‘अंकल बूढ़े होने तक जेल में रहें’, नाबालिग की गुहार पर जज का भावुक संदेश; दिल्ली हाईकोर्ट ने मुआवजे के साथ पहुंचाने का दिया आदेश
दिल्ली में एक नाबालिग बच्ची के साथ यौन अपराध के मामले में अदालत की कार्यवाही का एक ऐसा हिस्सा सामने आया है, जिसमें कानूनी आदेश के साथ संवेदनशीलता और मानवीय भावनाओं की भी झलक दिखाई देती है। अपने ही परिचित रिश्तेदार द्वारा यौन अपराध की शिकार हुई बच्ची ने अदालत के सामने इच्छा जताई थी कि जिस व्यक्ति को वह कभी ‘अंकल’ कहती थी, उसे तब तक जेल में रखा जाए, जब तक वह बूढ़ा न हो जाए।
बच्ची की इस बात को ट्रायल कोर्ट ने केवल एक पीड़ित की भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में नजरअंदाज नहीं किया। फैसले के अंत में अदालत ने सीधे बच्ची को संबोधित करते हुए एक व्यक्तिगत संदेश लिखा। इस संदेश में अदालत ने उसकी हिम्मत की सराहना की और उसे भरोसा दिलाया कि उसकी बात सुनी गई है।
बाद में दिल्ली हाईकोर्ट के सामने जब दोषी की अपील और सजा पर रोक की मांग से जुड़ा मामला आया, तो हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस संदेश को विशेष महत्व दिया। हाईकोर्ट ने उत्तर-पश्चिम दिल्ली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण यानी DLSA को निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा बच्ची के लिए लिखे गए संदेश को प्रिंट करके उसे या उसके परिवार तक पहुंचाया जाए।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संदेश बच्ची को मिलने वाली मुआवजा राशि के साथ दो सप्ताह के भीतर पहुंचाया जाए।
सात साल की उम्र में हुई थी घटना
मामला 23 जुलाई 2023 की घटना से जुड़ा है। उस समय बच्ची की उम्र महज सात वर्ष थी। मामले की सुनवाई POCSO यानी Protection of Children from Sexual Offences Act के तहत हुई।
ट्रायल कोर्ट के सामने बच्ची ने उस व्यक्ति की पहचान की थी, जिसे वह पहले ‘अंकल’ कहती थी। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी ने बच्ची के साथ गंभीर यौन अपराध किया था और उसे धमकाया भी गया था।
इस घटना के बाद बच्ची ने अपनी मां को घटना के बारे में बताया। मामले की जांच हुई और आरोपी के खिलाफ मुकदमा चला।
यह तथ्य मामले में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यौन अपराधों के मामलों में किसी छोटे बच्चे का घटना के बारे में बोल पाना और अदालत के सामने अपनी बात रखना अपने आप में बेहद कठिन परिस्थिति हो सकती है। ट्रायल कोर्ट ने बच्ची के व्यवहार और उसके बयान को मामले के साक्ष्यों के साथ देखते हुए अपना फैसला सुनाया।
बच्ची ने अदालत से क्या कहा था?
सुनवाई के दौरान बच्ची की ओर से यह इच्छा सामने आई कि जिस व्यक्ति ने उसके साथ अपराध किया, उसे लंबे समय तक जेल में रखा जाए।
उसने अपनी सरल भाषा में कहा था कि ‘अंकल’ को तब तक जेल में रखा जाए, जब तक वह बूढ़ा न हो जाए।
ट्रायल कोर्ट ने इस बात को अपने फैसले के अंतिम हिस्से में जगह दी। आम तौर पर न्यायिक फैसलों में कानूनी प्रावधानों, साक्ष्यों और दलीलों का विस्तृत उल्लेख होता है। लेकिन इस मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-01 (POCSO), रोहिणी, रजनी रंगा ने फैसले के अंत में बच्ची को सीधे संबोधित करते हुए एक अलग संदेश लिखा।
यह संदेश कानूनी आदेश की भाषा से अलग था। इसमें अदालत ने बच्ची को ‘बेटा’ कहकर संबोधित किया और कहा कि कोर्ट ने उसकी बात सुनी है।
अदालत ने उसे यह भरोसा दिलाया कि उसकी आवाज अनसुनी नहीं हुई।
जज ने बच्ची को क्या संदेश दिया?
