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वकीलों के खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक जांच में अंतरिम सस्पेंशन नहीं लगा सकती बार काउंसिल: इलाहाबाद हाईकोर्ट

वकीलों के खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक जांच में अंतरिम सस्पेंशन नहीं लगा सकती बार काउंसिल: इलाहाबाद हाईकोर्ट

     इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं के अनुशासनात्मक मामलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल किसी अधिवक्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित रहने के दौरान एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3)(c) के तहत अंतरिम रूप से प्रैक्टिस से सस्पेंड नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत दिया जाने वाला सस्पेंशन एक अंतिम अनुशासनात्मक दंड (final disciplinary punishment) है। इसे जांच पूरी होने से पहले केवल अंतरिम व्यवस्था के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने की। अदालत ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के अध्यक्ष द्वारा दो अधिवक्ताओं के एनरोलमेंट को “अगले आदेश तक” निलंबित करने के आदेश को कानून के अनुरूप नहीं पाया और उसे रद्द कर दिया।

अदालत के इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें बार काउंसिल की अनुशासनात्मक शक्तियों और अधिवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई के दौरान अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया की सीमा को स्पष्ट किया गया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला सेंट्रल बार एसोसिएशन, सिविल कोर्ट, लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और एसोसिएशन के सचिव अवनीश दीक्षित की ओर से दाखिल रिट याचिका से जुड़ा था।

याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के अध्यक्ष द्वारा 26 सितंबर 2026 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

बताया गया कि दोनों अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी। उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा पारित एक प्रस्ताव और उसके अध्यक्ष की ओर से जारी आदेश का पालन नहीं किया। इतना ही नहीं, कथित तौर पर उस प्रस्ताव और आदेश को राज्य के दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित भी कराया गया।

बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति ने इन आरोपों को गंभीर माना।

मामले की सुनवाई के लिए 11 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की गई थी। लेकिन इसके साथ ही समिति की ओर से एक ऐसा आदेश भी पारित किया गया, जिसका प्रभाव यह था कि तब तक दोनों अधिवक्ता किसी अदालत में वकील के रूप में पेश नहीं हो सकेंगे।

यानी अंतिम सुनवाई से पहले ही दोनों अधिवक्ताओं को प्रैक्टिस से रोक दिया गया।

यही अंतरिम रोक हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल बन गई।

‘अगले आदेश तक’ सस्पेंशन पर कोर्ट ने उठाया सवाल

बार काउंसिल के आदेश में दोनों अधिवक्ताओं के एनरोलमेंट को “until further orders” यानी अगले आदेश तक सस्पेंड करने की बात कही गई थी।

हाईकोर्ट ने इस भाषा और आदेश की प्रकृति पर विशेष ध्यान दिया।

खंडपीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा दिखाई देता है कि संबंधित प्राधिकरण ने याचिकाकर्ताओं को अगले आदेश तक वकालत करने से रोक दिया है।

अदालत के अनुसार यह सस्पेंशन किसी निश्चित अवधि के लिए नहीं था। इसकी कोई तय समाप्ति तारीख भी नहीं थी। इसलिए इसे अनिश्चितकालीन प्रकृति का सस्पेंशन माना गया।

यहीं से अदालत ने एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35(3) के तहत बार काउंसिल को उपलब्ध शक्तियों की जांच की।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए जो दंड निर्धारित किए गए हैं, उन्हें जांच पूरी होने से पहले अंतरिम आदेश के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35 क्या कहती है?

Advocates Act, 1961 की धारा 35 पेशेवर या अन्य प्रकार के misconduct यानी कदाचार के मामलों में अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित है।

जब राज्य बार काउंसिल को किसी अधिवक्ता के professional या other misconduct की शिकायत मिलती है और वह मामले में आगे बढ़ने का आधार पाती है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मामला अनुशासनात्मक समिति के सामने जा सकता है।

धारा 35(3) के तहत अनुशासनात्मक समिति को सुनवाई के बाद कुछ विशेष प्रकार के आदेश पारित करने की शक्ति दी गई है।

इनमें शिकायत को खारिज करना, अधिवक्ता को फटकार लगाना, एक निर्धारित अवधि के लिए प्रैक्टिस से सस्पेंड करना और गंभीर स्थिति में राज्य की अधिवक्ताओं की सूची से नाम हटाना शामिल है।

हाईकोर्ट ने इसी प्रावधान की भाषा पर जोर देते हुए कहा कि प्रैक्टिस से सस्पेंड करना स्वयं एक दंडात्मक आदेश है।

इसका अर्थ यह है कि जब किसी अधिवक्ता को धारा 35(3)(c) के तहत प्रैक्टिस से निलंबित किया जाता है, तो यह अनुशासनात्मक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लगाया जाने वाला दंड है, न कि जांच के दौरान लगाया जाने वाला अस्थायी प्रतिबंध।

सस्पेंशन की अवधि तय होना क्यों जरूरी है?

