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वसीयत असली है या फर्जी, इसका फैसला राजस्व अधिकारी नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

वसीयत असली है या फर्जी, इसका फैसला राजस्व अधिकारी नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—मालिकाना हक सिविल कोर्ट तय करेगा

       जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों में अक्सर नामांतरण (Mutation) की कार्यवाही को लेकर विवाद सामने आते हैं। कई बार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाम दर्ज जमीन को वसीयत, उत्तराधिकार या किसी अन्य दस्तावेज के आधार पर दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज कराने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में यदि वसीयत की वैधता या उसके वास्तविक होने पर ही विवाद खड़ा हो जाए, तो सवाल उठता है कि इसका फैसला राजस्व अधिकारी करेंगे या सिविल कोर्ट?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी से जुड़े एक मामले में इस सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी वसीयत की वैधता, वास्तविकता या genuineness पर गंभीर विवाद है और उसके आधार पर संपत्ति पर अधिकार का दावा किया जा रहा है, तो ऐसे विवाद का अंतिम निर्णय सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। राजस्व अधिकारी नामांतरण की संक्षिप्त कार्यवाही में मालिकाना हक का अंतिम फैसला नहीं कर सकते।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकलपीठ ने झांसी निवासी अखिलेंद्र प्रताप सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए कमिश्नर के आदेश पर रोक लगाई है। कोर्ट ने पक्षकारों को फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया और जमीन के संबंध में कोई बैनामा करने पर भी रोक लगाई है।

अदालत ने मामले को आगे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश देते हुए कहा कि विवाद में विचार किए जाने की आवश्यकता है।

क्या है झांसी की जमीन का पूरा विवाद?

मामला झांसी के पाली पहाड़ी गांव की एक जमीन से संबंधित है।

इस जमीन के खातेदार चंदन सिंह थे। वह अविवाहित थे और उनकी कोई संतान नहीं थी। 7 अक्टूबर 2016 को उनकी मृत्यु हो गई।

याचिकाकर्ता अखिलेंद्र प्रताप सिंह का दावा है कि वह चंदन सिंह की मृत बहन शांति देवी के पुत्र हैं। उनके अनुसार चंदन सिंह ने अपनी संपत्ति के संबंध में 2 अप्रैल 2016 को उनके पक्ष में वसीयत की थी।

यह वसीयत 4 अप्रैल 2016 को रजिस्टर्ड भी हुई थी।

दूसरी ओर, चंदन सिंह की एक अन्य बहन भगवती देवी ने खुद को वारिस बताते हुए संबंधित भूमि पर अपना नाम दर्ज करा लिया।

यहीं से विवाद ने राजस्व न्यायालय का रास्ता पकड़ा।

तहसीलदार ने याचिकाकर्ता के पक्ष में किया नामांतरण

याचिकाकर्ता ने अपनी कथित वसीयत के आधार पर जमीन अपने नाम दर्ज कराने के लिए दाखिल-खारिज की कार्यवाही शुरू कराई।

तहसीलदार ने 2 नवंबर 2022 को याचिकाकर्ता के पक्ष में नामांतरण कर दिया।

इस आदेश को भगवती देवी ने चुनौती दी। मामले की अपील एसडीएम के समक्ष पहुंची।

एसडीएम ने 28 दिसंबर 2023 को भगवती देवी की अपील खारिज कर दी।

इस तरह तहसीलदार और एसडीएम दोनों स्तरों पर याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश रहे।

लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ।

कमिश्नर ने पलट दिए तहसीलदार और एसडीएम के आदेश

भगवती देवी ने इसके बाद कमिश्नर, झांसी मंडल के समक्ष Revision दाखिल की।

कमिश्नर ने 18 अगस्त 2026 को Revision स्वीकार कर ली। उन्होंने तहसीलदार और एसडीएम के आदेशों को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही याचिकाकर्ता का नाम हटाकर प्रतिवादी का नाम दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

कमिश्नर के सामने वसीयत की वास्तविकता को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। आदेश में वसीयत को संदिग्ध बताया गया।

इसके बाद अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने हाईकोर्ट का रुख किया।

वसीयत को क्यों बताया गया संदिग्ध?

कमिश्नर के आदेश में वसीयत की परिस्थितियों पर संदेह जताया गया था।

बताया गया कि कथित वसीयत से जुड़े समय में चंदन सिंह अस्पताल में थे और वहां उनका अंगूठा लिया गया था।

इसके अलावा यह सवाल भी उठाया गया कि कथित तौर पर रविवार के दिन रजिस्ट्रार के पास जाने की बात सामने आई थी।

एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल यह था कि वसीयत में भगवती देवी को संपत्ति से अलग रखने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया।

इन परिस्थितियों को आधार बनाकर कमिश्नर ने वसीयत को संदिग्ध माना और उसके आधार पर किए गए नामांतरण को पलट दिया।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इसी दृष्टिकोण को चुनौती दी।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की मुख्य दलील

