आपराधिक मुकदमा लंबित है तो भी सिपाही भर्ती से सीधे बाहर नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला
सरकारी नौकरी में चयन के बाद चरित्र सत्यापन के दौरान किसी अभ्यर्थी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित मिलने पर उसकी नियुक्ति या अभ्यर्थिता को स्वतः समाप्त नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिपाही भर्ती-2023 से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि नियुक्ति प्राधिकारी को मामले की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्य और अभ्यर्थी की वास्तविक भूमिका समेत सभी प्रासंगिक परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकलपीठ ने सूरज कनौजिया की याचिका स्वीकार करते हुए मऊ के पुलिस अधीक्षक द्वारा 26 अगस्त 2025 को उनकी अभ्यर्थिता निरस्त करने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को मामले पर नए सिरे से विचार कर दो महीने के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
यह फैसला खास तौर पर उन अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के बाद चरित्र सत्यापन के दौरान किसी पुराने या लंबित आपराधिक मामले के कारण नियुक्ति से वंचित कर दिए जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि आपराधिक मामला लंबित होना अपने आप में हर मामले में उम्मीदवार को पुलिस सेवा के लिए अनुपयुक्त घोषित करने का अंतिम आधार नहीं बन सकता।
लिखित परीक्षा और मेडिकल में सफल हुआ था अभ्यर्थी
मामला उत्तर प्रदेश पुलिस की सिपाही भर्ती-2023 से संबंधित है। याची सूरज कनौजिया ने भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। वह लिखित परीक्षा में सफल रहा और इसके बाद मेडिकल प्रक्रिया में भी उसे सफल घोषित किया गया।
चयन प्रक्रिया के अगले चरण में जब उसका चरित्र सत्यापन कराया गया तो उसके खिलाफ कुशीनगर जिले के तुर्कपट्टी थाने में दर्ज एक मुकदमे की जानकारी सामने आई। यह मामला आबकारी अधिनियम की धारा 60 से संबंधित था।
चरित्र सत्यापन के दौरान इस आपराधिक मामले का उल्लेख होने के बाद याची के पक्ष में रिपोर्ट नहीं दी गई। इसके बाद मऊ के पुलिस अधीक्षक ने 26 अगस्त 2025 को उसकी अभ्यर्थिता निरस्त कर दी।
याची ने इस आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी।
चरित्र सत्यापन में सामने आया था मुकदमा
याची की ओर से अधिवक्ता अभय प्रताप सिंह ने कोर्ट के समक्ष तर्क रखा कि उनके मुवक्किल ने भर्ती की आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की थीं और वह चयनित अभ्यर्थियों में शामिल था।
अधिवक्ता का कहना था कि केवल इस आधार पर अभ्यर्थिता समाप्त कर दी गई कि चरित्र सत्यापन के दौरान उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित पाया गया।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण था कि मुकदमा किस प्रकार का था, उसमें याची की वास्तविक भूमिका क्या थी और उपलब्ध सामग्री से उसके खिलाफ लगाए गए आरोप किस स्तर तक साबित होते हैं—इन पहलुओं पर नियुक्ति प्राधिकारी ने स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया।
हाई कोर्ट ने इसी बिंदु को अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना।
एसपी ने रिपोर्ट को ही आधार बना लिया: हाई कोर्ट
कोर्ट ने पाया कि पुलिस अधीक्षक ने मुख्य रूप से जिलाधिकारी कुशीनगर और पुलिस अधीक्षक कुशीनगर की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए अभ्यर्थिता निरस्त कर दी।
हाई कोर्ट के अनुसार, नियुक्ति प्राधिकारी को केवल अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय मामले के सभी तथ्यों पर स्वयं विचार करना चाहिए था।
अदालत ने कहा कि नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी की suitability यानी उपयुक्तता तय करना सक्षम प्राधिकारी का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल यांत्रिक अथवा मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता।
