हर्ष फायरिंग मामले में विधायक राजू कुमार सिंह को बड़ा झटका, दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि पर रोक लगाने से किया इनकार
दिल्ली के चर्चित हर्ष फायरिंग मामले में बिहार के साहेबगंज विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे राजू कुमार सिंह की मुश्किलें फिलहाल पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी चार वर्ष की सजा पर पहले ही अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन दोषसिद्धि यानी ट्रायल कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाने की मांग पर तत्काल राहत नहीं दी है। हाईकोर्ट ने इस पहलू पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है और मृतका के परिवार को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है।
यह मामला वर्ष 2018 की उस नववर्ष पार्टी से जुड़ा है, जिसमें दक्षिण दिल्ली के फतेहपुर बेरी इलाके के एक फार्महाउस में गोली चली थी और 45 वर्षीय अर्चना गुप्ता की मौत हो गई थी। राउज एवेन्यू स्थित विशेष अदालत ने जून 2026 में राजू कुमार सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 पार्ट-II और आर्म्स एक्ट की धारा 30 के तहत दोषी ठहराया था। इसके बाद 4 जुलाई 2026 को उन्हें चार वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनाई गई। अदालत ने मृतका के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया था।
31 दिसंबर 2018 की रात क्या हुआ था?
मामले की शुरुआत 31 दिसंबर 2018 की रात से होती है। दक्षिण दिल्ली के फतेहपुर बेरी इलाके में एक फार्महाउस पर नए साल के स्वागत के लिए पार्टी आयोजित की गई थी। पार्टी में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। इसी दौरान कथित तौर पर फायरिंग की गई।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, फायरिंग के दौरान एक गोली अर्चना गुप्ता को लगी। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी हालत गंभीर थी। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक अर्चना गुप्ता 45 वर्ष की थीं और उनके पति का नाम विकास गुप्ता था।
मामले की जांच के बाद राजू कुमार सिंह के खिलाफ मुकदमा चला। बाद में दिल्ली की विशेष अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर उन्हें दोषी माना।
ट्रायल कोर्ट के 97 पृष्ठों के फैसले में अदालत ने फायरिंग की परिस्थितियों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और अन्य साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने निष्कर्ष दर्ज किया कि अर्चना गुप्ता को लगी जानलेवा गोली से ठीक पहले फायरिंग करने वाला व्यक्ति राजू कुमार सिंह था।
ट्रायल कोर्ट ने किस आधार पर दोषी ठहराया?
राजू कुमार सिंह को IPC की धारा 304 पार्ट-II के तहत दोषी ठहराया गया। यह प्रावधान ऐसे गैर-इरादतन मानव वध से संबंधित है जिसमें मृत्यु कारित करने या ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने की संभावना का ज्ञान हो, लेकिन मामला हत्या की श्रेणी में न आता हो।
इसके अलावा उन्हें Arms Act की धारा 30 के तहत भी दोषी माना गया। ट्रायल कोर्ट ने फायरिंग में इस्तेमाल हथियार और उसके लाइसेंस से जुड़े नियमों को भी मामले का हिस्सा माना।
विशेष अदालत ने 4 जुलाई 2026 को धारा 304 पार्ट-II के तहत चार वर्ष की साधारण कैद और Arms Act के तहत दो महीने की सजा सुनाई। दोनों सजाओं को साथ-साथ चलाने का निर्देश दिया गया। इसके साथ 25 लाख रुपये की राशि मृतका के पति को मुआवजे के रूप में देने का आदेश भी दिया गया।
चार साल की सजा के बाद हाईकोर्ट पहुंचे राजू कुमार सिंह
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ राजू कुमार सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की। इसके साथ उन्होंने सजा को निलंबित करने और दोषसिद्धि पर भी रोक लगाने की मांग की।
यहां दो कानूनी पहलुओं को अलग-अलग समझना जरूरी है।
पहला—सजा का निलंबन। इसका मतलब है कि अपील लंबित रहने के दौरान ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई जेल की सजा को फिलहाल लागू न किया जाए।
