पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल में देरी से सुप्रीम कोर्ट नाराज, FSSAI से पूछा- 2022 से अब तक क्या किया?
पैकेज्ड फूड में चीनी, नमक और फैट की अधिक मात्रा को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने की प्रस्तावित व्यवस्था में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI से कड़े सवाल पूछे हैं। अदालत ने कहा कि जब मुद्दा सीधे तौर पर आम लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है, तब इस प्रक्रिया में इतना लंबा समय क्यों लग रहा है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान FSSAI की प्रस्तावित पहल को सकारात्मक बताया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल प्रस्ताव तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने नियामक से यह जानना चाहा कि जब इस विषय पर काम वर्ष 2022 से चल रहा था, तो अब तक इसे लागू करने की दिशा में ठोस प्रगति क्यों नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला पैकेज्ड फूड पर Front-of-Pack Labelling यानी FoPL को अनिवार्य करने की मांग से जुड़ा है। याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है।
सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है।
क्या है पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल का पूरा मामला?
बाजार में बिकने वाले कई पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी जानकारी पीछे की तरफ दी जाती है। इसमें चीनी, नमक, फैट, कैलोरी और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा से संबंधित जानकारी शामिल होती है।
हालांकि, सामान्य उपभोक्ता के लिए छोटे अक्षरों में दी गई पोषण संबंधी जानकारी को पढ़कर किसी उत्पाद की पूरी तस्वीर समझना हमेशा आसान नहीं होता। इसी वजह से कई वर्षों से पैकेट के सामने की तरफ ऐसी स्पष्ट जानकारी या चेतावनी देने की मांग की जा रही है, जिसे ग्राहक खरीदारी के समय तुरंत देख सके।
इसे ही Front-of-Pack Labelling (FoPL) कहा जाता है।
इस व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि यदि किसी खाद्य पदार्थ में चीनी, नमक या फैट की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है, तो उपभोक्ता को यह जानकारी पैकेट के सामने ही स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए।
मौजूदा मामले में FSSAI ने अदालत को बताया है कि उसने अब एक नए प्रकार के चेतावनी लेबल का प्रस्ताव तैयार किया है।
क्या है नया हेक्सागोनल चेतावनी लेबल?
FSSAI की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब पैकेज्ड फूड के लिए एक षट्कोणीय यानी Hexagonal Warning Label प्रस्तावित किया गया है।
इस लेबल में लाल रंग के षट्कोणीय चेतावनी चिन्ह का इस्तेमाल किया जाना प्रस्तावित है। इसके लिए सफेद चौकोर पृष्ठभूमि का भी प्रस्ताव रखा गया है।
इसका उद्देश्य ऐसे पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के बारे में उपभोक्ता को सामने से जानकारी देना है जिनमें चीनी, नमक या फैट की मात्रा अधिक निर्धारित की गई हो।
इस तरह की चेतावनी का मकसद उपभोक्ता को यह जानकारी खरीदारी के समय ही उपलब्ध कराना है, ताकि वह केवल विज्ञापन या उत्पाद की पैकिंग देखकर निर्णय न ले, बल्कि उसमें मौजूद पोषण संबंधी तत्वों को भी ध्यान में रख सके।
यह प्रस्ताव पहले इस्तेमाल की गई स्टार-रेटिंग व्यवस्था से अलग है।
2022 की स्टार-रेटिंग व्यवस्था और अब के प्रस्ताव में अंतर
FSSAI ने अदालत को बताया कि वर्ष 2022 में जिस Health Star Rating प्रणाली को लेकर चर्चा और प्रक्रिया शुरू हुई थी, उसके मानक मौजूदा प्रस्ताव से अलग थे।