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि नामांतरण की कार्यवाही summary proceedings होती है। इसमें राजस्व अधिकारी को संपत्ति के वास्तविक मालिकाना हक का अंतिम निर्धारण करने का अधिकार नहीं होता।

याचिकाकर्ता का कहना था कि यदि प्रतिवादी वसीयत को चुनौती देती है और वसीयत की validity या genuineness पर विवाद खड़ा करती है, तो इस प्रश्न का अंतिम फैसला सिविल कोर्ट ही कर सकता है।

हाईकोर्ट के सामने यह भी बताया गया कि भगवती देवी की ओर से वसीयत को चुनौती देने वाला मुकदमा पहले 15 जुलाई 2024 को खारिज हुआ था, हालांकि बाद में वह proceedings restore यानी बहाल हो गई थीं।

इस आधार पर याचिकाकर्ता ने कहा कि वसीयत से जुड़े वास्तविक विवाद का फैसला राजस्व अधिकारियों के बजाय सक्षम सिविल कोर्ट में होना चाहिए।

प्रतिवादी ने हाईकोर्ट की याचिका पर उठाई आपत्ति

दूसरी ओर, प्रतिवादी की ओर से हाईकोर्ट में रिट याचिका की maintainability पर ही सवाल उठाया गया।

दलील दी गई कि कमिश्नर के आदेश के खिलाफ Board of Revenue के सामने Revision दाखिल करने का वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है।

इसलिए प्रतिवादी के अनुसार याचिकाकर्ता को सीधे हाईकोर्ट में Article 226 के तहत रिट याचिका दाखिल करने के बजाय पहले उपलब्ध वैधानिक remedy का इस्तेमाल करना चाहिए था।

हाईकोर्ट ने हालांकि इस प्रारंभिक आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।

यूपी राजस्व संहिता की धारा 210(1) पर अदालत की नजर

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 210(1) के प्रावधान पर विचार किया।

अदालत ने कहा कि इस प्रावधान के तहत Board और Commissioner को अधीनस्थ राजस्व न्यायालय के आदेशों के संबंध में Revision की शक्ति प्राप्त है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि Commissioner और Board के बीच सामान्य न्यायिक hierarchy इस प्रकार है कि Commissioner के Revision order के खिलाफ अनिवार्य रूप से Board के पास दूसरी Revision दाखिल की जा सकती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Commissioner का Revision order स्वयं उस अर्थ में subordinate court का order नहीं है, जिसके खिलाफ Board के सामने दूसरी Revision लाई जा सके।

इसलिए प्रतिवादी की यह आपत्ति कि याचिकाकर्ता के पास Board of Revenue के सामने दूसरी Revision का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, अदालत ने स्वीकार नहीं की।

नामांतरण से मालिकाना हक तय नहीं होता

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू Mutation को लेकर है।

आम तौर पर किसी जमीन के मालिक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी या वसीयत के लाभार्थी का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराने के लिए नामांतरण कराया जाता है।

लेकिन Mutation का उद्देश्य राजस्व रिकॉर्ड में व्यक्ति का नाम दर्ज करना है। इससे अपने आप संपत्ति पर अंतिम और निर्विवाद मालिकाना हक स्थापित नहीं हो जाता।

यदि कोई दूसरा व्यक्ति यह दावा करता है कि नामांतरण गलत आधार पर हुआ है या जिस वसीयत के आधार पर नामांतरण किया गया है वह फर्जी, संदिग्ध या अवैध है, तो विवाद केवल राजस्व रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रह सकता।

ऐसी स्थिति में असली प्रश्न यह हो जाता है कि संपत्ति का कानूनी अधिकार किसके पास है।

यही वह प्रश्न है जिसे निर्धारित करने के लिए सिविल कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

वसीयत की genuineness का फैसला कौन करेगा?

वसीयत से जुड़े विवाद कई बार केवल एक दस्तावेज की मौजूदगी तक सीमित नहीं होते।

वसीयत पर हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान किस परिस्थिति में लिया गया? वसीयतकर्ता की स्थिति क्या थी? क्या वह वसीयत करने की स्थिति में थे? गवाह कौन थे? दस्तावेज कैसे तैयार हुआ? क्या वसीयत वास्तव में उसी व्यक्ति ने बनाई थी? क्या किसी दबाव या अनुचित प्रभाव की स्थिति थी?

ऐसे प्रश्नों पर विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता हो सकती है।

राजस्व न्यायालय की नामांतरण कार्यवाही सामान्यतः इतनी विस्तृत साक्ष्य-आधारित प्रक्रिया के लिए नहीं होती। यही कारण है कि जब वसीयत की validity और genuineness पर गंभीर विवाद हो, तो उसके अंतिम निर्धारण के लिए सिविल कोर्ट उचित मंच हो सकता है।

राजस्व अधिकारी की भूमिका क्या है?

