यूपी के 27 जिलों में ऑनलाइन उपस्थिति की स्थिति खराब, बोर्ड ने बढ़ाई निगरानी, हर कार्यदिवस 100% हाजिरी दर्ज कराने के निर्देश
उत्तर प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों की उपस्थिति को डिजिटल माध्यम से दर्ज कराने की व्यवस्था को लेकर माध्यमिक शिक्षा विभाग ने अब निगरानी और सख्त करने का फैसला किया है। प्रदेश के सभी माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने की व्यवस्था लागू होने के बावजूद कई जिलों में इसका पालन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो रहा है। स्थिति यह है कि प्रदेश के 27 जिलों में 30 प्रतिशत से भी कम विद्यालय ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
ऑनलाइन उपस्थिति व्यवस्था का उद्देश्य विद्यालयों में शिक्षकों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों की उपस्थिति का नियमित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है। इससे विभाग के पास विद्यालयवार उपस्थिति की जानकारी उपलब्ध रहती है और अधिकारी दूर बैठे भी यह देख सकते हैं कि किसी विद्यालय में निर्धारित व्यवस्था के अनुसार रोजाना उपस्थिति दर्ज हो रही है या नहीं।
लेकिन जिन जिलों में ऑनलाइन उपस्थिति का प्रतिशत लगातार कम बना हुआ है, वहां अब संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। यूपी बोर्ड ने ऐसे विद्यालयों की जिलेवार समीक्षा हर सप्ताह करने का निर्णय लिया है। साथ ही जिला विद्यालय निरीक्षकों यानी DIOS को अपने-अपने जिलों में निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
27 जिलों में 30 प्रतिशत से कम ऑनलाइन उपस्थिति
माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन उपस्थिति की समीक्षा के दौरान प्रदेश के 27 जिले ऐसे पाए गए हैं जहां 30 प्रतिशत से भी कम स्कूल इस व्यवस्था के तहत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
इन जिलों में सुल्तानपुर, कुशीनगर, वाराणसी, इटावा, गौतम बुद्ध नगर, कानपुर देहात, प्रतापगढ़, हमीरपुर, अमेठी, चंदौली, बस्ती, फर्रुखाबाद, बलिया, कानपुर नगर, हरदोई, उन्नाव, गोरखपुर, गाजीपुर, अयोध्या, जौनपुर, आगरा, सिद्धार्थनगर, मैनपुरी, बहराइच, लखनऊ, फिरोजाबाद और गोंडा शामिल हैं।
इन जिलों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऑनलाइन उपस्थिति का आंकड़ा निर्धारित स्तर तक कैसे पहुंचाया जाए। बोर्ड की ओर से स्पष्ट किया गया है कि डिजिटल उपस्थिति का नियमित और शत-प्रतिशत अंकन शासन तथा परिषद की प्राथमिकताओं में शामिल है।
ऑनलाइन उपस्थिति को लेकर बोर्ड की सख्ती
यूपी बोर्ड ने अब इस व्यवस्था की नियमित निगरानी का फैसला किया है। इसके तहत स्कूलों की जिलेवार समीक्षा प्रत्येक सप्ताह की जाएगी।
जिन विद्यालयों में ऑनलाइन उपस्थिति का प्रतिशत 30 प्रतिशत से कम पाया जाएगा, उन्हें बोर्ड की ऑनलाइन समीक्षा में प्रत्येक सप्ताह शामिल किया जाएगा। इसका मतलब है कि ऐसे विद्यालयों की स्थिति पर केवल महीने या सत्र के अंत में नजर नहीं रखी जाएगी, बल्कि उनकी प्रगति की लगातार समीक्षा होगी।
