RBI का बड़ा फैसला: अब बैंक में 10% तक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए बार-बार मंजूरी नहीं, म्यूचुअल फंड-बीमा कंपनियों को राहत
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले संस्थागत निवेशकों के लिए शेयरहोल्डिंग से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियमों के तहत पात्र संस्थागत निवेशकों (Eligible Institutional Investors) को अब किसी बैंक में 10 प्रतिशत तक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए हर बार अलग-अलग मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। RBI ने One-Time Approval की व्यवस्था लागू की है, जिससे म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस कंपनियों और पेंशन फंड जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए बैंकिंग क्षेत्र में निवेश की प्रक्रिया पहले के मुकाबले आसान हो जाएगी।
RBI ने जुलाई 2026 में इन बदलावों का ड्राफ्ट जारी कर संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे थे। केंद्रीय बैंक ने प्राप्त सुझावों की समीक्षा के बाद अब संशोधित नियमों को अंतिम रूप दिया है। RBI की वेबसाइट पर जुलाई में Reserve Bank of India (Acquisition and Holding of Shares or Voting Rights) Amendment Directions, 2026 से संबंधित ड्राफ्ट पर टिप्पणियां आमंत्रित किए जाने की सूचना भी जारी की गई थी।
हालांकि, नए नियम का मतलब यह नहीं है कि बैंक में कोई भी निवेशक मनमाने ढंग से 10 प्रतिशत तक हिस्सेदारी खरीद सकेगा। पहली बार बैंक में 5 प्रतिशत या उससे अधिक की बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए RBI की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता बनी रहेगी। बदलाव मुख्य रूप से उन पात्र संस्थागत निवेशकों के लिए है, जिन्हें पहले ही आवश्यक मंजूरी मिल चुकी है और जो बाद में अपनी हिस्सेदारी को निर्धारित सीमा तक बढ़ाना चाहते हैं।
क्या बदला है RBI के नए नियम में?
अब तक व्यवस्था ऐसी थी कि बैंक में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले निवेशक को निर्धारित सीमा के ऊपर हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए नियामकीय मंजूरी की जरूरत पड़ सकती थी। विशेष रूप से यदि किसी निवेशक की हिस्सेदारी किसी समय 5 प्रतिशत से नीचे चली जाती थी और बाद में वह फिर से 5 प्रतिशत या उससे अधिक करना चाहता था, तो दोबारा अनुमति लेने की आवश्यकता सामने आती थी।
नए नियम में इसी प्रक्रिया को आसान किया गया है।
अब RBI पात्र संस्थागत निवेशक को किसी बैंक की paid-up share capital या voting rights में 10 प्रतिशत तक हिस्सेदारी हासिल करने के लिए One-Time Approval दे सकता है। यानी एक बार मंजूरी मिलने के बाद निवेशक को हर बार अलग आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी, बशर्ते वह निर्धारित शर्तों और नियामकीय सीमा का पालन करता रहे।
यह व्यवस्था खास तौर पर उन संस्थागत निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके पोर्टफोलियो में बड़े बैंकिंग शेयर होते हैं और जिनकी हिस्सेदारी बाजार में शेयरों की खरीद-बिक्री के कारण समय-समय पर ऊपर-नीचे होती रहती है।
पहली बार बड़ी हिस्सेदारी लेने पर मंजूरी अभी भी जरूरी
नए बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि RBI ने बैंक में बड़े शेयरहोल्डर बनने की मूल अनुमति की आवश्यकता खत्म नहीं की है।
यदि कोई पात्र निवेशक पहली बार किसी बैंक में 5 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी हासिल करना चाहता है, तो उसे RBI की पूर्व मंजूरी लेनी होगी।
इसका मतलब साफ है कि One-Time Approval कोई blanket permission नहीं है, बल्कि यह पात्र निवेशकों को निर्धारित सीमा के भीतर आगे की खरीद के लिए दी जाने वाली नियामकीय सुविधा है।
RBI के मौजूदा शेयरहोल्डिंग ढांचे में बैंक के बड़े शेयरधारकों के लिए पूर्व मंजूरी और ‘fit and proper’ मानदंड महत्वपूर्ण रहे हैं। RBI के नियामकीय दस्तावेजों में भी 5 प्रतिशत या उससे अधिक शेयरहोल्डिंग अथवा voting rights हासिल करने के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है।
किन निवेशकों को मिलेगा फायदा?