दूसरा—दोषसिद्धि पर रोक। इसका मतलब है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषी ठहराए जाने के निष्कर्ष के प्रभाव को भी अंतरिम तौर पर रोक दिया जाए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई में सजा को निलंबित कर दिया था, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक का प्रश्न अलग रखा गया। यही कारण है कि विधायक को जेल से राहत मिलने के बावजूद दोषसिद्धि का मामला अभी न्यायिक विचार के अधीन है।
27 जुलाई को हाईकोर्ट ने सजा पर लगाई थी रोक
27 जुलाई 2026 के आदेश में न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने राजू कुमार सिंह की सजा को निलंबित किया था। अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि वह लगभग दो महीने और 22 दिन हिरासत में रह चुके थे और अपील पर निकट भविष्य में अंतिम सुनवाई होने की संभावना नहीं थी।
हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चार वर्ष की सजा को अपील के लंबित रहने के दौरान निलंबित कर दिया।
उन्हें 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक स्थानीय जमानतदार के साथ रिहा करने का निर्देश दिया गया। साथ ही उन्हें अपना मोबाइल नंबर जांच अधिकारी को उपलब्ध कराने और अपील के निस्तारण तक उसे चालू रखने की शर्त भी लगाई गई।
इस आदेश का अर्थ यह नहीं था कि ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि खत्म हो गई। केवल सजा के क्रियान्वयन को फिलहाल रोक दिया गया था।
25 लाख रुपये जमा करने का भी निर्देश
हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान राजू कुमार सिंह की ओर से यह कहा गया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा मृतका के परिवार को दिए गए 25 लाख रुपये के मुआवजे की राशि हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराई जाएगी।
आदेश में कहा गया कि राशि जमा होने के बाद मृतका का परिवार उसे निकाल सकता है, भले ही आगे अपील का अंतिम परिणाम कुछ भी हो। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि पीड़ित परिवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अदालत में उपस्थित थे।
इस तरह अदालत ने एक तरफ अपीलकर्ता को सजा के तत्काल प्रभाव से राहत दी, वहीं दूसरी तरफ मृतका के परिवार के मुआवजे के हित को भी सुरक्षित रखा।
अब दोषसिद्धि पर रोक का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?
मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न अब दोषसिद्धि पर रोक का है।
किसी व्यक्ति को केवल सजा निलंबित होने से ट्रायल कोर्ट के दोषी ठहराने वाले निष्कर्ष से तत्काल मुक्ति नहीं मिलती। दोषसिद्धि तब तक बनी रहती है जब तक अपीलीय अदालत उसे पलट नहीं देती या उपयुक्त परिस्थितियों में उसके प्रभाव पर रोक नहीं लगाती।
राजू कुमार सिंह की ओर से इसी कारण हाईकोर्ट के सामने दोषसिद्धि पर रोक लगाने का आग्रह किया गया है।
दूसरी ओर, राज्य और मृतका के परिवार को इस मांग पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जा रहा है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है और पीड़ित परिवार को भी सुनवाई में अपना पक्ष रखने की अनुमति दी है।
इससे स्पष्ट है कि अदालत इस प्रश्न को केवल सजा के निलंबन की तरह नहीं देख रही, बल्कि दोषसिद्धि के प्रभाव और उससे जुड़े कानूनी परिणामों पर अलग से विचार कर रही है।
विधायक की सदस्यता पर भी पड़ा प्रभाव
चार वर्ष की सजा सुनाए जाने के बाद राजू कुमार सिंह की विधानसभा सदस्यता पर भी कानूनी प्रभाव पड़ा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, चार वर्ष की सजा के बाद उन्हें विधानसभा सदस्य के रूप में अयोग्यता का सामना करना पड़ा था।
यही कारण है कि दोषसिद्धि पर रोक का प्रश्न उनके लिए व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस मामले में अंतिम स्थिति अदालत के आगे के आदेशों और अपील के परिणाम पर निर्भर करेगी।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सजा पर रोक और दोषसिद्धि पर रोक दो अलग-अलग कानूनी राहतें हैं। जुलाई में हाईकोर्ट ने सजा निलंबित की थी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि समाप्त हो गई।
ट्रायल कोर्ट के फैसले में क्या कहा गया था?
