13 साल पुराने पारिवारिक विवाद में अहमदाबाद कोर्ट का फैसला, पिता की खुद की संपत्ति से बेटा-बहू होंगे बाहर; 90 दिन की मिली मोहलत
बहू ने ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ और घरेलू हिंसा कानून का दिया हवाला, कोर्ट ने कहा—सास-ससुर की स्व-अर्जित संपत्ति को केवल वैवाहिक घर होने के आधार पर साझा घर नहीं माना जा सकता
अहमदाबाद में करीब 13 साल से चल रहे एक पारिवारिक और संपत्ति विवाद पर सिटी सिविल कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने एक बुजुर्ग व्यक्ति को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति में रह रहे बेटे और बहू को घर खाली कराने का अधिकार दिया है। अदालत ने दोनों को मकान खाली करने के लिए 90 दिन का समय दिया है।
यह मामला केवल एक पिता और बेटे के बीच संपत्ति विवाद का नहीं था। इसमें बहू ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ यानी साझा घर में रहने के अधिकार का दावा भी किया था। उसका कहना था कि वह शादी के बाद इसी घर में आई थी, उसकी बेटी भी उसके साथ रहती है और इसलिए उसे अचानक घर से बाहर नहीं किया जा सकता।
दूसरी तरफ बुजुर्ग पिता का कहना था कि मकान उन्होंने 1980 के दशक में अपनी खुद की कमाई से खरीदा था। संपत्ति के दस्तावेज उनके नाम पर थे और घर खरीदने में उनके बेटे या बहू का कोई आर्थिक योगदान नहीं था। उनके अनुसार, बेटे और बहू के बीच लगातार होने वाले विवादों के कारण उनका और उनकी पत्नी का जीवन भी प्रभावित हो रहा था।
सिटी सिविल जज वी.ए. धाधल ने दोनों पक्षों की दलीलों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद बुजुर्ग व्यक्ति के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बेदखली का आदेश दंपति की बेटी पर लागू नहीं होगा, क्योंकि वह अब बालिग है और दादा ने उसके खिलाफ कोई राहत मांगी ही नहीं थी।
2013 में शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई
मामले की शुरुआत वर्ष 2013 में हुई थी। अहमदाबाद के वासना इलाके में रहने वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपने बेटे और बहू के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
बुजुर्ग ने अदालत को बताया कि उन्होंने यह मकान 1980 के दशक में अपनी मेहनत और खुद की कमाई से खरीदा था। वह इस संपत्ति के अकेले मालिक थे और काफी समय से अपनी पत्नी के साथ इसी मकान में रह रहे थे।
वर्ष 2002 में उनके बेटे की शादी हुई। शादी के बाद बेटा और बहू इसी मकान के ग्राउंड फ्लोर पर रहने लगे, जबकि बुजुर्ग दंपती पहली मंजिल पर रहते थे।
शुरुआत में परिवार एक ही मकान में रह रहा था, लेकिन धीरे-धीरे बेटे और बहू के बीच वैवाहिक विवाद बढ़ने लगे। दोनों के बीच झगड़े इतने बढ़ गए कि वे अलग-अलग कमरों में रहने लगे। बाद में बेटे ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की कार्यवाही भी शुरू कर दी।
बुजुर्ग पिता का कहना था कि बेटे-बहू के बीच लगातार होने वाले झगड़ों का असर पूरे घर के माहौल पर पड़ रहा था। उन्होंने दोनों से मकान खाली करने को कहा, लेकिन उनके अनुसार बेटे और बहू ने घर छोड़ने से इनकार कर दिया।
इसके बाद उन्होंने 2013 में अदालत में मुकदमा दाखिल कर दोनों को संपत्ति से बाहर करने की मांग की।
पिता ने क्यों मांगी थी बेटे-बहू से मकान खाली कराने की अनुमति?
