जौनपुर कस्टोडियल डेथ केस: चार पुलिसकर्मियों की जमानत खारिज, हाईकोर्ट ने कहा—मामले की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
वर्ष 2021 में जौनपुर के बक्सा थाना क्षेत्र में हुई कृष्ण कुमार यादव उर्फ पुजारी की कथित पुलिस हिरासत में मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार आरोपी पुलिसकर्मियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति समित गोपाल ने मामले में दायर चारों जमानत अर्जियां खारिज करते हुए मुकदमे की गंभीरता, अभियोजन के साक्ष्यों और आरोपियों के आचरण को महत्वपूर्ण माना।
करीब 95 पन्नों के आदेश में हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की चार्जशीट में लगाए गए आरोपों और मामले की अब तक की न्यायिक कार्यवाही पर विस्तार से विचार किया। CBI का आरोप है कि कृष्ण कुमार यादव से अपराध कबूल कराने के लिए उन्हें गंभीर शारीरिक यातना दी गई और बाद में ऐसी चोटें पहुंचाई गईं, जो उनकी मौत का कारण बन सकती थीं। जांच एजेंसी का यह भी आरोप है कि घटना के बाद वास्तविक परिस्थितियों को छिपाने के लिए रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया।
हाईकोर्ट ने जयशील तिवारी, रमाकृत यादव, राज कुमार वर्मा और अंगद प्रसाद चौधरी की जमानत अर्जियां खारिज कर दीं। इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ CBI की जांच में गंभीर आपराधिक आरोप सामने आए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मामला फरवरी 2021 का है। जौनपुर के बक्सा थाना क्षेत्र में कृष्ण कुमार यादव उर्फ पुजारी की पुलिस हिरासत में मौत हुई थी। इस घटना के बाद मृतक के परिवार की ओर से पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए गए।
मामले में 12 फरवरी 2021 को बक्सा थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसमें हत्या, लूट, घर में घुसने और गाली-गलौज समेत IPC की विभिन्न धाराओं में आरोप लगाए गए थे।
FIR के अनुसार, 11 फरवरी 2021 की सुबह करीब तीन बजे SOG टीम और तत्कालीन बक्सा थाना प्रभारी समेत पुलिसकर्मी कृष्ण कुमार यादव को उनके घर से लेकर गए थे। परिवार का आरोप था कि उस समय उनके खिलाफ कोई स्पष्ट आपराधिक मामला दर्ज नहीं था और उन्हें पुलिस टीम अपने साथ ले गई।
परिवार के मुताबिक, उसी रात पुलिसकर्मी कृष्ण कुमार को लेकर वापस घर पहुंचे। उस समय उनकी हालत बेहद खराब थी। आरोप है कि वह ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे और अपनी मां से पुलिस से बचाने की गुहार लगा रहे थे। उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि पुलिसकर्मी उन्हें मार डालेंगे।
इसके बाद परिवार को उनकी पुलिस हिरासत में मौत की जानकारी मिली। इस घटना ने पुलिस हिरासत में मानवाधिकार और पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2021 में मामले की जांच CBI को सौंप दी थी। बाद में CBI ने अपनी FIR दर्ज करके जांच शुरू की और 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इस जांच को लेकर हुई न्यायिक प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी रही और हाईकोर्ट द्वारा CBI जांच के निर्देश को बरकरार रखा गया।
CBI ने 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट
जांच पूरी करने के बाद CBI ने 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। चार्जशीट में IPC की धारा 302, 330, 331 और 218 के साथ धारा 34 और 120-B के तहत आरोप लगाए गए।
इन धाराओं में हत्या, अपराध कबूल कराने के लिए चोट पहुंचाना, गंभीर चोट पहुंचाना, लोक सेवक द्वारा गलत रिकॉर्ड तैयार करना, समान उद्देश्य और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
इसके बाद लखनऊ स्थित विशेष CBI अदालत ने 18 सितंबर 2024 को आरोप तय किए। यानी मामला अब केवल प्रारंभिक जांच के स्तर पर नहीं था, बल्कि ट्रायल की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी।