हाईकोर्ट ने इस मामले में सस्पेंशन की प्रकृति पर विशेष रूप से विचार किया।

बार काउंसिल ने अधिवक्ताओं को किसी निश्चित अवधि के लिए सस्पेंड नहीं किया था। इसके बजाय आदेश में उन्हें “अगले आदेश तक” प्रैक्टिस से रोक दिया गया।

कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में सस्पेंशन की अवधि अनिश्चित हो जाती है।

धारा 35(3)(c) के तहत यदि किसी अधिवक्ता को सस्पेंड किया जाता है, तो कानून में उसके लिए एक निर्धारित अवधि की बात की गई है। इसलिए जांच लंबित रहने तक किसी अधिवक्ता को अनिश्चितकाल के लिए प्रैक्टिस से रोकना इस प्रावधान के उद्देश्य के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

अदालत ने इसी आधार पर कहा कि संबंधित आदेश कानून के अनुरूप नहीं दिखाई देता।

क्या बार काउंसिल को अंतरिम सस्पेंशन की शक्ति है?

यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3)(c) को आधार बनाकर अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान किसी अधिवक्ता को अंतरिम रूप से सस्पेंड नहीं किया जा सकता।

दूसरे शब्दों में, बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक जांच करने और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार दंड देने की शक्ति है, लेकिन उसी अंतिम दंड की शक्ति को जांच पूरी होने से पहले interim suspension के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अधिवक्ता के खिलाफ गंभीर आरोप होना अपने आप में धारा 35(3)(c) के तहत तत्काल अंतरिम सस्पेंशन का कानूनी आधार नहीं बन जाता।

आरोपों की गंभीरता और दंड देने की शक्ति—दोनों अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का भी हवाला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष पर पहुंचते समय आर. जिम बनाम सेक्रेटरी, बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु एंड पुडुचेरी मामले में मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले का भी उल्लेख किया।

उस मामले में भी यह सवाल सामने आया था कि क्या बार काउंसिल अनुशासनात्मक जांच पूरी होने से पहले किसी अधिवक्ता को अंतरिम रूप से प्रैक्टिस से रोक सकती है।

मद्रास हाईकोर्ट ने माना था कि एडवोकेट्स एक्ट बार काउंसिल को अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान किसी अधिवक्ता को अंतरिम रूप से सस्पेंड करने की ऐसी शक्ति नहीं देता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया की जांच की।

खंडपीठ ने पाया कि इस मामले में अपनाई गई प्रक्रिया एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और ‘आर. जिम’ मामले में निर्धारित कानूनी सिद्धांत के अनुरूप नहीं थी।

सुनवाई का अधिकार भी महत्वपूर्ण

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू natural justice यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत से जुड़ा है।

किसी अधिवक्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय उसे आरोपों का जवाब देने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना जरूरी है।

धारा 35(3) के तहत अनुशासनात्मक समिति को अधिवक्ता को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही उसमें निर्धारित दंडात्मक आदेश पारित करने की शक्ति मिलती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक बार अनुशासनात्मक समिति धारा 35(3) के तहत सस्पेंशन का आदेश पारित करती है, तो उसके बाद उसी मामले में बिना नए नोटिस और सुनवाई के अधिवक्ता के खिलाफ आगे कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जा सकती।

इसका सीधा संबंध उस बुनियादी सिद्धांत से है कि किसी व्यक्ति के पेशेवर अधिकारों पर गंभीर असर डालने वाली कार्रवाई उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना नहीं की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने 26 सितंबर का आदेश किया रद्द

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के अध्यक्ष द्वारा 26 सितंबर 2026 को पारित आदेश को रद्द कर दिया।

इस आदेश के जरिए दोनों याचिकाकर्ताओं को अगले आदेश तक वकालत करने से रोक दिया गया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार का अंतरिम सस्पेंशन एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35(3)(c) के तहत नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि दोनों अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही खत्म हो गई है।

कोर्ट ने उन्हें 11 अक्टूबर 2026 को अनुशासनात्मक प्राधिकरण के सामने उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

