कलकत्ता हाईकोर्ट की छत पर नमाज की अनुमति पर सवाल, ‘दुर्गा पूजा की इजाजत क्यों नहीं?’ PIL पर रजिस्ट्रार से रिपोर्ट तलब
कलकत्ता हाईकोर्ट परिसर में धार्मिक प्रार्थना को लेकर एक नया कानूनी विवाद सामने आया है। हाईकोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) में सवाल उठाया गया है कि यदि अदालत परिसर की छत पर किसी विशेष समुदाय के लोगों को शुक्रवार के दिन नमाज अदा करने की अनुमति दी जाती है, तो फिर उसी स्थान पर अन्य धर्मों के धार्मिक आयोजन को लेकर अलग मानदंड क्यों होना चाहिए।
याचिका दायर करने वाले संजय घोष ने धार्मिक समानता और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा उठाते हुए अदालत से इस पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि हाईकोर्ट परिसर में किसी धार्मिक गतिविधि की अनुमति दी जा रही है, तो समान परिस्थितियों में दूसरे समुदायों को भी धार्मिक गतिविधि की अनुमति से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रविंद्र विठ्ठलराव घुगे और जस्टिस ओम नारायण राय की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई। अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार से इस संबंध में जवाब मांगा है। रिपोर्टों के अनुसार, रजिस्ट्रार को स्वयं मौके का निरीक्षण करने और हाईकोर्ट की छत पर इस प्रकार की धार्मिक प्रार्थनाओं के आयोजन की वास्तविक स्थिति की जानकारी देने को कहा गया है। रिपोर्ट 12 अक्टूबर तक अदालत के सामने पेश की जानी है।
याचिका में क्या सवाल उठाया गया?
संजय घोष की PIL का मूल आधार समानता का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता देता है और राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना चाहिए।
याचिका में कथित तौर पर हाईकोर्ट की छत पर शुक्रवार को होने वाली नमाज को लेकर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर पूछा है कि यदि किसी समुदाय को वहां धार्मिक प्रार्थना करने की अनुमति मिल सकती है, तो दूसरे समुदाय को उसी स्थान पर दुर्गा पूजा अथवा अन्य धार्मिक आयोजन की अनुमति देने से इनकार किस आधार पर किया जा सकता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि याचिकाकर्ता का दावा और अदालत द्वारा उस दावे को स्वीकार कर लेना दो अलग बातें हैं। अभी अदालत ने इस संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने पहले रजिस्ट्रार से तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
अदालत ने रजिस्ट्रार को क्या निर्देश दिया?
मामले में अदालत ने सीधे तौर पर यह मान लेने के बजाय कि हाईकोर्ट की छत पर धार्मिक प्रार्थना की अनुमति वास्तव में किस आधार पर दी गई है, प्रशासनिक रिकॉर्ड और मौके की स्थिति की जानकारी मांगना उचित समझा।
रजिस्ट्रार को ऑन-साइट निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। यानी अदालत केवल कागजों में दर्ज जानकारी पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि संबंधित स्थान की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट भी चाहती है।
रजिस्ट्रार से यह जानकारी मांगी गई है कि हाईकोर्ट परिसर की छत पर धार्मिक प्रार्थना या अन्य गतिविधि के आयोजन की क्या व्यवस्था है, किस प्रकार की अनुमति दी गई है और इसके संबंध में क्या प्रशासनिक नियम या आदेश लागू हैं।
अदालत के सामने आने वाली रिपोर्ट इस मामले में आगे की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। रिपोर्ट के आधार पर अदालत यह देख सकती है कि याचिका में लगाए गए आरोप और उपलब्ध प्रशासनिक रिकॉर्ड एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं।
‘अगर नमाज की अनुमति है तो दुर्गा पूजा क्यों नहीं?’