ट्रायल कोर्ट ने अपने संदेश में बच्ची को बताया कि जब उसने कहा था कि आरोपी को तब तक जेल में रखा जाए जब तक वह बूढ़ा न हो जाए, तब अदालत ने उसकी बात सुनी और उसके अनुरूप निर्णय दिया।
अदालत ने बच्ची को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि दोषी व्यक्ति को उसकी बाकी जिंदगी जेल में बितानी होगी और वह भविष्य में उसे या किसी अन्य बच्चे को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं होगा।
इसके बाद अदालत ने बच्ची की हिम्मत की भी प्रशंसा की।
संदेश में कहा गया कि वह अदालत में आने वाली एक बहादुर बच्ची है, जिसने उस व्यक्ति की पहचान की जिसने उसे चोट पहुंचाई और सच बताया।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि बच्ची चुप नहीं रही। उसने अपनी मां को घटना के बारे में बताया और इसी वजह से मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सकी।
फैसले के इस हिस्से में अदालत ने बच्ची को यह भी कहा कि वह अपना जीवन आगे बढ़ाए, स्कूल जाए, दोस्तों के साथ समय बिताए, हंसे, खेले और अपने सपने देखे।
अदालत ने यह स्वीकार किया कि वह बच्ची को उसका बीता हुआ बचपन वापस नहीं दे सकती, लेकिन उसकी बात सुनी गई है और उसकी शिकायत को गंभीरता से लिया गया है।
हाईकोर्ट ने संदेश को बच्ची तक पहुंचाने का क्यों दिया आदेश?
बाद में मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आपराधिक अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के फैसले के अंतिम हिस्से में लिखे गए इस संदेश पर भी ध्यान दिया।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भुट्ट की पीठ ने निर्देश दिया कि यह संदेश केवल अदालत की फाइल का हिस्सा बनकर न रह जाए।
हाईकोर्ट ने उत्तर-पश्चिम दिल्ली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों को निर्देश दिया कि संदेश को प्रिंट करके बच्ची या उसके परिवार को सौंपा जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि संदेश बच्ची को मिलने वाले मुआवजे के साथ दो सप्ताह के भीतर पहुंचना चाहिए।
इस निर्देश का महत्व इसलिए भी है क्योंकि अदालत ने पीड़ित बच्ची के लिए लिखे गए संदेश को महज न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा न मानकर उसे सीधे बच्ची तक पहुंचाने की व्यवस्था की।
आरोपी को मिली है उम्रकैद जैसी कठोर सजा
ट्रायल कोर्ट ने मामले में आरोपी को POCSO Act के तहत दोषी माना था।
उसे 12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची के साथ गंभीर यौन अपराध के लिए POCSO Act के संबंधित प्रावधानों के तहत कठोर सजा सुनाई गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत ने उसे शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कठोर कारावास की सजा दी।
इसके अलावा आरोपी को एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
आपराधिक धमकी के अपराध के लिए भी उसे दोषी ठहराया गया और पांच वर्ष की कठोर कैद तथा 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।
अदालत ने दोनों सजाओं को एक साथ चलाने का आदेश दिया।
इस तरह मुख्य अपराध के लिए दी गई सजा के कारण आरोपी के लिए जेल से बाहर आने की संभावना बेहद सीमित हो गई है, हालांकि दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ उसकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है।
बच्ची के लिए 10.50 लाख रुपये मुआवजा
ट्रायल कोर्ट ने बच्ची और उसके परिवार को आर्थिक सहायता देने के लिए मुआवजे की राशि भी निर्धारित की थी।
मामले में कुल 10.50 लाख रुपये का मुआवजा तय किया गया।
मुआवजे की राशि तय करते समय अदालत ने बच्ची और उसके परिवार को हुई परेशानी, अपराध की गंभीरता और ऐसी घटना के बच्चे के जीवन पर पड़ने वाले लंबे समय के प्रभाव को ध्यान में रखा।
POCSO मामलों में मुआवजे की व्यवस्था का उद्देश्य केवल आर्थिक भुगतान करना नहीं है। इसका एक उद्देश्य पीड़ित बच्चे को अपराध के बाद आवश्यक सहायता और पुनर्वास उपलब्ध कराने में मदद करना भी है।
इसी संदर्भ में DLSA की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाईकोर्ट ने DLSA से मांगी भुगतान की रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने केवल संदेश पहुंचाने का निर्देश ही नहीं दिया, बल्कि मुआवजा राशि के भुगतान की स्थिति की जानकारी भी मांगी है।
