चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायत पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार को 3 सप्ताह में SOP बनाने का निर्देश; किसान दुर्घटना योजना पर भी अहम टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही से जुड़ी शिकायतों की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने पाया कि प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों की जांच के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद होने के बावजूद ऐसी स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं है, जिससे कोई पीड़ित व्यक्ति यह आसानी से जान सके कि अपनी शिकायत सबसे पहले किस अधिकारी के सामने दर्ज कराए।
अदालत ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने की स्पष्ट प्रक्रिया और नामित अधिकारी की व्यवस्था न होने के कारण पीड़ित व्यक्ति को अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। इस स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायतों को दर्ज करने और उनकी जांच की प्रक्रिया के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया यानी Standard Operating Procedure (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने सरकार को यह SOP तीन सप्ताह के भीतर कोर्ट के समक्ष पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी।
इसी बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना से जुड़े एक अन्य मामले में भी महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी परिवार में एक अभिभावक की दुर्घटना में मृत्यु के बाद योजना के तहत पांच लाख रुपये का मुआवजा मिल चुका है, तो दूसरे अभिभावक की बाद में हुई दुर्घटना में मृत्यु के मामले में केवल इस आधार पर नया दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
दोनों मामलों में हाईकोर्ट ने सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लागू करने के तरीके से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर ध्यान आकर्षित किया है।
चिकित्सकीय लापरवाही के मामले में क्या है पूरा विवाद?
चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप वाले मामलों में पीड़ित या उसके परिवार के सामने अक्सर सबसे पहली समस्या यह होती है कि शिकायत किस अधिकारी या संस्था के पास की जाए।
किसी मरीज की उपचार के दौरान मृत्यु हो जाने या गंभीर नुकसान होने के बाद परिवार यह आरोप लगा सकता है कि डॉक्टर या अस्पताल की ओर से इलाज में लापरवाही बरती गई। लेकिन केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं होता। ऐसे मामलों में यह तय करने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकीय राय की आवश्यकता होती है कि वास्तव में उपचार में निर्धारित चिकित्सकीय मानकों का पालन हुआ था या नहीं।
यही कारण है कि चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायतों की जांच सामान्य प्रशासनिक शिकायतों की तरह नहीं की जा सकती। मामले की प्रकृति को देखते हुए विशेषज्ञ चिकित्सकों या मेडिकल बोर्ड की राय महत्वपूर्ण हो जाती है।
एकांश वर्मा की याचिका की सुनवाई के दौरान यही पूरा मुद्दा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने आया।
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से क्या बताया गया?
याचिका पर सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष अदालत में उपस्थित हुए।
सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता कार्तिकेय सरन ने उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी, प्रयागराज डॉ. अभिषेक सिंह का हलफनामा कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया।
हलफनामे में सरकार की ओर से बताया गया कि प्रदेश में चिकित्सकीय संस्थानों और उनसे संबंधित मामलों के लिए Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 तथा उत्तर प्रदेश Clinical Establishments Rules, 2019 लागू हैं।
सरकार के अनुसार, चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की जांच के लिए सक्षम चिकित्सा विशेषज्ञों की राय लेने का प्रावधान मौजूद है। परिस्थितियों के अनुसार मामले को जिला मेडिकल बोर्ड और आवश्यक होने पर राज्य मेडिकल बोर्ड के समक्ष भी भेजा जा सकता है।
यानी सरकार की ओर से अदालत को यह बताया गया कि चिकित्सकीय लापरवाही की जांच के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है।
लेकिन अदालत का सवाल कुछ अलग था।
हाईकोर्ट ने किस कमी को गंभीर माना?
हाईकोर्ट ने यह देखा कि कानून और नियमों में मेडिकल विशेषज्ञों या मेडिकल बोर्ड से जांच कराने की व्यवस्था होने के बावजूद शिकायत दर्ज कराने के शुरुआती चरण को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
सबसे अहम सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके परिवार के सदस्य के इलाज में चिकित्सकीय लापरवाही हुई है, तो वह सबसे पहले अपनी शिकायत लेकर किस नामित अधिकारी के पास जाए?
यदि यह स्पष्ट नहीं है कि शिकायत किस अधिकारी के पास दाखिल होगी, कौन अधिकारी उसे स्वीकार करेगा और किस समय सीमा में उसे संबंधित मेडिकल बोर्ड या सक्षम प्राधिकारी के सामने भेजा जाएगा, तो कानून में मौजूद व्यवस्था का व्यावहारिक लाभ पीड़ित को नहीं मिल पाता।
हाईकोर्ट ने इसी स्थिति पर चिंता जताई।
अदालत के अनुसार, स्पष्ट और बाध्यकारी प्रक्रिया के अभाव में पीड़ित व्यक्ति अलग-अलग अधिकारियों और विभागों के पास शिकायत लेकर जाने के लिए मजबूर हो सकता है। इससे शिकायत के निस्तारण में देरी हो सकती है और अंततः व्यक्ति न्याय पाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
पीड़ित को क्यों भटकना पड़ता है?
