मुर्शिदाबाद के सेलिम शेख की नागरिकता पर सवाल, कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा- साबित करें कि आप भारतीय हैं
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले से सामने आए नागरिकता और कथित अवैध प्रवास के एक मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसके पति को हिरासत से रिहा करने और उसे देश से बाहर भेजे जाने की कार्रवाई रोकने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस कृष्णा राव की एकल पीठ ने नागरिकता के दावे से जुड़े दस्तावेज पेश करने पर जोर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के पति से यह साबित करने को कहा कि वह भारतीय नागरिक है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है और जांच के दौरान उसके पास भारतीय नागरिक होने का पर्याप्त दस्तावेज नहीं है, तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार आगे क्या कार्रवाई करेगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक तरफ व्यक्ति की नागरिकता और हिरासत का सवाल है, तो दूसरी तरफ राज्य की ओर से कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासी की पहचान और उसे भारत से बाहर भेजने की प्रक्रिया का मुद्दा जुड़ा हुआ है।
क्या है पूरा मामला?
मुर्शिदाबाद की रहने वाली नरगिस बीबी ने कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने अपने पति सेलिम शेख को हिरासत से रिहा कराने और उन्हें भारत से बाहर भेजे जाने की संभावित कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की थी।
याचिका के मुताबिक सेलिम शेख को 31 अगस्त से डिटेंशन कैंप में रखा गया है। पत्नी का पक्ष था कि उनके पति के खिलाफ की गई हिरासत की कार्रवाई उचित नहीं है और उन्हें आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सेलिम शेख के संबंध में कुछ ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जिनके आधार पर पुलिस को उनके भारतीय नागरिक होने पर संदेह है।
राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि 31 अगस्त को की गई छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेजों से यह संकेत मिलता है कि सेलिम शेख बांग्लादेश के नागरिक हो सकते हैं और भारत में कथित रूप से अवैध रूप से रह रहे हैं।
हालांकि, किसी व्यक्ति को विदेशी या अवैध प्रवासी मानने का अंतिम निष्कर्ष केवल किसी एक दस्तावेज या आरोप के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को अपनी नागरिकता अथवा भारत में रहने के वैध अधिकार से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर और लागू कानूनी प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण होता है।
पत्नी का नाम वोटर लिस्ट में, पति का नहीं
सुनवाई के दौरान मतदाता सूची से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य भी अदालत के सामने रखा गया।
राज्य की ओर से बताया गया कि नरगिस बीबी का नाम वर्ष 2002 और वर्ष 2026 की मतदाता सूची में मौजूद है। इसके विपरीत उनके पति सेलिम शेख का नाम इन दोनों मतदाता सूचियों में नहीं मिला।
यही अंतर मामले में महत्वपूर्ण बन गया है।
हालांकि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में होना या न होना अपने आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन नागरिकता विवाद में मतदाता सूची, जन्म संबंधी रिकॉर्ड, परिवार से जुड़े सरकारी दस्तावेज, भूमि या निवास संबंधी रिकॉर्ड तथा अन्य आधिकारिक दस्तावेज परिस्थितियों के आकलन में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अदालत के सामने इसी संदर्भ में यह सवाल उठा कि सेलिम शेख के पास ऐसा कौन सा दस्तावेज है, जिससे यह साबित हो सके कि वह भारतीय नागरिक हैं।
बंगाल पुलिस ने गृह मंत्रालय के नोटिफिकेशन का दिया हवाला
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि सेलिम शेख को अवैध प्रवासियों की खोज, पहचान और उन्हें देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया से संबंधित गृह मंत्रालय के मई 2026 के नोटिफिकेशन के तहत हिरासत में रखा गया है।