बुजुर्ग व्यक्ति का मूल तर्क संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़ा था।
उनका कहना था कि मकान उन्होंने अपनी आय से खरीदा था। यह न तो पैतृक संपत्ति थी और न ही उनके बेटे या बहू ने इसे खरीदने के लिए कोई पैसा दिया था।
इसलिए उनके अनुसार, बेटे या बहू को केवल रिश्ते के आधार पर संपत्ति में स्थायी अधिकार का दावा करने का आधार नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार कहने के बावजूद दोनों घर खाली नहीं कर रहे थे और संपत्ति पर अपना अधिकार जताने लगे थे।
बुजुर्ग की शिकायत केवल संपत्ति तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अदालत के सामने यह भी बताया कि बेटे और बहू के बीच चल रहे विवाद और कथित झगड़ों से उन्हें और उनकी पत्नी को परेशानी होती थी।
इस पारिवारिक तनाव के बीच उन्होंने अदालत से अपने मकान का शांतिपूर्ण कब्जा वापस दिलाने की मांग की।
बेटे ने मुकदमे का विरोध नहीं किया
मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण स्थिति यह रही कि बुजुर्ग के बेटे ने अपने पिता द्वारा दायर मुकदमे का विरोध नहीं किया।
दूसरी ओर, बहू ने मुकदमे का विरोध किया।
बहू ने अदालत में आरोप लगाया कि उसके पति और ससुर की मिलीभगत से उसके खिलाफ यह मुकदमा किया गया है। उसका कहना था कि यह कार्रवाई वास्तव में उसके वैवाहिक विवाद से जुड़ी थी और इसका उद्देश्य उस पर दबाव बनाकर उसे घर से बाहर जाने के लिए मजबूर करना था।
बहू ने अपने पति पर यह आरोप भी लगाया कि वह किसी दूसरी महिला के साथ संबंध के कारण उससे तलाक लेना चाहता है।
हालांकि इन आरोपों का उल्लेख अदालत के सामने बहू की ओर से रखे गए बचाव के रूप में हुआ। अदालत का मौजूदा फैसला मुख्य रूप से संपत्ति के स्वामित्व और वहां रहने के कानूनी अधिकार के प्रश्न पर केंद्रित रहा।
बहू ने कहा—यह मेरा वैवाहिक घर है
बहू की ओर से सबसे महत्वपूर्ण दलील ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ को लेकर थी।
उसने कहा कि उसकी शादी इसी घर में हुई थी और शादी के बाद से वह लंबे समय तक इसी मकान में रही। इसलिए यह केवल उसके सास-ससुर का मकान नहीं बल्कि उसका वैवाहिक घर भी है।
उसने यह भी बताया कि वह अपनी बेटी के साथ इसी घर के एक कमरे में रह रही है।
बहू ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि कानून उसे साझा घर में रहने का अधिकार देता है और केवल संपत्ति के मालिकाना हक के आधार पर उसे घर से बाहर नहीं किया जा सकता।
उसकी दलील थी कि यदि उसे घर से निकाल दिया गया तो उसके पास रहने के लिए कोई दूसरा उचित ठिकाना नहीं है।
यही कारण था कि अदालत के सामने मामला केवल मालिकाना हक का नहीं रह गया था। कोर्ट को यह भी देखना था कि स्व-अर्जित संपत्ति में रहने वाले बेटे की पत्नी को घरेलू हिंसा कानून के तहत क्या संरक्षण प्राप्त हो सकता है।
अदालत ने दस्तावेजों से मालिकाना हक की जांच की
सिटी सिविल जज वी.ए. धाधल ने मामले में पेश किए गए दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों पर विचार किया।
अदालत ने पाया कि उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्थापित होता है कि संपत्ति बुजुर्ग व्यक्ति की थी। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि संपत्ति खरीदने में उनके बेटे या बहू की कोई आर्थिक भागीदारी नहीं थी।
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि संपत्ति पैतृक नहीं थी।
अदालत ने स्व-अर्जित और पैतृक संपत्ति के बीच अंतर को ध्यान में रखा। स्व-अर्जित संपत्ति में मालिक को सामान्यतः अपनी संपत्ति के संबंध में कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं, जबकि पैतृक संपत्ति से जुड़े अधिकारों की प्रकृति अलग हो सकती है।
इस मामले में अदालत के सामने ऐसा कोई प्रमाण नहीं आया जिससे यह माना जा सके कि बेटा संपत्ति में मालिकाना हिस्से का दावा कर सकता है।
‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ की दलील पर क्या कहा कोर्ट ने?