इस व्यवस्था से विभाग यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि किसी विद्यालय में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं होने का कारण क्या है। यदि तकनीकी समस्या है तो उसे दूर किया जा सकता है और यदि विद्यालय स्तर पर लापरवाही है तो संबंधित अधिकारियों के माध्यम से निगरानी बढ़ाई जा सकती है।
अपर सचिव ने DIOS को भेजा पत्र
यूपी बोर्ड के अपर सचिव (प्रशासन) सत्येंद्र कुमार सिंह की ओर से संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षकों को पत्र जारी किया गया है। पत्र में उन जनपदों का उल्लेख करते हुए आवश्यक पर्यवेक्षण पर जोर दिया गया है, जहां ऑनलाइन उपस्थिति का आंकड़ा 30 प्रतिशत या उससे कम है।
पत्र में कहा गया है कि ऐसे जिलों में अपेक्षित स्तर पर ऑनलाइन दैनिक उपस्थिति दर्ज नहीं होना पर्यवेक्षण की कमी को दर्शाता है। शासन और परिषद की प्राथमिकता है कि विद्यालयों में ऑनलाइन दैनिक उपस्थिति का नियमित और शत-प्रतिशत अंकन सुनिश्चित हो।
यानी अब केवल विद्यालयों को निर्देश देने तक मामला सीमित नहीं रहेगा। जिला स्तर पर अधिकारियों को यह देखना होगा कि उनके अधीन आने वाले विद्यालय रोजाना ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं या नहीं।
हर कार्यदिवस 100 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य
बोर्ड ने सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों को निर्देशित किया है कि वे अपने जिलों में विद्यालयों की निगरानी बढ़ाएं। प्रत्येक कार्यदिवस में शत-प्रतिशत विद्यालयों की ओर से एप के माध्यम से ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराई जानी चाहिए।
इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी विद्यालय की ऑनलाइन उपस्थिति एक-दो दिन दर्ज हो जाने को पर्याप्त नहीं माना जाएगा। व्यवस्था का उद्देश्य नियमित दैनिक रिकॉर्ड तैयार करना है।
यदि कोई विद्यालय लगातार ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं कराता है तो उसके कारणों की जानकारी लेना और आवश्यक कार्रवाई करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी।
आखिर क्यों जरूरी है ऑनलाइन उपस्थिति?
ऑनलाइन उपस्थिति व्यवस्था के पीछे केवल हाजिरी दर्ज करना ही उद्देश्य नहीं है। डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से विभाग को विद्यालयों में कर्मचारियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति का वास्तविक समय के करीब रिकॉर्ड प्राप्त हो सकता है।
पुराने समय में उपस्थिति रजिस्टर विद्यालय में ही रखा जाता था। किसी अधिकारी को विद्यालय की उपस्थिति की जानकारी प्राप्त करने के लिए निरीक्षण या रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ सकता था। डिजिटल व्यवस्था में आंकड़े ऑनलाइन उपलब्ध होने के कारण निगरानी अपेक्षाकृत आसान हो जाती है।
इसके माध्यम से अधिकारी यह भी देख सकते हैं कि कौन से विद्यालय नियमित रूप से व्यवस्था का पालन कर रहे हैं और किन विद्यालयों में लगातार समस्या बनी हुई है।
हालांकि किसी भी डिजिटल व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके लिए पर्याप्त तकनीकी सुविधा, इंटरनेट कनेक्टिविटी, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था मौजूद हो।
शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए क्या बदलेगा?