स्टार-रेटिंग मॉडल में किसी उत्पाद को उसकी पोषण संरचना के आधार पर एक रेटिंग देने का विचार था। दूसरी ओर, वर्तमान प्रस्ताव में अधिक चीनी, नमक या फैट वाले उत्पाद पर सामने से स्पष्ट चेतावनी देने की व्यवस्था प्रस्तावित है।
दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य उपभोक्ता को खाद्य उत्पाद की पोषण संबंधी स्थिति के बारे में जानकारी उपलब्ध कराना है, लेकिन लेबलिंग का तरीका अलग है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसी व्यापक प्रक्रिया में लग रहे समय को लेकर सामने आई।
सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI की प्रस्तावित पहल पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि प्राधिकरण इस व्यवस्था को लागू करने की दिशा में काम कर रहा है तो इसमें इतना अधिक समय क्यों लग रहा है।
पीठ ने विशेष रूप से इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि इस विषय पर वर्ष 2022 से काम किए जाने की बात कही गई है।
अदालत ने सवाल किया कि यदि प्रक्रिया इतने पहले शुरू हो चुकी थी, तो पिछले वर्षों में क्या प्रगति हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित एक साल की स्वैच्छिक अनुपालन अवधि पर भी सवाल उठाया।
अदालत के सामने सवाल यह था कि यदि चेतावनी लेबल का उद्देश्य उपभोक्ता स्वास्थ्य से जुड़ा है, तो कंपनियों को इसे अनिवार्य रूप से लागू करने से पहले एक वर्ष की स्वैच्छिक अवधि देने की आवश्यकता क्यों है।
पीठ ने यह भी पूछा कि एक बार फिर आपत्तियां और सुझाव मांगने की प्रक्रिया शुरू करने में कितना समय लगेगा।
FSSAI ने अदालत को क्या बताया?
FSSAI की ओर से अदालत को बताया गया कि नए नियमों का ड्राफ्ट तैयार करने और उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में लगभग चार महीने का समय लग सकता है।
प्रस्तावित नियमों को अंतिम रूप देने से पहले उन्हें सार्वजनिक किया जाएगा। इसके लिए लगभग 60 दिनों की अवधि रखे जाने की बात कही गई।
इस अवधि के दौरान संबंधित घरेलू हितधारकों को अपने सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर मिलेगा।
इसके अलावा, विश्व व्यापार संगठन यानी WTO के स्तर पर भी आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
FSSAI की ओर से यह भी बताया गया कि अधिसूचना जारी होने के बाद खाद्य कंपनियों को आवश्यक बदलाव करने के लिए एक वर्ष की स्वैच्छिक अनुपालन अवधि देने का प्रस्ताव है।
यानी प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार पहले नियमों का ड्राफ्ट सार्वजनिक होगा, फिर सुझाव और आपत्तियां ली जाएंगी, उसके बाद नियमों को अंतिम रूप दिया जाएगा और अधिसूचना जारी होने के पश्चात कंपनियों को बदलाव के लिए समय दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट को किस बात पर आपत्ति है?
अदालत की आपत्ति मूल रूप से प्रक्रिया की लंबाई को लेकर दिखाई दी।
FSSAI का कहना है कि नियम बनाने के लिए निर्धारित कानूनी और अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है। दूसरी तरफ अदालत यह देख रही है कि उपभोक्ता स्वास्थ्य से जुड़े विषय में इन प्रक्रियाओं को पूरा करने में कितना समय लग रहा है।
पीठ ने यह संकेत दिया कि यदि इस विषय पर काम वर्ष 2022 से चल रहा है, तो अब तक नियमों को अंतिम रूप देने की दिशा में पर्याप्त प्रगति हो जानी चाहिए थी।
अदालत ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया कि इतने वर्षों के बाद फिर से नई आपत्तियां और सुनवाई की प्रक्रिया शुरू करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
यहां अदालत का फोकस केवल लेबल के डिजाइन पर नहीं, बल्कि पूरी नियामक प्रक्रिया की गति और प्रभावशीलता पर है।
याचिका किसने दाखिल की?