राजस्व अधिकारियों की कार्यवाही का उद्देश्य मुख्य रूप से राजस्व रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखना और संबंधित व्यक्ति के नाम की प्रविष्टि करना है।

नामांतरण के दौरान राजस्व अधिकारी उपलब्ध दस्तावेजों और दावों को देख सकते हैं। लेकिन यदि मामला जटिल title dispute में बदल जाता है, तो केवल नामांतरण के आदेश के जरिए अंतिम मालिकाना हक तय नहीं किया जा सकता।

इसी अंतर को समझना जमीन से जुड़े मामलों में बहुत जरूरी है।

किसी व्यक्ति का नाम खतौनी या अन्य राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज होना और उस व्यक्ति का संपत्ति का अंतिम कानूनी मालिक होना हमेशा एक ही बात नहीं होती।

हाईकोर्ट ने कमिश्नर के आदेश पर लगाई रोक

मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 के कमिश्नर के आदेश के संचालन पर रोक लगा दी।

अदालत ने पक्षकारों को status quo बनाए रखने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही संपत्ति के संबंध में कोई बैनामा या अन्य हस्तांतरण न करने का आदेश भी दिया गया।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि फिलहाल पक्षकार संपत्ति की मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं कर सकेंगे और विवादित जमीन को किसी तीसरे व्यक्ति को बेचने या हस्तांतरित करने की कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

अदालत ने मामले को छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

क्या हाईकोर्ट ने वसीयत को सही मान लिया?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने इस स्तर पर यह अंतिम फैसला नहीं दिया कि चंदन सिंह द्वारा की गई वसीयत पूरी तरह वैध है या याचिकाकर्ता ही जमीन का अंतिम मालिक है।

अदालत का हस्तक्षेप मुख्य रूप से इस बात से संबंधित है कि वसीयत की genuineness और उससे पैदा होने वाले title dispute का निर्धारण किस मंच पर होना चाहिए।

यदि वसीयत को लेकर गंभीर विवाद है, तो संबंधित पक्ष सिविल कोर्ट में अपने अधिकारों का निर्धारण करा सकते हैं।

इसलिए इस आदेश को याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतिम ownership declaration के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

जमीन विवादों में यह अंतर क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर प्रदेश में जमीन से जुड़े विवादों में अक्सर लोग खतौनी, नामांतरण या दाखिल-खारिज को ही मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण समझ लेते हैं।

जबकि कानूनी तौर पर Revenue Entry और Title अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

नामांतरण से राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव हो सकता है, लेकिन इससे ऐसा व्यक्ति, जिसका वास्तविक title विवादित है, अंतिम मालिक घोषित नहीं हो जाता।

इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के पक्ष में वसीयत मौजूद है और दूसरा व्यक्ति उसकी वैधता को चुनौती देता है, तो केवल नामांतरण के आधार पर विवाद का अंतिम समाधान नहीं हो सकता।

फैसले से आम लोगों के लिए क्या समझना जरूरी है?

इस आदेश से संपत्ति मालिकों और उत्तराधिकारियों के लिए कई व्यावहारिक बातें सामने आती हैं।

सबसे पहले, वसीयत बनाते समय उसके execution की प्रक्रिया को विधि के अनुरूप रखना महत्वपूर्ण है।

दूसरा, वसीयत के आधार पर नामांतरण हो जाने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति उसके validity और genuineness को चुनौती देता है, तो विवाद सिविल कोर्ट तक जा सकता है।

तीसरा, राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना अपने आप अंतिम title साबित नहीं करता।

चौथा, यदि किसी संपत्ति के संबंध में गंभीर ownership dispute है, तो केवल तहसील या राजस्व अधिकारियों के आदेशों पर निर्भर रहने के बजाय सक्षम सिविल कोर्ट से अधिकारों का निर्धारण कराया जाना आवश्यक हो सकता है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का झांसी से जुड़ा यह आदेश वसीयत, नामांतरण और संपत्ति के मालिकाना हक से संबंधित विवादों में महत्वपूर्ण कानूनी अंतर को सामने लाता है।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि Mutation केवल राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि है; इससे अंतिम title निर्धारित नहीं होता। जब किसी वसीयत की वास्तविकता और वैधता पर गंभीर विवाद हो, तो उस विवाद का अंतिम निर्णय केवल संक्षिप्त राजस्व कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।

मामले में कमिश्नर ने वसीयत को संदिग्ध मानते हुए तहसीलदार और एसडीएम के आदेशों को पलट दिया था। हाईकोर्ट ने फिलहाल उस आदेश पर रोक लगाते हुए पक्षकारों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।

इस आदेश का सबसे अहम संदेश यही है कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना और संपत्ति का वैधानिक मालिक होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि वसीयत के आधार पर वास्तविक मालिकाना हक का विवाद पैदा होता है, तो उस विवाद का विस्तृत और अंतिम निर्धारण सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा किया जाना महत्वपूर्ण होगा। इसलिए नामांतरण की कार्यवाही को title adjudication का विकल्प नहीं माना जा सकता।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।