₹260 के अखरोट के ऑनलाइन विज्ञापन ने पहुंचाया उपभोक्ता आयोग तक मामला, Google को 45 दिन में ₹21,260 देने का आदेश
ऑनलाइन खरीदारी के दौरान बेहद कम कीमत और भारी छूट देखकर किसी विज्ञापन पर भरोसा करना उपभोक्ता को महंगा पड़ सकता है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में ऐसा ही एक मामला जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग के सामने पहुंचा, जहां एक उपभोक्ता ने Google के प्लेटफॉर्म पर दिखाई दिए ऑनलाइन विज्ञापन के आधार पर एक किलो अखरोट की गिरी खरीदने के लिए ₹260 का भुगतान किया, लेकिन उसे न तो सामान मिला और न ही संबंधित विक्रेता की ओर से कोई संतोषजनक जानकारी दी गई।
मामले की सुनवाई के बाद जिला उपभोक्ता आयोग, ग्वालियर ने Google India Private Limited के अधिकृत अधिकारी के खिलाफ दायर परिवाद में कंपनी को उपभोक्ता को कुल ₹21,260 का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखाए गए विज्ञापन को आकर्षक और भ्रामक माना तथा शिकायत के बाद संबंधित विज्ञापनदाता के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी उपलब्ध नहीं कराने को सेवा में कमी के रूप में देखा।
जिला आयोग के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शर्मा ने 28 सितंबर 2026 को यह आदेश बृजमोहन महाजन द्वारा प्रस्तुत परिवाद पर दिया।
87 प्रतिशत छूट देखकर खरीदने का फैसला
मामला 3 अक्टूबर 2023 का है। परिवाद के अनुसार, बृजमोहन महाजन Google नेटवर्क पर समाचार देख रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक वेबसाइट का ऑनलाइन विज्ञापन दिखाई दिया।
विज्ञापन में वेबसाइट का नाम “हैप्पी अवर्स-6 दिवाली सेल ऑनलाइन” बताया गया था। इसमें एक किलो अखरोट की गिरी केवल ₹260 में उपलब्ध होने का दावा किया गया था।
विज्ञापन में उत्पाद पर करीब 87 प्रतिशत की छूट बताई गई थी। साथ ही यह भी प्रदर्शित किया गया था कि ऑफर सीमित समय के लिए उपलब्ध है।
कम कीमत, भारी छूट और सीमित समय का संदेश देखकर उपभोक्ता ने विज्ञापन पर भरोसा किया और वेबसाइट के माध्यम से ₹260 का भुगतान कर दिया।
लेकिन भुगतान के बाद कहानी बदल गई।
उपभोक्ता के अनुसार, तय सामान की डिलीवरी नहीं हुई। इसके बाद विक्रेता की ओर से भी कोई स्पष्ट जानकारी या संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। उपभोक्ता को यह समझ नहीं आया कि भुगतान लेने के बाद ऑर्डर का क्या हुआ और सामान कब मिलेगा।
शिकायत के बाद Google से भी संपर्क किया
जब सामान नहीं पहुंचा तो बृजमोहन महाजन ने मामले को लेकर Google से शिकायत की।
उनकी ओर से यह मुद्दा उठाया गया कि जिस विज्ञापन के आधार पर उन्होंने खरीदारी की थी, वह Google के नेटवर्क पर दिखाई दिया था और विज्ञापन में बताए गए ऑफर के आधार पर उन्होंने भुगतान किया था।
शिकायत के जवाब में कंपनी की ओर से संबंधित वेबसाइटों या शिकायत दर्ज कराने के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई गई। हालांकि परिवाद के अनुसार, उपभोक्ता को यह स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि संबंधित विज्ञापनदाता के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
यही बात बाद में उपभोक्ता आयोग के सामने भी महत्वपूर्ण रही।
आयोग ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि यदि किसी प्लेटफॉर्म पर उपभोक्ता को आकर्षित करने वाला विज्ञापन प्रदर्शित होता है और बाद में उसके संबंध में शिकायत की जाती है, तो शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।
आयोग ने माना विज्ञापन आकर्षक और भ्रामक था
जिला उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में विज्ञापन की प्रकृति पर भी विचार किया।
आयोग के सामने यह तथ्य था कि एक किलो अखरोट की गिरी जैसे उत्पाद को 87 प्रतिशत छूट के साथ केवल ₹260 में उपलब्ध बताया गया था। इसके साथ सीमित समय के ऑफर का उल्लेख भी था।
आयोग के अनुसार, इस तरह का प्रस्ताव उपभोक्ता को खरीदारी के लिए आकर्षित करने वाला था।
यानी विज्ञापन की कीमत और छूट को केवल सामान्य प्रचार के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि आयोग ने माना कि इसके जरिए उपभोक्ता को खरीदारी के लिए प्रेरित किया गया।
इसके बाद जब सामान की डिलीवरी नहीं हुई और शिकायत के बाद भी संबंधित विज्ञापनदाता के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी उपभोक्ता को नहीं मिल सकी, तो आयोग ने इसे सेवा में कमी के दायरे में माना।
Google की अनुपस्थिति में हुई एकपक्षीय कार्रवाई
