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दो बार जानलेवा इंजेक्शन देने के बाद भी नहीं हुई मौत, अमेरिका में क्रिस्टा पाइक की फांसी की कोशिश नाकाम

दो बार जानलेवा इंजेक्शन देने के बाद भी नहीं हुई मौत, अमेरिका में क्रिस्टा पाइक की फांसी की कोशिश नाकाम

      अमेरिका के टेनेसी राज्य से मौत की सजा से जुड़ी एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने वहां की फांसी की प्रक्रिया और उसके कानूनी तथा चिकित्सकीय पहलुओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टेनेसी में मौत की सजा पाने वाली कैदी क्रिस्टा पाइक को घातक इंजेक्शन के जरिए मृत्युदंड देने की कोशिश की गई, लेकिन यह प्रक्रिया सफल नहीं हो सकी। रिपोर्टों के अनुसार, पाइक को दो बार दवाओं की खुराक दी गई, इसके बावजूद उसकी धड़कन चलती रही।

सजा के लिए निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होने के बाद पाइक को अस्पताल ले जाया गया। उनकी कानूनी टीम की ओर से बताया गया कि वह बेहोश थीं, लेकिन उनकी सांस और दिल की धड़कन चल रही थी। वकील के अनुसार, उन्हें अस्पताल में जीवन बचाने वाली चिकित्सा दी जा रही थी।

यह घटना इसलिए भी असाधारण मानी जा रही है क्योंकि अमेरिका में घातक इंजेक्शन को मृत्युदंड देने का अपेक्षाकृत नियंत्रित और चिकित्सकीय प्रक्रिया वाला तरीका माना जाता है। लेकिन जब निर्धारित दवाओं के इस्तेमाल के बाद भी कैदी की मृत्यु नहीं हुई, तो यह सवाल सामने आया कि ऐसी स्थिति में राज्य की अगली कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई क्या हो सकती है।

1996 की हत्या में सुनाई गई थी मौत की सजा

क्रिस्टा पाइक को वर्ष 1996 में 19 वर्षीय कोलीन स्लेमर की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। उस समय पाइक की उम्र 18 वर्ष थी।

मामला टेनेसी के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ा था, जहां पाइक और उसके तत्कालीन बॉयफ्रेंड टेडरिल शिप की मुलाकात स्लेमर से हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, बाद में विवाद बढ़ा और स्लेमर की हत्या कर दी गई।

अदालत में चले मुकदमे के बाद पाइक को हत्या का दोषी माना गया और उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। इसके बाद लगभग तीन दशकों तक यह मामला कानूनी प्रक्रिया से गुजरता रहा। अपील, दया याचिकाओं और मृत्युदंड पर रोक लगाने की कोशिशों के कारण सजा पर अमल लंबे समय तक नहीं हो सका।

पाइक की कहानी में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अपराध के समय वह स्वयं बहुत कम उम्र की थी। हालांकि अमेरिकी कानून में 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका व्यक्ति वयस्क माना जाता है, लेकिन किशोरावस्था और मानसिक परिपक्वता से संबंधित सवाल मृत्युदंड के मामलों में लंबे समय से कानूनी बहस का विषय रहे हैं।

आखिरी समय तक चली कानूनी लड़ाई

क्रिस्टा पाइक को मृत्युदंड दिए जाने की तारीख नजदीक आने के साथ उनकी कानूनी टीम ने सजा पर रोक लगाने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाया। मामले में अंतिम समय तक कानूनी प्रयास जारी रहे।

पाइक की ओर से मृत्युदंड की प्रक्रिया को रोकने के लिए अलग-अलग कानूनी आधारों पर दलीलें रखी गईं। हालांकि अंततः अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने घातक इंजेक्शन के जरिए सजा देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ने की अनुमति दी।

इस फैसले के बाद टेनेसी प्रशासन के सामने निर्धारित मृत्युदंड को लागू करने का रास्ता साफ हुआ। इसके लिए नैशविल स्थित रिवरबेंड मैक्सिमम सिक्योरिटी इंस्टीट्यूशन में प्रक्रिया तय की गई।

गुरुवार को स्थानीय समयानुसार रात करीब आठ बजे पाइक को घातक इंजेक्शन देने की प्रक्रिया शुरू की गई।

लेकिन जो हुआ, वह निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं रहा।

दो बार दी गई दवा, फिर भी चलती रही धड़कन

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पाइक को घातक इंजेक्शन की दो खुराक दी गईं। सामान्य तौर पर ऐसी प्रक्रिया में दवाओं के इस्तेमाल के बाद कैदी की चेतना समाप्त होती है और कुछ समय बाद हृदय गति रुकने की उम्मीद की जाती है।

लेकिन इस मामले में दो खुराक दिए जाने के बावजूद पाइक की मृत्यु नहीं हुई।

उनकी कानूनी टीम ने बताया कि पाइक बेहोश हो गई थीं, मगर उनकी धड़कन चल रही थी। वकील ने बीबीसी से बातचीत में यह भी बताया कि उनकी सांस चल रही थी और खर्राटे सुनाई दे रहे थे।

