बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर LIC ने खारिज किया 5 लाख का क्लेम, उपभोक्ता आयोग ने कहा- ठोस सबूत कहां हैं?
जीवन बीमा का उद्देश्य ही यह होता है कि पॉलिसीधारक की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सहारा मिल सके। लेकिन जब किसी बीमा कंपनी की ओर से मृत्यु के बाद क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिया जाता है कि पॉलिसी लेते समय किसी पुरानी बीमारी की जानकारी छिपाई गई थी, तो मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंच सकता है। ऐसा ही एक मामला पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के सामने आया, जहां भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने एक मृतक पॉलिसीधारक के 5 लाख रुपये के डेथ क्लेम को कथित मेडिकल जानकारी छिपाने के आधार पर अस्वीकार कर दिया था।
आयोग ने मामले में LIC के रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों की जांच की और पाया कि बीमा कंपनी अपने आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। इसके बाद आयोग ने क्लेम को गलत तरीके से खारिज किया जाना मानते हुए LIC को बीमा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया। रिपोर्टों के अनुसार, आयोग ने 5 लाख रुपये की बीमा राशि के अलावा ब्याज तथा 10 हजार रुपये की राशि भी देने का आदेश दिया।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक ऐसे युवक की जीवन बीमा पॉलिसी से जुड़ा है, जिसकी मृत्यु अगस्त 2023 में हुई थी। मृतक के पिता पॉलिसी के नॉमिनी थे। बेटे की मृत्यु के बाद पिता ने LIC के सामने पॉलिसी के तहत डेथ क्लेम प्रस्तुत किया, लेकिन कंपनी ने जनवरी 2024 में क्लेम को खारिज कर दिया।
शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके बेटे ने अप्रैल 2022 में LIC की पॉलिसी ली थी। पॉलिसी की परिपक्वता यानी मैच्योरिटी 2043 में होनी थी और इसके तहत 5 लाख रुपये का बीमा कवर था। पॉलिसीधारक हर महीने लगभग 2,290 रुपये और GST के रूप में प्रीमियम का भुगतान कर रहा था। शिकायत में बताया गया कि उसकी मृत्यु से पहले लगभग 36,000 रुपये प्रीमियम के रूप में जमा किए जा चुके थे।
इसके बाद 4 अगस्त 2023 को पॉलिसीधारक की मृत्यु हो गई। पिता का कहना था कि बेटे की मृत्यु हार्ट अटैक से हुई थी और उस समय पॉलिसी पूरी तरह प्रभावी थी। मृत्यु के बाद उन्होंने बीमा राशि प्राप्त करने के लिए आवश्यक दस्तावेज LIC में जमा किए।
लेकिन जांच के बाद LIC ने जनवरी 2024 में क्लेम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
LIC ने क्यों खारिज किया क्लेम?
बीमा कंपनी की ओर से मुख्य आधार यह बनाया गया कि पॉलिसी लेते समय मृतक ने अपने स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा नहीं किया था।
LIC का कहना था कि पॉलिसीधारक को पहले से हृदय संबंधी समस्या थी। कंपनी के अनुसार, उसे ASD/VSD जैसी जन्मजात हृदय संबंधी समस्या थी और वर्ष 2008 में उसका ASD/VSD closure तथा Post-Fontan procedure हुआ था।
बीमा कंपनी ने यह भी दावा किया कि पॉलिसी के प्रस्ताव के समय स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब में संबंधित बीमारी की जानकारी नहीं दी गई। LIC के अनुसार, यदि यह जानकारी पॉलिसी जारी करने से पहले सामने आती, तो कंपनी पॉलिसी जारी करने के निर्णय पर अलग तरीके से विचार कर सकती थी।
LIC ने अपने पक्ष में वर्ष 2023 के मेडिकल रिकॉर्ड और बठिंडा के जिंदल हार्ट इंस्टीट्यूट एंड मैटरनिटी सेंटर की डिस्चार्ज समरी का भी सहारा लिया। उस रिकॉर्ड में Atrial Flutter/CHD तथा पहले हुए उपचार का उल्लेख था।
यही वह बिंदु था जिस पर उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के रिकॉर्ड को गंभीरता से परखा।
पिता ने आयोग में क्या कहा?