बहू की ओर से घरेलू हिंसा कानून के तहत साझा घर में रहने के अधिकार की दलील मामले का सबसे अहम हिस्सा थी।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि सास-ससुर की अपनी स्वतंत्र रूप से अर्जित संपत्ति को केवल इस कारण बहू के लिए ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ नहीं माना जा सकता कि वह शादी के बाद वहां रहने लगी थी।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने इसी आधार पर बहू की उस दलील को स्वीकार नहीं किया कि घरेलू हिंसा कानून के कारण उसे इस निजी संपत्ति में स्थायी रूप से रहने का अधिकार मिल जाता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि घरेलू हिंसा कानून महिलाओं को निवास से संबंधित महत्वपूर्ण संरक्षण देता है, लेकिन हर ऐसी संपत्ति जिसमें महिला कभी वैवाहिक जीवन के दौरान रही हो, उसके मालिकाना हक में नहीं बदल जाती।
किसी मामले में ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ का प्रश्न संपत्ति के स्वामित्व, वहां रहने की परिस्थितियों और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय किया जाता है।
बेटे का जन्मसिद्ध अधिकार भी नहीं माना गया
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू बेटे के संपत्ति अधिकार से जुड़ा था।
अदालत के सामने संपत्ति के दस्तावेजों से यह स्पष्ट था कि मकान बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी कमाई से खरीदा था। इसलिए इसे पैतृक संपत्ति की तरह नहीं देखा गया।
स्व-अर्जित संपत्ति के संबंध में केवल बेटा होने से किसी व्यक्ति को पिता के जीवनकाल में उस संपत्ति पर स्वतः मालिकाना अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
यही अंतर इस मामले में निर्णायक रहा।
अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर माना कि संपत्ति पर बुजुर्ग व्यक्ति का मालिकाना हक है और उनके बेटे या बहू का संपत्ति खरीदने में कोई योगदान नहीं था।
90 दिन में घर खाली करने का आदेश
अदालत ने अपने फैसले में बेटे और बहू को मकान खाली करने के लिए 90 दिन का समय दिया है।
इसका अर्थ यह है कि उन्हें तत्काल उसी दिन घर से बाहर निकालने का आदेश नहीं दिया गया, बल्कि अदालत ने उन्हें निर्धारित अवधि में संपत्ति खाली करने का अवसर दिया।
यह अवधि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से वहां रहने वाले परिवार को वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए समय मिल सके।
हालांकि आदेश केवल बेटे और बहू के संबंध में है।
बेटी को क्यों नहीं किया गया बेदखल?
मामले में बुजुर्ग व्यक्ति के बेटे और बहू के साथ उनकी बेटी भी उसी घर में रहती थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बेदखली का आदेश बेटी पर लागू नहीं होगा।
इसके पीछे दो बातें थीं। पहली, बेटी अब बालिग हो चुकी थी। दूसरी, दादा ने अदालत से उसके खिलाफ किसी प्रकार की राहत मांगी ही नहीं थी।
इसलिए अदालत ने जितनी राहत मांगी गई थी और जिन व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा किया गया था, उसी सीमा में आदेश पारित किया।
यह पहलू बताता है कि अदालत का आदेश पूरे परिवार को एक साथ घर से निकालने का आदेश नहीं था। यह विशेष रूप से मुकदमे में प्रतिवादी बनाए गए बेटे और बहू से संबंधित था।
क्या यह फैसला हर बेटे-बहू पर लागू होगा?
इस फैसले को समझते समय यह सावधानी रखना जरूरी है कि इसे हर पारिवारिक विवाद पर सीधे लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं माना जा सकता।
हर मामले में संपत्ति की प्रकृति, मालिकाना दस्तावेज, रहने की परिस्थितियां, पारिवारिक संबंध और संबंधित पक्षों द्वारा पेश किए गए साक्ष्य अलग होते हैं।
यदि संपत्ति पैतृक है, संयुक्त स्वामित्व है या उसमें बेटे या बहू का वैध हिस्सा है, तो स्थिति अलग हो सकती है।
इसी तरह घरेलू हिंसा कानून के तहत निवास के अधिकार से जुड़े मामलों में भी अदालत परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर निर्णय लेती है।
इस मामले में निर्णायक तथ्य यह था कि अदालत ने संपत्ति को बुजुर्ग व्यक्ति की स्व-अर्जित और स्वतंत्र संपत्ति माना तथा बेटे और बहू के आर्थिक योगदान का प्रमाण नहीं पाया।
क्या बहू का शादी के बाद घर में रहना मालिकाना हक दे देता है?
