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दुष्कर्म मामले में पीड़िता को सुने बिना नहीं दी जा सकती जमानत? दिल्ली हाईकोर्ट

दुष्कर्म मामले में पीड़िता को सुने बिना नहीं दी जा सकती जमानत? दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर फिर सुनवाई का दिया निर्देश

       दुष्कर्म के एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने पीड़िता के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से आरोपी को दी गई नियमित जमानत को रद्द करते हुए कहा कि यौन अपराध से जुड़े मामले में पीड़ित महिला को केवल मुकदमे के दौरान ही नहीं, बल्कि आपराधिक कार्यवाही के अलग-अलग महत्वपूर्ण चरणों में अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसमें आरोपी की नियमित जमानत याचिका पर होने वाली सुनवाई भी शामिल है।

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि जब किसी महिला ने दुष्कर्म का आरोप लगाया है और उसके मामले में आपराधिक मुकदमा चल रहा है, तो आरोपी को जमानत देने से पहले पीड़िता को सुनवाई का अवसर देना महत्वपूर्ण है। अदालत ने पाया कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को नियमित जमानत देने से पहले पीड़ित महिला को नोटिस ही नहीं दिया था।

हाईकोर्ट ने इसी कमी को ध्यान में रखते हुए ट्रायल कोर्ट का जमानत संबंधी आदेश रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनने का निर्देश दिया। हालांकि, आरोपी को तत्काल दोबारा गिरफ्तार करने का आदेश नहीं दिया गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक ट्रायल कोर्ट नए सिरे से जमानत आवेदन पर फैसला नहीं करता, तब तक आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होगी।

मामला भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 69 के तहत दर्ज प्राथमिकी से संबंधित है। पीड़िता ने जुलाई 2026 में आरोपी को दी गई नियमित जमानत को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

क्या है पूरा मामला?

मामला जून 2026 में दयालपुर थाना क्षेत्र में दर्ज की गई एक प्राथमिकी से जुड़ा है। प्राथमिकी में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के सामने नियमित जमानत के लिए आवेदन किया। ट्रायल कोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी स्वीकार कर ली और आरोपी को जमानत दे दी।

हालांकि, जमानत दिए जाने से पहले पीड़ित महिला को नोटिस नहीं भेजा गया था। उसे अपनी बात रखने या आरोपी की जमानत का विरोध करने का अवसर भी नहीं मिला।

पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।

उसकी ओर से मुख्य आपत्ति यही थी कि गंभीर यौन अपराध के मामले में आरोपी को नियमित जमानत देने से पहले उसे सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था। हाईकोर्ट के सामने सवाल केवल जमानत के गुण-दोष का नहीं था, बल्कि यह भी था कि क्या पीड़िता को कानून के तहत उपलब्ध सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश क्यों रद्द किया?

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई के समय पीड़ित महिला को आवश्यक नोटिस नहीं दिया गया था।

अदालत ने माना कि ऐसे मामले में पीड़िता को सुनवाई का अवसर मिलना महत्वपूर्ण है। खासकर तब, जब कानून स्वयं कुछ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत आवेदन की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता या उसके अधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति को महत्व देता है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द कर दिया।

लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है और न ही यह कहा है कि उसे हर स्थिति में जेल में रखा जाएगा। अदालत ने केवल यह कहा है कि जमानत आवेदन पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में पीड़िता को भी सुना जाना चाहिए।

अब ट्रायल कोर्ट को पीड़िता को सुनवाई का अवसर देकर जमानत आवेदन पर नए सिरे से फैसला करना होगा।

BNSS की धारा 483(2) का क्या महत्व है?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 483(2) का उल्लेख किया।

यह प्रावधान कुछ निर्धारित यौन अपराधों से संबंधित जमानत आवेदनों की सुनवाई में शिकायतकर्ता या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी से जुड़ा है।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर यौन अपराध के मामले में जमानत पर फैसला लेते समय शिकायतकर्ता की ओर से भी अदालत के सामने अपनी बात रखने का अवसर उपलब्ध हो।

इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी कानूनी प्रावधान को ध्यान में रखते हुए कहा कि पीड़ित महिला को जमानत आवेदन की सुनवाई से बाहर नहीं रखा जा सकता।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आरोपी की जमानत अर्जी पर फैसला होने से पहले पीड़िता को उचित तरीके से सूचना और सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए, जहां कानून ऐसा अधिकार प्रदान करता है।

पीड़िता का अधिकार सिर्फ मुकदमे तक सीमित नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आपराधिक मामलों में पीड़ित के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले का भी उल्लेख किया।

पीठ ने जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गई बातों का संदर्भ लिया। इस मामले में शीर्ष अदालत ने आपराधिक कार्यवाही में पीड़ित की भागीदारी के अधिकार को मान्यता दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों के ऐसे अधिकारों को महत्वपूर्ण और लागू किए जाने योग्य अधिकारों के रूप में देखा था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी न्यायिक दृष्टिकोण को मौजूदा मामले में लागू करते हुए कहा कि पीड़ित महिला को आपराधिक कार्यवाही के महत्वपूर्ण चरणों में अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

इसमें आरोपी की नियमित जमानत की मांग भी शामिल है।

जमानत की सुनवाई में पीड़िता की भूमिका क्या होगी?