चिकित्सकीय लापरवाही का मामला सामान्य शिकायत से अलग होता है। इसमें अक्सर मरीज की मेडिकल फाइल, जांच रिपोर्ट, प्रिस्क्रिप्शन, ऑपरेशन रिकॉर्ड, डिस्चार्ज समरी और अन्य चिकित्सकीय दस्तावेज महत्वपूर्ण होते हैं।
कई मामलों में मरीज या उसके परिवार के पास इन दस्तावेजों की पूरी जानकारी भी नहीं होती। ऐसे में यदि शिकायत की प्रक्रिया भी अस्पष्ट हो, तो समस्या और बढ़ जाती है।
पीड़ित परिवार को यह जानकारी होनी चाहिए कि:
- शिकायत किस अधिकारी को देनी है;
- शिकायत के साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाने हैं;
- शिकायत मिलने के बाद अधिकारी क्या कार्रवाई करेगा;
- मेडिकल बोर्ड का गठन कैसे होगा;
- जांच कितने समय में पूरी की जानी है;
- विशेषज्ञों की राय कैसे ली जाएगी;
- जांच रिपोर्ट किस अधिकारी को भेजी जाएगी;
- और शिकायतकर्ता को अंतिम निर्णय की जानकारी कैसे दी जाएगी।
हाईकोर्ट की चिंता इसी प्रशासनिक स्पष्टता को लेकर है।
सरकार को SOP बनाने का निर्देश
अदालत ने इस समस्या के समाधान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को स्पष्ट दिशा दी है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायत दर्ज कराने और उनकी जांच के लिए SOP तैयार करने का निर्देश दिया है।
इस SOP में यह स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता होगी कि शिकायत की शुरुआत कहां से होगी और उसके बाद जांच किस स्तर पर जाएगी।
सरकार को तीन सप्ताह के भीतर तैयार SOP अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी है।
इस मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी। उस तारीख पर सरकार द्वारा तैयार की गई प्रक्रिया को अदालत के सामने रखा जा सकता है और हाईकोर्ट यह देख सकता है कि प्रस्तावित व्यवस्था पीड़ितों के लिए पर्याप्त रूप से स्पष्ट और प्रभावी है या नहीं।
मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना पर भी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना से संबंधित एक अलग मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
यह योजना किसानों और उनके परिवारों को दुर्घटना के कारण होने वाली मृत्यु या अन्य निर्धारित परिस्थितियों में आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से संचालित की जाती है।
मामले में विवाद इस बात को लेकर था कि यदि किसी परिवार के एक अभिभावक की मृत्यु के बाद योजना के तहत पांच लाख रुपये की सहायता पहले ही मिल चुकी है, तो क्या दूसरे अभिभावक की बाद में हुई दुर्घटना में मृत्यु के बाद दोबारा योजना का लाभ दिया जा सकता है?
सरकारी अधिकारियों ने पहले दिए जा चुके पांच लाख रुपये के लाभ को आधार बनाते हुए दूसरे दावे को स्वीकार नहीं किया था।
याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को चुनौती दी।
दूसरे अभिभावक की मृत्यु पर दावा क्यों खारिज किया गया?