यह सुविधा हर निवेशक के लिए उपलब्ध नहीं होगी। RBI ने इसके लिए Eligible Institutional Investors की श्रेणी निर्धारित की है।
इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- SEBI के साथ पंजीकृत Mutual Funds
- PFRDA के साथ पंजीकृत Pension Funds
- IRDAI के साथ पंजीकृत Insurance Companies
इन संस्थागत निवेशकों का काम बड़ी मात्रा में निवेश करना होता है। इनके पोर्टफोलियो में बैंकिंग कंपनियों के शेयर भी शामिल होते हैं। ऐसे में शेयर बाजार में कीमतों और खरीद-बिक्री के कारण किसी बैंक में उनकी हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से ऊपर या नीचे हो सकती है।
पुरानी व्यवस्था में इस तरह के उतार-चढ़ाव के कारण दोबारा नियामकीय अनुमति की प्रक्रिया सामने आ सकती थी। अब One-Time Approval से इस प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश की गई है।
10 प्रतिशत की सीमा का क्या मतलब है?
नए नियमों के तहत RBI पात्र संस्थागत निवेशकों को किसी बैंक की paid-up share capital या voting rights में 10 प्रतिशत तक की बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए एक बार की मंजूरी दे सकता है।
यह मंजूरी किसी एक पात्र निवेशक को दी जा सकती है या एक से अधिक निवेशकों को एक साथ भी दी जा सकती है।
हालांकि, 10 प्रतिशत की सीमा को समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मंजूरी मिलते ही निवेशक बिना किसी अन्य नियामकीय शर्त के बैंक पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है। शेयरहोल्डिंग से जुड़े अन्य बैंकिंग, कंपनी कानून और नियामकीय प्रावधान अपनी जगह लागू रहेंगे।
RBI के लिए बड़े शेयरधारकों की पहचान और उनके ‘fit and proper’ होने की निगरानी बैंकिंग क्षेत्र में महत्वपूर्ण नियामकीय व्यवस्था है। इसलिए One-Time Approval के बाद भी निगरानी समाप्त नहीं होगी।
PRAVAAH पोर्टल से करना होगा आवेदन
One-Time Approval के लिए पात्र निवेशकों को RBI के PRAVAAH Portal के जरिए आवेदन करना होगा।
आवेदन प्रक्रिया में संबंधित बैंक की भूमिका भी रखी गई है। जिस बैंक में निवेशक हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है, उस बैंक को भी आवेदन पर अपनी टिप्पणी RBI के पास भेजनी होगी।
इस व्यवस्था से RBI को निवेशक के आवेदन के साथ बैंक का दृष्टिकोण और संबंधित जानकारी भी उपलब्ध हो सकेगी।
इसका उद्देश्य केवल आवेदन प्रक्रिया को डिजिटल बनाना नहीं है, बल्कि शेयरहोल्डिंग से जुड़े निर्णय में आवश्यक जानकारी को एक ही नियामकीय प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कराना भी है।
RBI मंजूरी वापस भी ले सकता है
One-Time Approval मिलने के बाद भी निवेशक पूरी तरह नियामकीय निगरानी से बाहर नहीं होगा।
RBI के पास कुछ परिस्थितियों में दी गई मंजूरी वापस लेने का अधिकार रहेगा।
यदि निवेशक मंजूरी के साथ लगाई गई शर्तों का पालन नहीं करता है या बाद में निवेशक अथवा उससे संबंधित कोई व्यक्ति ‘fit and proper’ मानदंडों पर खरा नहीं उतरता है, तो RBI मंजूरी वापस ले सकता है।
यानी नई व्यवस्था निवेशकों के लिए सुविधा जरूर बढ़ाती है, लेकिन इसके साथ जवाबदेही भी बनी रहती है।
बैंकिंग क्षेत्र में यह निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी बैंक में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले शेयरधारक की भूमिका सामान्य कंपनी के शेयरधारक से अलग महत्व रखती है। बैंक जनता की जमा राशि, वित्तीय प्रणाली और व्यापक आर्थिक व्यवस्था से जुड़े होते हैं। इसलिए RBI बड़े शेयरधारकों की पृष्ठभूमि और आचरण पर लगातार नजर रखता है।
5 प्रतिशत की हिस्सेदारी घटने-बढ़ने पर देनी होगी जानकारी
One-Time Approval के साथ RBI ने reporting requirement भी रखी है।
