2018 के मारपीट मामले में कोर्ट में पेश नहीं हुए नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद, MP-MLA कोर्ट ने जारी किया NBW; संपत्ति कुर्की की कार्रवाई के आदेश
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष और नगीना लोकसभा क्षेत्र से सांसद चंद्रशेखर आजाद से जुड़े करीब आठ साल पुराने एक मामले में गाजियाबाद की MP-MLA विशेष अदालत ने सख्त कार्रवाई की है। अदालत ने 2018 के कथित मारपीट और गाली-गलौज के मामले में सुनवाई के दौरान अनुपस्थित रहने पर चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant-NBW) जारी किया है। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने उनकी संपत्ति की कुर्की से संबंधित कार्रवाई के आदेश भी दिए हैं।
यह मामला साहिबाबाद थाना क्षेत्र में वर्ष 2018 में दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता धर्मेंद्र कुमार ने आरोप लगाया था कि एक शादी समारोह के दौरान उनके साथ मारपीट और गाली-गलौज की गई। इस मामले में चंद्रशेखर आजाद के साथ कुछ अन्य लोगों के नाम भी सामने आए थे। फिलहाल यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में है और आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला अभी नहीं हुआ है।
सुनवाई के दौरान अदालत में पेश नहीं हुए चंद्रशेखर आजाद
मामले की ताजा सुनवाई के दौरान चंद्रशेखर आजाद अदालत में उपस्थित नहीं हुए। शिकायतकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष उनकी लगातार अनुपस्थिति का मुद्दा उठाया। रिपोर्टों के मुताबिक, शिकायतकर्ता पक्ष ने अदालत को बताया कि इस मामले में पहले भी चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ वारंट जारी हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद वह बाद की कार्यवाही में नियमित रूप से उपस्थित नहीं हुए।
इसके बाद अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया। साथ ही संपत्ति कुर्की से जुड़ी कार्रवाई के लिए भी आदेश दिए गए हैं।
गैर-जमानती वारंट जारी होने का अर्थ यह है कि संबंधित व्यक्ति की गिरफ्तारी की प्रक्रिया सामान्य जमानती वारंट की तुलना में अधिक कठोर हो सकती है। हालांकि, NBW जारी होना अपने आप में संबंधित व्यक्ति को उस आपराधिक मामले में दोषी साबित नहीं करता। दोषसिद्धि केवल मुकदमे की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही हो सकती है।
आठ साल पुराना है पूरा मामला
यह विवाद वर्ष 2018 का है। मामला साहिबाबाद थाना क्षेत्र स्थित वृंदावन गार्डन में आयोजित एक शादी समारोह से संबंधित बताया गया है। शिकायतकर्ता धर्मेंद्र कुमार के मुताबिक, वह शादी समारोह में शामिल होने गए थे। इसी दौरान चंद्रशेखर आजाद अपने कुछ समर्थकों के साथ वहां पहुंचे थे।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने वहां मौजूद लोगों के पास हथियार होने को लेकर सवाल किया था। इसके बाद कथित तौर पर उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की गई। शिकायत में चंद्रशेखर आजाद के अलावा गुलजार सिद्दीकी और अन्य लोगों के नाम भी बताए गए थे।
कुछ रिपोर्टों में शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आरोप बताया गया है कि घटना के दौरान उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई थी। हालांकि, ये सभी बातें शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप हैं और इनका अंतिम सत्यापन अदालत में साक्ष्यों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर होना है।
2018 में दर्ज हुआ था मुकदमा
धर्मेंद्र कुमार की शिकायत के आधार पर साहिबाबाद थाने में मामला दर्ज किया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों में इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 323 और 305 का उल्लेख किया गया है। हालांकि, वर्तमान रिपोर्टों में धाराओं के उल्लेख को लेकर कुछ असंगतियां दिखाई देती हैं, इसलिए मुकदमे की मूल FIR और न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति को अंतिम आधार मानना अधिक उचित होगा।
मामला दर्ज होने के बाद पुलिस की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया चली। बाद में यह प्रकरण गाजियाबाद की MP-MLA विशेष अदालत में पहुंचा, जहां जनप्रतिनिधि से जुड़े मामलों की सुनवाई की जा रही है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी FIR में किसी धारा का लगाया जाना और उन आरोपों का अदालत में सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत में अभियोजन पक्ष को आरोपों को कानून के मुताबिक साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होता है।
पहले भी जारी हुआ था वारंट
यह पहली बार नहीं है जब इस मामले में चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ वारंट जारी होने की बात सामने आई है। वर्ष 2025 में भी इसी मुकदमे को लेकर वह गाजियाबाद की MP-MLA विशेष अदालत में पेश हुए थे।
मई 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, चंद्रशेखर आजाद अपने अधिवक्ता के साथ अदालत पहुंचे थे। उस समय उनके खिलाफ पहले जारी किए गए वारंट को रिकॉल कराने के लिए आवेदन दिया गया था। अदालत ने आवेदन पर सुनवाई करते हुए आगे की तारीख तय की थी।
इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि मामला कई वर्षों से अदालत में लंबित है और आरोपी की उपस्थिति को लेकर पहले भी न्यायालय की प्रक्रिया सामने आ चुकी है।
शिकायतकर्ता पक्ष ने क्या मांग की?