यह मामला 3S and Our Health Society नामक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट की याचिका से जुड़ा है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि केंद्र और राज्य सरकारों को पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर Front-of-Pack Labelling को अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से खाद्य उत्पादों में अधिक मात्रा में मौजूद चीनी, नमक और फैट के संबंध में उपभोक्ताओं को स्पष्ट चेतावनी देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
याचिका का व्यापक उद्देश्य यह है कि उपभोक्ता को किसी खाद्य उत्पाद की पोषण संबंधी स्थिति की जानकारी पैकेट खोलने या पीछे दिए गए छोटे अक्षरों को पढ़ने से पहले ही मिल जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है Front-of-Pack Labelling?
किसी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ को खरीदते समय उपभोक्ता के सामने कई तरह के दावे होते हैं। पैकेट पर उत्पाद की ब्रांडिंग, स्वाद, गुणवत्ता और अन्य विशेषताओं को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता है।
इसके मुकाबले पोषण संबंधी जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे दी जाती है।
Front-of-Pack Labelling का विचार इसी अंतर को कम करने का है।
यदि पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी उपलब्ध हो तो उपभोक्ता को उत्पाद के पोषण संबंधी कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी तुरंत मिल सकती है।
मसलन, यदि किसी उत्पाद में निर्धारित सीमा से अधिक चीनी या नमक है, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत उस संबंध में सामने चेतावनी दिखाई जा सकती है।
इसका सीधा संबंध उपभोक्ता की जानकारी और खाद्य विकल्पों से है।
कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?
यदि प्रस्तावित व्यवस्था अंतिम रूप से लागू होती है, तो पैकेज्ड खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियों को अपने पैकेट के डिजाइन में बदलाव करना पड़ सकता है।
उन्हें निर्धारित मानकों के अनुसार सामने की तरफ चेतावनी चिन्ह प्रदर्शित करना होगा।
इसका प्रभाव उत्पाद की पैकेजिंग, प्रिंटिंग, डिजाइन और संभवतः बाजार में उपलब्ध पुराने स्टॉक पर भी पड़ सकता है।
इसीलिए कंपनियों को प्रस्तावित नियमों के तहत तैयारी के लिए समय देने की बात FSSAI की ओर से कही गई है।
एक वर्ष की प्रस्तावित स्वैच्छिक अवधि का उद्देश्य भी कंपनियों को आवश्यक बदलावों के लिए समय देना बताया गया है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसी अवधि को लेकर सवाल उठाया है कि उपभोक्ता स्वास्थ्य से जुड़े मामले में एक वर्ष तक स्वैच्छिक अनुपालन की आवश्यकता क्यों है।
WTO प्रक्रिया का भी उल्लेख
FSSAI ने अदालत को यह भी बताया कि नियमों को अंतिम रूप देने से पहले WTO के मंच पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जानी है।
तकनीकी नियमों और व्यापार से जुड़े कुछ मामलों में WTO के सदस्य देशों को प्रस्तावित नियमों के संबंध में जानकारी देने और टिप्पणियां प्राप्त करने की प्रक्रिया होती है।
FSSAI ने इसी प्रक्रिया को प्रस्तावित समय-सीमा के एक हिस्से के रूप में अदालत के सामने रखा।
इससे स्पष्ट है कि नियमों को लागू करने से पहले केवल घरेलू स्तर की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि संबंधित अंतरराष्ट्रीय दायित्वों और प्रक्रियाओं को भी ध्यान में रखा जा रहा है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले समय को लेकर अपनी चिंता दर्ज की है।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है।
इसका अर्थ है कि अदालत ने फिलहाल तत्काल कोई अंतिम निर्देश जारी नहीं किया है और अब मामले पर आदेश बाद में सुनाया जाएगा।
अदालत के आगामी आदेश से यह स्पष्ट हो सकता है कि FSSAI को प्रस्तावित चेतावनी लेबल व्यवस्था को लेकर क्या कदम उठाने होंगे और सरकार को किस समय-सीमा में आगे बढ़ना होगा।
यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अदालत प्रस्तावित एक वर्ष की स्वैच्छिक अनुपालन अवधि के संबंध में क्या रुख अपनाती है।
क्या तुरंत लागू हो जाएगा नया चेतावनी लेबल?