यदि One-Time Approval प्राप्त निवेशक की किसी बैंक में कुल हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से नीचे चली जाती है या फिर 5 प्रतिशत से ऊपर पहुंचती है, तो इसकी जानकारी RBI और संबंधित बैंक को देनी होगी।
यह जानकारी तीन कारोबारी दिनों के भीतर उपलब्ध करानी होगी।
इस प्रावधान का महत्व इसलिए है क्योंकि One-Time Approval का उद्देश्य बार-बार अनुमति लेने की जरूरत को खत्म करना है, न कि RBI को निवेशक की वास्तविक शेयरहोल्डिंग से अनजान रखना।
इसलिए एक तरफ निवेशक को खरीद की प्रक्रिया में सुविधा दी गई है, तो दूसरी तरफ शेयरहोल्डिंग में महत्वपूर्ण बदलाव की जानकारी समय पर देने की जिम्मेदारी भी तय की गई है।
जुलाई में आया था ड्राफ्ट
इन बदलावों की शुरुआत जुलाई 2026 में हुई थी। RBI ने 14 जुलाई को संशोधित नियमों का ड्राफ्ट जारी किया था और stakeholders से सुझाव मांगे थे।
सुझाव देने की अंतिम तारीख 4 अगस्त रखी गई थी।
केंद्रीय बैंक ने प्राप्त सुझावों की समीक्षा के बाद अंतिम नियम तैयार किए। इस तरह नई व्यवस्था सीधे लागू करने के बजाय पहले प्रस्तावित की गई, संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया ली गई और उसके बाद संशोधित प्रावधानों को अंतिम रूप दिया गया।
RBI की वेबसाइट पर जुलाई में Acquisition and Holding of Shares or Voting Rights से संबंधित 2026 के amendment directions के ड्राफ्ट पर सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित किए जाने की सूचना उपलब्ध थी।
Portfolio Manager को लेकर भी स्थिति स्पष्ट
अंतिम नियमों में Portfolio Manager के माध्यम से शेयर खरीदने की स्थिति को लेकर भी महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया गया है।
यदि बैंक के शेयर और voting rights ग्राहक के अपने नाम पर हैं, तो केवल इस वजह से ग्राहक द्वारा खरीदे गए शेयरों को Portfolio Manager की indirect acquisition नहीं माना जाएगा कि Portfolio Manager उस ग्राहक को सेवाएं प्रदान कर रहा है।
इसके लिए कुछ शर्तें महत्वपूर्ण होंगी।
Portfolio Manager की भूमिका केवल non-binding advice तक सीमित होनी चाहिए। साथ ही शेयरों पर voting ग्राहक के किसी विशेष निर्देश के आधार पर होनी चाहिए।
इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि वास्तविक निवेशक और उसके Portfolio Manager की भूमिका को केवल प्रबंधन या सलाहकारी संबंध के आधार पर एक जैसा नहीं माना जाए।
यह स्पष्टीकरण उन संस्थागत निवेश व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण हो सकता है जहां निवेश संबंधी निर्णय, सलाह और वास्तविक शेयर स्वामित्व अलग-अलग स्तरों पर व्यवस्थित होते हैं।
बैंकों पर लागू होंगे नए नियम
RBI के संशोधित शेयरहोल्डिंग नियमों का दायरा कई तरह के बैंकों तक है।
इनमें—
- Commercial Banks
- Small Finance Banks
- Payments Banks
- Local Area Banks
शामिल हैं।
इससे स्पष्ट है कि बदलाव केवल बड़े कमर्शियल बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि RBI के नियामकीय दायरे में आने वाली अलग-अलग बैंक श्रेणियों पर लागू किया गया है।
हालांकि प्रत्येक बैंक की प्रकृति और उसके लिए लागू अन्य नियामकीय प्रावधान अलग हो सकते हैं, शेयरहोल्डिंग से जुड़े इस ढांचे के तहत पात्र संस्थागत निवेशकों के लिए एक समान नियामकीय सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
निवेशकों के लिए प्रक्रिया होगी आसान
इस बदलाव का सबसे सीधा असर उन संस्थागत निवेशकों पर पड़ेगा जिनके पास बड़े बैंकिंग पोर्टफोलियो हैं।
मान लीजिए किसी पात्र निवेशक के पास किसी बैंक की 6 प्रतिशत हिस्सेदारी है। बाजार में शेयरों की बिक्री के कारण यह हिस्सेदारी घटकर 4.8 प्रतिशत रह गई। बाद में निवेशक फिर से खरीदारी करना चाहता है और हिस्सेदारी को 5 प्रतिशत से ऊपर ले जाना चाहता है।