याचिकाकर्ता की ओर से उठाया गया सबसे प्रमुख सवाल यही है। संजय घोष का तर्क है कि संविधान धार्मिक आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता। इसलिए यदि हाईकोर्ट परिसर में किसी धर्म के अनुयायियों को प्रार्थना करने की अनुमति दी जाती है, तो अन्य धर्मों के अनुयायियों के साथ भी समान व्यवहार होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने मीडिया से बातचीत में इसी तर्क को सामने रखते हुए कहा कि यदि एक धर्म के लोगों को हाईकोर्ट की छत पर इबादत करने की अनुमति मिल सकती है, तो दूसरे धर्म के लोग भी दुर्गा पूजा या भारत माता की पूजा के लिए समान अधिकार का दावा कर सकते हैं।
लेकिन कानूनी दृष्टि से इस सवाल का जवाब केवल धार्मिक समानता के सिद्धांत से तय नहीं होगा। अदालत को यह भी देखना होगा कि संबंधित स्थान पर किसी गतिविधि की अनुमति किस नियम, प्रशासनिक व्यवस्था, सुरक्षा मानक या परंपरा के आधार पर दी गई है।
धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक ढांचा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण या निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order), नैतिकता (Morality), स्वास्थ्य (Health) और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन इस अधिकार पर वैधानिक सीमाएं लग सकती हैं।
इसी प्रकार अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की बात करता है।
इसलिए किसी सार्वजनिक या संस्थागत परिसर में धार्मिक गतिविधि को लेकर विवाद होने पर अदालत को कई पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है। इनमें यह प्रश्न शामिल हो सकता है कि क्या सभी धार्मिक गतिविधियों के लिए समान नियम लागू हैं, क्या किसी विशेष परिस्थिति में प्रशासन ने अलग अनुमति दी है और क्या उस अनुमति के पीछे कोई सुरक्षा या प्रशासनिक कारण मौजूद है।
हाईकोर्ट स्वयं एक संवेदनशील न्यायिक परिसर है। यहां न्यायाधीश, वकील, न्यायिक कर्मचारी, वादकारी और अन्य लोग नियमित रूप से आते-जाते हैं। इसलिए किसी भी अतिरिक्त गतिविधि को लेकर सुरक्षा, अनुशासन और न्यायिक कार्य में व्यवधान जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पहले भी दुर्गा पूजा को लेकर PIL हुई थी
इस मामले को समझने के लिए हाल का एक और घटनाक्रम महत्वपूर्ण है।
25 सितंबर 2026 को इसी डिवीजन बेंच ने हाईकोर्ट की छत पर दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति मांगने वाली एक PIL को खारिज कर दिया था। उस याचिका में भी अधिवक्ता संजय घोष ने धार्मिक समानता और संविधान के तहत सभी धर्मों को समान अधिकार मिलने का तर्क रखा था। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने उस PIL को ‘public interest’ का मामला नहीं माना और कहा कि याचिका कुछ लोगों के हित से संबंधित प्रतीत होती है।
इसलिए 1 अक्टूबर को सामने आई नई कार्यवाही को उसी पुराने आदेश का सीधा पुनर्विचार समझना सही नहीं होगा। नई कार्यवाही में मुख्य सवाल यह है कि हाईकोर्ट की छत पर शुक्रवार की नमाज को लेकर वास्तविक प्रशासनिक व्यवस्था क्या है और इसकी अनुमति किस आधार पर है।
यानी एक तरफ पहले दुर्गा पूजा के आयोजन की अनुमति मांगने वाली PIL खारिज हो चुकी है और दूसरी तरफ अब नमाज के संबंध में प्रशासनिक स्थिति की रिपोर्ट मांगी गई है। दोनों घटनाओं का कानूनी आधार और अदालत के सामने मौजूद प्रश्न अलग-अलग हो सकते हैं।
क्या हाईकोर्ट परिसर में धार्मिक गतिविधि का अधिकार स्वतः मिल जाता है?
यह सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में है।
संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति या धार्मिक समूह किसी भी सार्वजनिक अथवा संस्थागत परिसर में अपनी पसंद का धार्मिक आयोजन करने का स्वतः अधिकार प्राप्त कर लेता है।
उदाहरण के तौर पर किसी सरकारी भवन, अदालत परिसर, विधानसभा भवन या अन्य संवेदनशील संस्थान में गतिविधियों के लिए अलग प्रशासनिक नियम हो सकते हैं। वहां सुरक्षा, कामकाज और परिसर के उद्देश्य को ध्यान में रखकर कुछ गतिविधियों पर नियंत्रण लगाया जा सकता है।
इसलिए अदालत के सामने वास्तविक सवाल केवल यह नहीं होगा कि ‘नमाज हो सकती है या दुर्गा पूजा।’ इससे पहले यह पता लगाना जरूरी होगा कि क्या हाईकोर्ट प्रशासन ने वास्तव में छत पर नमाज की अनुमति दी है, किस रूप में दी है और उस अनुमति का स्वरूप क्या है।
यही वजह है कि रजिस्ट्रार से रिपोर्ट मांगा जाना महत्वपूर्ण है।
समानता का सवाल कैसे तय होगा?