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि पीड़िता को सुनवाई का अधिकार मिलने का मतलब यह नहीं है कि जमानत का फैसला स्वतः पीड़िता की इच्छा के आधार पर होगा।

जमानत देना या न देना अंततः अदालत का न्यायिक निर्णय होता है। अदालत आरोपी के खिलाफ आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, जांच की स्थिति, आरोपी के न्याय से भागने की संभावना, गवाहों को प्रभावित करने की आशंका और कानून में निर्धारित अन्य परिस्थितियों पर विचार करती है।

लेकिन गंभीर यौन अपराध से संबंधित मामले में पीड़िता को अपनी आपत्ति और संबंधित तथ्य अदालत के सामने रखने का अवसर मिलना भी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यही वह पहलू है जिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने जोर दिया है।

अब जमानत अर्जी पर दोबारा होगी सुनवाई

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के पहले जमानत आदेश को रद्द करने के बाद मामले को वापस उसी अदालत के पास भेजा है।

ट्रायल कोर्ट को अब आरोपी की नियमित जमानत अर्जी पर नए सिरे से विचार करना होगा।

इस बार पीड़ित महिला को नोटिस दिया जाएगा और उसे अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा। उसके बाद ट्रायल कोर्ट मामले के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करके नया आदेश पारित करेगा।

हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक लंबित रखने के बजाय समय-सीमा भी तय की है।

अदालत ने निर्देश दिया है कि पीड़िता को सुनने के बाद ट्रायल कोर्ट अधिकतम दो सप्ताह के भीतर जमानत आवेदन पर नया निर्णय करे।

इससे मामले में आगे की कानूनी स्थिति जल्द स्पष्ट होने की संभावना है।

क्या आरोपी को तुरंत गिरफ्तार किया जाएगा?

हाईकोर्ट के आदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी से संबंधित है।

हालांकि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई जमानत को रद्द कर दिया, लेकिन उसने आरोपी को तुरंत गिरफ्तार करने का निर्देश नहीं दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ट्रायल कोर्ट जमानत आवेदन पर नए सिरे से निर्णय नहीं कर लेता, तब तक आरोपी को दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

इसका अर्थ यह है कि आरोपी को फिलहाल एक सीमित अंतरिम संरक्षण प्राप्त रहेगा।

ट्रायल कोर्ट अब पीड़िता को सुनने के बाद जमानत आवेदन पर अपना नया फैसला देगा। उस निर्णय के बाद आरोपी की आगे की कानूनी स्थिति तय होगी।

हाईकोर्ट ने समय सीमा क्यों तय की?

जमानत आवेदन को दोबारा सुनने का निर्देश देते हुए हाईकोर्ट ने अधिकतम दो सप्ताह की समय-सीमा निर्धारित की है।

इससे एक तरफ पीड़िता को सुनवाई का अवसर मिलेगा और दूसरी तरफ आरोपी की जमानत स्थिति भी अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रहेगी।

आपराधिक मामलों में जमानत से जुड़े आवेदन का शीघ्र निस्तारण भी महत्वपूर्ण होता है। आरोपी को कानून के तहत उपलब्ध अधिकार और पीड़ित को उपलब्ध सुनवाई का अधिकार—दोनों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने प्रक्रिया को सीमित समय में पूरा करने का निर्देश दिया है।

इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पीड़ित के अधिकारों को आपराधिक न्याय प्रणाली के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में रेखांकित करती है।

अतीत में आपराधिक मुकदमों में मुख्य रूप से अभियोजन और आरोपी के बीच कानूनी लड़ाई पर ध्यान केंद्रित किया जाता था। लेकिन समय के साथ न्यायिक व्यवस्था में पीड़ित की भूमिका और उसके अधिकारों को भी अधिक महत्व मिला है।

पीड़ित व्यक्ति को यह जानने और समझने का अधिकार है कि उसके मामले में क्या हो रहा है। गंभीर अपराधों में उसे संबंधित चरणों पर अपनी बात रखने का अवसर भी कानून और न्यायिक फैसलों के माध्यम से दिया गया है।

मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने जमानत की सुनवाई को भी इसी दृष्टिकोण से देखा है।

क्या हर आपराधिक मामले में यही नियम लागू होगा?