फिलहाल ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पैकेज्ड फूड के सभी उत्पादों पर नया हेक्सागोनल चेतावनी लेबल तुरंत लगना शुरू हो जाएगा।
FSSAI की ओर से अदालत में प्रस्तावित प्रक्रिया और समय-सीमा बताई गई है। अभी ड्राफ्ट नियमों को सार्वजनिक किए जाने, सुझाव और आपत्तियां प्राप्त करने तथा उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया बाकी है।
इसके बाद अधिसूचना और अनुपालन से जुड़े चरण आएंगे।
इसलिए वर्तमान स्थिति में यह कहना अधिक सही है कि हेक्सागोनल चेतावनी लेबल एक प्रस्तावित नियामक व्यवस्था है, जिसके अंतिम स्वरूप और लागू होने की समय-सीमा पर आगे की प्रक्रिया निर्भर करेगी।
उपभोक्ताओं के लिए क्यों अहम है यह मामला?
पैकेज्ड फूड को लेकर उपभोक्ता अक्सर उत्पाद की कीमत, स्वाद और ब्रांड को देखकर खरीदारी करते हैं। पोषण संबंधी जानकारी पैकेट पर मौजूद होने के बावजूद उसे समझना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता।
Front-of-Pack Warning Label इसी जानकारी को सरल और प्रमुख बनाने की कोशिश है।
यदि अंतिम नियमों में ऐसी व्यवस्था लागू होती है तो उपभोक्ता को उत्पाद खरीदने से पहले ही यह संकेत मिल सकता है कि उसमें चीनी, नमक या फैट की मात्रा निर्धारित मानकों के अनुसार अधिक है।
हालांकि, चेतावनी लेबल का उद्देश्य किसी उत्पाद को अपने आप “अच्छा” या “खराब” घोषित करना नहीं होगा। इसका प्रमुख उद्देश्य उपभोक्ता को महत्वपूर्ण पोषण संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराना है, ताकि वह अपने निर्णय के लिए उस जानकारी का इस्तेमाल कर सके।
निष्कर्ष
पैकेज्ड फूड के सामने चेतावनी लेबल लगाने का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुका है। FSSAI ने अदालत को बताया है कि अधिक चीनी, नमक और फैट वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के लिए लाल रंग के षट्कोणीय चेतावनी चिन्ह का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
प्रस्तावित प्रक्रिया के अनुसार नियमों के ड्राफ्ट को 60 दिनों तक सार्वजनिक किया जाएगा और घरेलू हितधारकों के साथ WTO स्तर पर भी आवश्यक सुझाव और आपत्तियां ली जाएंगी। इसके बाद नियमों को अंतिम रूप देने में लगभग चार महीने लगने की बात FSSAI ने अदालत को बताई है। अधिसूचना के बाद कंपनियों को एक वर्ष की स्वैच्छिक अनुपालन अवधि देने का भी प्रस्ताव है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसी समय-सीमा पर सवाल उठाया है। पीठ ने पूछा कि जब यह प्रक्रिया वर्ष 2022 से चल रही है और मामला सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा है, तो इसे पूरा करने में इतना समय क्यों लग रहा है।
अब दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। आने वाला आदेश यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर Front-of-Pack Warning Label लागू करने की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और FSSAI को इसे लेकर कितनी तेजी से कार्रवाई करनी होगी।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि नया हेक्सागोनल चेतावनी लेबल अभी प्रस्तावित व्यवस्था है; इसके अंतिम रूप, अधिसूचना और लागू होने की तारीख पर आगे की कानूनी और नियामक प्रक्रिया के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।