CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, SIR को लेकर भी उठे गंभीर सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और निर्वाचन आयोग में निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह सुनवाई करेगा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल कुछ मामलों में अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या भागीदारी के बिना किया गया। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR से जुड़े फैसलों को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
मामले का मंगलवार को वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष उल्लेख किया। इसके बाद CJI ने मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 और Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 18 के आधार पर निर्वाचन आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का मुद्दा उठाया गया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल किसी एक चुनावी निर्णय को चुनौती नहीं दी गई है, बल्कि यह मूल सवाल उठाया गया है कि जब निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है, तब आयोग की शक्तियों का इस्तेमाल किस तरीके से किया जाना चाहिए।
क्या है पूरी याचिका का मामला?
याचिका राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर की गई है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्वो वारंटो (Quo Warranto) रिट जारी करने सहित कई राहतों की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता का मूल तर्क यह है कि संविधान ने चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग नामक संस्था को दी है। इसलिए, याचिका के अनुसार, ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल आयोग की निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर करीब 14 अलग-अलग मामलों में आपत्तियां दर्ज कीं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन आपत्तियों से यह सवाल उठता है कि क्या संबंधित फैसले वास्तव में पूरे निर्वाचन आयोग के फैसले थे या उन्हें आयोग के नाम पर लिया गया था।
हालांकि, याचिका खुद यह भी कहती है कि इन आरोपों की वास्तविक स्थिति प्राथमिक रिकॉर्ड—जैसे बैठक की कार्यवाही, फाइल नोटिंग, मंजूरी पत्र और आदेश—देखे बिना तय नहीं की जा सकती। इसलिए याचिकाकर्ता ने आयोग के मूल रिकॉर्ड अदालत के सामने मंगाने की मांग भी की है।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
याचिका में निर्वाचन आयोग में कथित तौर पर शक्तियों के केंद्रीकरण का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग में कई सदस्य इसलिए होते हैं ताकि महत्वपूर्ण मामलों पर सामूहिक रूप से विचार हो सके और मतभेद होने की स्थिति में कानून के अनुसार बहुमत से निर्णय लिया जा सके।
मंगलवार को मामले का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत के सामने इसी पहलू पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बहु-सदस्यीय आयोग का उद्देश्य ही यह है कि निर्णय सर्वसम्मति से या मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर लिए जाएं।
उनकी ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि यदि SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया के संबंध में आयोग ने वास्तव में कोई सामूहिक निर्णय नहीं लिया था, तो उस प्रक्रिया को निर्वाचन आयोग का निर्णय किस आधार पर माना जाएगा।
इसी संदर्भ में CJI सूर्यकांत ने मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
निर्वाचन आयोग में फैसले लेने की व्यवस्था क्या है?
इस मामले को समझने के लिए निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्थिति को समझना जरूरी है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित करता है। वर्तमान में आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्त हैं।
याचिका का मुख्य आधार यही है कि आयोग की संवैधानिक शक्ति को केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की व्यक्तिगत शक्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता।
याचिकाकर्ता ने 2023 के कानून की धारा 18 का भी हवाला दिया है। इस प्रावधान के अनुसार आयोग अपने कामकाज और कार्यों के बंटवारे से संबंधित प्रक्रिया को सर्वसम्मति से तय कर सकता है। साथ ही, जहां तक संभव हो, आयोग का काम सर्वसम्मति से किया जाना है और यदि मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मामले पर मतभेद हो, तो मामला बहुमत की राय के अनुसार तय किया जाता है।
यही प्रावधान इस याचिका में केंद्रीय कानूनी आधार बनकर सामने आया है।
SIR को लेकर क्यों उठे सवाल?
याचिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) से संबंधित है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि SIR से संबंधित महत्वपूर्ण फैसले निर्वाचन आयोग की निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार नहीं लिए गए, तो इससे पूरी प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठ सकता है।
याचिका में कथित तौर पर चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई विभिन्न आपत्तियों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन आपत्तियों के आधार पर यह जांच आवश्यक हो जाती है कि संबंधित निर्णयों के पीछे वास्तव में आयोग की सामूहिक मंजूरी थी या नहीं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभी सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को सही नहीं ठहराया है। अदालत ने केवल याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करने की सहमति दी है। आरोपों की सत्यता, निर्णय प्रक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड की वैधानिक स्थिति पर आगे सुनवाई के दौरान विचार होना है।
Form-6 में बदलाव का भी जिक्र
याचिका में मतदाता पंजीकरण से जुड़े Form-6 में कथित बदलाव का भी उल्लेख किया गया है।
याचिका के अनुसार जुलाई 2026 में Form-6 में ऐसा बदलाव किया गया, जिसमें आवेदकों से यह जानकारी मांगी गई कि वे, उनके माता-पिता या दादा-दादी पिछले SIR की मतदाता सूची में मौजूद थे या नहीं।
याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई 2026 में आपत्ति दर्ज की थी और कहा था कि संबंधित फॉर्म में बदलाव के लिए नियमों में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि सुखबीर सिंह संधू ने बाद में इस आपत्ति का समर्थन किया।
याचिका के मुताबिक, इसके बावजूद जुलाई में संशोधित फॉर्म लागू किया गया।
अब इस पूरे घटनाक्रम में वास्तविक स्थिति क्या थी और किस स्तर पर किस अधिकारी या संस्था ने निर्णय लिया, यह संबंधित मूल रिकॉर्ड की जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।
चुनावी डेटा और डेटाबेस को लेकर भी चिंता
याचिका में निर्वाचन आयोग के मतदाता डेटा और इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि एक चुनाव आयुक्त की ओर से मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकृत होने को लेकर चिंता जताई गई थी। याचिका में कथित तौर पर डेटाबेस की सुरक्षा, एक्सेस और उसमें बदलाव करने की क्षमता से संबंधित सवालों का उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता ने ऐसे मामलों की जांच के लिए सर्वर लॉग, ऑडिट ट्रेल, एक्सेस रिकॉर्ड और डेटाबेस में किए गए बदलावों का इतिहास सुरक्षित रखने और अदालत के सामने पेश करने की मांग की है।
इन दस्तावेजों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि डिजिटल चुनावी रिकॉर्ड में किसी भी बदलाव का पता लगाने के लिए तकनीकी लॉग महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में अपीलों का भी उल्लेख
याचिका में पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया से जुड़े अपील मामलों का भी उल्लेख किया गया है।
याचिका के अनुसार, बड़ी संख्या में ऐसे मामलों में निर्वाचन आयोग के नाम से अपील दायर की गईं जिनमें न्यायिक अधिकारियों ने कुछ मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने के निर्देश दिए थे।
याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि इन अपीलों को निर्वाचन आयोग की ओर से दायर करने का अधिकार किसने दिया था और इसके लिए आयोग का औपचारिक निर्णय या मंजूरी कहां है।
याचिका में संबंधित अनुमति, मंजूरी और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड अदालत के सामने लाने की मांग की गई है।
‘क्वो वारंटो’ रिट क्या होती है?
इस मामले में याचिकाकर्ता ने Quo Warranto रिट की मांग की है। इसका सामान्य अर्थ है—“किस अधिकार से?”