हाईकोर्ट का आदेश उस विशेष कानूनी प्रावधान और मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में आया है।

इसलिए इसे यह कहकर नहीं समझना चाहिए कि हर तरह के आपराधिक मामले में हर जमानत आवेदन पर पीड़ित की मौजूदगी अनिवार्य होगी।

BNSS की धारा 483(2) में जिन मामलों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है, वहां उसका पालन आवश्यक होगा। मामले की प्रकृति और लागू कानून के अनुसार पीड़ित या शिकायतकर्ता को नोटिस और सुनवाई का अधिकार अलग-अलग हो सकता है।

यानी इस फैसले का महत्व मुख्य रूप से उन मामलों में है जहां कानून पीड़ित या शिकायतकर्ता की भागीदारी को विशेष रूप से मान्यता देता है।

आरोपी की अपील का क्या हुआ?

मामले में आरोपी को ट्रायल कोर्ट से मिली नियमित जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पीड़ित महिला ने हाईकोर्ट में दायर की थी।

हाईकोर्ट ने उसकी आपत्ति को स्वीकार करते हुए पाया कि जमानत देने से पहले उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था।

इस प्रक्रिया संबंधी कमी के कारण ट्रायल कोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया गया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपी को तत्काल हिरासत में लेने का आदेश नहीं दिया। अब आगे की प्रक्रिया ट्रायल कोर्ट में होगी, जहां दोनों पक्षों को सुनकर जमानत आवेदन पर नया फैसला किया जाएगा।

पीड़िता के लिए इसका क्या मतलब है?

इस आदेश के बाद पीड़ित महिला को आरोपी की नियमित जमानत अर्जी पर अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा।

वह अदालत के सामने यह बता सकती है कि आरोपी को जमानत दिए जाने से उसे किस प्रकार की आपत्ति या आशंका है। अदालत इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लेकर आरोपी की जमानत अर्जी पर कानून के अनुसार विचार करेगी।

यह प्रक्रिया पीड़िता को अंतिम फैसला तय करने का अधिकार नहीं देती, लेकिन उसकी आवाज को न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा जरूर बनाती है।

यही अंतर इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है।

आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी?

अब मामला ट्रायल कोर्ट के सामने वापस जाएगा।

ट्रायल कोर्ट को पीड़ित महिला को उचित नोटिस देना होगा। इसके बाद उसकी ओर से रखी जाने वाली दलीलों को सुना जाएगा। आरोपी की ओर से भी अपनी जमानत के समर्थन में पक्ष रखा जाएगा।

दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट नया आदेश पारित करेगा।

हाईकोर्ट ने इसके लिए अधिकतम दो सप्ताह की सीमा तय की है।

तब तक आरोपी को दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

नए आदेश के बाद यदि किसी पक्ष को कानूनी आपत्ति होती है, तो कानून के अनुसार आगे की न्यायिक प्रक्रिया उपलब्ध रह सकती है।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश ने दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में पीड़िता के सुनवाई के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि जहां कानून पीड़ित को विशेष अधिकार देता है, वहां आरोपी की नियमित जमानत पर फैसला करते समय पीड़िता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को नियमित जमानत दे दी थी, लेकिन जमानत देने से पहले पीड़ित महिला को नोटिस नहीं दिया गया था। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया।

पीठ ने BNSS की धारा 483(2) और सुप्रीम कोर्ट के जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा फैसले का उल्लेख करते हुए पीड़ित की आपराधिक कार्यवाही में भागीदारी के अधिकार को महत्वपूर्ण माना।

अब ट्रायल कोर्ट को पीड़ित महिला को सुनने के बाद आरोपी की जमानत अर्जी पर नए सिरे से फैसला करना होगा। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को अधिकतम दो सप्ताह में पूरा करने का निर्देश दिया है।

साथ ही हाईकोर्ट ने यह संतुलन भी बनाए रखा कि नए निर्णय तक आरोपी को दोबारा गिरफ्तार न किया जाए।

इस आदेश से एक बात साफ होती है कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया में पीड़ित की भूमिका केवल प्राथमिकी दर्ज कराने या गवाही देने तक सीमित नहीं है। जहां कानून उसे सुनवाई का अधिकार देता है, वहां जमानत जैसे महत्वपूर्ण चरण में भी उसकी बात अदालत के सामने रखी जानी चाहिए। हालांकि अंतिम फैसला जमानत के कानूनी मानकों और मामले के रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ही करेगी।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।