हाईकोर्ट ने मौजूदा सुनवाई के दौरान यह भी ध्यान में रखा कि ट्रायल में अभियोजन पक्ष के 11 गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। अदालत ने मुकदमे को आगे बढ़ाने और अनावश्यक स्थगन से बचने के लिए ट्रायल कोर्ट को तेजी से कार्यवाही करने का निर्देश दिया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट और AIIMS मेडिकल बोर्ड की राय
इस मामले में मेडिकल साक्ष्य भी जमानत पर सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण बिंदु रहा।
शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कृष्ण कुमार यादव के शरीर पर तीन चोटों का उल्लेख किया गया था। इनमें कूल्हे, निचले स्कैपुलर क्षेत्र और बाएं हाथ पर चोटें शामिल थीं। प्रारंभिक रिपोर्ट में मौत का कारण मायोकार्डियल इन्फार्क्शन से जुड़ा शॉक और सिंकोप बताया गया था।
लेकिन CBI की जांच के दौरान मेडिकल साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा हुई। मामले में AIIMS, नई दिल्ली के मेडिकल बोर्ड की राय भी सामने आई।
AIIMS बोर्ड के अनुसार, मृतक के शरीर पर कई जगह Blunt Force Injuries यानी कुंद वस्तु से लगी चोटें थीं। बोर्ड ने मौत का कारण शरीर पर आई कई कुंद चोटों के संयुक्त प्रभाव से हुआ शॉक बताया।
मेडिकल बोर्ड की राय में चोटें मृत्यु से पहले की यानी Antemortem और ताजा थीं। बोर्ड ने यह भी राय दी कि चोटों का संयुक्त प्रभाव सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु के लिए पर्याप्त हो सकता है।
जमानत के स्तर पर अदालत को अंतिम रूप से यह तय नहीं करना था कि आरोप साबित हो चुके हैं या नहीं। हालांकि, गंभीर आरोपों के साथ मेडिकल साक्ष्य और अन्य परिस्थितियां आरोपी पुलिसकर्मियों की जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण थीं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का भी हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान
हाईकोर्ट ने इसी मामले में सह-आरोपी जितेंद्र सिंह से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के 12 मार्च 2024 के आदेश को भी ध्यान में रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय आरोपी को मिली जमानत रद्द करते हुए मामले की प्रकृति को गंभीर माना था। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया था कि आरोपी पुलिस बल का सदस्य है और उस पर पुलिस हिरासत में मौत से संबंधित गंभीर आरोप हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 302 के तहत आरोप की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए आरोपी को CBI अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट के मौजूदा आदेश में इस पूर्व न्यायिक आदेश का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ही मामले में जमानत पर विचार करते समय पहले से सामने आ चुके न्यायिक निष्कर्ष और परिस्थितियां भी प्रासंगिक हो सकती हैं।
जयशील तिवारी की जमानत क्यों खारिज हुई?
चारों आरोपियों के मामलों की परिस्थितियां बिल्कुल एक जैसी नहीं थीं। हाईकोर्ट ने प्रत्येक आरोपी के संबंध में उपलब्ध परिस्थितियों पर अलग-अलग विचार किया।
जयशील तिवारी के मामले में अदालत ने उनके कथित तौर पर फरार रहने के आचरण को विशेष महत्व दिया। आदेश के अनुसार, जांच के दौरान उनके खिलाफ CrPC की धारा 82 और 83 के तहत कार्रवाई शुरू हुई थी।
अदालत ने यह भी देखा कि गिरफ्तारी से पहले ट्रायल के दौरान भी वह कथित तौर पर फरार हो गए थे।
जमानत के मामले में आरोपी का अदालत और जांच एजेंसी के साथ सहयोग तथा मुकदमे के दौरान उपलब्ध रहने की संभावना महत्वपूर्ण मानी जाती है। हाईकोर्ट ने तिवारी के कथित आचरण को देखते हुए माना कि भविष्य में उनके दोबारा फरार होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया।
रमाकृत यादव और राज कुमार वर्मा को भी नहीं मिली राहत
रमाकृत यादव और राज कुमार वर्मा पहले भी जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके थे। दोनों की पिछली जमानत अर्जियां वर्ष 2022 में खारिज हो चुकी थीं।