ऑनलाइन उपस्थिति की व्यवस्था मजबूत होने से शिक्षकों और विद्यालय कर्मचारियों को प्रतिदिन निर्धारित एप के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करनी होगी। विद्यालय प्रशासन के स्तर पर भी यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रक्रिया सही तरीके से पूरी हो।
ऐसी व्यवस्था में तकनीकी समस्या आने पर विद्यालयों को संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी देना भी महत्वपूर्ण हो जाता है। केवल उपस्थिति दर्ज नहीं होने के आधार पर किसी शिक्षक या कर्मचारी की अनुपस्थिति मान लेना और तकनीकी समस्या को नजरअंदाज करना अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।
इसलिए डिजिटल उपस्थिति व्यवस्था के साथ तकनीकी शिकायतों के समाधान की प्रभावी प्रणाली भी जरूरी है।
विद्यार्थियों की ऑनलाइन उपस्थिति भी महत्वपूर्ण
ऑनलाइन उपस्थिति की व्यवस्था केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं है। विद्यालय में विद्यार्थियों की उपस्थिति भी शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति का रिकॉर्ड विद्यालयों को ड्रॉपआउट, अनियमित उपस्थिति और छात्रों की शैक्षिक भागीदारी पर नजर रखने में मदद कर सकता है। यदि किसी विद्यार्थी की उपस्थिति लगातार कम रहती है तो विद्यालय स्तर पर उसके कारणों का पता लगाया जा सकता है।
इसी तरह शिक्षकों की उपस्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड विद्यालय संचालन की निगरानी में मदद कर सकता है।
27 जिलों में कम प्रतिशत क्यों?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन 27 जिलों में ऑनलाइन उपस्थिति 30 प्रतिशत से कम क्यों है। इसके कई संभावित कारण हो सकते हैं, लेकिन किसी एक कारण को पूरे प्रदेश के इन जिलों पर लागू करना उचित नहीं होगा।
कुछ विद्यालयों में इंटरनेट कनेक्टिविटी से जुड़ी समस्या हो सकती है। कुछ स्थानों पर एप के इस्तेमाल को लेकर तकनीकी कठिनाई हो सकती है। वहीं कुछ मामलों में विद्यालय स्तर पर व्यवस्था को नियमित रूप से लागू नहीं किया जा रहा हो सकता है।
बोर्ड के पत्र में पर्यवेक्षणीय शिथिलता की बात कही गई है, इसलिए अब जिला स्तर पर अधिकारियों को विद्यालयवार स्थिति की समीक्षा करनी होगी। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि समस्या तकनीकी है, प्रशासनिक है या विद्यालय स्तर पर अनुपालन की कमी से जुड़ी है।
साप्ताहिक समीक्षा से बढ़ेगी जवाबदेही
बोर्ड की ओर से प्रत्येक सप्ताह समीक्षा किए जाने का फैसला इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। नियमित समीक्षा से उन विद्यालयों की पहचान जल्दी हो सकती है जहां ऑनलाइन उपस्थिति लगातार कम है।
मान लीजिए किसी जिले में किसी विद्यालय की ऑनलाइन उपस्थिति लगातार कई सप्ताह तक दर्ज नहीं हो रही है। ऐसी स्थिति में अधिकारी विद्यालय से कारण पूछ सकते हैं और आवश्यक सुधार के निर्देश दे सकते हैं।
इसके विपरीत यदि किसी विद्यालय में तकनीकी समस्या है तो संबंधित विभाग उसे दूर करने के लिए कदम उठा सकता है। इस तरह समीक्षा का उद्देश्य केवल निगरानी करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को नियमित बनाना भी हो सकता है।
DIOS की जिम्मेदारी बढ़ी
जिला विद्यालय निरीक्षक माध्यमिक विद्यालयों की निगरानी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अब ऑनलाइन उपस्थिति के मामले में भी उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है।
उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि जिले के विद्यालयों में प्रत्येक कार्यदिवस ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज हो। साथ ही जिन विद्यालयों का प्रदर्शन लगातार खराब है, उनकी अलग से समीक्षा करनी होगी।
बोर्ड ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल विद्यालयों को आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जिला स्तर पर आदेशों के अनुपालन की निगरानी भी जरूरी होगी।
विद्यालयों को भी सतर्क रहना होगा
नए निर्देश के बाद माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों और संबंधित कर्मचारियों को ऑनलाइन उपस्थिति की प्रक्रिया को लेकर अधिक सतर्क रहना होगा। रोजाना की उपस्थिति समय पर दर्ज कराने के साथ यह भी देखना होगा कि दर्ज किया गया डेटा सही है।
यदि किसी दिन एप काम नहीं करता या नेटवर्क की समस्या आती है तो उसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को देना महत्वपूर्ण होगा, ताकि बाद में विद्यालय की ओर से अनुपालन न करने का आरोप न लगे।
डिजिटल व्यवस्था में रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होता है। इसलिए विद्यालयों को तकनीकी समस्या या अन्य बाधा से संबंधित जानकारी उपलब्ध होने पर उसका उचित रिकॉर्ड भी रखना चाहिए।
क्या होगी आगे की तस्वीर?