यह एक न्यायिक उपाय है जिसके माध्यम से किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से यह पूछा जा सकता है कि वह उस पद या उससे जुड़ी शक्ति का इस्तेमाल किस वैधानिक अधिकार के तहत कर रहा है।
इस मामले में याचिकाकर्ता चाहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त से यह स्पष्ट कराया जाए कि उन्होंने कथित तौर पर निर्वाचन आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से किस अधिकार के तहत किया।
याचिका में कहा गया है कि यदि अदालत यह पाती है कि 2023 के कानून की धारा 18 के अनुरूप आयोग का निर्णय लिए बिना सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल किया गया, तो ऐसे कार्यों को कानूनी अधिकार से बाहर घोषित किया जाना चाहिए।
SIR से जुड़े सभी फैसलों को शून्य घोषित करने की मांग
याचिका में केवल CEC की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाया गया है। इसमें SIR से जुड़े फैसलों और उनसे संबंधित कदमों को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि यदि यह पाया जाता है कि संबंधित फैसले निर्वाचन आयोग की वैधानिक सामूहिक प्रक्रिया के तहत नहीं लिए गए थे, तो SIR और उससे जुड़े सभी आदेश, निर्देश तथा परिणामी कार्रवाइयों को शुरुआत से ही अवैध और कानूनी अधिकार के बिना लिया गया घोषित किया जाए।
कानूनी भाषा में इसे void ab initio कहा जाता है, यानी शुरुआत से ही अमान्य।
हालांकि, ऐसी मांग स्वीकार होगी या नहीं, यह पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और अदालत द्वारा किए जाने वाले कानूनी परीक्षण पर निर्भर करेगा।
क्या CEC के खिलाफ तत्काल कोई कार्रवाई हुई है?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख तय करने का निर्देश दिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने याचिका में लगाए गए आरोपों को सही मान लिया है या CEC के खिलाफ कोई अंतिम आदेश पारित कर दिया है।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर रोक या उन्हें पद के कार्यों से अलग रखने जैसी अंतरिम राहतों की भी मांग की गई है। इसके अलावा आयोग के मूल रिकॉर्ड की सुरक्षा और उन्हें अदालत के समक्ष पेश करने की मांग भी की गई है।
इन मांगों पर सुप्रीम कोर्ट आगे सुनवाई के दौरान विचार करेगा।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण होगी?
अगली सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह हो सकता है कि निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय प्रकृति और 2023 के कानून की धारा 18 का व्यवहारिक अर्थ क्या है।
यदि किसी मामले में आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए? क्या किसी फैसले को निर्वाचन आयोग का फैसला कहने के लिए औपचारिक सामूहिक निर्णय जरूरी है? और यदि दो चुनाव आयुक्त किसी निर्णय पर आपत्ति दर्ज करते हैं, तो उस निर्णय की वैधानिक स्थिति निर्धारित करने के लिए किन रिकॉर्डों को देखा जाएगा?
इन सवालों के जवाब केवल इस मामले तक सीमित नहीं रहेंगे। उनका असर निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और भविष्य में ऐसे विवादों के न्यायिक परीक्षण पर भी पड़ सकता है।
अभी आरोप हैं, अंतिम फैसला बाकी
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि याचिका में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। याचिकाकर्ता ने कई दस्तावेजों और कथित आपत्तियों का हवाला देकर जांच की मांग की है, जबकि अदालत ने अभी इन दावों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। आगे अदालत याचिका की वैधानिकता, मांगी गई राहतों और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर विचार करेगी।
इसलिए अब सबकी नजर अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई पर रहेगी। विशेष रूप से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत आयोग के मूल रिकॉर्ड मंगाने, SIR से जुड़े फैसलों की प्रक्रिया की जांच और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मांगी गई क्वो वारंटो रिट जैसी राहतों पर किस तरह आगे बढ़ती है।
फिलहाल इस मामले ने एक बुनियादी संवैधानिक प्रश्न जरूर सामने ला दिया है—जब संविधान ने चुनावों की देखरेख की शक्ति निर्वाचन आयोग नामक संस्था को दी है, तो उस संस्था के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया किस सीमा तक सामूहिक होनी चाहिए और उस प्रक्रिया का प्रमाण किस रिकॉर्ड से तय होगा?
सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई में इसी सवाल के साथ SIR से जुड़े निर्णयों की वैधानिक प्रक्रिया भी चर्चा के केंद्र में रह सकती है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
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यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।