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30 साल तक जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया, अंतरिम आदेश भी नहीं माना, इलाहाबाद हाईकोर्ट

30 साल तक जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया, अंतरिम आदेश भी नहीं माना, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार पर लगाया 1 लाख रुपये का जुर्माना

        इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पुराने सेवा विवाद की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने रिट याचिका को उसके मूल दावे के आधार पर खारिज तो कर दिया, लेकिन सरकारी अधिकारियों की ओर से तीन दशक से अधिक समय तक जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं करने और हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के पालन की स्थिति अदालत के संज्ञान में नहीं लाने को गंभीर चूक माना।

मामले में न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने राज्य पर 1 लाख रुपये का जुर्माना (costs) लगाया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ता को छह सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराई जाए।

कोर्ट ने हालांकि यह भी साफ किया कि केवल सरकारी अधिकारियों की लापरवाही और मुकदमे के लंबे समय तक लंबित रहने से याचिकाकर्ता को उस नौकरी या सेवा लाभ का अधिकार नहीं मिल सकता, जिसे वह कानून के आधार पर साबित नहीं कर पाया।

अदालत ने इस मामले में एक तरफ याचिकाकर्ता के मुख्य दावे को स्वीकार नहीं किया, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र की लंबे समय तक चली निष्क्रियता को भी नजरअंदाज नहीं किया।

1993 में हुई थी अस्थायी नियुक्ति

यह पूरा मामला बहराइच जिला सहकारी बैंक लिमिटेड में एक क्लास-IV कर्मचारी के रूप में की गई नियुक्ति से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता को बैंक में ‘सहयोगी’ के पद पर नियुक्त किया गया था। उसकी नियुक्ति से संबंधित आदेश 7 सितंबर 1993 और 22 दिसंबर 1993 को जारी किए गए थे।

नियुक्ति आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि नियुक्ति अस्थायी प्रकृति की है। यह नियुक्ति 89 दिनों से अधिक की अवधि के लिए नहीं थी और बिना किसी पूर्व सूचना के समाप्त की जा सकती थी।

इसके अलावा नियुक्ति इस शर्त के अधीन भी थी कि संबंधित पदों को नियमित चयन प्रक्रिया के माध्यम से भरा जा सकता है।

यानी शुरुआत से ही नियुक्ति को स्थायी सरकारी या बैंक सेवा का दर्जा नहीं दिया गया था।

बाद में इसी नियुक्ति की वैधता को लेकर विवाद खड़ा हुआ और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।

नियुक्ति करने वाले अधिकारी के अधिकार पर भी सवाल

प्रतिवादियों की ओर से यह दलील दी गई कि जिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता की नियुक्ति का आदेश जारी किया था, वह ऐसा करने के लिए सक्षम अधिकारी नहीं था।

बताया गया कि बैंक के सेक्रेटरी/जनरल मैनेजर की मृत्यु के बाद संबंधित अधिकारी को उनके कामकाज को संभालने के लिए अधिकृत किया गया था। प्रतिवादियों का तर्क था कि केवल कामकाज संभालने के लिए अधिकृत किए जाने से उस अधिकारी को नई नियुक्तियां करने की शक्ति प्राप्त नहीं हो जाती।

इसी आधार पर याचिकाकर्ता की नियुक्ति को चुनौती दी गई।

मामला आगे बढ़ा और सहकारी विभाग के डिप्टी रजिस्ट्रार ने उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, 1965 की धारा 128 के तहत कार्रवाई की।

डिप्टी रजिस्ट्रार ने नियुक्ति करने वाले अधिकारी के अधिकार और उसके आधार पर जारी नियुक्ति आदेशों को रद्द कर दिया।

इसके बाद बैंक ने मार्च 1994 में याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दीं।

2 मई 1994 को हाईकोर्ट ने दिया था अंतरिम आदेश

सेवा समाप्त किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मामले की सुनवाई के दौरान 2 मई 1994 को हाईकोर्ट ने विवादित आदेश पर रोक लगा दी।

साथ ही प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को काम करने दिया जाए और उसे वेतन का भुगतान किया जाए।

यही अंतरिम आदेश आगे चलकर इस मामले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि हाईकोर्ट के इस आदेश के बावजूद उसे वापस काम पर नहीं लिया गया और न ही उसे वेतन दिया गया।

लेकिन इस आदेश के पालन को लेकर तत्काल कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