राज्य का पक्ष था कि संबंधित अधिकारियों को ऐसे लोगों की पहचान करने और कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार है, जिनके बारे में प्रथम दृष्टया यह संदेह हो कि वे भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं।
इस मामले में पुलिस की ओर से बरामद दस्तावेजों को भी अदालत के सामने रखा गया और बताया गया कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सेलिम शेख की नागरिकता की जांच की जा रही है।
दूसरी तरफ याचिकाकर्ता की ओर से हिरासत को चुनौती दी गई। उनका कहना था कि सेलिम शेख को किसी सक्षम अधिकारी के सामने उचित तरीके से पेश नहीं किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने याचिकाकर्ता के पक्ष से यह जानना चाहा कि यदि संबंधित व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है तो उसे अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए किस तरह का अवसर दिया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कानून के तहत जांच की प्रक्रिया चल रही है और व्यक्ति को यह साबित करने का अवसर दिया जा रहा है कि वह भारतीय नागरिक है, तो उसे संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी का सार यह था कि यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक होने का दावा करता है तो उसे अपने दावे के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
जस्टिस राव ने विशेष रूप से वर्ष 2002 की मतदाता सूची से जुड़े दस्तावेज की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि यदि दावा किया जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति का नाम उस सूची में था, तो अदालत के सामने वह दस्तावेज पेश किया जाए।
अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि यदि जांच पूरी होने के बाद व्यक्ति भारतीय नागरिक होने का दावा साबित नहीं कर पाता तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार उसके साथ क्या कार्रवाई करेगा।
30 दिन की जांच का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात भी आई कि संबंधित मामले में जांच की प्रक्रिया चल रही है। अदालत ने इस संदर्भ में 30 दिनों की जांच अवधि का उल्लेख किया।
इससे स्पष्ट होता है कि अदालत ने मामले को केवल इस आधार पर नहीं देखा कि याचिकाकर्ता का पति लंबे समय से भारत में रह रहा है या उसकी पत्नी भारतीय मतदाता सूची में दर्ज है। बल्कि अदालत ने व्यक्तिगत रूप से सेलिम शेख की नागरिकता के समर्थन में उपलब्ध प्रमाणों पर ध्यान केंद्रित किया।
नागरिकता विवाद में यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति का किसी भारतीय नागरिक से विवाह होना अपने आप में उसकी भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं बन जाता। इसी तरह भारत में लंबे समय तक निवास करना भी हर परिस्थिति में स्वतः भारतीय नागरिकता प्रदान नहीं करता।
नागरिकता का निर्धारण संबंधित कानून और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाता है।
नागरिकता साबित करने के लिए कौन से दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं?
ऐसे मामलों में नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों का महत्व काफी बढ़ जाता है। परिस्थितियों के अनुसार जन्म प्रमाणपत्र, पुराने सरकारी रिकॉर्ड, माता-पिता से जुड़े नागरिकता संबंधी दस्तावेज, स्कूल रिकॉर्ड, भूमि एवं निवास रिकॉर्ड, मतदाता सूची में नाम, पासपोर्ट और अन्य वैध सरकारी दस्तावेज जांच में उपयोगी हो सकते हैं।
हालांकि हर दस्तावेज का कानूनी महत्व समान नहीं होता। किसी व्यक्ति का नाम किसी सरकारी रिकॉर्ड में होना एक तथ्य हो सकता है, लेकिन नागरिकता का अंतिम निर्धारण संबंधित कानून और मामले के पूरे रिकॉर्ड को देखकर किया जाता है।
इसी वजह से ऐसे मामलों में केवल एक दस्तावेज को निर्णायक मानने के बजाय दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला और उनकी प्रामाणिकता महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या वोटर लिस्ट में नाम होना नागरिकता का अंतिम प्रमाण है?