मामले की सुनवाई के दौरान जिला आयोग ने Google कंपनी को नोटिस जारी किया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कंपनी की ओर से मामले में उपस्थित नहीं होने के कारण आयोग ने एकपक्षीय कार्यवाही की।
इसके बाद परिवादी बृजमोहन महाजन ने अपने दावे के समर्थन में शपथपत्र और संबंधित दस्तावेज आयोग के सामने पेश किए।
आयोग ने उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रस्तुत सामग्री के आधार पर मामले पर विचार किया।
उपभोक्ता की ओर से यह दावा किया गया था कि उसने विज्ञापन पर भरोसा करके भुगतान किया, लेकिन उसे उत्पाद प्राप्त नहीं हुआ। साथ ही शिकायत के बाद भी समस्या का संतोषजनक समाधान नहीं हुआ।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने Google के खिलाफ आदेश पारित किया।
उपभोक्ता ने मांगे थे चार लाख रुपये
बृजमोहन महाजन ने आयोग के सामने केवल ₹260 वापस करने की मांग नहीं की थी।
उन्होंने मानसिक परेशानी और क्षतिपूर्ति के लिए ₹4 लाख तथा मुकदमे के खर्च के लिए ₹10 हजार की राशि की मांग की थी।
हालांकि आयोग ने उपभोक्ता की ओर से मांगी गई पूरी राशि स्वीकार नहीं की।
आयोग ने अपने आदेश में उपभोक्ता को हुई परेशानी और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मानसिक परेशानी के लिए ₹20 हजार तथा प्रकरण व्यय के लिए ₹1 हजार देने का आदेश दिया।
इसके अलावा भुगतान किए गए मूल ₹260 को भी वापस करने का निर्देश दिया गया।
इस तरह कुल राशि ₹21,260 बनती है।
आयोग ने उपभोक्ता की सावधानी को भी माना जरूरी
इस मामले में आयोग ने केवल प्लेटफॉर्म की भूमिका पर ही विचार नहीं किया, बल्कि उपभोक्ता की जिम्मेदारी के पहलू को भी देखा।
आयोग ने माना कि अत्यधिक छूट वाले विज्ञापन से प्रभावित होकर किसी वेबसाइट पर खरीदारी करने से पहले उपभोक्ता को भी पर्याप्त सावधानी बरतनी चाहिए।
ऑनलाइन खरीदारी में वेबसाइट की विश्वसनीयता, विक्रेता की जानकारी, संपर्क विवरण, भुगतान के तरीके, रिटर्न और रिफंड नीति तथा वेबसाइट की प्रामाणिकता की जांच करना उपभोक्ता के लिए उपयोगी सावधानी हो सकती है।
इसी कारण आयोग ने उपभोक्ता द्वारा मांगी गई ₹4 लाख की मानसिक क्षतिपूर्ति और ₹10 हजार के प्रकरण व्यय को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
आयोग ने इसके बजाय निर्धारित राशि के भुगतान का आदेश दिया।
45 दिन के भीतर करना होगा भुगतान
जिला उपभोक्ता आयोग ने Google कंपनी को आदेश दिया है कि वह निर्धारित आदेश के अनुसार 45 दिनों के भीतर उपभोक्ता को राशि का भुगतान करे।
इसमें शामिल हैं—
- ₹260 — उत्पाद के लिए भुगतान की गई राशि
- ₹20,000 — मानसिक परेशानी के लिए क्षतिपूर्ति
- ₹1,000 — प्रकरण व्यय
इस प्रकार कुल भुगतान ₹21,260 होगा।
आयोग ने भुगतान की समय सीमा भी निर्धारित की है। यदि निर्धारित अवधि में राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो आदेश में ब्याज का भी प्रावधान किया गया है।
भुगतान में देरी पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज
आयोग ने कहा है कि निर्धारित अवधि में राशि का भुगतान नहीं होने पर पूरी देय राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
यह ब्याज आदेश की तारीख से वास्तविक भुगतान होने तक लागू होगा।
इसका मतलब है कि यदि कंपनी निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं करती है तो केवल ₹21,260 की मूल राशि ही देनी नहीं होगी, बल्कि आदेश में निर्धारित ब्याज भी जुड़ सकता है।
इस तरह आयोग ने अपने आदेश के पालन के लिए समय सीमा के साथ आर्थिक परिणाम भी तय किया है।
भ्रामक विज्ञापनों को लेकर आयोग की टिप्पणी
मामले में आयोग ने ऑनलाइन विज्ञापन की भूमिका पर भी ध्यान दिया।
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए उपभोक्ताओं तक बड़ी संख्या में विज्ञापन पहुंचते हैं। कई बार किसी उत्पाद पर भारी छूट, सीमित समय का ऑफर या असाधारण कम कीमत दिखाकर ग्राहक को तुरंत खरीदारी के लिए प्रेरित किया जाता है।
ऐसे विज्ञापनों में यदि उत्पाद की डिलीवरी नहीं होती या विक्रेता बाद में संपर्क से बाहर हो जाता है, तो उपभोक्ता के लिए समस्या खड़ी हो सकती है।
ग्वालियर जिला उपभोक्ता आयोग के इस मामले में भी विज्ञापन में बताई गई कीमत और छूट को महत्वपूर्ण तथ्य माना गया।
आयोग ने Google कंपनी को इस तरह के भ्रामक विज्ञापनों के लिए अपने मंच के उपयोग को प्रतिबंधित करने की कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया है।
ऑनलाइन विज्ञापन देखने वाले उपभोक्ताओं के लिए क्या सीख?