मृतक के पिता ने LIC के निर्णय को चुनौती देते हुए जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, श्री मुक्तसर साहिब में शिकायत दाखिल की।
उनका तर्क था कि जिस मेडिकल प्रक्रिया का LIC उल्लेख कर रहा है, वह कथित तौर पर वर्ष 2008 में हुई थी। उस समय उनका बेटा नाबालिग था। इसके लगभग 14-15 वर्ष बाद अप्रैल 2022 में उसने बीमा पॉलिसी ली थी।
पिता की ओर से यह भी कहा गया कि LIC ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि पॉलिसी लेते समय मृतक को किसी गंभीर बीमारी की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उस जानकारी को छिपाया था।
इसके अलावा, कथित पुरानी बीमारी और वर्ष 2023 में हुई मृत्यु के बीच सीधा संबंध भी साबित नहीं किया गया था।
प्रस्ताव फॉर्म बना LIC के लिए बड़ी समस्या
मामले में आयोग के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक बीमा प्रस्ताव यानी Proposal Form की विश्वसनीयता का था।
आयोग ने LIC की ओर से पेश किए गए दो प्रस्ताव फॉर्म की जांच की। रिपोर्ट के अनुसार, पहले प्रस्ताव फॉर्म में केवल दो पेज थे। उस पर मृतक के हस्ताक्षर नहीं थे और यह भी स्पष्ट नहीं था कि फॉर्म किस तारीख को लिया गया अथवा जमा किया गया था।
दूसरे प्रस्ताव फॉर्म को LIC ने पूरा प्रस्ताव फॉर्म बताया। लेकिन आयोग के सामने इसकी तारीख को लेकर भी सवाल खड़ा हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, उस दस्तावेज पर 22 मई 2022 की तारीख थी, जबकि पॉलिसी 28 अप्रैल 2022 को जारी हो चुकी थी।
इस स्थिति में आयोग के सामने स्वाभाविक सवाल था कि यदि प्रस्ताव फॉर्म की तारीख पॉलिसी जारी होने के बाद की है, तो उस दस्तावेज के आधार पर यह कैसे निर्धारित किया जा सकता है कि पॉलिसी जारी किए जाने के समय बीमाधारक ने क्या जानकारी दी थी?
यहीं से LIC के दावे की प्रमाणिकता पर सवाल खड़े हुए।
मेडिकल रिकॉर्ड भी पर्याप्त नहीं माना गया
आयोग ने केवल प्रस्ताव फॉर्म ही नहीं, बल्कि LIC द्वारा पेश किए गए मेडिकल रिकॉर्ड को भी देखा।
LIC ने जिस मेडिकल रिकॉर्ड पर भरोसा किया, उसमें वर्ष 2023 में हुए उपचार का विवरण था। लेकिन बीमा पॉलिसी अप्रैल 2022 में ली गई थी।
आयोग ने इस अंतर को महत्वपूर्ण माना। रिपोर्टों के अनुसार, LIC ऐसा कोई मेडिकल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी जो 28 अप्रैल 2022 से पहले का हो और यह स्थापित करता हो कि पॉलिसी लेते समय मृतक वास्तव में उसी बीमारी से पीड़ित था जिसका उल्लेख बीमा कंपनी ने किया था।
बीमा कंपनी ने वर्ष 2008 में हुए कथित ASD/VSD closure और Post-Fontan procedure का भी उल्लेख किया, लेकिन आयोग के सामने उस पुराने उपचार को प्रमाणित करने वाला मूल मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।
आयोग ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि अगर वर्ष 2008 में ऐसी कोई प्रक्रिया हुई भी थी, तो बीमा पॉलिसी अप्रैल 2022 में ली गई थी। यानी दोनों घटनाओं के बीच लगभग 14-15 वर्षों का अंतर था।
क्या केवल पुरानी बीमारी होना क्लेम खारिज करने के लिए पर्याप्त है?
इस मामले से एक महत्वपूर्ण कानूनी और उपभोक्ता विवाद का प्रश्न सामने आता है।
बीमा कंपनियां पॉलिसी जारी करते समय आवेदक से उसके स्वास्थ्य, पुरानी बीमारियों, इलाज, ऑपरेशन और अन्य महत्वपूर्ण मेडिकल परिस्थितियों के बारे में जानकारी मांगती हैं। इसका उद्देश्य बीमा कंपनी को जोखिम का आकलन करने में मदद करना होता है।
लेकिन किसी क्लेम को केवल इस आधार पर खारिज कर देना कि पॉलिसीधारक के मेडिकल इतिहास में कोई पुरानी बीमारी या प्रक्रिया थी, अपने आप में पर्याप्त नहीं हो सकता। बीमा कंपनी को अपने निर्णय के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज और परिस्थितियां भी दिखानी पड़ती हैं।
इस मामले में आयोग ने इसी सवाल पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या LIC वास्तव में यह साबित कर सकी कि पॉलिसी लेते समय मृतक ने जानबूझकर किसी महत्वपूर्ण बीमारी की जानकारी छिपाई थी।
आयोग के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला।
आयोग ने क्या फैसला दिया?
