आरोपियों की पहचान का सवाल था। लेकिन जांच में मिले जैविक नमूने भविष्य के लिए सुरक्षित रखे गए। जब 2026 में संदिग्धों की जानकारी सामने आई, तब उनके DNA नमूनों की तुलना पुराने प्रोफाइल से की गई।
इस तरह जांच में समय का अंतर निर्णायक बाधा नहीं बना। करीब दो साल पुराने वैज्ञानिक साक्ष्य को दोबारा उपयोग में लाकर पुलिस ने संदिग्धों तक पहुंचने का दावा किया है।
यह मामला यह भी दिखाता है कि आपराधिक जांच में घटनास्थल से मिले छोटे से छोटे साक्ष्य को सुरक्षित रखना क्यों महत्वपूर्ण होता है। उस समय किसी नमूने से आरोपी की पहचान न हो पाए, फिर भी भविष्य में किसी संदिग्ध के सामने आने पर वही नमूना महत्वपूर्ण बन सकता है।
आरोपियों का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी सामने आया
पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपी राजू मंडल उर्फ बंगाली मूल रूप से दुर्ग का रहने वाला है। पुलिस ने बताया कि उसके खिलाफ पहले से चोरी के दो मामले और हत्या का एक मामला दर्ज है। लता साहू हत्याकांड को पुलिस ने उसके खिलाफ चौथा अपराध बताया है।
वहीं पुलिस के अनुसार, मनहरण सारंग के खिलाफ भी मारपीट कर गंभीर चोट पहुंचाने और अवैध वसूली से संबंधित मामला पहले से दर्ज है।
किसी आरोपी का पिछला आपराधिक रिकॉर्ड वर्तमान मामले में उसकी दोषसिद्धि का स्वतः प्रमाण नहीं होता। मौजूदा हत्या के मामले में आरोपों को अदालत के समक्ष पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही तय किया जाएगा।
वैज्ञानिक जांच की भूमिका लगातार बढ़ रही है
आज के समय में आपराधिक मामलों की जांच केवल प्रत्यक्षदर्शियों के बयान या आरोपी से पूछताछ तक सीमित नहीं रह गई है। Forensic Science यानी फॉरेंसिक विज्ञान की भूमिका लगातार बढ़ी है। DNA profiling, fingerprint examination, forensic toxicology, CCTV analysis और digital evidence जैसे माध्यम जांच एजेंसियों को घटनाओं की कड़ियां जोड़ने में सहायता करते हैं।
DNA evidence की खासियत यह है कि किसी व्यक्ति की जैविक सामग्री से प्राप्त प्रोफाइल को दूसरे नमूने से वैज्ञानिक तरीके से तुलना की जा सकती है। हालांकि DNA का महत्व तभी सही तरीके से सामने आता है, जब नमूने का संग्रह, संरक्षण, परीक्षण और chain of custody उचित तरीके से किया गया हो।
किसी भी आपराधिक मामले में वैज्ञानिक रिपोर्ट अपने आप में पूरे घटनाक्रम का अंतिम निष्कर्ष नहीं होती। अदालत उपलब्ध सभी साक्ष्यों—गवाहों के बयान, परिस्थितिजन्य साक्ष्य, मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य सामग्री—का मूल्यांकन करती है।
दो साल पुरानी फाइल में फिर आई हलचल
लता साहू की हत्या के बाद परिवार और पुलिस के लिए यह मामला लंबे समय तक एक अनसुलझी पहेली बना रहा। लेकिन जांच के दौरान सुरक्षित रखे गए जैविक नमूनों ने मामले को आगे बढ़ाने का रास्ता दिया।
पुलिस का दावा है कि पुराने DNA प्रोफाइल और 2026 में लिए गए संदिग्धों के DNA नमूनों के बीच मिले मिलान के बाद तीनों आरोपियों तक पहुंच बनाई गई। इसके बाद पूछताछ में वारदात से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी सामने आई।
अब इस मामले में आगे की जांच के साथ-साथ अदालत में पेश किए जाने वाले साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे। पुलिस को यह भी स्थापित करना होगा कि DNA नमूनों का संग्रह और परीक्षण किस प्रक्रिया के तहत हुआ, आरोपियों और मृतका के बीच संपर्क कैसे हुआ तथा हत्या और कथित लूट की पूरी परिस्थितियां क्या थीं।
छोटे सबूत ने बदल दी पूरी जांच की दिशा
रायपुर का यह मामला इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि अपराध की जांच में कभी-कभी सबसे छोटा दिखाई देने वाला साक्ष्य भी भविष्य में बड़ी कड़ी बन सकता है। मृतका के नाखूनों में मिले जैविक नमूने घटना के समय केवल एक वैज्ञानिक सुराग थे। उस समय उनसे किसी व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकी।
लेकिन जांच एजेंसी ने उस साक्ष्य को सुरक्षित रखा। दो साल बाद जब संदिग्ध सामने आए तो उसी पुराने वैज्ञानिक साक्ष्य का मिलान कराया गया और पुलिस के अनुसार आरोपियों की पहचान सामने आ गई।
फिलहाल तीनों आरोपी पुलिस की गिरफ्त में हैं और मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। हत्या जैसे गंभीर अपराध में अंतिम निष्कर्ष अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक परीक्षण के बाद ही सामने आएगा। मगर इस घटना ने एक बार फिर यह जरूर दिखाया है कि अपराधी कितना भी समय बीत जाने के बाद पकड़ा जाए, घटनास्थल पर छोड़ा गया वैज्ञानिक साक्ष्य जांच की दिशा बदल सकता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।