सिर्फ शादी के बाद किसी घर में रहने से उस संपत्ति में मालिकाना हक स्वतः पैदा नहीं हो जाता।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि विवाहित महिला को किसी भी परिस्थिति में घर से निकाला जा सकता है। घरेलू हिंसा कानून में निवास से संबंधित संरक्षण मौजूद हैं और अलग-अलग मामलों में अदालतें तथ्यों के आधार पर उनका परीक्षण करती हैं।
अहमदाबाद के इस मामले में बहू ने इसी संरक्षण का सहारा लिया था। लेकिन अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक व्यवस्था को देखते हुए माना कि सास-ससुर की स्व-अर्जित संपत्ति को इस मामले में उसके लिए साझा घर नहीं माना जा सकता।
इसलिए उसका निवास अधिकार संपत्ति के मालिक के अधिकार पर इस तरह हावी नहीं हुआ कि वह मालिक की मांग के बावजूद हमेशा वहां रह सके।
13 साल लंबी कानूनी लड़ाई का अंत
यह मामला वर्ष 2013 में शुरू हुआ था और सितंबर 2026 में अदालत के आदेश के साथ इसका एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ।
इस दौरान परिवार के भीतर वैवाहिक विवाद, तलाक की कार्यवाही और संपत्ति को लेकर कानूनी विवाद चलते रहे।
एक ओर बुजुर्ग पिता अपनी संपत्ति पर नियंत्रण चाहते थे, वहीं बहू अपने वैवाहिक घर और अपनी बेटी के साथ रहने के अधिकार का हवाला दे रही थी।
लगभग 13 वर्षों तक मामला अदालत में चलने के बाद अब सिविल कोर्ट ने बेटे और बहू को 90 दिन में मकान खाली करने का निर्देश दिया है।
बुजुर्गों की संपत्ति और पारिवारिक विवाद
यह मामला भारत में तेजी से सामने आने वाले एक सामाजिक और कानूनी प्रश्न को भी दिखाता है—जब बुजुर्ग माता-पिता की अपनी संपत्ति में उनके बच्चों या बच्चों के परिवार के साथ रहने के कारण विवाद पैदा हो जाए तो संपत्ति के मालिक के अधिकार और परिवार के अन्य सदस्यों के निवास अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
ऐसे मामलों में भावनात्मक पहलू काफी मजबूत होता है, लेकिन अदालत को अंततः दस्तावेज और कानून देखना होता है।
इस मामले में भी अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि मकान किसने खरीदा, किसके नाम पर संपत्ति थी, खरीद में किसका आर्थिक योगदान था और क्या बेटे या बहू के पास कोई स्वतंत्र कानूनी अधिकार था।
दस्तावेजों के आधार पर बुजुर्ग व्यक्ति का स्वामित्व स्थापित होने के बाद अदालत ने उन्हें संपत्ति खाली कराने की अनुमति दी।
फैसले का कानूनी महत्व
इस आदेश को मुख्य रूप से तीन पहलुओं से समझा जा सकता है।
पहला—स्व-अर्जित संपत्ति: यदि संपत्ति किसी व्यक्ति ने अपनी कमाई से खरीदी है और वह उसका स्वतंत्र मालिक है, तो केवल पारिवारिक संबंध के आधार पर बेटे को उसमें जन्मसिद्ध हिस्सा नहीं मिल जाता।
दूसरा—शेयर्ड हाउसहोल्ड: घरेलू हिंसा कानून के तहत किसी महिला का निवास अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन हर सास-ससुर की निजी संपत्ति स्वतः साझा घर नहीं बन जाती।
तीसरा—अदालत की राहत की सीमा: अदालत ने केवल उन लोगों के खिलाफ बेदखली का आदेश दिया जिनके संबंध में राहत मांगी गई थी। दंपति की बालिग बेटी के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई थी, इसलिए उसे आदेश के दायरे से बाहर रखा गया।
निष्कर्ष
अहमदाबाद के इस 13 साल पुराने पारिवारिक विवाद में सिटी सिविल कोर्ट ने बुजुर्ग पिता के संपत्ति अधिकार को स्वीकार करते हुए बेटे और बहू को उनका वासना स्थित मकान खाली करने का निर्देश दिया है। दोनों को इसके लिए 90 दिन का समय दिया गया है।
मामले में बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा था कि उन्होंने मकान 1980 के दशक में अपनी कमाई से खरीदा था और वह इसके अकेले मालिक हैं। दूसरी ओर बहू ने इसे अपना वैवाहिक और साझा घर बताते हुए घरेलू हिंसा कानून के तहत निवास अधिकार का दावा किया था।
अदालत ने दस्तावेजों के आधार पर पाया कि संपत्ति बुजुर्ग व्यक्ति की स्व-अर्जित संपत्ति है और उसके अधिग्रहण में बेटे या बहू का कोई आर्थिक योगदान नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए अदालत ने बहू की ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ वाली दलील को स्वीकार नहीं किया।
हालांकि, इस आदेश का एक मानवीय पक्ष भी है। अदालत ने दंपति की बालिग बेटी को बेदखली के आदेश में शामिल नहीं किया, क्योंकि उसके खिलाफ दादा ने कोई राहत नहीं मांगी थी।
इस पूरे मामले से यह स्पष्ट होता है कि पारिवारिक संबंध और संपत्ति का कानूनी स्वामित्व दो अलग-अलग प्रश्न हैं। किसी घर में लंबे समय तक रहने या वहां शादी होने से संपत्ति का मालिकाना हक स्वतः पैदा नहीं हो जाता। वहीं, घरेलू हिंसा कानून के तहत निवास अधिकार के दावे का भी हर मामले के तथ्यों के आधार पर परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
अहमदाबाद कोर्ट का यह फैसला इसी संतुलन को सामने रखता है—एक तरफ स्व-अर्जित संपत्ति के मालिक के अधिकार, और दूसरी तरफ उस संपत्ति में रहने वाले परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए कानूनी दावों के बीच।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।