दिलचस्प बात यह रही कि अंतरिम आदेश का पालन न होने की शिकायत बहुत बाद में अदालत के सामने आई।

2017 में पहली बार उठाया गया अनुपालन का सवाल

हाईकोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता मार्च 1994 के बाद वास्तव में काम नहीं कर सका।

लेकिन अंतरिम आदेश का पालन नहीं होने की शिकायत करने वाला पहला हलफनामा 2017 में दाखिल किया गया।

यानी 1994 के अंतरिम आदेश और 2017 में दाखिल हलफनामे के बीच लगभग 23 साल का अंतर था।

मामला इसके बाद भी चलता रहा और याचिकाकर्ता 20 अप्रैल 2026 को सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच गया।

इस बीच मूल नियुक्ति की 89 दिनों की अवधि कब की समाप्त हो चुकी थी।

इसी तथ्य ने अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया—क्या केवल मुकदमे के लंबित रहने के कारण एक ऐसी अस्थायी नियुक्ति को दशकों तक जारी माना जा सकता है, जिसे शुरुआत में ही 89 दिनों तक सीमित किया गया था?

हाईकोर्ट ने इसका जवाब नकारात्मक रूप में दिया।

कोर्ट ने कहा- 89 दिन की नियुक्ति अपने आप स्थायी नहीं हो जाती

अदालत ने माना कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता की अस्थायी नियुक्ति को बाद में बढ़ाया गया था।

न तो ऐसा कोई दस्तावेज सामने आया जिससे उसकी सेवा अवधि बढ़ने का पता चले और न ही ऐसा रिकॉर्ड मिला जिससे यह साबित हो कि उसकी सेवा को नियमित किया गया था।

इसलिए अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता ने विवाद को अदालत में चुनौती दी थी, उसकी 89 दिनों की अस्थायी नियुक्ति स्थायी नहीं हो सकती।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित पद पर बाद में नियमित चयन के जरिए कोई व्यक्ति नियुक्त नहीं भी हुआ हो, तब भी इससे अस्थायी नियुक्ति अपने आप नियमित या स्थायी नहीं बन जाती।

नौकरी की प्रकृति और नियुक्ति की शर्तें महत्वपूर्ण हैं।

अंतरिम आदेश अंतिम अधिकार पैदा नहीं करता

मामले में हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश की कानूनी स्थिति को भी विस्तार से समझाया।

अदालत ने माना कि 2 मई 1994 के अंतरिम आदेश का पालन न करना प्रतिवादियों की ओर से संतोषजनक नहीं था। लेकिन केवल इस वजह से याचिकाकर्ता को वह मूल अधिकार नहीं मिल सकता, जो उसके पास कानूनन पहले से मौजूद ही नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि अंतरिम आदेश का उद्देश्य अंतिम निर्णय आने तक विवादित स्थिति को सुरक्षित रखना होता है।

लेकिन ऐसा आदेश किसी व्यक्ति के पक्ष में ऐसा मूल अधिकार पैदा नहीं कर सकता जो कानून के तहत उसके पास था ही नहीं।

यही वजह है कि अंतरिम आदेश के उल्लंघन को लेकर अदालत ने नाराजगी जताई, लेकिन उसे याचिकाकर्ता की मूल नियुक्ति को स्थायी मानने का आधार नहीं बनाया।

रिट ऑफ सर्टिओरारी पर भी कोर्ट की टिप्पणी

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी शिकायत की गई थी कि डिप्टी रजिस्ट्रार ने उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट की धारा 128 के तहत कार्रवाई करने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उसे उचित अवसर नहीं दिया गया और संबंधित प्रावधान के तहत मामले पर पुनर्विचार की प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई।

हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि writ of certiorari जारी करना कोई ऐसा अधिकार नहीं है जिसे हर स्थिति में याचिकाकर्ता मांगकर प्राप्त कर सकता है।

यह न्यायिक विवेक का विषय है।

अदालत ने माना कि यदि विवादित आदेश को रद्द करने का परिणाम केवल ऐसी नियुक्ति को फिर से शुरू करना होगा, जिसे कानून के तहत बनाए नहीं रखा जा सकता था या जिसकी अवधि बहुत पहले समाप्त हो चुकी है, तो ऐसी स्थिति में certiorari जारी करना उचित नहीं होगा।