पीठ ने DLSA के सचिव से इस संबंध में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।
इससे अदालत यह देख सकेगी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई मुआवजे की राशि वास्तव में पीड़ित बच्ची या उसके परिवार तक पहुंची है या नहीं।
कई मामलों में अदालत द्वारा मुआवजा तय किए जाने के बाद भी भुगतान की प्रक्रिया में समय लग सकता है। इसलिए हाईकोर्ट ने भुगतान की स्थिति पर रिपोर्ट मांगकर इस पहलू की निगरानी का रास्ता खुला रखा है।
आरोपी ने सजा पर रोक और जमानत की मांग की
हाईकोर्ट के सामने आरोपी की ओर से मुख्य रूप से ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी गई।
अपील के साथ आरोपी ने सजा पर रोक लगाने और जमानत पर रिहा किए जाने की मांग भी की।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस चरण पर आरोपी को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया।
पीठ ने मामले में मौजूद साक्ष्यों को ध्यान में रखा। अदालत के सामने उपलब्ध सामग्री में फोरेंसिक साक्ष्य भी शामिल थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर उपलब्ध सामग्री को देखते हुए सजा पर रोक लगाने का आधार नहीं बनता।
इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी की अपील का अंतिम निर्णय हो चुका है। अपील अभी भी लंबित है और उसके गुण-दोष पर अंतिम निर्णय बाद में होगा।
फिलहाल अदालत ने सजा पर रोक और तत्काल रिहाई की मांग को स्वीकार नहीं किया है।
फोरेंसिक साक्ष्य का भी अदालत ने लिया संज्ञान
मामले में फोरेंसिक साक्ष्य का उल्लेख हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान विशेष रूप से सामने आया।
आपराधिक मामलों में फोरेंसिक साक्ष्य का महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह घटना, आरोपी और पीड़ित के बीच संबंध को किस सीमा तक स्थापित करता है और अन्य साक्ष्यों के साथ उसका क्या संबंध है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए फिलहाल सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाने से इनकार किया।
आगे की अपील में अदालत पूरे रिकॉर्ड, ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों और दोनों पक्षों की दलीलों का विस्तृत परीक्षण करेगी।
अगली सुनवाई कब होगी?
मामले में DLSA की स्टेटस रिपोर्ट से संबंधित अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
वहीं आपराधिक अपील की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027 को होगी।
इस दौरान अदालत के सामने मुआवजा राशि के भुगतान की स्थिति भी आ सकती है। साथ ही अपील से जुड़े कानूनी मुद्दों पर आगे सुनवाई होगी।
फिलहाल ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा प्रभावी है तथा हाईकोर्ट ने इस चरण पर सजा पर रोक लगाने से इनकार किया है।
इस मामले में अदालत का संदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
इस मामले का सबसे अलग पहलू वह संदेश है जो ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में बच्ची के लिए लिखा।
न्यायिक फैसलों में सामान्यतः कानूनी भाषा, साक्ष्यों का विश्लेषण और कानून की धाराओं का उल्लेख होता है। लेकिन बाल यौन अपराध के मामलों में पीड़ित बच्चे की स्थिति केवल कानूनी दस्तावेजों तक सीमित नहीं होती।
ऐसे मामलों में बच्चे को यह महसूस कराना भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि उसकी बात सुनी गई है और उसके साथ हुई घटना को गंभीरता से लिया गया है।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने इसी पहलू को अपने संदेश के माध्यम से सामने रखा।
बच्ची ने जो कहा था, वह किसी कानूनी शब्दावली में नहीं था। उसकी मांग बहुत सीधी थी—जिस व्यक्ति को वह ‘अंकल’ कहती थी, उसे लंबे समय तक जेल में रखा जाए।
अदालत ने उसके इस कथन को अपने फैसले में स्थान दिया और उसे यह भरोसा दिलाया कि न्यायिक प्रक्रिया ने उसकी आवाज सुनी है।
अदालत ने बच्ची के भविष्य पर भी जोर दिया
ट्रायल कोर्ट का संदेश केवल आरोपी की सजा तक सीमित नहीं था।