मौजूदा सुनवाई में अदालत के सामने सवाल था कि क्या परिस्थितियों में ऐसा कोई नया आधार सामने आया है जिसके कारण पिछला आदेश दोबारा विचार योग्य हो।
हाईकोर्ट को ऐसा कोई पर्याप्त नया आधार नहीं मिला। इसलिए दोनों की दूसरी जमानत अर्जियां भी खारिज कर दी गईं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती कि किसी अन्य सह-आरोपी को समान परिस्थिति में राहत मिल गई है। Parity, यानी सह-आरोपी के साथ समानता, अपने आप में जमानत का निर्णायक आधार नहीं है। आरोपी की अपनी भूमिका, साक्ष्य, आचरण और मामले की परिस्थितियों को भी देखा जाता है।
हिरासत में मौत पर अदालत की सख्त टिप्पणी
मामले से जुड़े पहले के न्यायिक आदेशों में भी घटना की प्रकृति को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई थीं। हाईकोर्ट ने संबंधित मामले में पूर्व की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि घटना के संबंध में पुलिस हिरासत में कथित यातना, लूट और मौत की एक सोची-समझी साजिश का आरोप सामने आया था।
अदालत ने इसे पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग और पुलिस की मनमानी से जुड़ा गंभीर मामला भी माना था।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि आपराधिक मुकदमे में चार्जशीट में लगाए गए आरोप और अदालत की जमानत संबंधी टिप्पणियां अंतिम दोषसिद्धि नहीं होतीं। आरोपों का अंतिम परीक्षण ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा और आरोपी तब तक कानूनन दोषसिद्ध नहीं माने जाते जब तक उनके खिलाफ अपराध न्यायालय में सिद्ध न हो जाए।
पुलिस हिरासत में मौत का मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत का मामला सामान्य आपराधिक मामले से अलग गंभीर संवैधानिक प्रश्न भी खड़े करता है। हिरासत में लिया गया व्यक्ति भी कानून और संविधान के संरक्षण से बाहर नहीं हो जाता।
भारतीय संविधान का Article 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है। हिरासत में मौजूद व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य और संबंधित अधिकारियों पर विशेष रूप से आती है।
यदि हिरासत में किसी व्यक्ति को यातना देने या उसकी मृत्यु में पुलिसकर्मियों की भूमिका का आरोप लगाया जाता है, तो मामले की निष्पक्ष जांच और स्वतंत्र साक्ष्य का महत्व और बढ़ जाता है।
जौनपुर का यह मामला इसी वजह से लंबे समय से न्यायिक निगरानी में रहा है। पहले हाईकोर्ट द्वारा CBI जांच का निर्देश दिया जाना, फिर CBI की चार्जशीट, मेडिकल बोर्ड की राय, आरोप तय होना और अब चार आरोपी पुलिसकर्मियों की जमानत खारिज होना—पूरी प्रक्रिया यह दिखाती है कि मामला कई न्यायिक चरणों से गुजर चुका है।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट ने चारों जमानत अर्जियां खारिज करने के साथ ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की कार्यवाही तेज करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अनावश्यक स्थगन से बचने पर भी जोर दिया है।
अब मामले में आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में होगी, जहां अभियोजन पक्ष अपने साक्ष्य प्रस्तुत करेगा और बचाव पक्ष को भी आरोपों का विरोध करने तथा अपने पक्ष में साक्ष्य और दलीलें रखने का पूरा अवसर मिलेगा।
इस मामले का अंतिम परिणाम ट्रायल में सामने आने वाले साक्ष्यों और न्यायालय के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगा।
फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने जमानत के प्रश्न पर मामले की गंभीरता, CBI के आरोपों, मेडिकल साक्ष्यों, आरोपियों के कथित आचरण और पहले के न्यायिक आदेशों को एक साथ देखते हुए चारों आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है।
जौनपुर कस्टोडियल डेथ केस की अगली महत्वपूर्ण कड़ी अब ट्रायल की गति और उसमें सामने आने वाले साक्ष्य होंगे।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।