ताजा सुनवाई में शिकायतकर्ता धर्मेंद्र कुमार की ओर से अधिवक्ता भजनलाल गौतम ने अदालत के समक्ष चंद्रशेखर आजाद की गैरहाजिरी का मुद्दा उठाया। रिपोर्टों के अनुसार, शिकायतकर्ता पक्ष ने अदालत से गिरफ्तारी वारंट जारी करने और आगे की वैधानिक कार्रवाई की मांग की।
रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि शिकायतकर्ता पक्ष ने CrPC की धारा 82 और 83 के तहत कार्रवाई की मांग की थी। धारा 82 का संबंध ऐसे व्यक्ति के खिलाफ उद्घोषणा की प्रक्रिया से है, जिसके बारे में अदालत को यह विश्वास हो कि वह वारंट के निष्पादन से बचने के लिए फरार या छिप रहा है। वहीं धारा 83 कुछ परिस्थितियों में उसकी संपत्ति की कुर्की की प्रक्रिया से संबंधित है।
हालांकि, किसी विशेष मामले में इन धाराओं की वास्तविक लागू स्थिति अदालत के आदेश और मामले की प्रक्रिया पर निर्भर करती है। इसलिए समाचार रिपोर्ट में सामने आई जानकारी को अदालत के मूल आदेश के संदर्भ में ही अंतिम रूप से समझा जाना चाहिए।
संपत्ति कुर्की का आदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
गैर-जमानती वारंट के साथ संपत्ति कुर्की से संबंधित कार्रवाई का आदेश इस मामले में न्यायालय की प्रक्रिया का अगला गंभीर चरण माना जा रहा है। संपत्ति की कुर्की कोई सजा नहीं होती, बल्कि कानून में निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होती है।
आमतौर पर ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य अदालत के आदेश के पालन को सुनिश्चित करना और उस व्यक्ति की न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है, जिसके खिलाफ वारंट जारी किया गया है। हालांकि, संपत्ति की कुर्की के लिए भी कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अदालत ने चंद्रशेखर आजाद को इस मामले में दोषी करार दे दिया है। फिलहाल अदालत की ओर से सामने आई कार्रवाई उनकी अदालत में उपस्थिति और वारंट के अनुपालन से संबंधित है।
क्या NBW जारी होने का मतलब गिरफ्तारी तय है?