स्थिति स्पष्ट होने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें जीवन बचाने वाली चिकित्सा उपलब्ध कराई गई।

यह घटना अपने आप में कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि मृत्युदंड की प्रक्रिया का अंतिम उद्देश्य ही व्यक्ति की मृत्यु सुनिश्चित करना होता है। यदि निर्धारित दवाओं के बाद भी मृत्यु न हो, तो प्रशासन के सामने चिकित्सकीय और कानूनी दोनों तरह की जटिलताएं खड़ी हो जाती हैं।

टेनेसी के प्रोटोकॉल में दूसरी व्यवस्था भी है

रिपोर्टों के अनुसार, टेनेसी के घातक इंजेक्शन प्रोटोकॉल में दवाओं की सिरिंज का एक दूसरा सेट भी तैयार रखा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि पहली दवा-प्रक्रिया से कैदी की मृत्यु न हो तो दूसरी खुराक उपलब्ध हो।

क्रिस्टा पाइक के मामले में यही दूसरी व्यवस्था इस्तेमाल की गई।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया है—यदि पहली और दूसरी दोनों प्रक्रियाओं के बाद भी कैदी जीवित रहे तो आगे क्या किया जाएगा?

बताया गया है कि संबंधित प्रोटोकॉल में ऐसी स्थिति के बारे में स्पष्ट निर्देश नहीं हैं। यही बात इस मामले को असाधारण बना देती है।

मृत्युदंड जैसी अंतिम प्रकृति की सजा में प्रशासन के पास प्रत्येक संभावित परिस्थिति के लिए स्पष्ट प्रक्रिया होना कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी कैदी को दो बार घातक दवा देने के बाद भी मृत्यु न होना सामान्य स्थिति नहीं है और इसलिए इस मामले के आगे के कानूनी परिणाम भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

क्या दूसरी बार फिर मृत्युदंड दिया जा सकता है?

क्रिस्टा पाइक के मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वह चिकित्सकीय उपचार के बाद जीवित रहती हैं तो उनके साथ आगे क्या कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

यह सवाल केवल प्रशासनिक नहीं है। इसके साथ अमेरिकी संविधान में क्रूर और असामान्य दंड यानी Cruel and Unusual Punishment से संबंधित संवैधानिक सिद्धांत भी जुड़ सकते हैं।

अमेरिका में मृत्युदंड संवैधानिक रूप से कुछ परिस्थितियों में मान्य है, लेकिन उसे लागू करने की प्रक्रिया भी संवैधानिक सीमाओं के अधीन होती है। किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देने के प्रयास के बाद वह जीवित रह जाए और फिर उसी सजा को दोबारा लागू करने की कोशिश की जाए, तो यह अलग कानूनी प्रश्न पैदा कर सकता है।

ऐसी परिस्थिति में अदालतों को यह देखना पड़ सकता है कि पहले प्रयास के दौरान वास्तव में क्या हुआ, दवाओं की मात्रा क्या थी, प्रक्रिया में कोई तकनीकी या चिकित्सकीय समस्या थी या नहीं और आगे की कार्रवाई संविधान तथा राज्य के कानून के अनुरूप होगी या नहीं।

इसलिए पाइक के मामले में अस्पताल से आगे की स्थिति और अदालतों में होने वाली कार्रवाई काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।

मृत्युदंड और घातक इंजेक्शन पर पुरानी बहस

अमेरिका में मृत्युदंड लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। अलग-अलग राज्यों में इसके लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं और प्रोटोकॉल अपनाए जाते हैं।

घातक इंजेक्शन को लंबे समय तक अपेक्षाकृत मानवीय तरीका बताकर इस्तेमाल किया गया। इसका उद्देश्य यह था कि कैदी पहले बेहोश हो, फिर ऐसी दवाओं का प्रभाव पड़े जिससे सांस और अंततः हृदय की गतिविधि रुक जाए।

लेकिन वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें घातक इंजेक्शन की प्रक्रिया अपेक्षित तरीके से नहीं चली। कुछ मामलों में कैदियों को लंबे समय तक दर्द या परेशानी का सामना करना पड़ा, जबकि कुछ मामलों में नस खोजने या दवा देने की तकनीकी कठिनाइयों की खबरें सामने आईं।

इसी वजह से अमेरिका में मृत्युदंड की प्रक्रिया को लेकर अदालतों, मानवाधिकार संगठनों और कानून विशेषज्ञों के बीच लगातार बहस होती रही है।

क्रिस्टा पाइक का मामला इस बहस में एक अलग तरह का प्रश्न जोड़ता है—अगर राज्य किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देने की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, लेकिन निर्धारित तरीके से उसकी मृत्यु न हो, तो राज्य की कानूनी सीमा कहां समाप्त होती है?