अदालत ने बच्ची को आगे की जिंदगी जीने के लिए प्रोत्साहित किया। उसे स्कूल जाने, दोस्तों के साथ समय बिताने, खेलने, हंसने और सपने देखने की बात कही गई।
यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी बच्चे के साथ हुआ यौन अपराध उसके जीवन के कई हिस्सों को प्रभावित कर सकता है। न्यायालय अपराध के लिए दोषी व्यक्ति को सजा दे सकता है, मुआवजे का आदेश दे सकता है और कानूनी संरक्षण उपलब्ध करा सकता है, लेकिन बच्चे के अनुभव को पूरी तरह मिटा पाना संभव नहीं होता।
ट्रायल कोर्ट ने अपने संदेश में इसी वास्तविकता को स्वीकार किया कि अदालत बीते हुए बचपन को वापस नहीं कर सकती।
इसके बावजूद उसने बच्ची को यह भरोसा देने की कोशिश की कि उसकी आवाज की अनदेखी नहीं हुई।
POCSO कानून में बच्चे की सुरक्षा का महत्व
POCSO Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। इस कानून में बच्चे की पहचान की सुरक्षा, विशेष न्यायालयों में सुनवाई और बाल-अनुकूल प्रक्रिया जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।
ऐसे मामलों में अदालत के सामने केवल यह प्रश्न नहीं होता कि अपराध सिद्ध हुआ या नहीं। पीड़ित बच्चे की गरिमा, सुरक्षा और पुनर्वास भी महत्वपूर्ण पहलू होते हैं।
मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा बच्ची के लिए लिखा गया व्यक्तिगत संदेश और हाईकोर्ट द्वारा उसे DLSA के माध्यम से बच्ची तक पहुंचाने का निर्देश इसी संवेदनशील न्यायिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
अब मामले में आगे क्या होगा?
मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आरोपी की आपराधिक अपील हाईकोर्ट में लंबित है।
हाईकोर्ट ने इस स्तर पर दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देने वाले आरोपी को तत्काल राहत नहीं दी है। हालांकि, अंतिम फैसला अभी बाकी है।
दूसरी ओर, बच्ची को तय मुआवजा मिलने की स्थिति की भी निगरानी की जा रही है। DLSA के सचिव को इस संबंध में रिपोर्ट पेश करनी होगी।
4 नवंबर को मुआवजे और संदेश से संबंधित स्थिति अदालत के सामने आ सकती है, जबकि 20 जनवरी 2027 को मुख्य अपील पर आगे की सुनवाई प्रस्तावित है।
निष्कर्ष
दिल्ली के इस POCSO मामले में अदालत की कार्यवाही का सबसे उल्लेखनीय पहलू वह संदेश है जो ट्रायल कोर्ट ने पीड़ित बच्ची के लिए अपने फैसले के अंत में लिखा।
सात वर्ष की उम्र में अपराध का सामना करने वाली बच्ची ने अदालत के सामने इच्छा जताई थी कि जिस व्यक्ति को वह ‘अंकल’ कहती थी, उसे तब तक जेल में रखा जाए जब तक वह बूढ़ा न हो जाए। ट्रायल कोर्ट ने उसकी बात को सुना और आरोपी को गंभीर सजा सुनाने के साथ बच्ची को सीधे संबोधित करते हुए उसके साहस की सराहना की।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO Act के तहत शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कठोर कारावास की सजा और एक लाख रुपये का जुर्माना दिया। आपराधिक धमकी के लिए पांच वर्ष की कठोर कैद और 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। दोनों सजाएं साथ चलने का आदेश दिया गया।
बच्ची और उसके परिवार के लिए 10.50 लाख रुपये का मुआवजा भी तय किया गया।
इसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी ने सजा पर रोक और जमानत की मांग की। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों, जिनमें फोरेंसिक सामग्री भी शामिल है, को देखते हुए इस स्तर पर सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
साथ ही हाईकोर्ट ने एक मानवीय पहल करते हुए DLSA को निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट का बच्ची के लिए लिखा संदेश प्रिंट करके उसे या उसके परिवार तक पहुंचाया जाए। यह संदेश मुआवजे की राशि के साथ दो सप्ताह के भीतर पहुंचाने का निर्देश दिया गया है।
मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को DLSA की रिपोर्ट के संबंध में और 20 जनवरी 2027 को आपराधिक अपील के संबंध में होगी।
यह मामला इस बात को भी रेखांकित करता है कि बाल यौन अपराधों में न्याय केवल सजा सुनाने तक सीमित नहीं रहता। पीड़ित बच्चे की आवाज सुनना, उसकी गरिमा बनाए रखना, उसे मुआवजा उपलब्ध कराना और उसके भविष्य के प्रति भरोसा पैदा करना भी न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।