अर्थात हाईकोर्ट ने केवल उस अंतरिम सस्पेंशन आदेश को रद्द किया है, अनुशासनात्मक मामले की मूल कार्यवाही को समाप्त नहीं किया।

मांगे गए दस्तावेज देने का भी निर्देश

अदालत ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया।

याचिकाकर्ताओं ने कुछ दस्तावेज मांगे थे, लेकिन सुनवाई तक उन्हें वे सभी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए थे।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता 24 घंटे के भीतर उन दस्तावेजों की मांग करते हैं, तो बार काउंसिल उन्हें आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए।

इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुशासनात्मक सुनवाई में संबंधित अधिवक्ताओं को अपने बचाव की तैयारी के लिए जरूरी सामग्री मिल सके।

साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को भी निर्देश दिया कि वे सुनवाई को अनावश्यक रूप से टालने या बार-बार adjournment मांगने की कोशिश न करें।

इस तरह अदालत ने दोनों पक्षों के लिए प्रक्रिया से जुड़ी जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कर दीं।

गंभीर आरोप होने का मतलब तत्काल दंड नहीं

इस फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि किसी अधिवक्ता के खिलाफ आरोप गंभीर होने मात्र से अनुशासनात्मक प्राधिकरण को कानून में निर्धारित प्रक्रिया से हटकर कार्रवाई करने की शक्ति नहीं मिल जाती।

यहां बार काउंसिल ने आरोपों को गंभीर माना था। कथित तौर पर दोनों अधिवक्ताओं ने परिषद के एक प्रस्ताव और अध्यक्ष के आदेश का पालन नहीं किया था तथा उसे समाचार पत्रों में प्रकाशित किया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने मामले के आरोपों की सत्यता पर अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय यह देखा कि आरोपों की जांच के दौरान बार काउंसिल ने किस कानूनी शक्ति के तहत अधिवक्ताओं को प्रैक्टिस से रोका।

यही अंतर इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है।

अदालत का जोर इस बात पर रहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई भी उसी कानून और प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए, जिसे संसद ने निर्धारित किया है।

बार काउंसिल और अधिवक्ताओं के लिए क्या संदेश?

इस फैसले का व्यापक प्रभाव बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्यवाही पर पड़ सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि बार काउंसिल अधिवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती। बल्कि अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि कार्रवाई की शक्ति और उसके इस्तेमाल की प्रक्रिया कानून से निर्धारित होगी।

यदि किसी अधिवक्ता के खिलाफ misconduct की शिकायत है तो अनुशासनात्मक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। सुनवाई के बाद यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो धारा 35(3) में उपलब्ध दंडों में से उचित दंड दिया जा सकता है।

लेकिन जांच अभी चल रही हो और अंतिम निर्णय नहीं हुआ हो, तब धारा 35(3)(c) में दिए गए सस्पेंशन को केवल अंतरिम व्यवस्था के नाम पर लागू नहीं किया जा सकता।

यानी ‘सस्पेंशन’ शब्द का इस्तेमाल करके किसी अधिवक्ता को अनिश्चितकाल तक प्रैक्टिस से रोकना और बाद में जांच पूरी करना कानून की निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सीमा स्पष्ट की है। अदालत ने कहा है कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3)(c) के तहत सस्पेंशन एक अंतिम अनुशासनात्मक दंड है, जिसे अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान अंतरिम आदेश के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

मामले में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की ओर से दोनों अधिवक्ताओं को “अगले आदेश तक” प्रैक्टिस से रोक दिया गया था। हाईकोर्ट ने इसकी अवधि को अनिश्चित पाया और संबंधित आदेश को कानून के अनुरूप नहीं माना।

अदालत ने 26 सितंबर का आदेश रद्द करने के साथ यह भी स्पष्ट किया कि मूल अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रह सकती है। दोनों याचिकाकर्ताओं को 11 अक्टूबर को अनुशासनात्मक प्राधिकरण के सामने उपस्थित होना होगा। उन्हें मांगे गए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश भी बार काउंसिल को दिया गया है।

इस फैसले का मूल संदेश यही है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई की शक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन उस शक्ति का इस्तेमाल कानून में तय प्रक्रिया के भीतर ही किया जा सकता है। आरोप गंभीर हों या विवाद महत्वपूर्ण हो, किसी अधिवक्ता को पेशे से रोकने जैसी कार्रवाई के लिए वैधानिक आधार, सुनवाई का अवसर और निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक रहेगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।