गैर-जमानती वारंट जारी होने के बाद पुलिस के पास संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार हो सकता है, लेकिन आगे की प्रक्रिया परिस्थितियों और अदालत के आदेश पर निर्भर करती है। आरोपी अदालत में उपस्थित होकर कानून के अनुसार राहत मांग सकता है।
इस प्रकार NBW को सीधे अंतिम सजा के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह न्यायालय की ओर से जारी की जाने वाली प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य संबंधित व्यक्ति की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना है।
चंद्रशेखर आजाद के मामले में भी आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अदालत में कब और किस माध्यम से उपस्थित होते हैं तथा अदालत उनके संबंध में क्या अगला आदेश पारित करती है।
चंद्रशेखर आजाद पहले भी अदालत में पेश हो चुके हैं
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वर्ष 2025 में चंद्रशेखर आजाद स्वयं अदालत में उपस्थित हुए थे। उस समय उन्होंने पहले जारी वारंट को वापस लेने के लिए आवेदन किया था।
हिन्दुस्तान और अमर उजाला की मई 2025 की रिपोर्टों के मुताबिक, वह अपने अधिवक्ता के साथ अदालत पहुंचे थे और वारंट रिकॉल के लिए प्रार्थना पत्र दिया था। अदालत ने उस समय आवेदन पर सुनवाई की थी और आगे की तारीख तय की थी।
इससे यह भी पता चलता है कि मामले में अदालत की कार्यवाही पहले से चल रही थी और वारंट की प्रक्रिया इससे पहले भी सामने आ चुकी थी।
आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं
चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ लगाए गए मारपीट, गाली-गलौज और धमकी संबंधी आरोप फिलहाल न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। किसी भी आपराधिक मामले में FIR, शिकायत या आरोप-पत्र में लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जाता।
अदालत में अभियोजन पक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य पेश करने होते हैं। आरोपी पक्ष को भी अपने बचाव का पूरा कानूनी अधिकार प्राप्त होता है। इसके बाद अदालत उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानून के आधार पर फैसला करती है।
इसलिए मौजूदा घटनाक्रम का सही कानूनी अर्थ यही है कि चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ अदालत ने गैर-जमानती वारंट जारी किया है और संपत्ति कुर्की से संबंधित कार्रवाई का आदेश दिया है; इससे 2018 के मूल आरोप सिद्ध नहीं हो जाते।
अब आगे क्या हो सकता है?
अब इस मामले में अगली महत्वपूर्ण प्रक्रिया चंद्रशेखर आजाद की अदालत में उपस्थिति से जुड़ी होगी। NBW के बाद पुलिस की ओर से वारंट के अनुपालन की कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी ओर, चंद्रशेखर आजाद कानून के तहत अदालत के समक्ष उपस्थित होकर वारंट के संबंध में उचित राहत मांग सकते हैं।
यदि अदालत के आदेश में संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश प्रभावी रहता है, तो संबंधित अधिकारी कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे कार्रवाई कर सकते हैं।
मामले की अगली सुनवाई में अदालत यह भी देख सकती है कि आरोपी की अनुपस्थिति का कारण क्या था और आगे उनकी उपस्थिति किस प्रकार सुनिश्चित की जाए।
राजनीतिक पद से अलग है आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया
चंद्रशेखर आजाद वर्तमान में नगीना लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष हैं। लेकिन किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ आपराधिक मामले की न्यायिक प्रक्रिया सामान्य कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही चलती है।
सांसद या किसी अन्य जनप्रतिनिधि के खिलाफ मामला लंबित होना अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। इसी तरह अदालत द्वारा जारी वारंट भी अंतिम न्यायिक फैसला नहीं होता।
मामले में अदालत की ओर से वर्तमान में जो कार्रवाई की गई है, वह मुख्य रूप से आरोपी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करने से जुड़ी है।
निष्कर्ष
गाजियाबाद की MP-MLA विशेष अदालत द्वारा नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने से वर्ष 2018 से चल रहा यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। शादी समारोह में कथित मारपीट और गाली-गलौज से शुरू हुआ यह प्रकरण अब अदालत में आरोपी की अनुपस्थिति और वारंट की कार्रवाई तक पहुंच गया है।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, सुनवाई के दौरान चंद्रशेखर आजाद की अनुपस्थिति और पहले जारी वारंट के बावजूद पेशी नहीं होने को देखते हुए अदालत ने NBW जारी किया है। साथ ही संपत्ति कुर्की से संबंधित कार्रवाई के आदेश भी दिए गए हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को समझते समय यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि वारंट जारी होना और आपराधिक आरोप सिद्ध होना दो अलग-अलग कानूनी अवस्थाएं हैं। 2018 के मामले में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय अभी अदालत द्वारा किया जाना बाकी है। आगे की सुनवाई में चंद्रशेखर आजाद की उपस्थिति, वारंट के संबंध में उनकी ओर से मांगी जाने वाली राहत और संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया इस मामले के प्रमुख कानूनी बिंदु होंगे।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।