यदि किसी अधिकारी को यह तय करना है कि कोई व्यक्ति पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त है या नहीं, तो उसे संबंधित आपराधिक मामले की प्रकृति और उसकी परिस्थितियों पर विचार करना होगा।
एफआईआर में स्वतंत्र गवाह नहीं था
हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड की समीक्षा करते हुए यह भी पाया कि एफआईआर में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था।
अदालत ने इस तथ्य को मामले की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना। केवल एफआईआर दर्ज हो जाना किसी व्यक्ति के अपराधी होने का अंतिम प्रमाण नहीं होता। आपराधिक मुकदमे में आरोपों की न्यायिक जांच और साक्ष्यों का परीक्षण अलग प्रक्रिया है।
इसी तरह किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल होने का अर्थ भी यह नहीं है कि अदालत ने उसे दोषी घोषित कर दिया है।
यही अंतर आपराधिक मुकदमे के लंबित होने और दोषसिद्धि के बीच है।
एनसीआर केस की भी चर्चा
फैसले में यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित NCR केस की कभी विवेचना नहीं हुई थी। इसके अलावा 30 मई 2021 को दर्ज एफआईआर के लगभग पांच वर्ष बाद भी मुकदमे का ट्रायल पूरा नहीं हुआ था।
याची को इस मामले में 16 मई 2025 को जमानत भी मिल चुकी थी।
हाई कोर्ट ने इन परिस्थितियों को समग्र रूप से देखा। अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या ऐसी परिस्थितियों में केवल लंबित मुकदमे के आधार पर पुलिस भर्ती में चयनित अभ्यर्थी को बाहर करना उचित था।
कोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी के निर्णय की प्रक्रिया की समीक्षा की और पाया कि मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त स्वतंत्र विचार नहीं किया गया।
पांच साल बाद भी मुकदमा पूरा नहीं हुआ
इस मामले की एक खास बात मुकदमे का लंबे समय तक लंबित रहना भी थी। एफआईआर 30 मई 2021 को दर्ज हुई थी, लेकिन याची के अनुसार लगभग पांच वर्ष बीत जाने के बावजूद ट्रायल पूरा नहीं हुआ था।
इस बीच भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ी और याची लिखित परीक्षा तथा मेडिकल में सफल हुआ।
ऐसी परिस्थितियों में केवल यह कहना कि मुकदमा लंबित है, पर्याप्त कारण है या नहीं—यही विवाद का मुख्य हिस्सा था।
हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों को देखते हुए कहा कि नियुक्ति प्राधिकारी को उपलब्ध परिस्थितियों पर विचार करके अपना स्वतंत्र निर्णय लेना चाहिए था।
अभ्यर्थी पर तथ्य छिपाने का आरोप भी नहीं
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि याची पर आपराधिक मामले को छिपाने का आरोप नहीं था।
सरकारी नौकरी की भर्ती में अभ्यर्थी द्वारा आपराधिक मामले की जानकारी छिपाना और स्वयं उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होना—दो अलग परिस्थितियां हैं।
यदि कोई उम्मीदवार जानबूझकर मांगी गई जानकारी छिपाता है, तो नियुक्ति प्राधिकारी उस तथ्य को गंभीरता से देख सकता है। लेकिन इस मामले में याची के खिलाफ तथ्य छिपाने का आरोप नहीं था।
इसलिए केवल लंबित मुकदमे के अस्तित्व को आधार बनाकर अभ्यर्थिता समाप्त करने के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की गई।
28 अप्रैल 1958 के शासनादेश का भी उल्लेख
हाई कोर्ट ने मामले में 28 अप्रैल 1958 के शासनादेश का भी संदर्भ लिया। अदालत ने कहा कि संबंधित प्राधिकारी को इस शासनादेश में निर्धारित सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों के अनुसार मामले पर विचार करना चाहिए था।
पुलिस भर्ती में चरित्र सत्यापन का महत्व स्वाभाविक रूप से अधिक है। पुलिस सेवा में नियुक्त होने वाले व्यक्ति से उच्च स्तर के आचरण और विश्वसनीयता की अपेक्षा की जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर लंबित आपराधिक मामला समान रूप से देखा जाए।
प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह फैसले का सिद्धांत
