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OMR शीट में एक अतिरिक्त गोला भरना पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभ्यर्थी को राहत देने से किया इनकार

OMR शीट में एक अतिरिक्त गोला भरना पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभ्यर्थी को राहत देने से किया इनकार

प्रश्न पुस्तिका संख्या सही लिखने के बावजूद OMR शीट का मूल्यांकन नहीं हुआ, हाईकोर्ट ने कहा- परीक्षा के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने OMR शीट में निर्धारित निर्देशों के अनुसार जानकारी नहीं भरने वाली एक अभ्यर्थी को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में OMR शीट भरने के लिए जारी किए गए निर्देश केवल औपचारिकता नहीं होते, बल्कि उनका पालन करना अनिवार्य होता है। यदि किसी अभ्यर्थी से निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत OMR शीट भरी जाती है तो बाद में केवल इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती कि उसकी गलती छोटी थी या उसके अन्य विवरण सही थे।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था द्वारा अभ्यर्थियों को OMR शीट भरने के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए जाते हैं। अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे परीक्षा शुरू होने से पहले इन निर्देशों को ध्यान से पढ़ें और उसी के अनुसार उत्तर पुस्तिका में आवश्यक विवरण दर्ज करें।

अदालत ने यह भी माना कि यदि हर ऐसे मामले में बाद में OMR शीट की हाथ से जांच कराने की अनुमति दे दी जाए, तो इससे परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता, एकरूपता और पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी।

क्या है पूरा मामला?

मामला एक प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हुई अभ्यर्थी की OMR शीट से जुड़ा था। परीक्षा के दौरान अभ्यर्थी ने प्रश्न पुस्तिका संख्या से संबंधित खाने में सही संख्या 204103343 दर्ज की थी।

हालांकि, OMR शीट पर प्रश्न पुस्तिका संख्या भरने के लिए बनाए गए गोलों में उससे एक गलती हो गई। संबंधित खाने में पहले गोले के साथ उसने चौथे गोले को भी भर दिया।

बताया गया कि पहले गोले से अंक ‘0’ दर्शाया जाता था। अभ्यर्थी द्वारा पहले गोले के अतिरिक्त चौथे गोले को भी भर दिए जाने के कारण OMR शीट निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मूल्यांकन के लिए स्वीकार नहीं की गई।

अभ्यर्थी की दलील थी कि प्रश्न पुस्तिका संख्या उसने अंकों में सही लिखी थी। केवल संबंधित गोले में अतिरिक्त निशान लगाए जाने के कारण उसकी पूरी OMR शीट का मूल्यांकन रोक देना उचित नहीं है।

उसकी ओर से अदालत से यह राहत मांगी गई कि OMR शीट का हाथ से परीक्षण कराया जाए और उसके उत्तरों का मूल्यांकन कर परिणाम घोषित करने की अनुमति दी जाए।

अभ्यर्थी ने क्या तर्क दिया?

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष मुख्य रूप से यह तर्क रखा गया कि OMR शीट में प्रश्न पुस्तिका संख्या के अंकों को सही ढंग से दर्ज किया गया था। गलती केवल संबंधित गोलों को भरने के दौरान हुई।

अभ्यर्थी की ओर से यह भी कहा गया कि केवल एक अतिरिक्त गोला भर जाने के कारण उसकी पूरी उत्तर पुस्तिका का मूल्यांकन रोकना कठोर कार्रवाई है। जब प्रश्न पुस्तिका संख्या अंकों में स्पष्ट रूप से सही दर्ज थी, तब परीक्षा संस्था को वास्तविक विवरण समझते हुए OMR शीट का मूल्यांकन करना चाहिए था।

इस आधार पर अभ्यर्थी ने अनुरोध किया कि उसकी OMR शीट को मशीन के बजाय मैनुअल तरीके से जांचने की अनुमति दी जाए।

लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

आयोग ने क्या कहा?

मामले में संबंधित आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि OMR शीट में इस तरह की गलती केवल याचिकाकर्ता से नहीं हुई थी। बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों से OMR शीट भरने के दौरान निर्धारित निर्देशों का पालन नहीं हुआ था।

आयोग के अनुसार, इसी प्रकार की त्रुटियों के कारण लगभग 14 हजार OMR शीट मूल्यांकन के लिए स्वीकार नहीं की गईं।

आयोग ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता को विशेष राहत देते हुए उसकी OMR शीट का मैनुअल मूल्यांकन कराया जाता है, तो इसी प्रकार की गलती करने वाले हजारों अन्य अभ्यर्थियों के लिए भी समान मांग सामने आ सकती है।

ऐसी स्थिति में परीक्षा की पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

आयोग की ओर से न्यायालय के समक्ष पूर्व के न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया गया, जिनमें परीक्षा प्रक्रिया और OMR शीट से संबंधित निर्देशों के पालन को महत्वपूर्ण माना गया था।

परीक्षा के निर्देश क्यों माने गए महत्वपूर्ण?