मामले की परिस्थितियों के अनुसार परिवार में पहले एक अभिभावक की मृत्यु हुई थी। उस मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की गई।
इसके बाद परिवार के दूसरे अभिभावक की भी दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
दूसरी दुर्घटना के बाद परिवार की ओर से योजना के तहत मुआवजे का दावा किया गया। लेकिन अधिकारियों ने पहले ही पांच लाख रुपये की सहायता दिए जाने को आधार बनाकर दूसरे दावे को स्वीकार नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं और दूसरे अभिभावक की मृत्यु भी योजना के अंतर्गत आने वाली दुर्घटना की श्रेणी में है। इसलिए केवल इसलिए दूसरा दावा समाप्त नहीं किया जा सकता कि परिवार को पहले अभिभावक की मृत्यु पर सहायता मिल चुकी है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
लखनऊ खंडपीठ ने योजना के प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक पात्र दुर्घटना मृत्यु को उसके अपने तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
यदि योजना के तहत परिवार का कोई व्यक्ति पात्र था और उसकी दुर्घटना में मृत्यु हुई, तो केवल पूर्व में किसी अन्य पात्र व्यक्ति की मृत्यु पर सहायता मिल जाने के आधार पर बाद के दावे को स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि पहले और दूसरे अभिभावक की मृत्यु दो अलग-अलग घटनाएं हैं। यदि दोनों घटनाएं योजना में निर्धारित पात्रता की शर्तों को पूरा करती हैं, तो केवल पहले दिए गए लाभ को दूसरे दावे को अस्वीकार करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर दूसरे दावे पर स्वतः पांच लाख रुपये का भुगतान हो जाएगा। दूसरे दावे में भी योजना की अन्य पात्रता शर्तों को पूरा करना आवश्यक होगा।
योजना का लाभ व्यक्ति और घटना की पात्रता से जुड़ा
अदालत की इस टिप्पणी को समझने के लिए योजना के उद्देश्य और पात्रता के बीच अंतर करना जरूरी है।
किसी परिवार को पहले सहायता मिल चुकी है, यह अपने आप में यह साबित नहीं करता कि भविष्य में परिवार के किसी अन्य पात्र सदस्य की दुर्घटना मृत्यु पर योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता।
दूसरे शब्दों में, प्रशासन को प्रत्येक दावे की स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी। यह देखना होगा कि संबंधित मृत्यु वास्तव में दुर्घटना के कारण हुई या नहीं, मृतक योजना के अंतर्गत पात्र था या नहीं और दावा अन्य निर्धारित शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
केवल पहले भुगतान का हवाला देकर बाद के दावे को रोक देना पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
दोनों मामलों से क्या संदेश निकलता है?
चिकित्सकीय लापरवाही वाले मामले में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक प्रक्रिया की स्पष्टता पर जोर दिया है। अदालत ने यह माना कि कानून में जांच के लिए मेडिकल बोर्ड आदि की व्यवस्था होने के बावजूद शिकायतकर्ता को शुरुआती स्तर पर स्पष्ट मार्ग उपलब्ध होना चाहिए।
वहीं, मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना वाले मामले में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी योजना का लाभ तय करते समय प्रत्येक पात्र घटना और दावे की परिस्थितियों को देखा जाना चाहिए।
दोनों मामलों में एक समान पहलू यह है कि केवल कागज पर व्यवस्था होना पर्याप्त नहीं है। उसका ऐसा क्रियान्वयन भी जरूरी है जिससे आम व्यक्ति को अपने अधिकार या शिकायत के लिए उचित प्रक्रिया का पता चल सके।
अब आगे क्या होगा?
चिकित्सकीय लापरवाही से संबंधित मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को तीन सप्ताह के भीतर SOP तैयार करके हाईकोर्ट में पेश करनी है। अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी। उस समय अदालत प्रस्तावित प्रक्रिया की समीक्षा कर सकती है और आवश्यकता होने पर उसमें और निर्देश दे सकती है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना से जुड़े मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण होगी जहां परिवार में अलग-अलग समय पर एक से अधिक पात्र सदस्यों की दुर्घटना में मृत्यु हुई हो।
हालांकि प्रत्येक दावे का निर्णय संबंधित योजना के प्रावधानों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर होगा। हाईकोर्ट की टिप्पणी को बिना मामले की परिस्थितियां देखे हर दावे पर स्वतः लागू मानना उचित नहीं होगा।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायतों को लेकर उत्तर प्रदेश में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कमी की ओर ध्यान दिलाया है। अदालत ने सरकार से ऐसी SOP बनाने को कहा है जिससे पीड़ित को शुरुआत से ही यह पता रहे कि शिकायत कहां करनी है और उसके बाद जांच किस प्रक्रिया से आगे बढ़ेगी।
फिलहाल प्रदेश में मेडिकल विशेषज्ञों, जिला मेडिकल बोर्ड और आवश्यक मामलों में राज्य मेडिकल बोर्ड के माध्यम से जांच की व्यवस्था का उल्लेख सरकार ने अदालत के सामने किया है। लेकिन हाईकोर्ट चाहता है कि इस पूरी प्रक्रिया को व्यावहारिक और स्पष्ट बनाया जाए, ताकि शिकायतकर्ता को अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।
दूसरे मामले में मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना को लेकर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार के एक अभिभावक की मृत्यु पर पांच लाख रुपये का लाभ मिल जाने मात्र से दूसरे अभिभावक की बाद की दुर्घटना मृत्यु का दावा स्वतः समाप्त नहीं किया जा सकता। दूसरे दावे की पात्रता को उसके अपने तथ्यों और योजना के प्रावधानों के आधार पर जांचना होगा।
इस तरह दोनों मामलों में हाईकोर्ट की टिप्पणियां आम नागरिक के लिए महत्वपूर्ण हैं—एक तरफ चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायत के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तैयार करने पर जोर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ दुर्घटना राहत योजना में पात्र दावों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।