लगभग तीन दशक पुराना मामला

क्रिस्टा पाइक का मामला आज इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हत्या और सजा के बीच लगभग तीन दशक का समय बीत चुका है।

1996 में हुई हत्या के समय पाइक सिर्फ 18 वर्ष की थीं। इसके बाद मुकदमा, दोषसिद्धि, अपील और मृत्युदंड से संबंधित कानूनी प्रक्रियाएं चलती रहीं।

अमेरिकी न्याय व्यवस्था में गंभीर अपराधों के मामलों में दोषसिद्धि के बाद भी अपील की कई संभावनाएं होती हैं। विशेष रूप से मृत्युदंड के मामलों में अदालतें प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों की गहन समीक्षा करती हैं।

इसी कारण किसी कैदी को दोषी ठहराए जाने और वास्तविक मृत्युदंड के बीच कई वर्ष या दशकों का अंतर हो सकता है।

पाइक के मामले में भी ऐसा ही हुआ। लेकिन अब मृत्युदंड को लागू करने का प्रयास ही एक नए कानूनी प्रश्न में बदल गया है।

पीड़िता के परिवार के लिए भी यह घटना महत्वपूर्ण

इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष 19 वर्षीय कोलीन स्लेमर और उनके परिवार से जुड़ा है। किसी हत्या के मामले में दोषसिद्धि के बाद पीड़ित परिवार के लिए न्याय की प्रक्रिया का अर्थ केवल अदालत का फैसला नहीं होता, बल्कि वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया भी उसका हिस्सा बन जाती है।

मृत्युदंड के मामलों में पीड़ित परिवार अक्सर सजा के अंतिम अमल की प्रतीक्षा करते हैं। दूसरी ओर, दोषी व्यक्ति की कानूनी टीम अपने मुवक्किल के जीवन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए उपलब्ध सभी कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करती है।

इस मामले में भी यही दो अलग-अलग कानूनी हित सामने दिखाई देते हैं—एक ओर हत्या की पीड़िता के लिए न्याय और दूसरी ओर दोषसिद्ध कैदी के संवैधानिक अधिकार।

अस्पताल में भर्ती होने के बाद आगे क्या?

घातक इंजेक्शन की कोशिश विफल होने के बाद पाइक को अस्पताल ले जाया गया। उनकी कानूनी टीम के अनुसार उन्हें जीवन बचाने वाली चिकित्सा दी जा रही थी।

अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि उनका स्वास्थ्य कैसा रहता है और टेनेसी प्रशासन तथा अदालतें इस असफल निष्पादन के संबंध में क्या कदम उठाती हैं।

यदि पाइक जीवित रहती हैं, तो उनके वकील इस घटना के आधार पर नए कानूनी तर्क भी उठा सकते हैं। दूसरी ओर, राज्य की ओर से यह सवाल उठ सकता है कि पहले निर्धारित मृत्युदंड को किस कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जा सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम में चिकित्सा रिकॉर्ड, जेल प्रशासन की रिपोर्ट, इस्तेमाल की गई दवाओं का विवरण और मृत्युदंड प्रोटोकॉल की व्याख्या महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।

घटना ने खड़े किए कई बड़े सवाल

क्रिस्टा पाइक के मामले ने मृत्युदंड की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल सामने रख दिए हैं। क्या किसी व्यक्ति को दो बार घातक दवा दिए जाने के बाद भी जीवित रहने पर दोबारा मृत्युदंड दिया जा सकता है? क्या ऐसा करना संवैधानिक रूप से उचित होगा? यदि राज्य के प्रोटोकॉल में ऐसी असाधारण स्थिति का स्पष्ट उल्लेख नहीं है तो निर्णय कौन करेगा? और यदि किसी प्रक्रिया में मृत्यु सुनिश्चित नहीं हो पाती, तो उस प्रक्रिया को कानूनी रूप से सफल माना जाएगा या असफल?

इन सवालों का जवाब केवल जेल प्रशासन के स्तर पर नहीं मिल सकता। संभव है कि मामला दोबारा अदालतों के सामने पहुंचे और न्यायपालिका को यह तय करना पड़े कि आगे की कार्रवाई के लिए कौन-सा कानूनी रास्ता उपलब्ध है।

क्रिस्टा पाइक को 1996 की हत्या के मामले में अदालत ने मृत्युदंड दिया था। लगभग 30 साल बाद उस सजा को लागू करने का प्रयास हुआ, लेकिन दो बार घातक इंजेक्शन देने के बाद भी उनकी मृत्यु नहीं हुई। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

यह घटना अमेरिका में मृत्युदंड की व्यवस्था के सामने एक असाधारण स्थिति के रूप में सामने आई है। अंतिम रूप से इस मामले का कानूनी भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पाइक की चिकित्सकीय स्थिति क्या रहती है और टेनेसी की अदालतें तथा प्रशासन इस असफल निष्पादन को किस तरह देखते हैं।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि मृत्युदंड की प्रक्रिया के बावजूद क्रिस्टा पाइक जीवित रहीं और उन्हें अस्पताल में उपचार दिया गया। अब इस घटना से जुड़े चिकित्सकीय तथ्यों के साथ-साथ इसके संवैधानिक और कानूनी परिणामों पर भी नजर रहेगी।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।