याचिकाकर्ता ने Article 14 के समानता सिद्धांत की ओर संकेत किया है। लेकिन कानूनी समानता का अर्थ हर परिस्थिति में बिल्कुल एक जैसा व्यवहार होना नहीं है।
अदालत किसी भी कथित भेदभाव की जांच करते समय यह भी देख सकती है कि दो स्थितियां वास्तव में समान हैं या उनके बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर है। यदि प्रशासन किसी गतिविधि की अनुमति किसी विशिष्ट प्रशासनिक या सुरक्षा व्यवस्था के तहत देता है, तो यह देखना आवश्यक होगा कि उस व्यवस्था का उद्देश्य क्या है और क्या वही नियम अन्य समान परिस्थितियों पर भी लागू किए जा सकते हैं।
इसी कारण रजिस्ट्रार की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि रिपोर्ट में यह स्पष्ट होता है कि किसी धार्मिक गतिविधि के लिए कोई विशेष नियम या अनुमति मौजूद है, तो उसके आधार पर अदालत आगे के प्रश्नों पर विचार कर सकती है।
हाईकोर्ट की छत पर धार्मिक आयोजन का सवाल
अदालत की छत आम तौर पर न्यायिक कार्य के लिए इस्तेमाल होने वाला नियमित कोर्टरूम नहीं होती, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि वहां किसी भी प्रकार की गतिविधि स्वतः अनुमत हो जाती है।
छत पर लोगों के एकत्र होने की स्थिति में भवन की सुरक्षा, भीड़ का प्रबंधन, आपातकालीन निकास, अग्नि सुरक्षा और अन्य प्रशासनिक पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।
यदि किसी धार्मिक आयोजन की अनुमति दी जाती है तो यह भी देखा जा सकता है कि आयोजन कितने लोगों तक सीमित है, कितने समय के लिए है और क्या उससे अदालत के नियमित कामकाज पर कोई प्रभाव पड़ता है।
यही कारण है कि केवल धार्मिक अधिकार का हवाला देकर पूरे विवाद का समाधान नहीं किया जा सकता। धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन—दोनों संवैधानिक और प्रशासनिक पहलू इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
क्या अदालत अब दुर्गा पूजा की अनुमति देगी?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
अदालत ने अभी रजिस्ट्रार से रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट 12 अक्टूबर तक पेश की जानी है। इसके बाद अदालत उपलब्ध तथ्यों, प्रशासनिक रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार कर सकती है।
इसलिए अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि हाईकोर्ट दुर्गा पूजा की अनुमति देगा या नहीं देगा।
25 सितंबर को इसी पीठ द्वारा छत पर दुर्गा पूजा की अनुमति मांगने वाली PIL खारिज किए जाने का आदेश जरूर मौजूद है। उस आदेश में अदालत ने याचिका को जनहित के बजाय कुछ लोगों के हित से संबंधित माना था।
नई कार्यवाही में हालांकि रजिस्ट्रार से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी गई है। इसलिए आगे की स्थिति उस रिपोर्ट और अदालत की अगली सुनवाई पर निर्भर करेगी।
मामला धार्मिक विवाद से ज्यादा प्रशासनिक और संवैधानिक प्रश्न भी
पहली नजर में यह मामला नमाज बनाम दुर्गा पूजा के रूप में दिखाई दे सकता है, लेकिन कानूनी स्तर पर इसके कई व्यापक पहलू हैं।
एक प्रश्न धार्मिक स्वतंत्रता का है। दूसरा समानता का। तीसरा हाईकोर्ट जैसे न्यायिक संस्थान के परिसर में धार्मिक गतिविधियों की अनुमति का है। चौथा प्रशासनिक निर्णय की पारदर्शिता का है।
यदि किसी गतिविधि की अनुमति दी गई है, तो उसका आधार क्या है? क्या उसके लिए लिखित अनुमति है? क्या ऐसी अनुमति वर्षों से चली आ रही व्यवस्था का हिस्सा है? क्या दूसरे धर्मों के लिए भी समान नियम उपलब्ध हैं? क्या सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से किसी आयोजन को सीमित किया जा सकता है?
इन सवालों का जवाब तथ्यात्मक रिकॉर्ड से मिलेगा।
अब 12 अक्टूबर पर नजर
फिलहाल कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार से मौके का निरीक्षण कर रिपोर्ट देने को कहा है। रिपोर्ट 12 अक्टूबर 2026 तक अदालत के सामने पेश की जानी है।
इसके बाद अदालत यह तय कर सकती है कि याचिका में उठाए गए सवालों पर आगे सुनवाई की जरूरत है या नहीं।
इस मामले ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न जरूर सामने ला दिया है—न्यायिक संस्थान के परिसर में धार्मिक आस्था और संस्थागत तटस्थता के बीच संतुलन किस तरह कायम किया जाए?
संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और समानता दोनों की बात करता है। वहीं अदालतों की अपनी गरिमा, सुरक्षा और प्रशासनिक आवश्यकताएं भी होती हैं। ऐसे में इस विवाद का अंतिम उत्तर किसी एक धार्मिक आयोजन के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि लागू संवैधानिक सिद्धांतों, प्रशासनिक रिकॉर्ड और हाईकोर्ट परिसर की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर सामने आना होगा।
अभी अदालत ने केवल तथ्य जुटाने का कदम उठाया है। इसलिए 12 अक्टूबर को पेश होने वाली रजिस्ट्रार की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली सुनवाई इस मामले की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।