इसलिए प्रक्रिया संबंधी आपत्तियों के बावजूद याचिकाकर्ता को उस राहत का अधिकार नहीं मिला जिसकी वह मांग कर रहा था।

रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुके थे याचिकाकर्ता

इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू याचिकाकर्ता की वर्तमान स्थिति थी।

अदालत के सामने सुनवाई के समय यह तथ्य था कि याचिकाकर्ता 20 अप्रैल 2026 को सेवानिवृत्ति की उम्र प्राप्त कर चुका है।

ऐसे में अब उसे वापस उस पद पर नियुक्त करने या काम करने की अनुमति देने का कोई व्यावहारिक आधार भी नहीं बचा था।

लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि मूल नियुक्ति खुद केवल 89 दिनों के लिए थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि रिट याचिका दशकों तक लंबित रही, उस अस्थायी नियुक्ति की अवधि अपने आप सेवानिवृत्ति की तारीख तक नहीं बढ़ सकती।

वेतन, पेंशन और सेवा लाभ का दावा भी स्वीकार नहीं

याचिकाकर्ता की ओर से लंबे समय तक मामला लंबित रहने और 1994 के अंतरिम आदेश के पालन न होने के आधार पर सेवा से जुड़े लाभों का दावा किया गया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति केवल 89 दिनों की थी और बाद में उसके विस्तार या नियमितीकरण का कोई वैध आधार रिकॉर्ड में नहीं है, तो केवल रिट याचिका के लंबित रहने से याचिकाकर्ता को दशकों का वेतन, पेंशन या अन्य सेवा लाभ देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

इसलिए अदालत ने मूल सेवा संबंधी दावे को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया।

यहां अदालत ने दो अलग-अलग पहलुओं को अलग रखा—एक तरफ याचिकाकर्ता का सेवा संबंधी दावा था, जिसे स्वीकार नहीं किया गया; दूसरी तरफ सरकारी अधिकारियों की ओर से मुकदमे में हुई असाधारण देरी और अंतरिम आदेश के पालन की स्थिति अदालत के सामने नहीं रखने की चूक थी।

30 साल से ज्यादा समय तक जवाबी हलफनामा क्यों नहीं आया?

मामले में अदालत को सबसे अधिक चिंता सरकारी अधिकारियों की ओर से counter affidavit दाखिल करने में हुई देरी को लेकर थी।

2 मई 1994 के आदेश में संबंधित अधिकारियों को छह सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया था।

लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार प्रतिवादी संख्या 3 और 4 ने निर्धारित अवधि में अपना जवाब दाखिल नहीं किया।

इतना ही नहीं, उनका जवाबी हलफनामा लगभग तीन दशक से अधिक समय तक अदालत के सामने नहीं आया।

बताया गया कि संबंधित अधिकारियों की ओर से जवाबी हलफनामा 2025 में, यानी मामले के मूल आदेश के लगभग 31 साल बाद दाखिल किया गया।

अदालत के सामने इस असाधारण देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण भी नहीं रखा गया।

यही वह बिंदु था जिसने कोर्ट को राज्य के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करने के लिए मजबूर किया।

अंतरिम आदेश के पालन की जानकारी भी अदालत से छिपी रही

हाईकोर्ट ने केवल जवाबी हलफनामे में हुई देरी को ही नहीं देखा।

अदालत ने यह भी नोट किया कि उसके 2 मई 1994 के अंतरिम आदेश का पालन हुआ या नहीं, इस बारे में भी लंबे समय तक कोर्ट को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।

याचिकाकर्ता ने बाद में 2017 में हलफनामा दाखिल कर बताया कि उसे आदेश के बावजूद काम नहीं करने दिया गया।

अदालत के अनुसार, यदि अंतरिम आदेश का पालन नहीं हुआ था तो संबंधित अधिकारियों को समय रहते अदालत को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी।

ऐसा न होने के कारण मामले की वास्तविक स्थिति लंबे समय तक अदालत के सामने नहीं आ सकी।

‘राज्य अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता’

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि राज्य केवल इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि याचिकाकर्ता अपना मुख्य दावा साबित करने में सफल नहीं हुआ।

अर्थात, भले ही याचिकाकर्ता को अंततः नौकरी से संबंधित मांगी गई राहत न मिल सके, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी अधिकारियों की ओर से हुई गंभीर और लंबे समय की प्रक्रिया संबंधी लापरवाही को नजरअंदाज कर दिया जाए।