हाईकोर्ट के सामने मूल प्रश्न केवल यह नहीं था कि अभ्यर्थी ने कितनी छोटी या बड़ी गलती की। महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या परीक्षा संस्था द्वारा पहले से निर्धारित OMR प्रक्रिया को बाद में किसी व्यक्तिगत मामले में बदला जा सकता है?

अदालत ने माना कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सभी अभ्यर्थियों के लिए एक समान नियम लागू होना जरूरी है।

यदि परीक्षा संस्था पहले से यह स्पष्ट कर देती है कि किसी विशेष कॉलम या गोले को किस प्रकार भरना है और निर्धारित तरीके से जानकारी नहीं भरने पर OMR शीट का मूल्यांकन नहीं किया जाएगा, तो अभ्यर्थियों से उन निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लाखों उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन एक समान प्रक्रिया के माध्यम से हो सके।

OMR प्रणाली इसी उद्देश्य से बनाई गई है कि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का तेजी से और एक समान तरीके से मूल्यांकन किया जा सके।

हाथ से जांच की अनुमति देने से क्या समस्या हो सकती है?

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि यदि OMR शीट की मशीन से जांच में कोई तकनीकी या निर्देश संबंधी समस्या सामने आती है, तो प्रत्येक मामले में मैनुअल जांच का रास्ता खोलना परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

कल्पना कीजिए कि किसी परीक्षा में लाखों अभ्यर्थी शामिल हुए हों और हजारों OMR शीट अलग-अलग कारणों से मशीन मूल्यांकन के लिए अस्वीकार हो जाएं। यदि प्रत्येक अभ्यर्थी यह मांग करने लगे कि उसकी शीट को हाथ से जांचा जाए, तो परीक्षा परिणाम तैयार करने की पूरी प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

इससे न केवल परिणाम घोषित होने में देरी होगी, बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के सामने प्रशासनिक कठिनाइयां भी पैदा होंगी।

अदालत ने इसी व्यापक पहलू को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत मामले में ऐसी रियायत देने से इनकार किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया गया हवाला

आयोग की ओर से अदालत के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का उल्लेख किया गया, जिनमें शैक्षणिक और प्रतियोगी परीक्षाओं के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर विचार किया गया है।

अदालतों ने कई अवसरों पर यह माना है कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को परीक्षा की प्रक्रिया, मूल्यांकन का तरीका और अभ्यर्थियों के लिए आवश्यक निर्देश तय करने का अधिकार है।

न्यायालय सामान्य तौर पर तब तक परीक्षा संस्था की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक किसी स्पष्ट कानूनी उल्लंघन या गंभीर मनमानी का मामला सामने न हो।

इसी संदर्भ में आयोग ने विनय कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले का भी हवाला दिया।

इस फैसले में परीक्षा के दौरान अभ्यर्थियों के लिए जारी निर्देशों के पालन और OMR शीट से संबंधित प्रक्रिया पर विचार किया गया था।

जय करण सिंह मामले का भी उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के जय करण सिंह एवं 52 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का भी उल्लेख किया।

उस मामले में अभ्यर्थियों ने OMR शीट पर पंजीकरण संख्या, अनुक्रमांक, प्रश्न पुस्तिका की श्रेणी अथवा परीक्षा में चुनी गई भाषा जैसी महत्वपूर्ण जानकारी गलत तरीके से भर दी थी।

इन त्रुटियों के कारण संबंधित अभ्यर्थियों के परिणाम घोषित नहीं किए गए थे।

उस मामले में भी यह प्रश्न सामने आया था कि क्या परीक्षा संस्था को गलत तरीके से भरी गई OMR शीट को बाद में हाथ से जांचकर अभ्यर्थियों को राहत देनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने माना था कि मूल्यांकन की प्रक्रिया निर्धारित करना परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था का काम है। जब अभ्यर्थियों को पहले से स्पष्ट रूप से बताया गया था कि गलत जानकारी भरने की स्थिति में परिणाम घोषित नहीं किया जाएगा, तो बाद में परीक्षा संस्था को बड़ी संख्या में OMR शीट की मैनुअल जांच करने का निर्देश देना उचित नहीं होगा।

OMR प्रणाली का उद्देश्य क्या है?