श्री मुक्तसर साहिब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने LIC द्वारा डेथ क्लेम को खारिज करने की कार्रवाई को उचित नहीं माना।
आयोग ने माना कि केवल गैर-प्रकटीकरण का आरोप लगाने से बीमा कंपनी का पक्ष साबित नहीं हो जाता। कंपनी को अपने आरोप के समर्थन में विश्वसनीय रिकॉर्ड प्रस्तुत करना जरूरी था।
रिपोर्टों के अनुसार, आयोग ने LIC को मृतक के पिता और नॉमिनी को 5 लाख रुपये की बीमा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही 10 हजार रुपये मुआवजे और मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने का आदेश दिया गया। एक रिपोर्ट में 7 प्रतिशत ब्याज का भी उल्लेख है।
आयोग की पीठ में अध्यक्ष अशोक कुमार गर्ग और सदस्य तजिंदर कौर शामिल थीं। आदेश 1 सितंबर 2026 को पारित किए जाने की रिपोर्ट है।
आयोग के फैसले से क्या समझ आता है?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी से उसके आरोप का प्रमाण मांगा।
बीमा पॉलिसी लेते समय यदि कोई व्यक्ति महत्वपूर्ण मेडिकल जानकारी छिपाता है, तो ऐसी जानकारी क्लेम विवाद में महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन विवाद की स्थिति में यह देखना भी जरूरी होता है कि कथित बीमारी के संबंध में बीमा कंपनी के पास कौन-से दस्तावेज हैं, वे दस्तावेज किस तारीख के हैं और क्या वे यह साबित करते हैं कि पॉलिसी लेते समय वह जानकारी वास्तव में मौजूद थी और बीमाधारक को उसके बारे में जानकारी थी।
इस मामले में आयोग को इसी कड़ी में कई कमियां दिखाई दीं। एक ओर LIC ने 2008 में हुए कथित हृदय उपचार का उल्लेख किया, लेकिन उस उपचार का मूल रिकॉर्ड सामने नहीं रखा गया। दूसरी ओर, जिस मेडिकल रिकॉर्ड पर भरोसा किया गया, वह पॉलिसी जारी होने के लगभग एक साल बाद का था।
प्रस्ताव फॉर्म की तारीख और हस्ताक्षर को लेकर भी सवाल सामने आए।
इसी वजह से आयोग ने LIC के क्लेम अस्वीकार करने के आधार को पर्याप्त नहीं माना।
पॉलिसीधारकों के लिए क्या है सबक?
इस मामले से बीमा पॉलिसी लेने वाले लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण बात सामने आती है। जीवन बीमा लेते समय प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य से जुड़े सवालों का जवाब सावधानी से देना चाहिए।
पुरानी बीमारी, ऑपरेशन, अस्पताल में भर्ती होने, नियमित दवा लेने या किसी महत्वपूर्ण मेडिकल प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी को छिपाना बाद में विवाद का कारण बन सकता है। इसलिए पॉलिसी खरीदते समय सभी आवश्यक जानकारी सही तरीके से देना उपभोक्ता के हित में है।
दूसरी ओर, यदि किसी परिवार का डेथ क्लेम केवल बीमारी छिपाने के आरोप पर खारिज किया जाता है, तो परिवार को बीमा कंपनी के repudiation letter यानी क्लेम अस्वीकृति पत्र को ध्यान से देखना चाहिए। उसमें क्लेम खारिज करने का कारण क्या बताया गया है, किस मेडिकल रिकॉर्ड पर भरोसा किया गया है और प्रस्ताव फॉर्म में क्या जानकारी दर्ज है—इन सभी बातों की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता संबंधित उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रख सकता है।
निष्कर्ष
श्री मुक्तसर साहिब का यह मामला इस बात पर केंद्रित रहा कि किसी बीमा क्लेम को खारिज करते समय बीमा कंपनी द्वारा लगाए गए आरोपों के समर्थन में कितना विश्वसनीय और प्रासंगिक रिकॉर्ड उपलब्ध है।
LIC ने मृतक की कथित पुरानी हृदय संबंधी बीमारी और वर्ष 2008 में हुए उपचार को आधार बनाकर क्लेम अस्वीकार किया था। लेकिन आयोग के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड में कथित पुराने उपचार का मूल मेडिकल प्रमाण नहीं था। वर्ष 2023 के मेडिकल दस्तावेज पॉलिसी जारी होने के बाद के थे और प्रस्ताव फॉर्म की तारीख तथा उसकी प्रमाणिकता को लेकर भी सवाल सामने आए।
इन परिस्थितियों को देखते हुए आयोग ने क्लेम अस्वीकृति को सेवा में कमी माना और मृतक के पिता को 5 लाख रुपये की बीमा राशि तथा अतिरिक्त राशि देने का निर्देश दिया।
इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि बीमा क्लेम विवाद में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते; दस्तावेजी साक्ष्य, उनकी तारीख, विश्वसनीयता और पॉलिसी जारी होने के समय की वास्तविक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं। वहीं पॉलिसीधारकों के लिए यह मामला याद दिलाता है कि बीमा प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भरते समय पूरी सावधानी और सत्यता बरतना बेहद जरूरी है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।