इस मामले से ऑनलाइन खरीदारी करने वाले लोगों के लिए कई व्यावहारिक बातें सामने आती हैं।
यदि किसी उत्पाद की कीमत सामान्य बाजार मूल्य की तुलना में असाधारण रूप से कम दिखाई दे रही हो, तो खरीदारी से पहले वेबसाइट की विश्वसनीयता की जांच करना जरूरी है।
उदाहरण के लिए, वेबसाइट का डोमेन, कंपनी का नाम, पता, ग्राहक सेवा नंबर, रिफंड पॉलिसी और अन्य उपभोक्ता समीक्षाओं की जांच की जा सकती है।
सिर्फ किसी बड़े सर्च इंजन या इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन दिखाई देने से यह जरूरी नहीं हो जाता कि विज्ञापन में दिया गया विक्रेता स्वतः विश्वसनीय साबित हो जाए।
ऑनलाइन विज्ञापन और वास्तविक विक्रेता के बीच अंतर को समझना भी महत्वपूर्ण है।
विज्ञापन दिखाने वाले प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर भी सवाल
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें केवल फर्जी या संदिग्ध ऑनलाइन विक्रेता की भूमिका नहीं, बल्कि उस डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठा है जहां विज्ञापन दिखाई दिया।
उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में इस पहलू को महत्व दिया कि शिकायत के बाद संबंधित विज्ञापनदाता के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
हालांकि इस आदेश को केवल इस आधार पर सामान्य नियम के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए कि किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखाई देने वाले विज्ञापन के लिए प्लेटफॉर्म स्वतः विक्रेता के समान जिम्मेदार होगा। प्रत्येक मामले में तथ्य, प्लेटफॉर्म की भूमिका, शिकायत के बाद की कार्रवाई और लागू कानून अलग-अलग हो सकते हैं।
ग्वालियर आयोग का यह आदेश अपने विशिष्ट तथ्यों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर दिया गया है।
₹260 से शुरू हुआ मामला पहुंचा ₹21,260 तक
इस पूरे मामले में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि शुरुआत केवल ₹260 के भुगतान से हुई थी।
उपभोक्ता ने एक किलो अखरोट की गिरी खरीदने के लिए ₹260 दिए थे। लेकिन जब उत्पाद नहीं मिला और विवाद उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा, तो आयोग ने मानसिक परेशानी और मुकदमे के खर्च को ध्यान में रखते हुए कुल ₹21,260 के भुगतान का आदेश दिया।
इससे यह भी पता चलता है कि उपभोक्ता विवादों में केवल वस्तु की मूल कीमत ही एकमात्र मुद्दा नहीं होती। परिस्थितियों के अनुसार मानसिक परेशानी, सेवा में कमी और मुकदमे से जुड़े खर्च की क्षतिपूर्ति का भी प्रश्न उठ सकता है।
आयोग के आदेश का व्यापक महत्व
ग्वालियर जिला उपभोक्ता आयोग का यह आदेश ऑनलाइन खरीदारी और डिजिटल विज्ञापनों से जुड़े विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
इंटरनेट पर विज्ञापन अब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का एक प्रमुख माध्यम हैं। ऐसे में विज्ञापन की विश्वसनीयता, विक्रेता की पहचान और शिकायतों के निवारण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है।
दूसरी ओर, उपभोक्ताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे अत्यधिक आकर्षक ऑफर देखकर बिना जांच-पड़ताल के भुगतान न करें।
इस मामले में आयोग ने दोनों पहलुओं पर ध्यान दिया। एक तरफ प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित विज्ञापन और शिकायत के बाद की कार्रवाई को लेकर कंपनी की भूमिका पर सवाल उठाया गया, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ता को भी भारी छूट वाले ऑफर पर खरीदारी करने से पहले सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई।
फिलहाल आदेश के अनुसार Google को 45 दिन के भीतर बृजमोहन महाजन को ₹21,260 का भुगतान करना होगा। भुगतान में देरी होने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
यह मामला ऑनलाइन खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में सामने आया है कि इंटरनेट पर दिखने वाले असाधारण ऑफर पर भुगतान करने से पहले विक्रेता और वेबसाइट की विश्वसनीयता की जांच करना कितना जरूरी है। साथ ही यह आदेश यह सवाल भी सामने लाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित विज्ञापनों के संबंध में शिकायत आने पर प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और उपभोक्ता संरक्षण के बीच कानूनी संतुलन किस तरह तय किया जाए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।