OMR यानी Optical Mark Recognition आधारित प्रणाली का इस्तेमाल बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में लंबे समय से किया जा रहा है।

इस प्रणाली में अभ्यर्थी को निर्धारित स्थान पर दिए गए विकल्पों में गोला भरना होता है। मशीन उसी निर्धारित पैटर्न को पढ़कर उत्तर और अन्य आवश्यक जानकारी का मूल्यांकन करती है।

इसमें थोड़ी सी भी अतिरिक्त मार्किंग, गलत स्थान पर गोला भरना या निर्धारित तरीके से अलग निशान लगाना कई बार मशीन द्वारा पढ़े जाने में समस्या पैदा कर सकता है।

यही कारण है कि परीक्षा संस्थाएं OMR शीट के साथ विस्तृत निर्देश देती हैं। इनमें यह बताया जाता है कि किस प्रकार का पेन इस्तेमाल करना है, गोला कैसे भरना है, कौन-सी जानकारी कहां दर्ज करनी है और किन स्थानों पर किसी प्रकार का अतिरिक्त निशान नहीं लगाना है।

पहचान से जुड़ी जानकारी में गलती को गंभीर माना गया

अदालत के पूर्व निर्णयों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि OMR शीट में पंजीकरण संख्या, अनुक्रमांक, प्रश्न पुस्तिका संख्या, परीक्षा की भाषा या अन्य पहचान संबंधी विवरण केवल सामान्य जानकारी नहीं होते।

इनके माध्यम से परीक्षा संस्था अभ्यर्थी की उत्तर पुस्तिका को संबंधित उम्मीदवार और उसकी परीक्षा से जोड़ती है।

यदि ऐसे विवरण गलत तरीके से दर्ज किए जाते हैं, तो मूल्यांकन प्रणाली में भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए केवल यह कहकर कि गलती छोटी थी, हर मामले में उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि परीक्षा में जारी किए गए निर्देशों का पालन करना अभ्यर्थियों के लिए अनिवार्य है। अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे परीक्षा शुरू होने से पहले दिए गए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें और OMR शीट उसी के अनुसार भरें।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि बाद में ऐसे अभ्यर्थियों को राहत दी जाती है जिन्होंने निर्धारित निर्देशों का पालन नहीं किया, तो इससे परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं।

कोर्ट के अनुसार, एक अभ्यर्थी को दी गई विशेष रियायत का प्रभाव केवल उसके मामले तक सीमित नहीं रहता। इसी तरह की परिस्थितियों में दूसरे अभ्यर्थी भी समान राहत की मांग कर सकते हैं।

इसलिए परीक्षा प्रक्रिया में एकरूपता बनाए रखना जरूरी है।

अभ्यर्थियों के लिए क्या सीख है?

यह फैसला प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। अक्सर उम्मीदवार परीक्षा के प्रश्नों की तैयारी पर तो पूरा ध्यान देते हैं, लेकिन OMR शीट भरने के निर्देशों को सामान्य औपचारिकता मान लेते हैं।

दरअसल, परीक्षा केंद्र में कुछ मिनट की असावधानी भी परिणाम पर असर डाल सकती है।

अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले यह समझ लेना चाहिए कि प्रश्न पुस्तिका संख्या, अनुक्रमांक, पंजीकरण संख्या, भाषा और अन्य विवरण किस तरीके से भरने हैं। OMR शीट मिलने के बाद उसे जल्दबाजी में भरने के बजाय निर्देशों को ध्यान से पढ़ना चाहिए।

किसी गोले को दो बार भरने, गलत गोला भरने, अतिरिक्त निशान लगाने या निर्धारित स्थान के बाहर मार्क करने जैसी गलती से बचना जरूरी है।

निष्पक्ष परीक्षा के लिए एक समान नियम जरूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला इस व्यापक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि प्रतियोगी परीक्षा में नियम सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

एक ओर अभ्यर्थी के लिए उसकी गलती छोटी लग सकती है, लेकिन दूसरी ओर परीक्षा संस्था के लिए OMR मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों और तकनीकी मानकों पर आधारित होती है।

यदि किसी अभ्यर्थी द्वारा की गई गलती के बावजूद बाद में मैनुअल मूल्यांकन की अनुमति दी जाती है, तो समान गलती करने वाले अन्य अभ्यर्थियों के लिए भी वही मांग उठ सकती है।

इसी कारण अदालत ने व्यक्तिगत कठिनाई के बजाय पूरी परीक्षा प्रक्रिया की एकरूपता और पारदर्शिता को ध्यान में रखा।

याचिका हुई खारिज

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभ्यर्थी को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि OMR शीट भरने के संबंध में जारी निर्देश अनिवार्य प्रकृति के हैं और अभ्यर्थी को उनका पालन करना चाहिए था।

अदालत ने बाद में OMR शीट की हाथ से जांच कराने की मांग को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी।

इस फैसले से एक बात साफ है कि प्रतियोगी परीक्षा में केवल सही उत्तर देना ही पर्याप्त नहीं है। परीक्षा संस्था द्वारा निर्धारित पूरी प्रक्रिया का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। OMR आधारित परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की छोटी सी लापरवाही भी उनके परिणाम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए परीक्षा हॉल में प्रश्न हल करने के साथ-साथ OMR शीट भरते समय भी उतनी ही सावधानी बरतना जरूरी है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।