यूपी बोर्ड के इस निर्देश के बाद आने वाले सप्ताहों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन 27 जिलों में ऑनलाइन उपस्थिति का प्रतिशत कितना बढ़ता है। यदि जिला विद्यालय निरीक्षक नियमित निगरानी करते हैं और विद्यालय भी व्यवस्था का पालन करते हैं तो ऑनलाइन उपस्थिति के आंकड़े में सुधार आने की संभावना है।
दूसरी ओर, यदि किसी जिले में प्रतिशत लगातार 30 से कम रहता है तो वहां बोर्ड की साप्ताहिक समीक्षा जारी रहेगी। इससे संबंधित विद्यालय और जिला स्तर के अधिकारियों पर व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी बनी रहेगी।
डिजिटल निगरानी से शिक्षा व्यवस्था में क्या असर पड़ेगा?
ऑनलाइन उपस्थिति जैसी व्यवस्था शिक्षा विभाग को विद्यालयों की निगरानी के लिए एक डिजिटल आधार देती है। इससे कागजी रिकॉर्ड पर निर्भरता कम हो सकती है और अधिकारियों को नियमित आंकड़े उपलब्ध हो सकते हैं।
लेकिन डिजिटल व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब शिक्षक, कर्मचारी और विद्यालय प्रशासन इसे नियमित रूप से इस्तेमाल करें। इसके साथ तकनीकी सुविधाओं और प्रशिक्षण की उपलब्धता भी जरूरी है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सभी माध्यमिक विद्यालयों में एक समान डिजिटल व्यवस्था लागू करना आसान काम नहीं है। अलग-अलग जिलों में इंटरनेट, संसाधन और विद्यालयों की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए निगरानी के साथ वास्तविक समस्याओं का समाधान भी इस व्यवस्था की सफलता के लिए जरूरी होगा।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में ऑनलाइन उपस्थिति को लेकर यूपी बोर्ड ने अब निगरानी बढ़ाने का फैसला किया है। 27 जिलों में 30 प्रतिशत से कम विद्यालयों द्वारा ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज किए जाने के बाद बोर्ड ने जिला विद्यालय निरीक्षकों को विशेष निगरानी के निर्देश दिए हैं।
बोर्ड के अपर सचिव (प्रशासन) सत्येंद्र कुमार सिंह की ओर से जारी पत्र में ऑनलाइन दैनिक उपस्थिति के नियमित और शत-प्रतिशत अंकन को प्राथमिकता बताया गया है। अब प्रत्येक कार्यदिवस सभी विद्यालयों से एप के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य रखा गया है।
जिन विद्यालयों में उपस्थिति 30 प्रतिशत से कम रहेगी, उनकी स्थिति बोर्ड की साप्ताहिक ऑनलाइन समीक्षा में शामिल की जाएगी। इससे आने वाले दिनों में विद्यालयों और जिला स्तर के अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ना तय है।
अब देखना यह होगा कि जिन 27 जिलों में ऑनलाइन उपस्थिति का आंकड़ा फिलहाल काफी कम है, वहां प्रशासनिक निगरानी और विद्यालयों के स्तर पर किए गए प्रयासों के बाद स्थिति कितनी बदलती है। डिजिटल उपस्थिति व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब यह केवल आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया न रहकर विद्यालयों की नियमित निगरानी और बेहतर शैक्षिक प्रशासन का माध्यम बने।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।