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में आपराधिक मामले और सरकारी नियुक्ति के बीच संबंध को लेकर कई महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए थे। विशेष रूप से यह माना गया था कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मामला होना नियुक्ति से जुड़े निर्णय में प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन प्रत्येक मामले को उसके तथ्यों के आधार पर देखना आवश्यक है।
यानी नियुक्ति प्राधिकारी के पास विचार करने का अधिकार है, लेकिन उसे तथ्यों से आंखें बंद करके निर्णय नहीं लेना चाहिए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसी दृष्टिकोण को सूरज कनौजिया के मामले में लागू किया।
पुलिस नौकरी में चरित्र का महत्व, लेकिन निर्णय विवेकपूर्ण होना चाहिए
पुलिस विभाग में नियुक्ति के मामलों में चरित्र सत्यापन का महत्व अन्य कई सरकारी नौकरियों की तुलना में अधिक माना जाता है। पुलिस कर्मचारी सीधे कानून-व्यवस्था और जनता की सुरक्षा से जुड़े कार्य करते हैं।
इसी कारण नियुक्ति प्राधिकारी उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास को गंभीरता से देख सकता है। लेकिन कोर्ट ने इस मामले में यह नहीं कहा कि आपराधिक मामले की जानकारी को नजरअंदाज कर दिया जाए।
अदालत का जोर इस बात पर था कि मामले का स्वतंत्र और विवेकपूर्ण मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
अर्थात किसी अभ्यर्थी के खिलाफ मामला लंबित है तो उसकी प्रकृति क्या है, घटना कितनी पुरानी है, आरोप कितने गंभीर हैं, उम्मीदवार की भूमिका क्या है, क्या उसे दोषी ठहराया गया है, क्या मामला अभी जांच या ट्रायल के स्तर पर है और क्या उसने कोई तथ्य छिपाया है—इन तमाम पहलुओं को देखा जा सकता है।
मनमाना विवेक न्यायिक समीक्षा के दायरे में
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियुक्ति प्राधिकारी को अभ्यर्थी की suitability तय करने का अधिकार है। अदालत आमतौर पर नियुक्ति प्राधिकारी के स्थान पर बैठकर खुद suitability तय नहीं करती।
लेकिन यदि इस अधिकार का इस्तेमाल मनमाने तरीके से किया जाए या प्राधिकारी जरूरी तथ्यों पर विचार किए बिना निर्णय ले, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
यही वजह है कि हाई कोर्ट ने सीधे यह निर्देश नहीं दिया कि सूरज कनौजिया को तत्काल नियुक्त कर दिया जाए। इसके बजाय 26 अगस्त 2025 के आदेश को रद्द करके संबंधित प्राधिकारी को मामले पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।
यह अंतर इस फैसले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
राजस्थान विद्युत निगम और अन्य फैसलों पर भी चर्चा
याची की ओर से जिन न्यायिक सिद्धांतों पर भरोसा किया गया था, उनके संदर्भ में कोर्ट ने राजस्थान विद्युत निगम, चेतन जेफ और इम्तियाज मल्ला जैसे मामलों का भी उल्लेख किया।
हालांकि अदालत ने कहा कि इन मामलों में दिए गए फैसले वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होते।
हर भर्ती विवाद का निर्णय समान नियम से नहीं किया जा सकता। आपराधिक मामले की प्रकृति, आरोपों की स्थिति, उम्मीदवार द्वारा जानकारी देने या छिपाने का सवाल तथा नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया जैसे तथ्य प्रत्येक मामले को अलग बनाते हैं।
इसलिए अदालत ने वर्तमान मामले को उसके अपने तथ्यों के आधार पर परखा।
दोषसिद्धि और लंबित मुकदमे में अंतर
इस मामले से एक सामान्य कानूनी अंतर भी समझा जा सकता है। किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना, आरोप पत्र दाखिल होना और अदालत द्वारा दोषी ठहराया जाना तीन अलग-अलग अवस्थाएं हैं।
एफआईआर किसी घटना के संबंध में पुलिस के पास दर्ज सूचना होती है। जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल हो सकता है। इसके बाद अदालत में मुकदमे की सुनवाई होती है और साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि या बरी होने का निर्णय हो सकता है।
सूरज कनौजिया के मामले में मुकदमा लंबित था और ट्रायल पूरा नहीं हुआ था। इसलिए हाई कोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी के निर्णय में इस स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने नियुक्ति का सीधा आदेश क्यों नहीं दिया?