अदालत ने माना कि इतनी लंबी देरी के कारण उसे संबंधित अधिकारियों से समय पर सहायता नहीं मिल पाई और अंतरिम आदेश के पालन का मुद्दा भी वर्षों तक अनसुलझा रहा।

इसका असर यह हुआ कि मामला लंबित रहते-रहते याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर गया।

इसी वजह से लगाया गया 1 लाख रुपये का जुर्माना

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया और अंतरिम आदेश को समाप्त कर दिया।

लेकिन इसके बावजूद अदालत ने राज्य के अधिकारियों की चूक के लिए 1 लाख रुपये की लागत लगाने का फैसला किया।

कोर्ट ने विशेष रूप से तीन बातों को ध्यान में रखा—

  • जवाबी हलफनामा दाखिल करने में तीन दशक से अधिक की देरी,
  • देरी का कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया जाना,
  • और अंतरिम आदेश के पालन की वास्तविक स्थिति अदालत के संज्ञान में समय पर नहीं लाया जाना।

अदालत ने प्रतिवादी संख्या 3 और 4 को निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि 1 लाख रुपये की राशि छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को भुगतान कर दी जाए।

यह राशि उस नौकरी या सेवा लाभ का विकल्प नहीं है जिसका दावा याचिकाकर्ता कर रहा था। यह राज्य के अधिकारियों की ओर से हुई प्रक्रिया संबंधी चूक के लिए अदालत द्वारा लगाई गई लागत है।

हाईकोर्ट के फैसले से क्या स्पष्ट हुआ?

इस फैसले में अदालत ने सेवा विवाद के दो अलग-अलग पहलुओं को साफ तौर पर अलग किया है।

पहला, याचिकाकर्ता की नियुक्ति शुरू से ही अस्थायी और 89 दिनों तक सीमित थी। रिकॉर्ड में उसके विस्तार या नियमितीकरण का कोई वैध प्रमाण नहीं मिला। इसलिए उसे लंबे समय की सेवा, वेतन, पेंशन या अन्य लाभ देने का आधार नहीं बना।

दूसरा, सरकारी अधिकारियों का यह कर्तव्य था कि वे समय पर जवाब दाखिल करते और अदालत के अंतरिम आदेश के पालन की वास्तविक स्थिति सामने रखते। इस जिम्मेदारी को पूरा करने में तीन दशक से अधिक की देरी को अदालत ने गंभीरता से लिया।

इसलिए याचिकाकर्ता को नौकरी का अधिकार नहीं मिला, लेकिन सरकारी लापरवाही के लिए उसे 1 लाख रुपये की लागत जरूर मिली।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी मुकदमों में जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के पालन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने साफ किया कि किसी याचिकाकर्ता का मुख्य दावा कानूनन कमजोर होने का अर्थ यह नहीं है कि राज्य के अधिकारी अपनी प्रक्रियागत गलतियों के लिए जवाबदेही से बच सकते हैं।

इस मामले में याचिकाकर्ता को 1993 में मिली नियुक्ति 89 दिनों की अस्थायी नियुक्ति थी। मार्च 1994 में सेवा समाप्त होने के बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया। 2 मई 1994 को अदालत ने उसे काम पर रखने और वेतन देने का अंतरिम निर्देश दिया, लेकिन इस आदेश के पालन का मुद्दा वर्षों तक अदालत के सामने स्पष्ट रूप से नहीं आया।

दूसरी ओर, संबंधित अधिकारियों को छह सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करना था, लेकिन उनका जवाब करीब तीन दशक बाद 2025 में दाखिल हुआ। तब तक याचिकाकर्ता 20 अप्रैल 2026 को सेवानिवृत्ति की उम्र भी पार कर चुका था।

अदालत ने इसलिए नौकरी या सेवा लाभ देने से इनकार किया, लेकिन सरकारी अधिकारियों की असाधारण देरी और अंतरिम आदेश के पालन की जानकारी समय पर न देने को गंभीर चूक मानते हुए उत्तर प्रदेश राज्य पर 1 लाख रुपये की लागत लगाई।

फैसले से यह सिद्धांत सामने आता है कि अदालत में किसी दावे का अंतिम परिणाम एक अलग प्रश्न है, जबकि न्यायिक प्रक्रिया के प्रति राज्य और उसके अधिकारियों की जवाबदेही अलग प्रश्न। दोनों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।