पुरानी व्यवस्था में ऐसी स्थिति में दोबारा मंजूरी का सवाल सामने आ सकता था। अब यदि निवेशक के पास 10 प्रतिशत तक के लिए One-Time Approval है और वह उसकी शर्तों के अनुरूप काम कर रहा है, तो हर बार नई मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
हालांकि, 5 प्रतिशत की सीमा पार होने पर RBI और बैंक को निर्धारित समय में रिपोर्ट करना होगा।
यही इस बदलाव का मूल उद्देश्य है—regulatory oversight को बनाए रखते हुए repetitive approval process को कम करना।
RBI की निगरानी फिर भी बनी रहेगी
नए नियमों को केवल निवेशकों के लिए छूट के रूप में देखना सही नहीं होगा। RBI ने One-Time Approval के साथ कई सुरक्षा प्रावधान भी बनाए रखे हैं।
पहली बड़ी हिस्सेदारी के लिए पूर्व मंजूरी की व्यवस्था जारी है। दूसरी ओर, शेयरहोल्डिंग में 5 प्रतिशत की सीमा से जुड़े बदलावों की reporting अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त ‘fit and proper’ मानदंड और मंजूरी की शर्तों का पालन भी जरूरी रहेगा।
जरूरत पड़ने पर RBI मंजूरी वापस लेने की शक्ति भी रखता है।
इस तरह नई व्यवस्था में निवेशकों को operational flexibility मिलती है, लेकिन बैंकिंग नियमन की मूल निगरानी व्यवस्था बरकरार रहती है।
बदलाव का व्यापक अर्थ
बैंकिंग क्षेत्र में संस्थागत निवेशकों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। Mutual Funds, Insurance Companies और Pension Funds जैसे संस्थागत निवेशक बड़ी मात्रा में पूंजी बाजार में निवेश करते हैं। इनके निवेश निर्णयों का असर शेयर बाजार और कंपनियों की शेयरहोल्डिंग संरचना पर पड़ता है।
ऐसे में यदि हर छोटे बदलाव पर बार-बार अलग नियामकीय अनुमति की आवश्यकता हो, तो निवेश प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल हो सकती है।
RBI के नए One-Time Approval framework से इस प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक बनाने की कोशिश दिखाई देती है। एक बार निर्धारित जांच और मंजूरी पूरी होने के बाद निवेशक को 10 प्रतिशत तक की सीमा के भीतर आगे की खरीद के लिए हर बार नई अनुमति लेने से राहत मिलेगी।
साथ ही reporting और ‘fit and proper’ जैसी शर्तों के जरिए RBI ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि सुविधा मिलने के बावजूद नियामकीय निगरानी कमजोर न हो।
निष्कर्ष
RBI का 1 अक्टूबर 2026 से लागू किया गया यह बदलाव बैंकिंग शेयरों में निवेश करने वाले पात्र संस्थागत निवेशकों के लिए प्रक्रिया को सरल करने वाला कदम है। अब SEBI-registered Mutual Funds, PFRDA-registered Pension Funds और IRDAI-registered Insurance Companies को निर्धारित शर्तों के तहत किसी बैंक में 10 प्रतिशत तक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए One-Time Approval की सुविधा मिल सकती है।
हालांकि पहली बार 5 प्रतिशत या उससे अधिक बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए RBI की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता बनी रहेगी। वहीं One-Time Approval पाने वाले निवेशकों को 5 प्रतिशत की हिस्सेदारी सीमा के ऊपर या नीचे जाने पर तीन कारोबारी दिनों के भीतर RBI और संबंधित बैंक को जानकारी देनी होगी।
PRAVAAH Portal के जरिए आवेदन, बैंक की टिप्पणी, ‘fit and proper’ शर्त और मंजूरी वापस लेने की RBI की शक्ति इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
कुल मिलाकर RBI ने निवेश प्रक्रिया में बार-बार होने वाली मंजूरी की औपचारिकता को कम किया है, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र में बड़े शेयरधारकों की निगरानी से समझौता नहीं किया है। नई व्यवस्था का वास्तविक असर आने वाले समय में तब दिखाई देगा जब पात्र संस्थागत निवेशक इसका इस्तेमाल करते हुए बैंकिंग शेयरों में अपने निवेश को अधिक लचीले ढंग से प्रबंधित करेंगे।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।