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि यदि कोर्ट ने एसपी का आदेश गलत पाया तो उसने सीधे नियुक्ति देने का आदेश क्यों नहीं दिया।
दरअसल, suitability तय करना नियुक्ति प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में है। हाई कोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारी ने इस अधिकार का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया।
इसलिए कोर्ट ने प्रशासनिक निर्णय को रद्द करके प्राधिकारी को दोबारा निर्णय लेने का अवसर दिया।
इसका अर्थ है कि अब एसपी मऊ को मामले के सभी प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना होगा और कानून तथा लागू शासनादेश व सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों के अनुसार नया आदेश पारित करना होगा।
दो महीने में नया आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 26 अगस्त 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके माध्यम से सूरज कनौजिया की अभ्यर्थिता निरस्त की गई थी।
साथ ही मऊ के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया गया कि वह मामले पर दो महीने के भीतर नए सिरे से आदेश पारित करें।
इस प्रक्रिया में संबंधित प्राधिकारी को हाई कोर्ट द्वारा बताए गए कानूनी सिद्धांतों और मामले के वास्तविक तथ्यों को ध्यान में रखना होगा।
फैसले का व्यापक महत्व
यह निर्णय उन भर्ती मामलों में महत्वपूर्ण हो सकता है जहां किसी चयनित उम्मीदवार का चरित्र सत्यापन किसी लंबित आपराधिक मामले के कारण प्रभावित होता है।
हालांकि इस फैसले का यह अर्थ नहीं है कि आपराधिक मुकदमा लंबित रहने पर हर उम्मीदवार को सरकारी नौकरी में नियुक्ति का अधिकार मिल जाता है। नियुक्ति प्राधिकारी को उम्मीदवार की उपयुक्तता पर निर्णय लेने का अधिकार बना रहता है।
लेकिन उस निर्णय में न्यायसंगत, स्वतंत्र और प्रासंगिक तथ्यों पर आधारित विवेक होना जरूरी है।
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी संदेश है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले ने पुलिस भर्ती में चरित्र सत्यापन और लंबित आपराधिक मामलों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण बात सामने रखी है। कोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित है, अपने आप उसकी अभ्यर्थिता समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
सूरज कनौजिया लिखित परीक्षा और मेडिकल में सफल होकर सिपाही भर्ती-2023 में चयनित हुए थे। चरित्र सत्यापन के दौरान कुशीनगर के तुर्कपट्टी थाने में आबकारी अधिनियम की धारा 60 के तहत दर्ज मामले की जानकारी सामने आने के बाद उनकी अभ्यर्थिता निरस्त कर दी गई थी।
हाई कोर्ट ने पाया कि निर्णय लेते समय संबंधित प्राधिकारी ने जिलाधिकारी और एसपी की रिपोर्ट को स्वतंत्र विवेक के साथ जांचे बिना स्वीकार कर लिया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि एफआईआर में स्वतंत्र गवाह नहीं था, एनसीआर मामले की विवेचना नहीं हुई थी, 30 मई 2021 की एफआईआर के बावजूद ट्रायल पूरा नहीं हुआ था, याची को 16 मई 2025 को जमानत मिल चुकी थी और उस पर तथ्य छिपाने का आरोप भी नहीं था।
अदालत ने 28 अप्रैल 1958 के शासनादेश और सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह फैसले के सिद्धांतों के अनुरूप मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है।
इस फैसले का सार यही है कि सरकारी नौकरी में चरित्र और उपयुक्तता का परीक्षण जरूरी है, लेकिन किसी अभ्यर्थी के खिलाफ लंबित मुकदमे को देखकर बिना मामले की प्रकृति और परिस्थितियों की जांच किए अभ्यर्थिता समाप्त नहीं की जा सकती। नियुक्ति प्राधिकारी को कानून के अनुसार स्वतंत्र और विवेकपूर्ण निर्णय लेना होगा। :::
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।