ट्रायल कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर विचार किया था।
फैसले में कुछ गवाहों के hostile होने के बावजूद अदालत ने अन्य गवाहों के बयानों को विश्वसनीय माना। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अर्चना गुप्ता को गोली लगने से पहले राजू कुमार सिंह ही फायरिंग कर रहे थे।
अदालत ने यह भी माना कि भीड़ के बीच पिस्तौल से कई राउंड फायरिंग करना ऐसा कृत्य था जिसमें किसी व्यक्ति को गोली लगने और उसकी मृत्यु होने की संभावना का ज्ञान होना चाहिए।
इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट ने धारा 304 पार्ट-II के तहत दोषसिद्धि दर्ज की।
मामले में आगे क्या होगा?
अब दिल्ली हाईकोर्ट के सामने मुख्य अपील और दोषसिद्धि पर रोक से संबंधित आवेदन पर आगे की सुनवाई होगी। राज्य को अपना जवाब दाखिल करना है और मृतका के परिवार को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।
हाईकोर्ट अंततः उपलब्ध रिकॉर्ड, ट्रायल कोर्ट के फैसले, पक्षकारों की दलीलों और लागू कानून के आधार पर यह तय करेगा कि दोषसिद्धि पर रोक की मांग के संबंध में क्या आदेश दिया जाए।
इस स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि दोषसिद्धि खत्म हो गई है या विधायक को मामले में अंतिम राहत मिल गई है। अभी ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि वाला फैसला अपील में चुनौती के अधीन है।
सजा पर रोक और दोषसिद्धि पर रोक में अंतर समझना जरूरी
आम तौर पर अदालत के आदेशों की खबरों में दोनों शब्दों को एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से दोनों की भूमिका अलग है।
यदि अदालत सजा निलंबित करती है, तो दोषी व्यक्ति को अपील के दौरान जेल की सजा भुगतने से अस्थायी राहत मिल सकती है, बशर्ते अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों का पालन किया जाए।
लेकिन यदि अदालत दोषसिद्धि पर रोक लगाती है, तो इसका प्रभाव दोषी ठहराए जाने वाले फैसले के कानूनी प्रभावों पर पड़ सकता है।
राजू कुमार सिंह के मामले में जुलाई में सजा निलंबित हो चुकी है। लेकिन दोषसिद्धि पर रोक की मांग पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यही वजह है कि मामला अभी भी महत्वपूर्ण कानूनी चरण में है।
निष्कर्ष
2018 की नववर्ष पार्टी में हुई फायरिंग से शुरू हुआ यह मामला अब लगभग आठ वर्ष बाद भी अदालत में कानूनी प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण में है। अर्चना गुप्ता की मौत के मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने 4 जुलाई 2026 को राजू कुमार सिंह को IPC की धारा 304 पार्ट-II और Arms Act के तहत दोषी ठहराते हुए चार वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनाई थी। मृतका के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया गया था।
इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 27 जुलाई को अपील लंबित रहने के दौरान चार वर्ष की सजा को निलंबित कर दिया और जमानत की शर्तों पर रिहाई का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि 25 लाख रुपये की मुआवजा राशि रजिस्ट्री में जमा की जाए।
लेकिन दोषसिद्धि पर रोक का सवाल अभी अलग से विचाराधीन है। इस पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा गया है और मृतका के परिवार को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।
इसलिए मौजूदा स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है: राजू कुमार सिंह को चार वर्ष की सजा के तत्काल क्रियान्वयन से अंतरिम राहत मिल चुकी है, लेकिन ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि अभी समाप्त नहीं हुई है। दोषसिद्धि पर रोक और अपील के अंतिम परिणाम के संबंध में आगे दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय महत्वपूर्ण होगा।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
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यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।