यह सवाल इस मामले के केंद्र में है।
मतदाता सूची में नाम दर्ज होना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड है, लेकिन केवल मतदाता सूची में नाम होने या नहीं होने से किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
कई बार मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने या संशोधित होने से जुड़े प्रशासनिक कारण भी हो सकते हैं। इसलिए नागरिकता विवाद में अन्य दस्तावेजों और लागू कानूनी प्रावधानों को भी देखा जाना आवश्यक होता है।
इसी तरह यदि किसी व्यक्ति का नाम पुरानी मतदाता सूची में नहीं है, तो केवल इस आधार पर उसे विदेशी घोषित करना भी अलग से कानूनी प्रक्रिया का विषय बन सकता है।
इस मामले में अदालत ने फिलहाल मुख्य रूप से याचिकाकर्ता के पति की ओर से भारतीय नागरिकता के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करने के सवाल पर ध्यान दिया।
हिरासत और डिपोर्टेशन का सवाल
मामले का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू हिरासत और डिपोर्टेशन यानी देश से बाहर भेजे जाने से जुड़ा है।
यदि किसी विदेशी नागरिक के भारत में अवैध रूप से रहने की स्थिति सामने आती है, तो संबंधित कानूनों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति खुद को भारतीय नागरिक बताता है, तब उसकी नागरिकता का सवाल पहले महत्वपूर्ण हो जाता है।
ऐसी स्थिति में दस्तावेजों की जांच, संबंधित व्यक्ति का पक्ष और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यही कारण है कि नागरिकता से जुड़े मामलों में अदालतें कई बार यह देखती हैं कि प्रशासन ने संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया या नहीं और कार्रवाई लागू कानून के अनुरूप हुई या नहीं।
कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
कलकत्ता हाई कोर्ट ने नरगिस बीबी की याचिका खारिज कर दी।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने राज्य की ओर से सेलिम शेख की नागरिकता पर संदेह के समर्थन में दस्तावेजों और जांच प्रक्रिया का उल्लेख किया गया। दूसरी तरफ याचिकाकर्ता की ओर से हिरासत को चुनौती दी गई थी।
अदालत की टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि इस स्तर पर अदालत ने प्रशासनिक जांच में हस्तक्षेप करने के बजाय संबंधित व्यक्ति को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए उपलब्ध दस्तावेज प्रस्तुत करने के महत्व पर जोर दिया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल पुलिस के आरोप से किसी व्यक्ति की नागरिकता अंतिम रूप से तय हो गई। नागरिकता का प्रश्न लागू कानून और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित होना है।
नागरिकता विवादों में कानूनी प्रक्रिया क्यों जरूरी है?
भारत में नागरिकता का प्रश्न केवल पहचान का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध किसी व्यक्ति के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों से जुड़ा है। इसलिए किसी व्यक्ति को विदेशी या अवैध प्रवासी मानने से पहले लागू कानूनी प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, यदि जांच में किसी व्यक्ति के विदेशी नागरिक होने के पर्याप्त आधार सामने आते हैं, तो राज्य को अपने कानूनों के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार भी प्राप्त है।
यही संतुलन ऐसे मामलों को संवेदनशील बनाता है।
मुर्शिदाबाद का यह मामला इसी व्यापक कानूनी प्रश्न को सामने लाता है कि जब किसी व्यक्ति की नागरिकता पर विवाद हो, तो उसके दावे की जांच किन दस्तावेजों और किस प्रक्रिया के आधार पर की जाएगी।
आगे क्या हो सकता है?
कलकत्ता हाई कोर्ट के सामने इस मामले में फिलहाल याचिका खारिज हो चुकी है। सेलिम शेख के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब यही रहेगा कि वह भारतीय नागरिक होने के दावे के समर्थन में कौन-कौन से विश्वसनीय और आधिकारिक दस्तावेज संबंधित प्राधिकारी के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं।
वहीं प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि नागरिकता की जांच और आगे की कार्रवाई संबंधित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही हो।
इस मामले का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत में नागरिकता और कथित अवैध प्रवास से जुड़े विवादों में दस्तावेजों की प्रामाणिकता, पुराने सरकारी रिकॉर्ड, मतदाता सूची और प्रशासनिक जांच की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।
निष्कर्षतः, कलकत्ता हाई कोर्ट की इस सुनवाई में सबसे प्रमुख बात यह रही कि अदालत ने नागरिकता के दावे को दस्तावेजों के आधार पर साबित करने पर जोर दिया। कोर्ट की टिप्पणी का केंद्रीय बिंदु यही था कि यदि कोई व्यक्ति खुद को भारतीय नागरिक बताता है, तो उसे अपने दावे के समर्थन में उपलब्ध वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। वहीं अंतिम निर्णय संबंधित कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होना है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
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यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।